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सन्डे का फंडा: सलमान के चूजे की टक्कर में पैदा करिए 12 आमलेट वाला अंडासन्डे का फंडा: सलमान के चूजे की टक्कर में पैदा करिए 12 आमलेट... इस अंडे को देख एक बार आप भी सोच में पड़ गए होंगे कि आखिर ये अंडा किस पक्षी का है? और क्या इसे खाने के प्रयोग में भी लाया जाता है। तो आज हम आपको बताते हैं कि इस अंडे का खाने में प्रयोग अब भारत में काफी तेजी से बढ़ा है और कई होटल में भी अब इसकी डिमांड ज्यादा हो गई है। खास बात यह है...

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मंच माला माइक और लगन में मगन नेताजी, समस्याएं जस की तस

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Posted on : 19-05-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

Editorफर्रुखाबाद: नेताजी लगन में मगन हैं। उनकी क्षेत्र की समस्याएं जस की तस पड़ी है। स्थिति यह है कि नेताजी का आंख खुलते ही उनके प्रतिनिधि निमंत्रण की सूची लेकर पहुंच जाते हैं। तब नेताजी चयन करते हैं कि कहां मैं जाऊं और कहां दूसरे के माध्यम से न्यौता भिजवाऊं। कहाँ कहाँ गोष्ठी में मुख्य अतिथि है और कहाँ कहाँ केवल अतिथि? मुख्य अतिथि में पहुचना जरुरी है| बाकी बाद में| ये कडुआ सच है जिले के नेताओ का| मंच माला माइक और लगन में नेता इस कदर मगन है मानो आम जनता की सभी समस्याए हल हो गयी है और राम राज आ गया है| ब्याह बरात से लेकर शमशान तक सिर्फ वोट की तलाश है|

जिले में दो नेताओ के पास लाल बत्ती वाली सरकारी पेट्रोल से चलने वाली कार और लाखो रुपये प्रतिमाह खर्चे का सुरक्षा दस्ता है| दोनों नेताओ को मंत्री दर्जा प्राप्त है| ये सरकारी खर्चा वैसे तो नियमानुसार सरकारी काम काज निपटाने या जनहित के लिए किया जाना चाहिए मगर दोनों के दोनों मंत्री गोष्ठी, उद्घाटन, चुनावी तैयारी, ब्याह बरात और स्वागत समारोह में मगन है| अगर ये झूठ है तो देख लीजिये किसी भी दिन के अखबार| अखबार में मंत्रियो के मंच माला माइक और स्वागत समारोह की खबरे मिलेंगी| एक भी आम जन की जनसमस्या हल कर दी ऐसी खबरे नहीं मिलती| तो क्या अब कोई समस्या नहीं है| क्या थाने चौकी में रामराज हो गया है| क्या कोटेदार नियमित राशन देने लगा है| क्या भ्रष्ट टाइप लेखपाल ने गरीब आदमी का खून चूसना बंद कर दिया है? क्या बेरोजगारों को रोजगार मिल गया है? आज भी नगर से लेकर गाँव तक आम आदमी सरकारी सेवाओ को आसानी से प्राप्त नहीं कर सकता| इसी को हल करने के लिए चुनाव में वोट देकर विधायक बनाया| नतीजा क्या हुआ| एक चुनाव ख़त्म हुआ तो दूसरे चुनाव के लिए काम शुरू हो गया| और ऊपर से तुर्रा ये कि हम कोई सोना मुह में नहीं डाले है| क्या जबाब है इन नेताओ का| जो कर सकते है आत्मचिंतन और स्वमूल्यांकन अवश्य करे| क्या यही जिम्मेदारी है आपकी?

नौनिहालों के मुह में जाने वाला निबाला जानवर खा रहे है| बदले में कई नेताओ के घर में इसका कमीशन भी आ रहा है| कमालगंज से लेकर कायमगंज तक और काली नदी से लेकर राम गंगा तक हाल एक जैसा ही है| आँगन बाड़ी की पंजीरी भैंसे खा रही है और गरीबो के घरो में कुपोषण बढ़ रहा है|

नेताजी आजकल हर जगह एक ही भाषण देते है| वोट जरुर देना| क्या कभी नेता ने सभा या गोष्ठी में किसी आम आदमी से पूछा कि क्या गाँव में मास्टर नियमित बच्चो को पढ़ाने आ रहा है? क्या गाँव का कोटेदार सभी को राशन और मिटटी का तेल बाट रहा है? क्या जरूरतमंद को मनरेगा में काम और समय से पैसा मिल रहा है? क्या गाँव में लेखपाल और ग्राम सचिव बिना रिश्वत के आम किसान का काम कर रहा है? नहीं पूछा होगा! क्योंकि इनके खुद के घर में ये समस्या नहीं है| इनके काम के अफसर या सरकारी नौकर रिश्वत नहीं लेते| बदले में आम आदमी को लूटने का लाइसेंस जो मिल जाता है| बस एक ही बात कहते है वोट जरुर देना| धुप हो या वरिश वोट जरुर डाल आना ताकि इनके नेता मुख्यमंत्री और प्रधानमन्त्री बन जाए| क्योंकि नेताओ के लिए आम जनता और इनके बीच एक ही रिश्तेदारी है नेताजी और वोटर की| आपका नाम और मोबाइल नंबर इनके रजिस्टर में दर्ज है| पहले सिर्फ जाति का रजिस्टर बनता था अब मोबाइल नंबर का भी बन रहा है| विकास और समस्या का कोई रजिस्टर ये नेता नहीं बनाते| बात अगर झूठ लगे तो एक भी नेता बताये|

नगर के इस सीजन में मंत्री, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष के अलावा विभिन्न पार्टी के बड़े नेताओं के पास एक ही तिथि पर आयोजित शादी समारोह के 20-30 कार्ड पहुंच रहे हैं। एक ही दिन में इतने जगहों पर पहुंच पाना नेताजी लोग के लिए संभव नहीं है। खास जगहों पर नेताजी स्वयं जाते हैं। शेष जगहों पर उनके प्रतिनिधि पहुंचकर न्यौता दे देते हैं। नेताजी शादी समारोह में पहुंचने पर भी राजनीतिक गलियारे से बाहर नहीं निकलते। वहां भी पार्टी के लोगों के मिलने पर वह पार्टी की गतिविधियों पर चर्चा करने में कोई चूक नहीं करते। पूर्वाह्न निकलते हैं और देर रात तक एक के बाद एक शादी समारोह में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यहां भी नेताजी जनता को गुमराह करना नहीं भूलते। लगन में नेताजी के व्यस्तता की वजह से उनके क्षेत्र की समस्या जस की तस पड़ी हैं। शादी समारोह में पहुंचे नेताजी का ध्यान जनता समस्या की ओर आकृष्ट कराती है तो हंसकर टाल देते हैं कि लगन बीत जाने दीजिए।

ग्रीश बाबू: लोहिया के साथी ने जीवन भर मुलायम से निभायी दोस्‍ती, सपाइयों ने किया सिर्फ शोषण

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Posted on : 18-05-2013 | By : तफहीम खान | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, Politics- Sapaa

फर्रुखाबाद: लोहिया के साथी रहे ग्रीश बाबू आज 95 वर्ष की आयु में इस मतलबी दुनिया से चले गये। बिना किसी राजनैतिक महत्‍वाकांक्षा के जीवन भर उन्‍होंने मुलायम से दोस्‍ती का फर्ज निभाया, और कभी कोई फायदा नहीं लिया। परंतु स्‍थानीय सपाइयों ने उनका जमकर शोषण किया, और मनमौजी ग्रीश बाबू ने जानते-बूझते भी कभी उफ तक न की।

