फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) आज हम विकास, आधुनिकता और तकनीक की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन इसी दौड़ में कहीं न कहीं अपने बुजुर्गों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। जिस उम्र में माता-पिता को अपने बच्चों का साथ, सम्मान और अपनापन मिलना चाहिए, उसी उम्र में अनेक वरिष्ठ नागरिक अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। यह केवल परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।हमारे संस्कारों में माता-पिता को देवतुल्य माना गया
है। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, जिन आंखों ने उनके भविष्य के सपने देखे और जिन्होंने अपनी इच्छाओं का त्याग कर बच्चों का जीवन संवारा, उन्हीं हाथों और आंखों को वृद्धावस्था में सहारे की जरूरत पड़ती है। आज का समाज विकास, आधुनिकता और तकनीक की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हमारे पास दुनिया से जुड़ने के लिए मोबाइल है, दूर बैठे व्यक्ति से बात करने के लिए इंटरनेट है और जीवन को आसान
बनाने के लिए अनेक सुविधाएं हैं, लेकिन विडंबना यह है कि अपने ही घर में बैठे बुजुर्गों से बात करने और उनका हाल पूछने के लिए हमारे पास समय कम होता जा रहा है। यह केवल पारिवारिक उपेक्षा नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के कमजोर पड़ने का संकेत है।
जिस माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने, पढ़ाने और
उनके भविष्य को संवारने में लगा दी, वही माता-पिता जब वृद्धावस्था में पहुंचते हैं तो कई बार उन्हें अपने ही घर में उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। उनकी बातें पुरानी लगने लगती हैं, उनकी सलाह को महत्व नहीं दिया जाता और उनकी आवश्यकताओं को कभी-कभी बोझ की तरह देखा जाता है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिन बुजुर्गों के अनुभव से परिवार की कई पीढ़ियां आगे बढ़ीं, उन्हीं के अनुभव को आज की पीढ़ी सुनना तक पसंद नहीं करती।
हमारे धर्म और संस्कृति में बुजुर्गों का स्थान सर्वोच्च
भारत की संस्कृति केवल आधुनिक कानूनों से नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चले आ रहे संस्कारों से बनी है। हमारे धर्मग्रंथों में माता-पिता और गुरु के सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” का संदेश हमारी संस्कृति की आत्मा है। अर्थात माता और पिता को देवता के समान मानना चाहिए।
रामायण में भगवान श्रीराम का चरित्र हमें माता-पिता की आज्ञा और सम्मान का सर्वोत्तम उदाहरण देता है। राजा दशरथ की आज्ञा को स्वीकार कर भगवान श्रीराम ने राजपाट छोड़कर वनवास का मार्ग चुना। यह प्रसंग केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों की गहरी सीख है कि माता-पिता के प्रति सम्मान और कर्तव्य जीवन के कठिन से कठिन निर्णय से भी बड़ा हो सकता है।
महाभारत में भीष्म पितामह जैसे पात्र हमें यह बताते हैं कि बुजुर्ग केवल उम्रदराज व्यक्ति नहीं होते, बल्कि परिवार और समाज के अनुभव का भंडार होते हैं। उनके अनुभव को नजरअंदाज करना स्वयं अपने इतिहास और ज्ञान से मुंह मोड़ना है। हमारे यहां तो यह भी कहा गया है कि जहां बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहां सुख-समृद्धि और संस्कार टिके रहते हैं। घर में बुजुर्गों का आशीर्वाद केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाली भावनात्मक शक्ति है।
मंदिर जाने से पहले घर के बुजुर्गों का सम्मान जरूरी
आज हम मंदिरों में जाकर भगवान के सामने सिर झुकाते हैं। तीर्थ यात्राएं करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में हजारों रुपये खर्च करते हैं। यह सब अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि यदि घर में बैठे माता-पिता की आंखों में आंसू हैं और हम उनकी उपेक्षा कर रहे हैं तो हमारी धार्मिकता कितनी सार्थक है? भगवान की पूजा के साथ-साथ माता-पिता की सेवा भी भारतीय धर्म और संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी मंदिर की
सीढ़ियों पर सिर झुकाने से पहले यदि हम घर में अपने बुजुर्ग माता-पिता के चरण छू लें, उनके साथ कुछ पल बैठकर उनका हाल पूछ लें और उनकी जरूरत समझ लें तो यह भी अपने आप में एक बड़ा पुण्य है। धर्म हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाता, धर्म हमें सेवा, करुणा, दया, सम्मान और कर्तव्य भी सिखाता है। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों की सेवा को केवल सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक धर्म के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
बुजुर्गों का अकेलापन सबसे बड़ी पीड़ा
वरिष्ठ नागरिकों की समस्या केवल आर्थिक नहीं है। कई बुजुर्गों के पास घर है, पेंशन है, भोजन है और रहने की सुविधा भी है, लेकिन उनके पास बातचीत करने वाला कोई नहीं होता। उन्हें सबसे अधिक जरूरत अपनेपन की होती है। बच्चे सुबह काम पर चले जाते हैं, शाम को मोबाइल और टीवी में व्यस्त रहते हैं। पोते-पोतियां भी डिजिटल दुनिया में खोए रहते हैं। ऐसे में बुजुर्ग घंटों किसी के साथ दो शब्द बोलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कई बार बुजुर्ग अपनी तकलीफ इसलिए नहीं बताते क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उन्हें परिवार पर बोझ न समझ लिया जाए। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
