“हर-हर मोदी” नारे का विरोध करके भाजपा का काम मीडिया और विरोधियो ने कर दिया

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Editor(पंकज दीक्षित) बेसिर पैर की खबरो से मुद्दो को भटकाने का प्रयास हो रहा है, टीवी मीडिया/मीडिया की नादानी है या फिर खालिस टीआरपी का खेल| लोकसभा चुनाव में नेता मुद्दो पर चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते| इसीलिए वे विरोधियो के भी उन मुद्दो को हवा देते है जिसने किसी को भी नुकसान या नफा नहीं होता| नेता तो यूपी में एक बार फिर से जात धर्म पर चुनाव लड़ रहे है| सपा बसपा कांग्रेस और भाजपा चारो पार्टियां जातीय आंकड़ो को ही हावी रहने देना चाहते है| आखिर हमाम में सभी नंगे जो है| दाग किसी के दामन पर कम है तो किसी के दामन पर ज्यादा| बरहाल बेदाग़ कोई भी नहीं है| “हर हर मोदी” के नारे का विरोध टीवी मीडिया में सिर्फ सुर्खिया बनाने के धंधे की देन है|

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टीवी रिपोर्टर को कुछ नया करके खबरो को सुर्खिया बनाने का जोश आया| उसने हर हर मोदी के नारे को टारगेट बनाया, हमेशा मोदी का विरोध करने वाले संत को तलाशा और उसकी बयान रिकॉर्ड किया और टीवी स्टूडियो में भेज दिया| डेस्क पर बैठे लोगो को कुछ नया ब्रेकिंग लगा चालू हो गए- “हर हर मोदी नारे का विरोध”| दो चार बयान मोदी के विरोध करने वालो से लिए और टीवी पर खबर चमकने लगी| एक चेनल पर एक नेता से चमकी तो दूसरे पर दूसरे नेता से| तत्काल दूसरे रिपोर्टरो ने अपने अपने इलाके में नामी गिरामी दूसरे दलो के नेता तलाशने शुरू कर दिए| ध्यान रखिये किसी नेता ने बुलाकर किसी मीडिया को बयान नहीं दिया| रिपोर्टर खुद सवाल पूछने गए- भाजपा प्रचार के लिए हर हर मोदी नारे का इस्तेमाल कर रही है आपका क्या कहना है| अब विरोधी नेता को क्या कहना है जाहिर है सिर्फ विरोध करना है कह दिया ‘मोदी पहले कांग्रेस भगाओ कह रहे थे अब भगवान् को की हटा दिया और खुद को भगवान् की जगह स्थापित कर दिया”| चलने लगी खबर| बयान बहादुरो की पौ बारह हो गयी| सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह, लेखी से लेकर प्रमोद कृषणन तक छा गए| और फिर चेनल पर पैनल बैठ गए| एएनआई, पीटीआई जैसी एजेंसियो ने एक दूसरे से विडियो मांंग सलमान खुर्शीद, दिग्विजय, आचार्य प्रमोद कृष्णन आदि आदि नेताओ और धर्माचार्यो के ट्वीट श्रुरु कर दिए| मगर इन सब में छा कौन रहा था? सोचने की बात है|

