आरटीआई- यूपी के गरीब महानुभाव या फिर सरकारी धन के लुटेरे!

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politicsडेस्क: सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा प्राप्त एक आर टी आई में खुलासा हुआ है कि एमपी, एमएलए तथा विभिन्न आयोग, निगम आदि के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को प्रदत्त सुरक्षाकर्मियों के सम्बन्ध में प्राप्त सूचना से साफ़ दिखता है कि राज्य सरकार आम आदमी की तुलना में इन महानुभावों के प्रति कितना अधिक उदार भाव रखती है|

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गृह विभाग की पत्रावली के अनुसार जब राज्य सरकार 2008 में नयी सुरक्षा नीति बना रही थी तो उसे महसूस हुआ कि इन महानुभावों को सुरक्षा व्यय का 25% देने बहुत असुविधा हो रही है|

अतः एक प्रस्ताव बनाया गया कि इन लोगों को 25% निजी व्यय (जो 01 मई 2007 को 5370 रुपये था) पर नहीं बल्कि मात्र 10% निजी व्यय अर्थात 2148 रुपये पर अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान किया जाएगा. 01 मई 2008 को गृह विभाग द्वारा भेजा प्रस्ताव 03 मई को मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित भी हो गया|

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यदि यह काफी नहीं था तो 13 दिसंबर 2012 को तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह आर एम श्रीवास्तव ने एक संक्षित नोट बनाया कि अब दो सुरक्षाकर्मी निश्हुल्क प्रदान किये जाएँ और तीसरा, चौथा और पांचवा सुरक्षाकर्मी अलग-अलग निजी व्यय पर प्रदान किया जाए| इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री ने 15 दिनों में अनुमोदित कर दिया|

इसके विपरीत आम आदमी को हमेशा निजी व्यय पर ही सुरक्षा मिल सकती है और वह भी उच्चस्तरीय समिति की संस्तुति के बाद|

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