इक जरा सी चाह में जिस रोज बिक जाता हूँ मैं ………..

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aalok-yadavफर्रुखाबाद: इक जरा सी चाह में जिस रोज बिक जाता हूं मै-आइने के सामने उस दिन नही आता हूं मै, रंजो-गम उससे छुपता हूं मै अपने लाख पर-पढ़ ही लेता है वो चेहरा,फिर भी झुठलाता हूं मै| यह पंक्ति उस शख्सियत की है जो सरकारी आमले में अफसर होने के बाद भी शायरी के लिये वकत निकाल कर समाज में हो रहे घटनाक्रम को अपनी शायरी के माध्यम से लोगो के जहन में उतारने का प्रयास करते है| कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के क्षेत्रीय आयुक्त आलोक यादव का एक बड़ी कुर्सी पर बैठे होने के बाद भी शायरी के लिये वकत निकाल ही लेते है| क्या कहना है आलोक यादव का राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ केजिलाध्यक्ष संजय तिवारी के आवास पर जेएनआई से एक खास मुलाकात में उन्होंने कहा ….

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मूल रूप से फर्रुखाबाद जनपद के मूल निवासी आलोक यादव वर्तमान में बरेली में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के क्षेत्रीय आयुक्त पद पर तैनात है| कक्षा 6 से 12 वीं तक की पढ़ाई उन्होंने केन्द्रीय विधालय फतेहगढ़ से पूर्ण कर लखनऊ विश्व विधालय से बीएससी और इलाहबाद से एमबीए की डिग्री हासिल की थी| उसके बाद उन्होंने सरकारी सेवा में कदम रखा| आज वो एक जाने माने शायर भी है|

उन्होंने बताया कि शायरी एक अनोखी बिधा है जिसमे आप को लिखने की जरूरत नही पड़ती| उन्होंने कहा कि मेरे लब सी दिए उसने, कलम है फिर भी हाथो में, ये हाकिम से कहो जाकर, तेरी बंदिश अधूरी है| एक सबाल के जबाब में श्री यादव का कहना है नये सोशल मिडिया के जमाने में भी युवा वर्ग शायरी को अब फिल्मो से जादा तबज्जो दे रहा है| हर मिनट पर कोई ना कोई शायरी पोस्ट होकर लोगो के पास आती रहती है| यह शायरी का शौक नही तो क्या है| उन्होंने कहा कि वह राजनितिक-सामाजिक, पारिवारिक घटनाओ व समस्याओ पर लिखना पसंद करते है| राजनीति पर उन्होंने कहा कि हालत की तस्वीर बदल जाये तो अच्छा, हाकिम जो मेरा खुद की संभल जाये तो अच्छा| श्री यादव ने शायरी पर नये लोगो को भी प्रयास करने को कहा खासकर युवाओ यह शौक बरकरार रखने की सलाह दी| शायरी कहते हुये कहा कि नई नस्ल के हाथो में ताविदा रहेगा, मै मिल जाऊगा मिट्टी में कलम जिन्दा रहेगा|

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