सदस्य फॉर सेल- न अजेंडा न वादा

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बड़ा सवाल भारत के लोकतंत्र में खड़ा किया है देश की संसद से सैकड़ो किलोमीटर दूर एक गाँव के लोगो ने| जिन प्रतिनिधिओ को जनता चुन कर भेजती है क्या उन्हें जनता से बिना पूछे या सलाह लिए वोट देने का अधिकार होना चाहिए?
पीवी नरसिहं राव की केंद्र सरकार में जनता के चुने हुए प्रतिनिधिओ की खरीद फरोख्त के मामले की सुर्ख़ियों में आने के बाद ये सवाल रह रह कर देश की जनता के बीच उबाल मारता रहा है|
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद का एक गाँव भावन में सर्दी की देर शाम अलाव किनारे बैठ पड़े लिखे नौजवानों के बीच चल रही बहस बड़ा चिंतन दर्शा रही थी लोकतंत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार की| ३५ वर्षीय विनोद त्रिवेदी गाँव का तेज तर्रार नौजवान है| संसद की खबरों को गाँव से जोड़ कर देखता सुनता रहता है| उसके जैसे कई साथी आज प्रदेश में पंचायत चुनाव पर चर्चा कर रहे थे|
लोकतान्त्रिक इकाई के उच्च सदन राज्य सभा और विधान परिषद् में सदस्यों को चुनने में वोटो के खरीद फरोख्त का नीच काम परम्परा बन चुका है| फिर काहे का उच्च सदन| चर्चा बड़ी और उत्तर प्रदेश में चल रहे जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव पर आकर अटक गयी| कुछ १५ दिन पहले ही जिला पंचायत सदस्य बनने के लिए नेताओ ने उनके गाँव में भी धमाचौकड़ी की थी| वोट की चिरौरी के साथ ५ साल तक सुख दुःख में साथ निभाने और जमकर विकास कराने का वादा कर वोट मांगे थे| चुनाव हुआ और ७ में १ जीत कर जिला पंचायत सदस्य बन गया| अब जिला पंचायत अध्यक्ष चुनने की बारी है और कौन जिला पंचायत बने इसके लिए जनता के हाथ कटे हुए है| वोट उसे करना है जिसे जनता चुन चुकी है और वो उनसे पूछने या सलाह लेने नहीं आ रहा है कि जनता किसे अध्यक्ष बनाना चाहती है|
पूरे उत्तर प्रदेश में १२ को वोट पड़ेंगे, मगर न कोई इनका अजेंडा है न कोई जनता से वादा| बस कौन कितने में बिकेगा और कौन कितने खरीद सकेगा इस पर आकर बहस रुक जाती है और अलाव की आग राख में बदलते ही गाँव की चौपाल सर्द सन्नाटे में बदल जाती है|

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