फर्रुखाबाद के 300 वर्ष: 1714 में फैली थी सफेद दाग की भयाभय बीमारी

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FARRUKHABAD : एक समय जनपद में सफेद दाग की इतनी भयाभय बीमारी फैल गयी कि नबाब ने पूरे सल्तनत में प्रत्येक कुंए के पास एक नींव का पेड़ लगाने का फरमान जारी कर दिया था। बमुश्किल इस बीमारी पर काबू पाया जा सका। लेकिन जानकारों के मुताबिक वर्तमान में फिर यही बीमारी जनपद में पनपना शुरू हो गयी है। जिसकी मुख्य बजह खेतों में बगैर परीक्षण के डाली जाने वाली खाद है।babool

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सन 1714 में नबाब मोहम्मद खां बंगश ने अपनी सल्तनत फर्रुखाबाद के अंदर सफेद दाग जैसी गंभीर बीमारी के बारे में सुना तो इस पर रायमसविरा किया गया। बंगश के बुलाने पर ईरान से हकीम, अल्की खां दिल्ली पहुंचे। जहां से उन्हें फर्रुखाबाद भेजा गया था। हकीम अल्की खां उस दौर में जाने माने वैद्य हुआ करते थे। उन्होंने जनपद पहुंचकर नबाब मोहम्मद खां बंगश को इस बीमारी के पनपने का कारण बताया तो नबाव भौचक्के रह गये।

हकीम ने कहा कि इस समय सल्तनत में जंगली बबूलों के जंगल हैं जो वातावरण को दूषित कर रहे हैं इस बजह से यह बीमारी लोगों में फैलती जा रही है। नबाब ने फरमान जारी कर दिया कि उसकी सल्तनत में जंगली बबूल के पेड़ों को काट लिया जाये और प्रत्येक कुएं के पास एक नीम का पेड़ अवश्य लगाया जाये। जिससे इस बीमारी पर काबू पाया जा सके। उस समय तो बीमारी काफी हद तक सही कर दी गयी। लेकिन वर्तमान में पुनः इस बीमारी से सम्बंधित मरीजों की तादाद बढ़ती जा रही है।
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जिसकी मुख्य बजह सरकार द्वारा जंगली बबूलों के पेड़ सड़कों के किनारे लगवाना और खाद को बगैर भूमि की उर्वरा शक्ति का परीक्षण कराये डालना और उसमें बीमारियों से बचाने के लिए जहरीला कैमिकल भी मुख्य बजह बनी हुई है। सब्जियों में सबसे ज्यादा घातक आलू की फसल में डाले जाने वाला कीटनाशक है। अधिक पैदावार के लिए किसान मनमुताबिक खाद डालकर आलू की पैदावार बढ़ाता है।

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