सतीश के स्‍वागत में लाल दरवाजे से मठिया देवी तक उमड़ा समाजवादी सौहार्द का समंदर

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फर्रुखाबाद: पेशे से वकील व पत्रकार रहे सतीश दीक्षित शुरू से ही खुला खेल फर्रुखाबादी की जीवंत मिसाल और खांटी समाजवादी रहे हैं। अचानक प्रदेश सरकार द्वारा उनको श्रृमसंविदा बोर्ड का अध्‍यक्ष बनाये जाने के साथ ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया। पहली बार लालबत्‍ती कार से फर्रुखाबाद 7 8 10 12 13 17पहुंचने के बाद उन्‍होंन लाल दरवाजे से शहर में घुसते ही कार से उतर कर गुरुगांवदेवी मंदिर तक पैदल ही यात्रा की। इस दौरन उनके स्‍वागत के लिये पार्टी, जाति और धर्म की सीमायें लांघ्‍कर जिस प्रकार समाजवादी सौहार्द का समंदर उमड़ा, वह देखने लायक था।

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सतीश दीक्षित फर्रुखाबाद के राजनैति सामजिक हलकों में यूं तो पहले ही जाना पहचाना नाम हैं। उनकी बेबाक पत्रकारिता और साफ-सुथरी वकालत शुरू से उनकी पहचान है। राजनैतिक क्षेत्र में खंटी समाजवादी सोच और बिना लाग-लपेट के खरी बात कहने की अपनी पुरानी आदत के लिये भी पहचाने जाते हैं। दो दिन पूर्व उनको अचानक प्रदेश सरकार ने श्रृम संविदा बोर्ड का अध्‍यक्ष बनाने के साथ ही उनको केबिनेट मंत्री का दर्जा भी प्रदान कर दिया। इसके बाद से पहली बार जनपद लौटने पर उनका शहर ने भाव-भीना स्‍वागत किया। लखनऊ से वह लाल बत्ती कार में शहर तो लौटे परंतु लाल दरवाजे से गुरुगांव देवी मंदिर तक उन्‍होंने पैदल ही यात्रा की। शुरू से ही जमीनी हकीकतों और जमीनी आदमी से जुड़े रहे सतीश दीक्षित मंगलवार को शहर के मुख्‍य बाजार से गुजरे तो उनको बधाई देने के लिये लोगों का तांता लग गया। पार्टी, धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर मानों उनके पीछे समाजवादी सौहार्द और प्रेम का एक समंदर सा उमड़ पड़ा। कुक्‍कू चौहान हों, हाजी शुएब आंसारी हों, बंटी सरदार हों या अरुण प्रकाश तिवारी ददुआ, सभी सतीश दीक्षित को देखकर मिलने को दौड़ पड़े। मानों हर कोई सतीश दीक्षित को देख कर दो दिन से उनके कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्‍त कर लेने की खबर का देखन कर ही नहीं छूकर भी पुष्‍टि कर लेना चाहता था। हर कोई उनसे मिलकर बधाई देना चाहता था।

जगह जगह दुकानों पर चढ़कर और चाय होटलों में घुसकर लोगों से मिलने की उनकी अदा मानों हर एक के दिल में उतर गयी। घुमना, मित्‍तमकूंचा, चौक, टाउनहाल, मऊदरवाजा आदि पर उनके स्‍वागत के लिये लोग फूल मालायें लिये तैयार खड़े थे। यात्रा का अंत गुरुगावं देवी मंदिर पर माथा टेक का हुआ।

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