देर भी अंधेर भी: आधे से अधिक मुकदमों में आरोपी बाइज्जत बरी

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फर्रुखाबाद: सब जानेत हैं कि आम पीडि़त व्यक्ति के लिये पहले तो एफआईआर लिखाना ही कितना मुश्किल होता है, फिर दौड़-धूप, खुशामद या मीडिया की सरगर्मी के चलते यदि एफआईआर दर्ज भी हो गयी तो पुलिस की लचर पैरवी के चलते अधिकांश आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं, और पीड़ित टापता रह जाता है। यद्यपि पुलिस गवाहों के मुकरने या पक्षद्रोही हो जाने के अधिकांश मामलों में ठीकरा वादी के ही सर फोड़ कर पल्ला झाड़ लेती है। शासन की ओर से प्रभावी पैरवी के कड़े निर्देशों के बावजूद माह जून में हुए कुल 15 फैसलों में से 8 मुकदमों में आरोपी बाइज्जत बरी हो गयी, जबकि मात्र  7 में ही सजा सुनाई गयी।

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न्यायपालिका की सक्रियता के चलते मुकदों के निस्तारण में कुछ तेजी तो आयी है, परंतु पुलिस की चाल और चरित्र में परिवर्तन अभी आना बाकी है। न्यायालयों को अभिलेख और गवाहियों के लिये पुलिस कर्मियों को न्यायिक नोटिस जारी करने पड़ते हैं, कई मामलों में तो नोटिस के बावजूद आदेशों का अनुपालन न किये जाने पर उनके वेतन रोकने तक की कार्रवाई करनी पड़ती है। कहा जाता है कि न्याय में देरी अन्याय है (Justice delayed is Justice denied) या इंसाफ में देर हो सकती है पर अंधेर नहीं। परंतु यहां तो देर भी है और अंधेर भी। शुक्रवार को मासिक समीक्षा बैठक के दौरान जो आंकड़े सामने आये उनके अनुसार माह जून में हुए कुल 15 फैसलों में से 8 मुकदमों में आरोपी बाइज्जत बरी हो गयी, जबकि मात्र  7 में ही सजा सुनाई गयी। जिला शासकीय अधिवक्ता चंद्रशेखर के अतिरिक्त एडीजीसी शैलेंद्र सिंह चौहान, राम कुमार त्रिवेदी व पैनल लायर अवनीश कुमार सिंह द्वारा पैरवी किये गये चारों मुकदमों में अपराधियों को सजा हुई। एडीजीसी योगेश कुमार दुबे ने तीन मुकदमों की पैरवी की जिसमें दो मुकदमो में अपराधी सजा पाये। रामप्रकाश राजपूत ने भी दो में से एक मुकदमें में अपराधियों को सजा दिलवाई। एडीजीसी अश्वनी कुमार तिवारी, लक्ष्मीचंद्र यादव व मोहम्मद हलीम और पैनल लायर निर्मल चंद्र कटियार व एसपीओ आरडी निगम की पैरवी वाले सभी आधा दर्जन मुकदमों में आरोपी बाइज्जत बरी हो गये।

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