फर्रुखाबाद:(जेएनआई ब्यूरो) संस्कार भारती द्वारा आयोजित कथक कार्यशाला में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। कार्यशाला का उद्देश्य प्राचीन नृत्य परंपरा को संरक्षित करने के साथ-साथ युवाओं में भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय कला के प्रति रुचि जागृत करना है।
कथक प्रशिक्षक स्नेहा श्रीवास्तव ने बताया कि कथक भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है और यह उत्तर प्रदेश का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य माना जाता है। इसका इतिहास लगभग दो हजार वर्ष पुराना है, जिसकी शुरुआत मंदिरों में कथावाचन करने वाले कथाकारों से हुई थी। उन्होंने प्रतिभागियों को ठेका, दोगुन, चौगुन, तिहाई एवं विभिन्न हस्त मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। आगामी सत्रों में सलामी, चक्कर और कथक गीतों पर नृत्याभ्यास भी कराया जाएगा।
मंदिरों से दरबारों तक पहुंचा कथक
स्नेहा श्रीवास्तव ने बताया कि कथक की उत्पत्ति देव मंदिरों में भगवान की स्तुति और कथावाचन से हुई थी। समय के साथ मुगल काल में यह दरबारी नृत्य के रूप में विकसित हुआ। वर्तमान में कथक भाव-भंगिमाओं, नेत्र मुद्राओं और देवी-देवताओं की कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जो दर्शकों को भारतीय संस्कृति से जोड़ता है।
उत्साह के साथ सीख रहे प्रतिभागी कार्यशाला में बच्चों से लेकर बड़े प्रतिभागी भी पूरे उत्साह के साथ कथक सीख रहे हैं। प्रशिक्षकों के अनुसार तल्लगुन, दोगुन, चौगुन, तिहाई जैसी थापों और विभिन्न मुद्राओं का नियमित अभ्यास कराया जा रहा है। संस्कार भारती का मानना है कि ऐसी कार्यशालाएं भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय नृत्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं।
कार्यशाला को सफल बनाने में अनुराग अग्रवाल, गौरव मिश्रा, अरविंद दीक्षित, कुलदीप, सुरेंद्र पांडेय, आदेश अग्रवाल, रवींद्र गुप्ता, अखिलेश पांडेय, समरेन्द्र शुक्ल, अनुराग पाण्डेय एवं कुलदीप श्रीवास्तव सहित कई पदाधिकारियों का सहयोग रहा।
संस्कार भारती की कथक कार्यशाला में सीख रहे बच्चे-बड़े, जीवित हो रही शास्त्रीय परंपरा