Grish C Katyarबाबू ग्रीश चंद्र कटियार कभी शहर के जाने माने रईसों में गिने जाते थे। बड़े जमींदार थे। फतेहगढ़ स्‍थित जिला मुख्‍यालय पर उनकी काफी बड़ी और पुरानी कोठी आज भी उनकी पुरानी जमींदाराना हैसियत की गवाह है। पेशे से वकील रहे ग्रीश बाबू शुरू से ही समाजवादी विचारधारा के आदमी थे। एक जमाने में जब लोहिया जी यहां से चुनाव लड़ने आये थे, तो इन्‍हीं ग्रीश बाबू कटियार की कोठी पर ठहरे थे। मिजाज से फक्‍कड़ लोहिया जी अपने साथ केवल एक छोटा ब्रीफकेस लेकर आये थे। नहाने के बाद जब नामांकन के लिये निकलने से पूर्व लोहिया जी को पुराने कुर्ता-पजामा में देख कर वह बिफर गये। आनन-फानन में उन्‍होंने गांधी आश्रम खुलवाकर नया कुर्ता-पजामा मंगवाया। तब कहीं जाकर वह लोहिया जी के साथ नामांकन-पत्र दाखिल करने कलक्‍ट्रेट गये। यह तो बानगी भर है। बाद में चुनाव प्रचार में भी उन्‍होने दिल खोलकर लोहिया जी का साथ दिया।

बड़ी बात यह है कि जीवन भर उन्‍होंने स्‍वयं अपने या अपने परिवार के लिये कभी कोई राजनैतिक महत्‍वाकांक्षा नहीं पाली। मुलायम सिंह यादव से दोस्‍ती उनकी बहुत पुरानी रही। मुलायम ने भी ग्रीश बाबू के सम्‍मान में कभी कोई कमी नहीं आने दी। मजाल है कि मुलायम का मंच हो और ग्रीश बाबू उस पर मौजूद न हों। कभी देर हो गयी तो मुलायम ने मंच से ही ग्रीश बाबू के विषय में जानकारी शुरू कर दी। लखनऊ हो, दिल्‍ली हो या इटावा-सैफई, ग्रीश बाबू के आने की सूचना मुलायम को मिले तो मजाल है कि उनको अंदर बुलाने में देर लग जाये।

मुलायम से उनकी इसी नजदीकी का स्‍थानीय सपाई और छुटभैये नेता जमकर शोषण करते रहे। मिजाज से इतने फक्‍कड़ कि दिल में आ जाये तो इस उम्र में भी मोटरसाइकिल से लखनऊ जाने के लिये तैयार हो जाते थे। परंतु उन्‍होंने कभी अपने या अपने परिवार के लिये सत्‍ता का कोई लाभ नहीं लिया।

पंजीकरण कराये: जल्द शुरू होगी JNI NEWS की pre-paid Premium SMS News Service

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Posted on : 13-05-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

jnilogoफर्रुखाबाद: 4 साल तक जनता को SMS द्वारा पल पल की खबर देने के बाद अक्टूबर 2012 में टूटा सिलसिला एक बार फिर शुरू होने जा रहा है| इसके लिए पंजीकरण शुरू किया जा रहा है| पहले आओ पहले पाओ के आधार पर शुरू में पंजीकृत 10000 लोगो को ये सुविधा दी जाएगी| अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो सभी के लिए ये सेवा चालू कर दी जाएगी|


केंद्र सरकार की नीतियों के चलते गत वर्ष अक्टूबर में अचानक SMS की कीमतें 10 गुना बढ़ गयी थीं| लिहाजा SMS इंडस्ट्री की कमर ही टूट गयी| पहले सरकार ने SMS पर 5 पैसे प्रति SMS टैक्स लगाया| उसके बाद इनकमिंग और आउटगोइंग भी लेने की अनुमति टेलिकॉम ऑपरेटर को दे दी| इसके बाद जो SMS 5 से 10 पैसे का मिलता था वही SMS आज 40 पैसे तक का हो गया है| ऐसे में मुफ्त में आम जनता को भेजी जा रही SMS से खबरे बंद करनी पड़ी| क्यूंकि JNI के SMS पाठको की संख्या 1 लाख को पार कर चुकी थी|


वर्ष 2009 में शुरू हुई JNI SMS सेवा नगर से गाँव तक पहुची| दिसम्बर 2012 तक JNI के पास 1.27,358 पंजीकृत पाठक अकेले फर्रुखाबाद जनपद के हो गए थे| बाढ़ आने से पहले ही सतर्क करती खबरे, अफसरों के तबादले, हमारे बीच से किसी प्रिय के अचानक चले जाने का शोक समाचार, हत्या, डकैती, या फिर बंद स्कूलों की रिपोर्ट| सबसे पहले JNI का SMS ही बताता रहा| समस की मोबाइल पर बजती टोन ने जनता को SMS खोलने पर मजबूर कर दिया था| पता नहीं JNI ने कौन सी नयी खबर भेजी|

मगर दोस्तों जब केंद्र सरकार की जड़े SMS से उपजे अन्ना और रामदेव के आन्दोलन ने उखाड़नी शुरू की तो अपना दामन साफ़ करने की जगह केंद्र की सरकार ने SMS का गला घोटने की सोच ली| वे केंद्र में सत्ता पर काबिज थे उनकी ही चली| उन्हें ग्रामीणों की कोई चिंता नहीं दिखती| ये असल में सच जनता तक पहुचने ही नहीं देना चाहते| जबकि यही एक माध्यम था दूर दराज के गाँव तक तुरंत समाचार भेजने का| मगर बल्क SMS महंगा होने से मुफ्त में मिलने वाली जेएनआई की समाचार सेवा चालू रखना मुश्किल हो गया| इसी बीच लगातार पाठको के फोन आने लगे| लोगो/JNI के पाठको को असल बात बताई गयी तो अधिकांश पाठको का कहना था कि वे अब JNINEWS SMS के लिए पैसे खर्च करने को तैयार है|

दोस्तों पाठको की मांग पर प्रयोग के तौर पर हम ये प्रोजेक्ट जल्द शुरू करने जा रहे है| इसमें आपको कूपन के माध्यम से अपना मोबाइल रिचार्ज करना होगा| कोई पैसा मोबाइल से नहीं कटेगा| जब तक कूपन मोबाइल में वैलिड रहेगा पूरे जनपद की पल पल की खबर आपको मिलती रहेगी| ये कूपन कहाँ मिलेगा, कैसे मिलेगा और कब से मिलेगा, इसकी जानकारी बहुत जल्द ही इसी पोर्टल पर दे दी जाएगी| कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं 30 से 50 रुपये प्रतिमाह रखने का विचार है|

आपको करना क्या है?

अगर आप भविष्य में प्रे-पेड JNI न्यूज़ SMS अपने मोबाइल पर चाहते है तो आपको नीचे कमेन्ट बॉक्स में लिखे I wanted premium JNI SMS news service और अपना नाम, उम्र, पता, और मोबाइल नंबर लिख कर सबमिट करना है| उसके बाद आपको योजना शुरू होने की जानकारी आपको मोबाइल द्वारा दी जाएगी| कैसे और कहाँ रिचार्ज करना है आपको सूचना मोबाइल पर दे दी जाएगी|

नोट:- इस सेवा में कोई पैसा मोबाइल से अपने आप नहीं कटेगा| तो शुरू कर दीजिये अपना पंजीकरण| और अपने दोस्तों को भी बता दे|

भ्रष्टाचार पर साहब ने जाँच बिठाई…

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Posted on : 09-05-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

Editorसिंचाई के लिए लगाये गए ट्यूबवेल और बोरिंग में घोटाला| पी डब्लू डी की सड़क का घोटाला| तहसील में लेखपालो द्वारा रिश्वत लेकर कहीं गरीब बनाने का घोटाला तो कहीं ग्राम सभा की जमीन हड़प कर लेने का घोटाला | शिक्षा विभाग में मिड डे मील का घोटाला| फर्जी और कूटरचित राशन कार्डो की दम पर सालो से चल रहा राशन घोटाला| आँगनबाड़ी की पंजीरी दूध डेरी की गाय और भैंसों के लिए बिक जाने का घोटाला| बेसिक शिक्षा में ट्रेनिंग के नाम पर आये धन को घोट जाने का घोटाला| और हाँ बिजली विभाग में घोटाला| इतने घोटाले और इन पर चल रही जाँच की खबरे इन दिनों सुर्ख़ियों में है| मगर होगा क्या? क्या पहले कुछ हुआ जो अब होगा?

