बाबा नीबकरोली ने बदली थी IPhone किंग स्टीव जॉब्स की जिंदगी!

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Steevan Palटेक्नोलॉजी की दुनिया में तहलका मचाने वाले आईफोन किंग स्टीवन पॉल जॉब्स को भारत से नई राह मिली थी। जी हां, अपने चमत्कारों के लिए विश्वविख्यात नीम करौली बाबा के विचारों से वह बहुत प्रभावित थे। शांति और ज्ञान की तलाश में वह अपने दोस्त के साथ भारत पहुंचे। वह नीम करौली बाबा का दर्शन करके उनसे दीक्षा लेना चाहते थे। पर जब वह भारत पहुंचे तब तक बाबा मृत्यु हो चुकी थी।

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बाबा के आश्रम में ही उन्हें ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ एन योगी’ नामक किताब मिली। इस किताब को उन्होंने बार-बार पढ़ा। अपने दोस्त डेनियल कोटटके के साथ आए स्टीव को वहां से निकलने के बाद कई दिव्य अनुभव हुए। स्टीव की आगे की जिंदगी और प्रोफेशन के लिहाज से उनकी यह भारत यात्रा अहम साबित हुई।

सन 1974 की बात है। स्टीव जॉब्स नौकरी कर रहे थे। पर उनका मन नहीं लग रहा था। वह कुछ बड़ा कर पाने की ख्वाहिश में अशांत थे। उनका एक मित्र रॉबर्ट फ्रीडलैंड नीम करौली बाबा से दीक्षा ग्रहण कर रहा था। अपने दोस्त के विचार और व्यवहार में आए परिवर्तन से वह अचंभित थे। वह भी बाबा से मिलकर जीवन का ज्ञान लेना चाहते थे। यही कारण है कि उन्होंने अपने दोस्त के साथ भारत जाने की योजना बनाई।
BABA NEEBKARORI
सन 1974 की बात है। स्टीव जॉब्स नौकरी कर रहे थे। पर उनका मन नहीं लग रहा था। वह कुछ बड़ा कर पाने की ख्वाहिश में अशांत थे। उनका एक मित्र रॉबर्ट फ्रीडलैंड नीम करौली बाबा से दीक्षा ग्रहण कर रहा था। अपने दोस्त के विचार और व्यवहार में आए परिवर्तन से वह अचंभित थे। वह भी बाबा से मिलकर जीवन का ज्ञान लेना चाहते थे। यही कारण है कि उन्होंने अपने दोस्त के साथ भारत जाने की योजना बनाई।
कैंची आश्रम से निकलने के बाद स्टीव जॉब्स पूरी तरह बदल चुके थे। वह सादगी से जीवन जीने लगे। सुबह-शाम वह जैन दर्शन का अभ्यास करते और दिन के समय स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में फिजिक्स और इंजीनियरिंग के कोर्स के बारे में जानकारी जुटाते रहते थे।

19 साल के स्टीव पूर्व की आध्यात्मिकता, हिंदू धर्म, जैन बौद्ध-दर्शन और ज्ञान की तलाश करने लगे। उनके अंदर आए नए बदलाव ने उनकी कल्पनाशीलता को दिशा दी। यहीं से एक नए स्टीव का जन्म हुआ, जिसने तकनीक की दुनिया में मिसाल कायम कर दिया।
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नीम करौली बाबा का जीवन परिचय