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भाजपा का काम मीडिया और विरोधियो ने कर दिया-
जिस नारे पर आम जनता का ध्यान नहीं जा रहा था| उसे हाईलाइट कर दिया गया| मीडिया की उपज थी| इसमें मोदी का कुछ भी नहीं| विरोध जितना ज्यादा हुआ उतना ही जल्दी नारा घर घर पंहुचा| काम पूरा हो गया| जो काम बीजेपी वालो को करना था उसे पूरे भारत की मीडिया ने कर दिया| नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया- अति उत्साह में भी इस नारे का इस्तेमाल नहीं किया जाए| तब तक काम हो चुका था| आज तक लाइव बनारस में इस नारे पर लाइव कर रहा था| लगभग हर टीवी चैनेल पर सुबह से शाम दो दिन लाइव पैनल बैठने लगे| सवाल एक ही रहा- ‘हर हर महादेव की जगह- हर हर मोदी कितना सार्थक” | “मोदी को तीन फुल टाइम दिन मिले इस नारे से टीवी पर”- जरा सोचिये|
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शब्दो का अर्थ कौन तय करेगा-
शब्दो के मायने अपने अपने अंदाज में बयान कर रहे थे| जैसे दुनिया के सभी शास्त्र, वेड और पुराण उसकी व्यख्या करने वालो ने ही पढ़े है| मानो इस ब्रह्माण्ड में शब्दो की उत्पति इन्ही टीवी पैनल पर बैठ बहस करने वाले नेताओ और धर्माचार्यो की देन है| किस शब्द का मायना क्या होगा अब यही तय करेंगे| कोई “हर-हर” को समस्या हरने से जोड़ रहा था तो कोई “हर-हर” को जय जय बता रहा था| क्या सही था क्या गलत ये तय नहीं किया जा सकता क्योंकि भाषा और अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई अंकुश नहीं है| उत्तर प्रदेश में कई शब्द ऐसे इस्तेमाल रोजमर्रा की भाषा में इतेमाल किये जाते है जो पंजाब में बोलने पर जूते पड़ सकते है| असांविधानिक होने के बाबजूद माँ बहन की गलियां घर घर में बहु बेटियो के समक्ष दी जा रही है| उस पर टीवी मीडिया धर्माचार्य भड़कते नहीं दीखते क्योंकि शरीर के अंगो को अभिव्यक्त करते हुए दो चार गलिया अंग्रेजी में न दे ले तो तो पढ़े लिखे और खुद को अत्याधुनिक कहने वालो को भी लगता है कि उन्होंने कोई महत्वपूर्ण काम छोड़ दिया है| शब्द अभिव्यक्ति का माध्यम है उसके अर्थ अलग अलग जगह अलग अलग हो सकते है| यही पढ़ाया जाता है भाषा से ग्रेजुएट करते समय| सब भूल गए सिर्फ लोकतंत्र के पर्व में अच्छी संसद के गठन में सार्थक भूमिका निभाने की जगह सिर्फ टीआरपी और हर हर मोदी याद आया|

चुनाव के समय मीडिया पर सार्थक मुद्दो का महत्त्व-
चुनाव के समय मीडिया की जिम्मेदारी अतिरिक्त रूप से बढ़ जाती है| मीडिया को नेताओ के गलत और सही की को जनता तक पहुचाने की जिम्मेदारी भी होती है| जनता को अच्छे लोगो को चुनकर संसद में पहुचाने में सहयोग करने का काम बढ़ जाता जाता है| ऐसे में हम क्या कर रहे है सोचना पड़ेगा| जनता मीडिया पर भरोसा करती है| इसका मतलब यह नहीं कि मीडिया कुछ भी परोस कर अपना काम पूरा कर ले| चुनाव का समय है| अभी भी जनता को ये जानना जरुरी है कि किस नेता का असली करेक्टर क्या है| किसके पास विजन है कौन खालिस जात धर्म और अपराध के बल पर चुनाव जीतने/हारने जा रहा है| गरीबी, भर्ष्टाचार, महगाई, अपराध, विदेश निति, आर्थिक निति जैसे दर्जनों मुद्दे है जिन पर चुनाव के समय तो लगातार बहस चलती रही चाहिए| जनता को भी फैसला लेते समय नए नए विषयो पर सोचने के लिए दिशा मिलेगी| याद रखिये दिशा आज भी मीडिया तय करता है| अब हर हर मोदी के नारे के विरोध से मीडिया अपना सार्थक समय नष्ट करके भाजपा को लाभ पंहुचा रहा है या फिर जनता का नुकसान कर रहा है|

जरा सोचिये-

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