ट्यूब वेल घोटाले की जाँच के लिए फ़ाइल नहीं मिलेगी| वो फाइल जिसमे 1200 बोरिंग के नाम पते है| दरअसल में शिकायतकर्ताओं के मुताबिक कोई सूची है ही नहीं| सीधा पैसा बैक से निकाला और बाट लिया| अब जिस पैसे का हिस्सा समय से पहुच गया उस पर कोई नई मुसीबत साहब क्यूँ लेंगे| सुना है घोटाले की सभी फाइलें कानपुर में है| घोटाले की चर्चा के एक सप्ताह भी अभी तक ये फ़ाइले जिले में नहीं पहुच सकी है| जो डाटा इंटरनेट पर होना चाहिए था वो कहाँ है इसी पर जाँच बैठ सकती है| हो सकता है कि 140 किलोमीटर दूर फर्रुखाबाद पहुचने में एक सरकार का कार्यकाल तो बीत ही जाये| हाँ नेताजी तक खबर पंहुचा कर नुक्सान जरुर कर दिया| घोटाले के हिस्से में एक बड़ा भाग और बटेगा| मीडिया के हाथ तो कुछ है नहीं| भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण कराने में तो सक्षम जरुर है| अकेले कैसे खाओगे|

अब भोलेपुर में सड़क घोटाले को ही ले लो| खबर छपी है कि जाँच शुरू हो गयी| क्या और कैसे हो रही है जाँच इस पर कोई खबर नहीं है| मगर जैसा सभी जाँच में होता है इसमें भी होगा| जाँच में सबसे पहले पता किया जायेगा कि ठेकेदार कौन था? पैसा कब निकाले? कितना निकला? ठेकेदार सत्ता दल समर्थक है या विरोधी पक्ष का? कमीशन समय से पंहुचा या नहीं? इतनी जाँच होने के बाद फैसला होगा कि जाँच होगी कि नहीं| और अगर होगी तो कैसे होगी| फाइनल रिपोर्ट कैसे लगेगी| क्योंकि पैसा साहब से लेकर बड़े साहब और नेताजी सबको बट गया| समय से घोटाले का हिस्सा पहुच गया फिर काहे का बबाल मच रहे हो| अब इम्पेक्ट विम्पेक्ट कुछ नहीं होता| सिर्फ बड़े साहब और उनसे बड़े साहब को ये पता चल जाता है कि चव्वनी की छूट में रुपैया लुट गया| अब रुपैये का हिसाब लाओ…| जाँच के नाम पर एक स्पष्टीकरण माँगा जाता है| और कुछ समय के बाद चव्वनी की जगह रुपैये के बोझ तले साहब ये भी भूल जाता है कि कोई जबाब माँगा गया था| देर शाम किसी पार्टी में दोनों एक ही माचिस से सिगरेट सुलगाते दिख जाते है|

और समझो, राशन कार्ड घोटाला की जाँच| केवल पिछले एक साल में ही जिले में लगभग एक सैकड़ा से अधिक फर्जी राशन कार्डो की शिकायत जिलाधिकारी को दी गयी है| यकीन नहीं तो एक साल के अखबारों में छापी खबरों का ही संकलन कर देख लो| हजारो की संख्या में बने फर्जी बी पी एल और अन्तोदय कार्डो की सूची बाकायदा शिकायतकर्ताओ ने मय सबूत सौपी| एक भी राशन कार्ड निरस्त नहीं हुआ| हजारो कुंतल सरकारी सस्ता अनाज चंद घूस के टुकडो की खातिर बाजार में हर माह बिक जाता है| कुछ हुआ? कुछ भी नहीं? खबर मिली है कि नए सिरे से पूरे जिले के राशन कार्ड बनेगे| इसमें फर्जी बंद हो जायेंगे| कौन बंद करेगा| गाँव से लेकर नगर तक कोटेदार को राशन कार्ड बनाने का काम करना है| वैसे लिखापढ़ी में ये काम नगर में शिक्षक और देहात में ग्राम सचिव करेगा| मगर हकीकत में ऐसा नहीं है| चोरो के हाथो में चौकीदारी का बिल्ला है| शिकायते आने लगी है कि गाँव में राशन कार्ड के फार्म सफाई कर्मी और कोटेदार कर रहा है| आने दो शिकायत| कोटेदार जिला पूर्ती कार्यालय का अघोषित भ्रष्टाचार का साथी है| कुछ नहीं होगा| बनने दो फर्जी बीपीएल और अन्तोदय राशन कार्ड| फसेगा तो मास्टर, ग्राम सचिव और कम आय प्रमाण पत्र देने वाला लेखपाल| अब सरकार और सरकारी नौकरशाही से कुछ उम्मीद मत रखिये| कोई शिकायत दे आओ तो इनके साहब तो जाँच ही फर्जी निपटा देते है| अब क्या उम्मीद कहिये| भ्रष्टाचार चालू आहे….|

बात जिला कार्यक्रम अधिकारी के तहत चलने बाले आँगन बाड़ी और बाल बाड़ी योजना की| नगर से लेकर गाँव तक दूध डेरी की गाय और भैंसे मासूमो के लिए आ रहा सरकारी पुष्टाहार खा रही है और दूध बढ़ता जा रहा है| गोदाम से ही पंजीरी सीधी बिक रही है| सैकड़ो शिकायत हुई मगर आज तक किसी की नौकरी नहीं गयी| कैसे जाएगी| कौन लेगा| नौकरी लेने में क्या रखा है? जाँच में भ्रष्टाचार के हिस्सा लेने में क्या गुरेज है| मगर साहब है कि उन्हें सरकारी कर्मचारी के खिलाफ हलफनामे पर भ्रष्टाचार की शिकायत चाहिए| और कोई गारंटी नहीं कि भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लगे|


अब जिला जेल से सेन्ट्रल जेल रोड पर हुए 40 लाख की सड़क का नया मामला| अरे भाई भुगतान तो 31 मार्च 2013 के पहले यानि पिछली वितीय वर्ष में ही निकला है| बाद में बनी तो क्या हुआ| कौन पुष्ट करेगा| फाइलों में काम पिछली तारीखों में हुआ है| ये साहब भी जानते है और बड़े साहब भी| चिल्लाते रहो| नया टेंडर नए साल का निकलेगा|

और चलते चलते-

शराब पीकर तमंचा लहराते हुए लेखपाल सार्वजनिक स्थान पर हंगामा करते हुए पुलिस ने पकड़ा और लेखपालो ने कोतवाली में ही खरी खोटी पुलिस को सुनकर छुटा लिया| तमंचे की बात नहीं आने दी| शराबी लेखपाल की पैरवी में कई लेखपाल सामने आ गए| तहसील परिसर में चर्चा है कि ये लेखपाल भी उन्ही लेखपालो में शामिल है जो एक पौवे में आय प्रमाण पत्र पर मनचाही आय लिखने में अग्रणी रहता है| पूरे जनपद में कहीं का भी आय प्रमाण पत्र बनना हो ये इनसे रिपोर्ट लगवाई जा सकती है| हालाँकि ये शासनादेश के विरुद्ध है मगर कई लेखपाल इसे पालते है| क्योंकि होशियार लेखपाल करोडपति को बी पी एल का आय प्रमाण जारी करने का ठेका लेता है तो रिपोर्ट खुद न लगाकर इन्ही शराबी लेखपालो से लगवाते है| अब ऐसे में पैरवी तो होनी ही थी| मगर पुलिस वालो को उन्ही की कोतवाली में दम दबाने पर मजबूर होना पड़े| ये पहली बार देखा है| मानना पड़ेगा अंग्रेजो के जमाने का कानून| कानून व्यवस्था भंग होने की दुहाई देकर असीमित अधिकार जो जिला हुक्मरानों को देकर गए| हड़ताल और प्रदर्शन की धमकी पर तमंचा छूट गया| केवल दफा 34 यानि शराब के नशे में सार्वजनिक स्थान पर हंगामा रह गया| पता चला है कि इस मुद्दे पर भी साहब ने जाँच बैठाई है…….

