फर्रुखाबाद परिक्रमा- कानाफूसी चुगलखोरी और चमचागीरी का दौर!

EDITORIALS FARRUKHABAD NEWS

प्रदेश में नयी सरकार बने अगले शनिवार को पूरे छह माह हो जायेंगे। सरकार के सौ दिन पूरे होने पर सपा मुखिया ने अपने बेटे के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार को सौ में सौ नंवर दिए थे। देखना है सरकार के छह माह पूरे होने पर वह प्रदेश सरकार के काम काज पर क्या टिप्पणी करेंगे। लक्ष्य सभी का 2014 के लोकसभा चुनाव ही है। इस सम्बंध में खबरीलाल की दिल्ली लखनऊ से जो रिपोर्ट आई वह मिली जुली है। परन्तु जिले से मुंशी हरदिल अजीज, मियां झान झरोखे तथा उनकी टीम के लोगों से जो फीड बैक प्राप्त हो रहा है। वह रंच मात्र भी उत्साह वर्धक और आश्वस्त करने वाला नहीं है।

मीडिया में ‘इन्वेस्टीगेटिव स्टोरीज’ का वर्षों से अकाल पड़ गया है। चला गया वह जमाना जब बाबू गिरजा नंदन लाल, रमेश माथुर, यदुनंदन प्रसाद गोस्वामी की तिकड़ी और राज नरायन दुबे, अक्षय कुमार सिंह जैसे कभी न थकने और कभी न डरने वाले लोग अपनी खबरों से जिला और पुलिस प्रशासन को हिला देते थे। जनप्रतिनिधि को बेलगाम नहीं होने देते थे। अपने तेवर, जनून और उत्साह के चलते कुछ लोग कभी जिले की पत्रकारिता में सत्य के प्रतीक बन गये थे। परन्तु उनकी प्राथमिकतायें भी समय के साथ बदल गयीं। वह अपने को भले ही तीसमारखा समझते हों परन्तु हकीकत यही है कि वह न घर के रहे और न घाट के। इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी जिले में नयी दुल्हन की तरह है। सुधार का कोई क्षण पल मुहुर्त नहीं होता। हमें उम्मीद है कि देश और समाज के व्यापक हित में सभी लोग बेहतर तालमेल से अपनी विश्वसनीयता में जबर्दस्त इजाफा करेंगे। विज्ञापन की कोख से कलंकित जनसेवियों को जन्म देने का सिलसिला बंद करेंगे। शायद जनप्रतिनिधि भी उनकी इस परिवर्तनशीलता से और कुछ सबक लें।

हां अब बात करेंगे खबरीलाल की दिल्ली से आयी रिपोर्ट की। सपा मुखिया के लिए पिछले विधानसभा चुनाव में छिबरामऊ के मवेशी बाजार में हुई मीटिंग में ’मुलायम सिंह का शमशान’ के पत्थर बनाने की बात तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सलमान खुर्शीद ने की थी। उन्हीं सलमान ने केन्द्रीय विधि मंत्री रहते इस बार के विधानसभा चुनाव में फर्रुखाबाद कन्नौज सहित आसपास के जिलों में मुलायम सिंह यादव के पुराने वफादारों के कांग्रेस प्रत्याशी बनाने का अभियान छेड़ा हुआ था। परन्तु इन पुराने सपाई सिपह सालारों ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में अपनी लुटिया डुबोयी सो डुबोई, सलमान साहब को भी दिल्ली में हंसी का पात्र बना दिया। खबरीलाल की रिपोर्ट कहती है कि समय बदलते ही लगभग सारे कांग्रेस प्रत्याशी सपा के अपने पुराने घर में आने की जुगत भिड़ा रहे हैं। कन्नौज के तीनो प्रत्याशी डिंपल यादव के कन्नौज से प्रत्याशी बनते ही सपा में इन्ट्री पा पाए। कांग्रेस प्रत्याशी रहे मोहम्मदाबाद के पुराने सपाई भी सपा मुखिया के दिल्ली आवास के चक्कर काट चुके हैं। परन्तु उनकी इन्ट्री उन्हीं के सजातीय दिग्गज सपाई यह कह कर रोक रहे हैं कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। देखना है कब किसका मुगालता कहां पर और कैसे टूटता है। बहिन जी के यहां प्रत्याशिता फाइनल होते होते बड़ो-बड़ों की सांसें फूलने लगती हैं।