बुजुर्गों की उपेक्षा केवल परिवार की नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी
समाज को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा। मोहल्लों, गांवों और कस्बों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए नियमित स्वास्थ्य शिविर, सामाजिक मिलन कार्यक्रम, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां और सहायता केंद्र विकसित किए जाने चाहिए। स्थानीय प्रशासन को भी वरिष्ठ नागरिकों की शिकायतों पर संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। परिवारों को उनके अधिकारों और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन कानून से नहीं, परिवार की सोच से आएगा।
आज हम उनकी जरूरत हैं, कल हमें उनकी जरूरत होगी
समय का चक्र कभी एक जैसा नहीं रहता। आज जो युवा अपने बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा कर रहा है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन वह स्वयं वृद्धावस्था में पहुंचेगा। जिस तरह आज हम अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करेंगे, आने वाली पीढ़ियां हमारे साथ वैसा ही व्यवहार सीखेंगी। बच्चों को संस्कार भाषणों से नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के व्यवहार से मिलते हैं। यदि बच्चे अपने घर में दादा-दादी और माता-पिता का सम्मान देखते हैं तो उनके भीतर भी सम्मान की भावना विकसित होती है। इसके विपरीत यदि वे अपने बुजुर्गों को अपमानित होते देखते हैं तो वही व्यवहार आगे चलकर समाज का हिस्सा बनता है।
बुजुर्ग अनुभव की चलती-फिरती पुस्तक हैं
हमारे वरिष्ठ नागरिकों के पास जीवन का वह अनुभव है जो किसी किताब या इंटरनेट पर पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो सकता। उन्होंने अभाव देखे हैं, संघर्ष किया है, रिश्तों को निभाया है और कठिन परिस्थितियों से परिवार को बाहर निकाला है। आज की पीढ़ी तकनीक में आगे हो सकती है, लेकिन जीवन के अनुभव में वरिष्ठ नागरिकों की बराबरी नहीं कर सकती। इसलिए जरूरी है कि परिवार के निर्णयों में उनकी राय ली जाए। बच्चों को उनसे उनके जीवन के अनुभव सुनने चाहिए। पोते-पोतियों को उनके साथ समय बिताना चाहिए। इससे केवल बुजुर्गों का अकेलापन दूर नहीं होगा, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कार और जीवन का वास्तविक ज्ञान भी मिलेगा।
धर्म का सार सेवा और सम्मान है
हम कितनी भी पूजा कर लें, कितने भी धार्मिक आयोजन कर लें, कितनी भी तीर्थ यात्राएं कर लें—यदि हमारे व्यवहार में दया और सम्मान नहीं है तो धार्मिकता अधूरी है। भगवान की भक्ति के साथ मानव सेवा आवश्यक है और मानव सेवा की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। अपने माता-पिता, दादा-दादी और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के प्रति सम्मान इस सेवा का सबसे सरल रूप है। बुजुर्गों के माथे की झुर्रियां उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं। उनके सफेद बाल उस जीवन यात्रा की गवाही देते हैं जिसमें उन्होंने हमारे लिए अपना बहुत कुछ त्याग दिया। इसलिए उनके कमजोर कदमों को सहारा देना, उनकी बात सुनना और उनकी जरूरतों को समझना हमारा कर्तव्य है।
सम्पादकीय निष्कर्ष
वरिष्ठ नागरिक दिवस जैसे अवसर हमें केवल शुभकामनाएं देने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमें स्वयं से पूछना होगा—क्या हमारे घर के बुजुर्ग वास्तव में सम्मानित और खुश हैं? क्या हम उनके साथ पर्याप्त समय बिताते हैं? क्या उनकी राय हमारे लिए मायने रखती है? यदि उत्तर नकारात्मक है तो सुधार की शुरुआत आज से ही करनी होगी। बुजुर्ग घर की पुरानी वस्तु नहीं, घर की जड़ होते हैं। पेड़ की जड़ दिखाई नहीं देती, लेकिन वही पूरे पेड़ को मजबूती देती है। उसी तरह परिवार में बुजुर्गों की उपस्थिति भले ही शांत दिखाई दे, लेकिन उनके अनुभव, आशीर्वाद और संस्कार पूरे परिवार को जोड़कर रखते हैं।
आइए, हम संकल्प लें कि वरिष्ठ नागरिकों को केवल एक दिन नहीं, बल्कि हर दिन सम्मान देंगे। उनके साथ बैठेंगे, उनकी बातें सुनेंगे, उनकी जरूरतों को समझेंगे और उन्हें यह एहसास कराएंगे कि वे हमारे लिए बोझ नहीं, बल्कि हमारी सबसे मूल्यवान विरासत हैं।
क्योंकि मंदिर में भगवान की तलाश करने से पहले यदि हम अपने घर में बैठे माता-पिता के चेहरे पर मुस्कान ला दें, तो शायद उससे बड़ा कोई धर्म, कोई सेवा और कोई पुण्य नहीं।
“मातृ देवो भव। पितृ देवो भव।”
यही भारतीय संस्कृति है, यही हमारे संस्कार हैं और यही एक स्वस्थ, संवेदनशील एवं संस्कारित समाज की पहचान होनी चाहिए।
वरिष्ठ नागरिक दिवस विशेष: बुजुर्गों की अनदेखी, समाज के पतन का संकेत
[adrotate banner="3"]
[adrotate banner="2"]