मराठी में कहते है कि- भ्रष्टाचार चालू आहे…, थांबा नाही, जाँच जारी……

जय हिन्द

लेखपाल और कोटेदारो के भ्रष्टाचार पर अंकुश सपा सरकार भी नहीं लगा पायी, गरीब अभी भी लाचार

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Posted on : 23-04-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

समाजवादी पार्टी की सरकार यूपी में खास दिन मना रही है| सरकार की उपलब्धियो को जनता तक पहुचाने के लिए जिले स्तर पर सम्मेलन आयोजित किये जा रहे है| एक साल से ज्यादा सत्ता में काबिज हुए अखिलेश सरकार ने अपने चुनावी वाडे के अनुरूप कई कार्य कर दिए है| मुफ्त लेपटाप बटना शुरू हो चुके है| प्रदेश स्तर पर चलायी गयी अम्बुलेंस सेवा से भी जनता को फायदा मिला है| ये काम जनता को दिखाई पड़ रहे है| इसके अलावा भी कई योजना चली जो नाम बदल कर पहले भी चलती रही है| मगर जो काम जमीन पर होना चाहिए था| जिस की वजह से समाज के सबसे निचले तबके को उसका हक नहीं मिल पा रहा था| जिस वजह से समाज के सबसे निचले तबके का शोषण होता रहा है| वो काम अभी भी नहीं हो पाया है| उस पर अखिलेश सरकार कोई रोक नहीं लगा पायी| ये है जड़ो में फैला भष्टाचार| जिसके कारण समाज के सबसे कमजोर तबके का हर रोज शोषण हो रहा है|


जब सत्ता में काबिज पार्टियो के निचले स्तर के कार्यकर्ता भ्रष्टाचार के सहारे या भ्रष्टाचार के सहयोग से खुद की तरक्की का रास्ता तलाशते है तब जड़ो में काबिज भ्रष्टाचार रोक पाना आसान नहीं है| सरकार की जड़ो में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी जिनके कंधो पर होती है वे ही इसका हिस्सा वसूलने लगते है| पूर्व में सत्ता में रह चुकी सरकारों की पार्टियो के छोटे और जिले स्तर के बहुत से कार्यकर्ता जिलों में ये कारनामे करते रहे| जिले स्तर पर सरकारी सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार में ये कार्यकर्ता हिस्सा वसूल कर जनता को लुटने का लाइसेंस देते रहे| कमोवेश अब वही काम समाजवादी पार्टी की सरकार में भी हो रहा है|


प्रदेश में मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव कई बार सार्वजानिक रूप से ये न केवल स्वीकार कर चुके है बल्कि रोष भी प्रगट कर चुके है कि कोटेदार, लेखपाल और शिक्षक इमानदार नहीं है| मगर क्या सत्ता पर काबिज हुक्मरानों का काम केवल रोष प्रगट करना है? इसे रोकने की जिम्मेदारी भी सत्ता दल की भी है| क्या इसे याद दिलाना पड़ेगा| तहसील स्तर पर कई समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता इन कामो में शामिल है| ये जनता के काम घूस वसूल कर मुफ्त में सरकारी कर्मचारी से करवाते है और बदले में उन सरकारी कर्मचारियो को बरदहस्त प्रदान करते है| शिकायत होने पर उस सरकारी कर्मचारी की पैरवी भी करते है| छोटा कार्यकर्ता छोटे की पैरवी करता है और बड़े कार्यकर्ता/पदाधिकारी अफसरों को बचाने की पैरवी करते है| कोई नयी बात नहीं पिछली सरकारों में भी ऐसा ही होता रहा|

कई जिले स्तर के पदाधिकारी अपना खुद का काम न होने पर भ्रष्टाचार का मुद्दा तो उठाते है मगर यही काम वो जनता के लिए नहीं करते| सवाल ये कि क्या आम जनता सरकार इसलिए चुनती है कि सिर्फ सत्ता धारी पार्टी के कार्यकर्ताओ के काम सुचारू रूप से हो जाए| जनता को छोटे भ्रष्टाचार से कोई मुक्ति नहीं|

खाद्य एवं रसद विभाग के अंतर्गत चलने वाली सरकारी सस्ते गल्ले की कोटे की दुकानों में 80 फ़ीसदी गोलमाल हो रहा है| जिले के कोटे का में 50 फ़ीसदी मिटटी का तेल तो जिले के डिपो तक ही नहीं आता| और दुकानों तक मात्र 10 फ़ीसदी तेल ही पहुचता है| इस खेल में डिपो स्तर पर ही जिले स्तर के अधिकारी माल खाते है| निचले स्तर का हिस्सा बाबुओ और बाकी के लोगो का| इस में नुकसान तो आम गरीब आदमी का ही हो रहा है| उसे ही सस्ता राशन जरुरत है| किसी नेता या विधायक को नहीं| दफ्तरों में बैठ कर भौतिक सत्यापन हो रहा है| और बदले में रिश्वत की रकम इधर से उधर हो रही| ये रिश्वत गरीब का पेट काट कर इक्कट्ठी की जाती है| इसे रोकने के भी कोई प्रयास सपा सरकार ने नहीं किये| इतना ही नहीं प्रदेश के मुखिया के पास जिले स्तर के कार्यकर्ता और विधायक ये रोना तो रो आते है कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं मगर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई शिकायत मुखिया तक नहीं करते| ये कडुआ सच है| एक भी पत्र किसी विधायक या मंत्री ने इस बाबत मुख्यमंत्री को नहीं लिखा|

एक उदहारण के लिए आम आदमी को सपा सरकार में राशन कार्ड नहीं मिला| अकेले फर्रुखाबाद जनपद में ही 8000 राशन कार्ड के अनेदानो में से 7200 आवेदन निरस्त कर दिए गए| केवल 250-300 लोगो को ही राशन कार्ड मिला| उस पर भी इन राशन कार्डो पर राशन नहीं मिला| क्या ये समाजवादी पार्टी की सरकार का काम नहीं था| जिसको राशन कार्ड मिल भी गया उसे राशन नहीं दिल पाए| लेखपाल बिना घूस के आम जनता का कोई काम नहीं कर रहा| हाँ सपा के कार्यकर्ताओ और पदाधिकारियो के काम तो हो रहे है| ऐसे में कल को आम जनता ये कह दे कि जिन लोगो का काम हुआ उनसे ही वोट ले लेना तो क्या बुरा होगा?

कई सपा समर्थक स्कूलों कालेजो में पढ़ने वाले बच्चो के खातो में छात्रवृति नहीं पहुची| जबकि इंटरनेट पर दर्शाए जा रहे आंकड़ो में ये छात्रवृति वितरित दिखाई पड़ रही है| प्रदेश में राशन कार्डो का नवीनीकरण चल रहा है| गरीबी की रेखा से नीचे वाला बीपीएल राशन कार्ड के लिए छोटी आय का प्रमाण पत्र जारी करने के लिए 1000/- रुपये की रिश्वत आवश्यक है| जो गरीब है उसी का कार्ड बनाना है| और गरीब से 1000/- रुपये की रिश्वत लेखपाल वसूल रहा है| शर्म की बात है कि जायज काम के लिए घूस की रकम देनी पड़ रही है| ये काम चल रहा है| प्रक्रिया में है| समाजवादी पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारियो को चाहिए कि लेखपाल और कोटेदार के भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाये| क्योंकि वे ही असली वोटर है|

खुलासा: CM की समीक्षा के लिए महीनो लंबित जन शिकायतों का उलजलूल और फर्जी निस्तारण

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Posted on : 17-04-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : Corruption, EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

सरकार की समीक्षा के लिए जनता की लंबित पंजीकृत शिकायतों का निस्तारण रातो रात कर दिया गया| इनमे अधिकांश निस्तारण उलजलूल और फर्जी रिपोर्ट लगाकर किया गया| कुल मिलाकर सरकार और जनता दोनों की आँखों में धूल झोक नौकरी पक्की करने का प्रयास सरकारी मशीनरी द्वारा किया गया है| 18/04/2013 को जिलाधिकारी और उनके अधीनस्थ इस समीक्षा बैठक में लखनऊ में प्रमुख सचिव से विडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सीधे रूबरू होंगे|
82 फ़ीसदी प्रार्थना पत्र लेट लपेट ही निपटे-
जन शिकायतों का मौके पर ही निस्तारण के लिए सरकार द्वारा चलाये जा रहे तहसील दिवस कार्यक्रम का आलम तो ये है कि पिछले 10 माह में फर्रुखाबाद जनपद में पंजीकृत हुई 3709 शिकायतों में से मौके पर तो बमुश्किल 1 फ़ीसदी भी शिकायते नहीं निपटी| वहीँ केवल 8 फ़ीसदी शिकायतों/प्रार्थना पत्रों का निस्तारण समय से हुआ| शेष 82 फ़ीसदी निस्तारण निस्तारण की समय सीमा के बाद हुआ| अधिकांश में ये समय 2-3 माह भी लगा| ये आंकड़े तहसील दिवस की वेबसाइट के आंकड़े है जो समीक्षा की खातिर सरकारी नौकरों को अपडेट करना मजबूरी है| ये तो आकंडे है| इनके निस्तारण की बाजीगरी की भी अजब कहानी है| जो मामलो बहुत देरी से निपटाए गए उनमे रिश्वत कमाने की गुंजाइश भी उतनी ज्यादा थी| मामले लटके या लटकाए भी इसीलिए गए| लम्बे समय तक लटकाने में शिकायतकर्ता हताश हो जाता है और आरोपी से रिश्वत कमाई की गुंजाइश भी बनी रहती है|