जिले के कुख्यात दलबदलू और परम भाग्यशाली समझे जाने वाले सज्जन ने भी हार नहीं मानी है। संसद के सेन्ट्रल हाल में पूर्व सांसद के नाते प्रवेश के लिए अधिकृत यह सज्जन वहां हर दल के नेताओं से मिल लेते हैं। जोड़तोड़ की संभावनाओं को जांचते परखते हैं, प्रयास जारी है। जिस कंपनी की डीलरशिप मिल जायेगी, उसी का गुणगान करने लगेंगे। परन्तु अपने दरबार में बैठकर यही फरमाते हैं कि सांसदी का टिकट वह अपने जूते के नीचे रखते हैं। यहां भी पूर्व सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व चेयरमैन सहित लम्बी लाइनें हैं। सभी अपने को आगे साबित करने में लगे हैं। सभी को विरादरी, मंदिर, इलाहाबाद के कुम्भ, गंगा और कांग्रेस की निरंतर गिरती लग रही साख का भरोसा है। हाथ में अपने हाथ और कम मतदान के साथ ही वोटों के वंटवारे का पूरा भरोसा है। इसी के चलते 2009 में कुल मतदाताओं का मात्र 13 प्रतिशत वोट पाकर सांसद मंत्री बन गए। उन्हें पार्टी में किसी के मुकाबले में होने की चिंता नहीं रहती। क्योंकि यहां की पार्टी उनकी और उनकी पत्नी की जेब में है।

जिले की राजनीति को जिला पंचायत के चुनाव में पूरे सूबे में चर्चित और कलंकित कर देने वाले एक सपाई सूरामा परिवार की तीसरी पीढ़ी को संसदीय राजनीति में स्थापित करने की जोड़तोड़ में लगे हैं। उनके लिए परिवार ही पार्टी है। ग्राम प्रधानी से लेकर ऊपर तक के सारे पद उन्हीं को अपने परिवार के लिए चाहिए। उनके लिए जिले में यहां की जनता के लिए यहां की समस्याओं के लिए करने को कुछ भी नहीं है।

खबरीलाल का कहना है कि विभिन्न दलों के यह सारे सूरमा दिल्ली लखनऊ में कभी साथ-साथ और अधिकांशतः अलग-अलग संसद के केन्द्रीय कक्ष, विधान भवन कनाट प्लेस पालिका बाजार, यूपी भवन, इण्डिया गेट, वेस्टर्न कोर्ट, हजरतगंज, विधायक निवासों, पार्टी कार्यालयों और पार्टी के दिग्गज नेताओं के आवासों पर, साउथ एवेन्यू, नार्थ एवेन्यू आदि में देखे जा सकते हैं। दल बदलुओं की तेजी देखने लायक है। जिले के किसी आदमी को देख लेते हैं। तब झेंप जाते हैं। परन्तु बड़े प्रेम से मिलते हैं। हाल चाल पूंछते हैं। जल्दी में नहीं हुए तब फिर चाय काफी पिलाते हैं। विरोधी का हाल चाल खोद खोद कर पूंछते हैं। अपनी तानते हैं। दूसरे की बखिया उधेड़ते हैं। लखनऊ दिल्ली में इस समय कानाफूसी और चुगलखोरी का दौर जारी है। जिसकी आने वाले दिनों में और तेज होने की जबर्दस्त संभावनायें हैं।

पुलिस को नेता सुधरने नहीं देंगे

ग्राम टाडा बहरामपुर में पुलिस की कथित दरिंदगी आज हर एक की जुवान पर है। हर दल का नेता बहती गंगा में हाथ धोने की तर्ज पर वहां चला जा रहा है। मरी मौत दुर्घटना आपदा में भी राजनीति की विसात पर अपने वोट बैंक की ही चिंता सताती रहती है। 15 मार्च से पहले थाने चौकियों में बहिन जी के जिन छोटे बड़े कारिंदों की जमकर बैठकी होती थी। वह अब सबके सब नदारद हैं। थाने चौकी नहीं बदले थाना और चौकी प्रभारी बदल गए हैं। पहिले हाथियों का काफिला अकड़ अकड़ कर चलता था। अब सायकिल वाले हल्ला बोल रहे हैं। रहे पुलिस वाले उन्हें तत्कालिक लाभ हानि के अनुसार सलाम करना है या तमंचा स्मैक आदि के नाम पर भीतर करना है। यही काम पन्द्रह मार्च से पहले भी हो रहा था। अब भी हो रहा है। तब कोई और बमबम होता था। अब कोई और बम बम हो रहा है।