नीम करौली बाबा का जन्म एक ब्राह्मण जमींदार घराने में यूपी के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में हुआ। उनके पिता श्री दुर्गा प्रसाद शर्मा ने उनका नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा रखा था। बचपन से ही उनका ध्यान भक्ति में था। 11 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक धनी ब्राह्मण परिवार की लड़की से कर दिया गया था। विवाह के ठीक बाद वह घर छोड़कर गुजरात के बावनिया नामक स्थान पर रहने लगे।
वहां उन्होंने गुजरात और भारत के अन्य प्रदेशों में भ्रमण किया। लगभग 10-15 साल बाद उनके पिता को पता लगा कि उनके पुत्र जैसा कोई साधु नीम उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के करौली नामक गांव में है। उनके पिता अपने पुत्र से मिलने तुरंत नीम करौली गए। वहां उन्हें (महाराजजी) लक्ष्मी नारायण से मिले। वह अपने पिता के साथ वापस लौट आए। उनके दो बेटे और एक बेटी भी हैं।
उन्होंने बहुत जगहों पर हनुमानजी के मंदिर और दो आश्रम स्थापित किए। पहला आश्रम उत्तराखंड में नैनीताल स्थित कैंची में और दूसरा यूपी के मथुरा जिले के वृन्दावन में है। उनकी समाधि वृन्दावन के आक्षम में स्थित है।
उन्होंने 11 सितम्बर, 1973 को वृन्दावन के आक्षम में समाधि ली थी। नीम करौली बाबा या महाराजजी बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में गिने जाते थे। विदेशों में इन्हें बाबा रामदास और बाबा भगवानदास ने लोकप्रिय बनाया।
कैंची मंदिर भुवाली से 7 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। नीम करौली बाबा को यह स्थान बहुत प्रिय था। वह हर गर्मियों में यहीं आकर निवास करते थे। बाबा के भक्तों ने इस स्थान पर हनुमान जी का भव्य मंदिर बनवाया। उस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति के साथ-साथ अन्य देवताओं की मूर्तियां भी हैं। अब तो वहां नीम करौली बाबा की भी एक भव्य मूर्ति स्थापित कर दी गई है।
इस मंदिर में यात्रियों के ठहरने के लिए एक सुंदर धर्मशाला भी है। यहां देश-विदेश से कई लोग आज भी आते हैं। कैंची मंदिर में हर साल 15 जून को वार्षिक समारोह मानाया जाता है। उस दिन यहां बाबा के भक्तों की विशाल भीड़ लगती है। नवरात्रों में यहां विशेष पूजा होती है।
जनश्रुति के मुताबिक, नीम करौली बाबा सिद्ध पुरुष थे। उनकी सिद्धियों के विषय में अनेक कहानिया प्रचलित हैं। कहते हैं कि बाबा पर बजरंगबली की विशेष कृपा थी। हनुमान जी के कारण ही उन्हें इतनी ख्याति प्राप्त हुई। वह जहां जाते, वहीं हनुमान मंदिर बनवाते थे। लखनऊ का हनुमान मंदिर भी उन्होंने ही बनवाया था।
उनका नाम नीम करौली पड़ने के संबंध में कहा जाता है कि बहुत पहले बाबा ने नीम करौली गांव में रहकर हनुमान की साधना की थी। एक बार उन्हें रेलगाड़ी में बैठने की इच्छा हुई। नीम करौली के स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकी, बाबाजी रेल के पहले डिब्बे में जाकर बैठ गए। गार्ड को जैसे ही पता चला कि वह बिना टिकट के बैठे हैं तो उन्होंने कहा कि बाबाजी, आप गाड़ी से उतर जाएं। वह मुस्कुराते हुए गाड़ी के डिब्बे से उतरकर स्टेशन के सामने ही आसन जमाकर बैठ गए। गार्ड ने ट्रेन को झंडी दिखाई और ड्राइवर ने गाड़ी चलाई लेकिन गाड़ी एक इंच भी आगे न बढ़ सकी। लोगों ने गार्ड से कहा कि बाबाजी जी के प्रभाव से गाड़ी आगे नहीं चल पा रही है। इसपर भी रेल कर्मचारियों ने बाबा को ढोंगी समझा। उसके बाद गाड़ी चलाने के लिए कई कोशिशें की गई। कई इंजन और लगाए गए, गाड़ी टस से मस तक न हुई। आखिर में बाबा की शरण में जाकर गार्ड और ड्राइवर ने माफी मांगी। उन्हें आदर से बिठाया गया तब जाकर गाड़ी चली। तब से बाबा का नाम ‘नीम करौली बाबा’ पड़ा। अपने चमत्कारों के कारण वह सब जगह विख्यात हो गए।
नीम करौली बाबा के चरण। कहा जाता है कि देसी-विदेशी भक्त उनके चरणों में लोट जाते थे। उनके चरण की पूजा की जाती थी। अपनी हथेली और गोद में उनके चरण रखने की होड़ लगी रहती थी।

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