जेएनआई की पड़ताल में सदर तहसील में विभिन्न विभागों के लंबित प्राथना पत्रों की जाँच पड़ताल में कई तथ्य पकड़ में आये| जिला पूर्ति विभाग ने तो जैसे तहसील दिवस के प्रार्थना पत्रों के फर्जी निस्तारण में पहला इनाम पाने योग्य काम किया है| दूसरे नंबर पर राजस्व विभाग के लेखपालो के गुल खिले है| तीसरे नंबर पर नगरीय विकास अभिकरण ने फर्जी निस्तारण में कमाल दिखाया है| इसके बाद समाज कल्याण और पुलिस विभाग का नंबर आता है| एक नजर आप भी पढ़िये किस प्रकार सपा सरकार के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कैसा जेठ के महीने में बियाबान हुए खेतो में सावन की हरियाली दिखाने की तैयारी की जा रही है|-

जिला पूर्ति अधिकारी का कमाल-
गुलाब चंद, यही नाम लिखते है जिला पूर्ति अधिकारी महोदय| इनके निपटाने के लिए आई शिकायत संख्या 2913-00366 में शिकायत कर्ता अनिल शर्मा की शिकायत तो इंटरनेट पर 16/04/2013 को निपट गयी| मगर अनिल शर्मा ने जो मांग रखी थी उसे जिला पूर्ति अधिकारी ने गलत बताया और न ही उसे राहत दिलाई| हाँ अलबत्ता इसमें जिसके खिलाफ शिकायत की गयी थी उससे जरुर कुछ खा पी लेने की बू आ रही है|
DSO1
अनिल शर्मा ने 2 अप्रैल २०१३ को शिकायत दर्ज करायी थी उसके पास बी पी एल कार्ड है जिस पर राशन मिलता था मगर कोटेदार ने कई महीनो से उस पर राशन देने से मना कर दिया| अनिल कुमार शर्मा ने सिर्फ इतनी सी मांग राखी कि उसे नियमित राशन दिला दिया जाए| इस शिकायत को नियमानुसार 9/04/2013 को निपट जाना चाहिए था| मगर गनीमत थी कि सरकार 18/4/2013 को समीक्षा करेगी इसलिए डीएम की डांट खाने के बाद 13/04/2013 को निस्तारित कर दी गयी| मगर निस्तारण इस प्रकार हुआ कि कागजो में किसी को भी नफा नुक्सान नहीं हुआ|


जाँच कर्ता का नाम गोपनीय रहा (इंटरनेट पर लिखना जरुरी नहीं समझा गया, जबकि कालम बना है) | मगर रिपोर्ट वेबसाइट पर सार्वजानिक है| रिपोर्ट में जाँचकर्ता लिखता है कि कोटेदार रामनिवास द्वारा बताया गया कि प्रधान और ग्राम सचिव ने कुछ राशन कार्डो के सम्बन्ध में लिखित आदेश दिया था कि इनके स्थान पर गरीबो को राशन दे इसलिए कोटेदार ने राशन देना बंद कर दिया| इसी के साथ जाँचकर्ता ये भी लिखता है कि ऐसा कोटेदार नहीं कर सकता| इसके लिए जिला पूर्ति अधिकारी का अनुमोदन लेना चाहिए था और इन्टरनेट पर नए राशन कार्ड लोड करने के बाद ही नए लोगो को राशन दिया जा सकता है|
उपरोक्त रिपोर्ट में अनिल शर्मा को पुनः राशन कार्ड पर राशन देने का कोई जिक्र नहीं है| और न ही कोटेदार द्वारा नियम विरुद्ध राशन बंद कर दिए जाने के विरुद्ध कोई एक्शन लेने की बात कही गयी| जाहिर है ऐसे में शिकायत कर्ता को अपनी शिकायत पर कोई राहत नहीं मिली| और न ही दोषियो को कोई दंड| जाहिर है कोटेदार जो हर माह कुछ न कुछ चढ़ावा खाद्य एवं आपूर्ति कार्यालय देता हो उसके एवज में आम जनता की कैसे सुनी जाती|
डूडा ने शिकायत की जाँच की जगह शिकायकर्ता की ही जाँच की
दिनांक १९/०३/२०१३ के तहसील दिवस में एक शिकायत संख्या 29313-00303 प्राप्त हुई| शिकायत किसी विजय वाला आदि अनेक नमो से थी| शिकायत कांशीराम योजना में फर्जी आवंटन से सम्बन्धित था| शिकायत की गयी थी कि कोई संजीव त्रिवेदी और उसकी पत्नी कांशीराम कॉलोनी हैवातपुर गढ़िया में ४ मकान को किराये पर उठाये है| ब्लाक संख्या ६४ में मकान संख्या 1013, 1022, 1024, 123 में रहने वाले अवंती नहीं किरायेदार है| यानि कि इन मकानों का आवंटन फर्जी तरीके से अपात्र लोगो ने करा लिया है| कृपया जाँच कर इन्हें निरस्त कर पत्रों को दे दिया जाए|
डूडा को जाँच एवं रिपोर्ट देने के लिए कहा गया| तहसील दिवस की शिकायत के इंटरनेट संस्करण में जांच कर्ता का नाम नहीं लिखा गया है| अलबत्ता एक महीने से अधिक समय से पेंडिंग पड़ी इस शिकायत का भी निस्तारण सरकार को दिखाने के लिए निस्तारित कर दिया गया है और निस्तारण में लिखा गया है कि शिकायत कर्ता फर्जी निकले| यानि कि जांच करने वाले ने शिकायत के मजमून की जाँच नहीं की बल्कि शिकायत कर्ता उसे नहीं मिले लिहाजा शिकायत करने वाले फर्जी करार दिए गए| क्या बढ़िया निस्तारण कर दिया गया| यानि कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई शिकायत हो तो अफसर नहीं करेंगे| जाहिर है जिनके हाथ काले है वाही जाँच कर रहे है| ऐसे मे क्या जनता का भरोसा सरकार पर बरक़रार होगा| बसपा की सरकार थी जब घोटाला हुआ और सपा की सरकार है जब घोटाले खुलने की कोई उम्मीद नहीं है| वही जो पिछली पार्टी की सरकार में फर्जी आंकड़ेबाजी होती रही वाही अब हो रही है|