जिले के थानेदारों चौकी प्रभारियों की 15 मार्च से पहले की सूची उठाइए। फिर बाद वाली सूची उठाइए। जातिवाद के गंदे जहर ने पुलिस को कहीं का नहीं रखा। जब नेता को अपने सजातीय से अधिक किसी पर विश्वास नहीं रहा। तब फिर सुधार का सवालही बेकार है। जो बात जातिवाद से भी बनती नहीं दिखती। वह रिजर्व बैंक के गवर्नर की चिट्ठी से बन जाती है। हुकूमत चाहें जिसकी हो। इस क्षेत्र के पूर्व और वर्तमान विधायक के पैतृक गांव में वर्षों से क्या हो रहा है। सबको मालूम है। न मालूम हो जाकर देख आइए। टाडा बहरामपुर का मामला उजागर हो गया। शोर मच गया। नेता सक्रिय हो गए। थोड़े समय के लिए पुलिस बैकफुट पर आ गई। परन्तु जिले के लगभग प्रत्येक थाने में मनमानी और लूट का दौर जारी है। नेता के गुर्गों का जब तक मनमानी की छूट रहती है। कोई शिकवा शिकायत नहीं। नेता जी की जय-जयकार पर जरा भी संकट आया बस हाहाकार मच जाता है। पुलिस राज नहीं करती। पुलिस का इकबाल राज करता है। पुलिस का इकबाल जातिवादी नेताओं ने समाप्त कर दिया है। नतीजतन पुलिस अगर सुधारना भी चाहे तब भी नेता उसे सुधरने नहीं देंगे। पुलिस अगर सुधर गयी तब फिर जातिवादी नेताओं के दरबार सूने हो जायेंगे।

शिक्षकों की जय-जयकार

अपने यहां भी अजीब प्रथायें और परम्परायें हैं। नाग पंचमी को सापों को दूध पिलाते हैं। साल भर जिन शिक्षकों को विभागीय कार्यालयों के अधिकारियों, कर्मचारियों से लेकर स्कूल कालेज शासन प्रशासन द्वारा तरह-तरह से लांछित, अपमानित किया जाता है। शिक्षक दिवस पर उन्हीं शिक्षकों की जय-जय कार की जाती है। उन्हें राष्ट्र निर्माता और भावी पीढ़ी का भाग्य विधाता बनाया जाता है। आज देश और प्रदेश में निरक्षरता उन्मूलन के नाम पर जितनी धनराशि खर्च की जा रही है शिक्षा का स्तर उतनी ही तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। सबसे बुरी दशा है बेसिक शिक्षा की। जिसके संचालक शिक्षकों का शोषण तो करते ही हैं। शिक्षा से जुड़े सारे कार्यों के बजट के बंदरबांट की उधेड़बुन में ही लगे रहते हैं। दोहरी शिक्षा ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। जिसे जरा भी गुंजाइस है वह परिषदीय स्कूलों की तरफ नजर ही नहीं करता। हम पश्चिम के अंधानुकरण के लिए विख्यात हैं। परन्तु अच्छे कार्यों का अनुसरण नहीं करते। हजूर और मजूर के बच्चों को एक साथ पढ़ाने की बातें होती हैं परन्तु उन्हें अमलीजामा पहनाने में दिलचस्पी किसी को नहीं है। देखादेखी शिक्षक भी दावपेंच का खेल खेलते हैं। नतीजन शिक्षक दिवस मनता रहेगा। शिक्षकों को माला, साल, दुसाला स्मृतिचिन्ह मिलता रहेगा। परन्तु शिक्षक और छात्रों का भला होगा इसकी वर्तमान परिस्थितियों में उम्मीद नहीं दिखती।

और अंत में ………….

एक वादा और पूरा हो गया। बेरोजगारी का भत्ता मिलना प्रारंभ हो गया। घर बैठे प्रति माह एक हजार रुपया। विधवाओं, वृद्वों की तीन सौ प्रतिमाह। व्यापारियों का दुर्घटना बीमा पांच लाख। किसानों को भी बीमा का लाभ। छात्रों को सब कुछ मुफ्त। पढ़ाई और हाजिरी की भी कोई पावंदी नहीं। है न राम राज्य-

अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न काम,
दास मलूका कह गए सबके दाता राम।

और भ्रष्टाचार उसकी चिंता मत कर- उसको हटाने में लगे हैं अन्ना, अरविंद और बाबा रामदेव!

चलते चलते ……………….

जिले में ताकतवर कहे जाने वाले लोगों के सिंहासन हलने लगे हैं। हालात बेकाबू हो रहे हैं। जन सेवकों और जनप्रतिनिधियों में जंग छिड़ी है। प्रभारी मंत्री की उपस्थिति में एक जनप्रतिनिधियों ने फरमाया अधिकारी हमारी सुनते नहीं। हमारा टेलीफोन नहीं उठाते। पूरा जिला जान रहा है कि बड़का अफसर बड़का नेता की जरा भी नहीं सुनता। मामला मीडिया की सुर्खियों में आने लगा है। कौन छुट्टी पर गया है और किसकी छुट्टी होगी। कलेक्ट्रेट तहसील से लेकर गली मोहल्लों तक में चर्चाओं का दौर जारी है। लोगों को अपनी इज्जत बचानी मुश्किल पड़ रही है। आने वाले दिनों में धमाकेदार खबरों का सिलसिला शुरू हो जाए तब किसी को आश्चर्य नहीं होगा। आज बस इतना ही।

जय हिन्द!