चुनावी जुगाड़: आलू के साथ रूठों को बफादारी का नमक चटानें का प्रयास!

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फर्रुखाबाद:(जेएनआई ब्यूरो) ख़्वाजा साजिद ने खूब एक शेर कहा है कि कल सियासत में भी मोहब्बत थी, अब मोहब्बत में भी सियासत है! यह उस आलू पार्टी के ऊपर सटीक बैठती है जो शुक्रवार को रूठों को मनाने के लिए आयोजित की गयी थी| आलू पार्टी शहर के माननीय के लिए पार्टी के एक अतिविशिष्ठ माननीय के द्वारा सजायी गयी थी | पांच साल तक जिन्हें देखना भी पसंद नही किया आज हुजुर उस पार्टी में उनमे अपना पन तलाश करते दिखे| आलू पार्टी के बहाने बुलाये गये प्रबुद्धजनों को अब बफादारी का नमक चटाने का असफल प्रयास किया गया|
दरसल शहर के एक प्रबुद्धजनों के नेता को पार्टी फिर से टिकट मिला है| लेकिन पिछली सरकार आनें के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने सबसे करीबियों को ही किनारे का रास्ता दिखाया| इसके बाद उन्होने दो अपने खास सिपेहसालारों को सत्ता की काजू और बादाम खिलायी| पता चला उन चौकीदारों के पांच साल में गगनचुंबी हबेलियाँ बन गयी| लेकिन जो पिछले चुनावों में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे उनकी शायद बाइक भी बिना चालान के सिफारिश के बाद नही छूटी| जिससे सभी नें उनसे किनारा कर लिया| इसका भी महोदय पर कोई फर्क नही पड़ा और अब जब चुनाव में उन्हें पुन: टिकट दिया है तो अब उन्हें अपनों की याद आ रही है| फोन पर उनकी खुशामद कर रहें है| जब इस तरह से दाल नही गली तो सातनपुर आलू मंडी के सामने एक गोदाम में आलू की पार्टी के बहाने सभी रूठो को बुलाया गया| आलू के साथ चटनी नमक दिया गया| खाते-खाते लगातार उनके अमूल का मख्खन मलमल के लगाया गया लेकिन वह हाथ से फिसल गये| आलू खाते-खाते अनायस ही रूठों का गुस्सा ज्वारभाटा बनकर माननीय के खिलाफ फुट पड़ा| आलू पार्टी में आये अधिकतर लोग एक वर्ग के ही थे| उनका दर्द छलका और बोले की जो पांच साल उनके साथ रहे उन्ही को अब चुनाव में बुला लें| एक सज्जन बोले जो माननीय नें पांच साल तक अपने निजी दो अधिकारी बना रखे थे उन्ही से काम ले लें| जब वह डेढ़ लाख से जीत ही रहे है तो फिर क्या करना| जब उन्हें हम फोन करते थे तो वह उठाते नही थे| अब उनके दोनों जय-विजय कहा बिलुप्त हो गये| लेकिन जबाब में यही समझाया गया कि अब यह नही होगा आप सब चुनाव लड़ायें| लेकिन इसके बाद भी कोई भरोसे पर तैयार नही हुआ! सामने बैठे एक अति विशिष्ट माननीय से कहा कि आप 2024 में फिर लड़ें हम आपके साथ है| लेकिन इसके लिए मन गबाही नही दे रहा| यह गुफ्तगू चल ही रही थी की अपने हक में फैसले का इंतजार कर रहे शहर के माननीय आ धमकेबस फिर क्या था एक-एक करके लोग खिसक गये| फिर माहौल इस तरह बना की एक शख्स नें मुनव्वर राणा का शेर गुनगुनाया की बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है, बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है!