राजस्व विभाग का भी नमूना बेमिसाल है-
नगर क्षेत्र के खतराना मोहल्ले के राधेश्याम ने शिकायत संख्या 29313-00136 दिनांक 19/02/2013 को दर्ज करायी थी| दो महीने से पेंडिंग ये शिकायत भी सरकार की समीक्षा के चलते 13/04/2013 को निस्तारित की गयी| शिकायत में राधेश्याम ने अपने मोहल्ले में ही एक व्यक्ति द्वारा नगर पालिका की जमीन पर अतिक्रमण कर लेने की शिकायत की थी| दो महीने तक पेंडिंग शिकायत क्यूँ रही| जबकि नगर क्षेत्र के कानूनगो और एक लेखपाल द्वारा रिपोर्ट दी जाने वाली थी| शिकायत कर्ता ने शिकायत की थी कि आरोपी फर्जी दस्ताबेजो की सह पर नगर पालिका की जमीन पर कब्ज़ा कर चुका है| जे एन आई ने पड़ताल की कि क्या शिकायत कर्ता को न्याय मिला| इस पर शिकायत कर्ता के पुत्र अनुराग मिश्र ने बताया कि लेखपाल जाँच करने आये और आरोपी से समझौता कर लेने का प्रस्ताव रखा| उन्होंने ठुकरा दिया| इसके बाद उन्होंने आरोपी को तहसील और नगरपालिका बुलवाया, इसके बाद क्या हुआ उन्हें नहीं मालूम| शिकायत कर्ता का कहना है कि अरोपियो ने फर्जी दस्ताबेज तैयार करवा लिए है| यानि की जांच मौके और दस्ताबेजो दोनों की होनी थी| मगर निस्तारण में लेखपाल लिखता है कि आरोपी ने बैनामा कराया और बैनामा की जमीन की पैमाइश की गयी तो पूरी पायी गयी| यानि कि यदि आप ताजमहल का बैनामा कर लीजिये तो यूपी के लेखपाल को उसका भी पैमाइश कर कब्ज़ा दिलाने में कोई तकलीफ नहीं होगी अलबत्ता उसे भरपेट रिश्वत दे दीजिये| मामला ऐसा ही मिलता जुलता है|

तो ये तो मात्र नमूना है| हजारो शिकायत कर्ता ये तक नहीं जानते कि उनकी शिकायत का हुआ क्या| समय से निस्तारण न होने के कारण जनता का सरकार से विश्वास दिन पर दिन उठता जा रहा है| जिन कंधो पर पूरे मामलो पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी है वे कमोवेश इसी सिस्टम के अंग है| ऐसे में तहसील दिवस जैसे कार्यक्रमों को बंद कर देना ज्यादा उचित है| क्योंकि सिर्फ प्रार्थना पत्र प्राप्त करने के लिए जिले भर के विभागीय अफसरों को एक जगह बैठा देना कोई कार्यकुशलता नहीं कही जा सकती|

क्‍लर्क ने दो महीने में पचास हजार कमीशन कमाए

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Posted on : 14-04-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

Editorभारतीय खाद्य निगम में अपर डिविजनल क्लर्क की नौकरी के उसके दो माह गुजरे है| उसके विभाग में लीकेज के बारे में पूछ रहा था| वो बोला जिसे आप लीकेज समझते हो वही मेन पाइप है अब जनता के लिए है| अब लीकेज वाला हिस्सा ही जनता तक पहुचता है| सरकार का बड़ा हिस्सा जो जनता तक पहुचना चाहिए उसे तो हाईजेक कर लिया है भ्रष्ट सरकारी मशीनरी ने|
मैंने पूछा तुम्हे कुछ मिला? (मेरा मतलब उसके 28000 रुपये मासिक वेतन से नहीं, उपरी कमाई से था)
कुछ देर के लिए उसकी नजरे झुक गयी| मैं कुरेद-कुरेद पूछ रहा था| वो बोलना नहीं चाह रहा था| फिर पूछा तो इशारे में बोला- दो माह में 50 हजार रुपये कमीशन का मिला है| मैंने बोला ये तो घूस की रकम है| फ़ौरन ही सफाई पेश दी, नहीं ये सिस्टम है| रिश्वत और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के बाद उसे स्याह करने के लिए कितने प्रकार की सफाई पेश करनी पड़ती है| शायद मुझे भ्रष्ट सिस्टम से लड़ते हुए देख खुद को सहज नहीं महसूस नहीं कर पा रहा था| मगर मैंने कभी अपने जैसा बनने का दबाब दूसरो पर नहीं डाला| अपनी अपनी मंजिल है| जो मन को अच्छा लगे वही करो| बस छोटा सा उदहारण दिया| पूछा प्रदीप शुक्ला का नाम सुना है| तपाक से बोला हाँ कभी IAS टापर था अब राष्ट्रीय स्वस्थ्य मिशन में यूपी में सबसे बड़ा घोटालेबाज अभियुक्त है|

मैं बोला- प्रदीप शुक्ला जब आई ए एस टापर हुए तब मैं छात्र था| उनके अंग्रेजी की पत्रिका इंडिया टुडे और कॉम्पिटिशन मास्टर में छपे इंटरव्यू को दो बार पढ़ा था| अब मेरे छोटे भाइयो की बारी है देश के सबसे बड़े प्रदेश के सबसे बड़े गरीबो के लिए इलाज के लिए आई रकम में घपला कर डकारने वाले अभियुक्त के रूप में प्रदीप शुक्ल को पढ़ रहे है| स्वभाव के अनुरूप मैंने थोडा सा प्रवचन दे डाला| बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा कि जब मैंने प्रदीप शुक्ल को पढ़ा था तब उन्हें आदर्श के रूप में पढ़ा था| कैसे तयारी की| क्या सोच है? आई ए एस बनकर क्या करोगे| मगर आज तुम उसी आदमी को भ्रष्टाचार की सड़ांध में लिप्त लालीपॉप के रूप में पढ़ रहे हो| क्या सोच कर प्रदीप शुक्ला ने भ्रष्टाचार के सहारे धन बटोर होगा? दो चार पीडियो के लिए धन इक्कठा कर लो| मगर अब क्या नतीजा है| दो चार पीडियो तक उनके नाती पोते परपोते भ्रष्टाचार के दागी खानदान के वारिस होने का दंश झेलेंगे| कितने करोड़ चाहिए| दिल्ली वाले भाई ने साथ दिया बोले धन संग्रह के मामले एक लिमिट के बाद शून्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता| मगर आदमी इसी शून्य को बढ़ाते रहने की सोचता रहता है| नाश्ता कब ख़त्म हुआ पता नहीं चला| वैसे खूब तरक्की करो, कहते हुए माहौल को सहज बनाने का प्रयास करने लगा|


रविवार को सुबह नाश्ते की मेज पर मैं एक नौजवान मौसेरे भाई को सड़ांध भरे प्रशसनिक सिस्टम का हिस्सा बनते हुए देख रहा था| इसके अन्दर जोश है| एक साल के अन्दर ही आधा दर्जन सरकारी नौकरियो को अपनी क़ाबलियत की दम पर हासिल कर लेने की कुव्वत वाले अपने से 15 साल छोटे नौजवान भाई को भ्रष्टाचार से भरे प्रशसनिक दलदल में खुद को सहज करते हुए देख रहा था| कई साल बाद मेरे तीन मौसेरे सगे भाई एक साथ नाश्ते की मेज पर थे| तीनो की उम्र 20 से 25 के बीच| एक दिल्ली में सचिवालय में तो बाकी के दो भारतीय खाद्य निगम में लग चुके है| तीनो एक के बाद एक नौकरी पकड़ रहे है और छोड़ रहे है| तीनो में बहुत कुछ हथिया लेने की कुव्वत है| मगर मैं देख रहा हूँ कि इन नवयुवको में सिर्फ एक अदद अच्छी नौकरी पा लेने के सिवा अभी कोई सोच नहीं है|


सबसे बड़ा भाई दिल्ली में सचिवालय पहुच चुका था जब अन्ना का आन्दोलन चल रहा था| बीच बीच में मुलाकात हुई तो कोई खास प्रभाव अन्ना का नहीं दिखा| भीड़ की चर्चा जरुर हुई| मगर गहराई कुछ नहीं| आई इ एस के अलगे टर्म की तैयारी में पूरा वक़्त गुजार रहा था| भ्रष्ट तंत्र से सब पीड़ित है| मगर सबसे पहले तो पेट का जुगाड़ करना है| और जिस युवा को पेट का जुगाड़ करना है वही अन्ना का सबसे बड़ा समर्थक है| भरे पेट वाले को तो अन्ना सिर्फ शोर करने वाला बाबा लगता है| बागपत में अन्ना की सभा में कोई नहीं पंहुचा| मीडिया में खबर आई और उस पर कोई खास चर्चा नहीं हुई| बहुत ज्यादा तिरस्कार भी देखने को नहीं मिला| क्योंकि अन्ना की सभा में भीड़ का न होना अन्ना की नाकामी नहीं देश की नाकामी है| नौजवान को रोजगार की तलाश पहले है| पेट भरने का काम पहले है| खुद के और अपने परिवार के जीने के लिए साधन जुटाने का काम पहला है| भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ना पहली प्राथमिकता नहीं है| ये बड़ी गहन बात है जिसे केंद्र में राज करने वाले जानते है| मगर सच ये भी है अन्ना नाकाम है या अन्ना का अजेंडा नाकाम है ऐसा भी किसी में कहने की हिम्मत नहीं है| कुल मिलाकर भारतीय सरकारी तंत्र एक सड़े फलो का टोकरा है जिसमे रखा जाने वाला नया और अच्छा फल भी सड़ने पर मजबूर है| अन्ना इसे ही बदलना चाहते है|

खुल्लमखुल्ला- मुलायम की प्राब्लम उम्र है या सीबीआई?

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Posted on : 26-03-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

Editorकोई बताए कि मुलायम सिंह को क्या हो गया है। उम्र उन पर हावी हो गई है, उनकी इंद्रियाँ शिथिल पड़ गई हैं या सरकार द्वारा लगाई गई सीबीआई से वे परेशान हैं। अखिलेश सरकार की नाकामी से निराश हैं या फिर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के चलते उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। एक दिन सरकार गिराने की बात करते हैं और अगले दिन चलाने की। उनको सत्यवादी बता देते हैं जिनका पूरा कारोबार ही असत्य पर टिका हुआ है।

बेटा अलग परेशान है। पिताश्री ने पुत्र को स्वयं सत्ता में बैठाया और अब उसे ही नकारा साबित करने पर आमादा हैं। सब जानते हैं कि अखिलेश मुलायम की खड़ाऊँ रखकर शासन चला रहे हैं और चला क्या रहे हैं उनसे चलावाया जा रहा है। उनके सत्ता-रथ के कई-कई सारथी हैं। सब अपनी-अपनी दिशा में ले जाना चाहते हैं। नतीजा ये हुआ है कि रथ वहीं खड़ा हो गया है। मीडिया के लिए तो वरदान हैं मसाजवादी मुलायम। मध्यावधि चुनाव का खेल खेलने के लिए अवसर जुटाते रहते हैं।

मुलायम का मतलब चाहे जो हो, चैनलों की चटपटी चर्चा सरकार के पतन से तीसरे मोर्चे के गठन तक हिलोरें मारने लगती है। ऐसे में अमर सिंह की कमी खलती है। वे होते तो जाने कितनी बातें होतीं, कितनी परोक्ष और सीधी चेतावनियाँ होतीं। फिल्मी डायलॉग होते और जाने कितनी भेंट-मुलाकात वे अब तक कर चुके होते। वे होते मसाजवाद के नए नए रूप देखने को मिलते। भारतीय राजनीति में इसे मनमोहन सिंह के लिए क्या माने- दुर्भाग्य या सौभाग्य? वे 2014 तक देश के सिर पर तो सवार रहेंगे ही।

राहुल कठेरिया खुद को डीएम का रिश्तेदार बताता है तो इसमें सपाइओ को क्या परेशानी?
पिछले एक माह से एक नया नाम बड़ा चर्चा में है| नाम है राहुल कठेरिया| बसपा से ज्यादा सपा वालों को परेशानी हो रही है| कई मीडिया कर्मिओं को फोन करके बताया जाता है कि भाई ये राहुल नाम के जीव ने अपनी बड़ी धमक डीएम साहब के आसपास बना रखी है| मगर अपने को तो कभी दिखा नहीं| किसी को घर पता और फोन नंबर मालूम हो तो हमें जरुर बताये|

आखिर ये राहुल कठेरिया क्या बला है| कोई ठेकेदार बता रहा है तो कोई दलाल| कोई भी हो मगर साइकिल वाली सरकार में राहुल कठेरिया शायद बेतरतीब और हुल्लड़वादी समाजवादी कार्यकर्ताओ हजम नहीं हो रहा है| अब उगरपुर में विद्यालय में ओम प्रकाश कठेरिया के खिलाफ डीआईओएस द्वारा गैर जमानती धाराओ में मामला दर्ज करने के बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई तो भी हमारे कुछ साइकिल वाले सूत्र राहुल कठेरिया का नाम ले बैठे| बोले साहब के दफ्तर में सीधी पकड़ है| राहुल ने पैरवी कर दी है| नक़ल माफिया कठेरिया गिरफ्तार नहीं होंगे| अव्वल उल्टा एक मुकदमा जिला विद्यालय निरीक्षक के खिलाफ लिख जाए तो कोई आश्चर्य मत मानिए? हम भी चकित है| बेटा बैंक मैनेजर के बेटे के क़त्ल के मुकदमे में जमानत पर है| बाप नक़ल कराने पर रोक लगती देख जिला स्तर के अफसर पर हमला कर दे और उस पर कोई कार्यवाही न हो इसे क्या संज्ञा दे| हिंदुस्तान की राजनीति जिस मूल मन्त्र के सहारे ही टिकी थी अब उसी का अनुसरण प्रशासनिक व्यवस्था में भी होने लगे तो इसमें सपाइओ को बुरा क्यूँ लग रहा है?

हालाँकि पिछले चौबीस घंटे में राहुल कठेरिया का नाम DUDA के PO जेड ए खान के साथ जुड़ रहा है| कोई कह रहा है कि खान साहब को राहुल कठेरिया यह कहकर बुला लाया कि उसे डीएम साहब ने बुलाया है| कोई DUDA में ठेके का मामला कह रहा था| कोई कह रहा है कि जेड साहब को बरगदिया घाट पर किसी मकान में ले जाया गया| अरे ऐसा हो रहा है तो कौन सी खास बात है| सीएम अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण का मंच भूल गए| शुरू भला तो अंत भला| मगर सपाइओ को होली की गुजिया खाने से पहले ही पेचिस क्यूँ हो रही है? जेड ए खान साहब तो कुछ भी नहीं कहते| उनके मुताबिक सब बेकार की बाते है| अब मुद्दई चुप है मगर गवाह चिल्ला कर क्या लेगा| और रही बात राजनीति और प्रशासन की साख की तो उसमे बचा ही क्या है| खुले मंच पर आमने सामने बैठ एक भी सवाल का देने की हैसियत में नहीं रह गए है दोनों| चुपचाप शांति पूर्वक होली मनाओ| जहाँ काम धाम की जुगाड़ हो वहाँ जरुर होली मिलने जाना और आशीर्वाद लेना| सपा बसपा कुछ नहीं होता| इसमें भेद नहीं करना चाहिए| सब में भाईचारा बना रहे|
-पंकज दीक्षित

उत्‍तर प्रदेश में ब्राह्मण विरोधी राजनीति की एक धुरी के तौर पर स्‍थापित हो चुके हैं राजा भैया

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Posted on : 21-03-2013 | By : जेएनआई-डेस्क | In : EDITORIALS, LUCKNOW

Lucknow: अपनी आपराधिक छवि की वजह से सरकारों के लिए अक्सर बोझ बन जाने वाले राजा भैया में कुछ तो ऐसा है जो पिछले दो दशक के दौरान उन्हें प्रदेश की राजनीति में अपरिहार्य बनाये हुए है। आज भी राजा भैया अखिलेश यादव और सपा की राजनीति की वह मजबूरी हैं जिसे ढोने के फायदे उनसे छुटकारा पाने के नुकसान से बहुत ज्यादा बड़े हैं। मजबूरी की यह दोस्ती इतना आगे बढ़ चुकी है कि सपा चाहकर भी राजा भैया से रिश्ता तोड़ नहीं सकती। वरना ऐसा नहीं है कि प्रतापगढ़ में यह कोई पहली घटना हुई है। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी द्वारा इस घटना के बाद चार मार्च को विधानसभा में दिए गए बयान के मुताबिक पिछले एक साल में प्रतापगढ़ में नौ प्रधान, बीटीसी और दूसरे जनप्रतिनिधियों की हत्या हो चुकी है। इससे भी ज्यादा सन्न करने वाली सच्चाई यह है कि इनमें से सात यादव थे।

Raja Bhaiyaउत्तर प्रदेश में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के आगे कानून के लंबे हाथ हमेशा ही छोटे पड़ जाते हैं। इस छवि को गढ़ने में जातियों की बैसाखियों पर तन कर खड़ी राजनीति का भी योगदान है। इन्हीं जातिगत समीकरणों ने उन्‍हें लगातार प्रासंगिक बनाए रखा है। वे उत्तर प्रदेश में ठाकुरों की राजनीति और ब्राह्मण-विरोधी की एक धुरी बन चुके हैं। यह एक नमूना ही था कि सीओ हत्‍याकांड में आरोपित किये जाने के बाद बीती छह मार्च को लखनऊ में सूबे के 60 से ज्यादा ठाकुर विधायकों ने बैठक करके उन्हें अपने तन-मन-धन का समर्थन अर्पित किया। इसमें सपा, भाजपा और कांग्रेस के ठाकुर विधायक सम्मिलित थे। पिछली बसपा सरकार को छोड़ दें तो राजा भैया पिछले दो दशक के दौरान वे अलग-अलग विचारों और संस्कारों वाले कुल छह मुख्यमंत्रियों के साथ एक सी सहजता के साथ जुड़ते-उठते-बैठते रहे हैं। इनमें कल्याण सिंह, मायावती, रामबाबू गुप्ता, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह और अब अखिलेश यादव के नाम हैं। लेकिन आज तक उन्होंने किसी पार्टी का दामन नहीं थामा है।

वैसे आज राजा भैया अखिलेश यादव और सपा की राजनीति की वह मजबूरी हैं जिसे ढोने के फायदे उनसे छुटकारा पाने के नुकसान से बहुत ज्यादा बड़े हैं। परंतु 1993 में मुलायम सिंह ने ही राजा भैया का जमकर विरोध किया था। उनका आरोप था कि 1991-92 में राजा भैया ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान प्रतापगढ़ के मुस्लिम विरोधी दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। तब मुलायम सिंह ने राजा भैया पर कार्रवाई की मांग को लेकर हफ्ते भर तक प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही बाधित की थी। राजा भैया ने यहीं से राजनीति में अपना पहला कदम रखा था। तब भाजपा ने उनका समर्थन करते हुए चुनावी मैदान में उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था। उनके पिता उदय प्रताप सिंह विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। इलाके के मुट्ठी भर मुसलमानों की उन्हें कोई जरूरत नहीं पड़ती। एक बार फिर से चर्चा है कि भाजपा राजा भैया के खिलाफ कोई सीधा मोर्चा नहीं खोलेगी, सिर्फ प्रदेश की बदतर कानून-व्यवस्था पर विलाप करेगी।

1996 में कल्याण सिंह किसी बात पर राजा भैया से नाराज हो गए। उन्होंने ‘कुंडा के गुंडा’ के खिलाफ अभियान चलाया। मगर 1997 में इन्हीं कल्याण सिंह ने राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में बतौर काबीना मंत्री शामिल कर लिया। आगे चलकर राजनाथ सिंह ने भी उन्हें अपने मंत्रिमंडल में बनाए रखा। उस समय यह बात आम थी कि राजा भैया के जरिए राजनाथ सिंह जमकर ठाकुरवादी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। यह भाजपा की वह सरकार थी जो लोकतांत्रिक कांग्रेस और जनतांत्रिक बसपा नाम की दो दलबदलू पार्टियों की बैसाखियों पर टिकी थी। इनमें विधायक ठाकुरों की संख्या काफी थी जिन्हें कांग्रेस और बसपा से तोड़ने का कार्य राजा भैया ने ही पूरा किया था। राजा भैया के लिए तभी मायावती के मन में वह गांठ पड़ गई जिसे आने वाले समय में हर मौके पर वे खोलती रहीं।

मई, 2002 में भाजपा और बसपा की मिली-जुली सरकार बनी। यह छह-छह महीने का प्रयोग था जिसमें पहले मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं। राजा भैया एक बार फिर से भाजपा के सहयोग से विधानसभा में थे। कल्याण सिंह तब तक पार्टी से अलग हो चुके थे और राजनाथ सिंह प्रदेश में पार्टी के सबसे बड़े नेता थे। लेकिन उनकी लालजी टंडन के साथ अदावत थी और मायावती टंडन को राखी बांधती थीं। उस वक्त राजनाथ सिंह तो राजा भैया को मायावती मंत्रिमंडल में शामिल करवाना चाहते थे लेकिन टंडन ने एक भी राजनाथ समर्थक को भाजपा के कोटे से सरकार में मंत्री नहीं बनने दिया। अक्टूबर, 2002 आते-आते राजा भैया का मायावती सरकार से मोहभंग होने लगा। उन्होंने सरकार विरोधी गतिविधियां शुरू कर दीं। पहली बार वे सपा के करीब जाते दिखने लगे। उस वक्त अमर सिंह ने राजा भैया के पक्ष में बयान दिया। राजा भैया अमर सिंह के साथ राजभवन गए और राज्यपाल को समर्थन वापसी की चिट्ठी थमा दी। सरकार लड़खड़ाने लगी। किसी तरह से कुछ विधायकों का जुगाड़ करके मायावती ने सरकार बचाई। अब मायावती अवसर की तलाश में थीं।

नवंबर, 2002 में राजा भैया ने ललितपुर के भाजपा विधायक पूरन सिंह बुंदेला को धमकी देकर सरकार से अलग होने के लिए कहा। बुंदेला ने इसकी शिकायत मायावती से की। मायावती ने बुंदेला को राजा भैया के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के लिए कहा। राजा भैया को गिरफ्तार कर लिया गया। कुंडा स्थित उनके पैतृक महल में जनवरी, 2003 में पुलिस ने छापा मारकर तमाम हथियारों के साथ दो एके-47 रायफलों की बरामदगी दिखाई। राजा भैया, उनके पिता उदय प्रताप सिंह और चचेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह को पोटा के तहत गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। राजकुमारी रत्ना सिंह के अनुसार राजा भैया के पिता उदय प्रताप सिंह पूरे देश में इकलौते शख्स हैं जिनके खिलाफ पोटा के अल्प जीवनकाल में चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी। राजा भैया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही मायावती सरकार गिर गई थी। इस घटना ने राजा भैया को ठाकुरों के बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर दिया। इसी समय भाजपा का राजनीतिक आधार सिकुड़ने लगा था और सपा ने अमर सिंह के माध्यम से राजा भैया को अपने साथ जोड़ लिया। इस तरह से राजा भैया के प्रति ठाकुरों में पैदा हुई संवेदना सपा के साथ जुड़ गई। अगस्त, 2003 में मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही राजा भैया को हिरासत से मुक्त करवा दिया।

मुलायम सिंह की इस सरकार में राजा भैया खाद्य और आपूर्ति विभाग के मंत्री बने। उन्होंने अपने मंत्रालय का जमकर दोहन किया।  राजा भैया ने खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रहते हुए एक व्यवस्थित नेटवर्क के जरिए 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का कथित गबन किया था। गरीबों के लिए आवंटित सरकारी अनाज की तस्करी करके उन्हें बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में बेच दिया गया। उनके खिलाफ सीबीआई की जांच चल रही है। तस्करी के इस लेनदेन से संबंधित एक डायरी सीबीआई के पास मौजूद है। इसमें रुपये के लेन-देन का पूरा ब्योरा मौजूद है और हर लेन-देन के नीचे राजा भैया की पत्नी के हस्ताक्षर हैं। इस दौरान समाजवादी पार्टी और राजा भैया के जुड़ाव से ही ठेकों, पट्टों और शराब आदि पर ठाकुर नेटवर्क का कब्जा हो गया था। सीबीआई से राजा भैया का नाता तभी से जुड़ा हुआ है जो कुंडा के क्षेत्राधिकारी जिया-उल-हक की मौत से और भी पक्का हो गया है।

इस बीच मायावती ने राजा भैया के खिलाफ जो कड़ाई बरती थी उससे सिर्फ दलितों में ही सशक्तीकरण का संदेश नहीं गया बल्कि इससे दशकों से प्रदेश की राजनीति में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे ब्राह्मण समुदाय में भी एक तरह की खुशी का भाव था। मायावती ने इस भावना को ताड़ लिया था। उन्होंने इसके जवाब में सतीश मिश्रा को खड़ा किया औऱ जून, 2004 में अपना सर्वजन फॉर्मूला पेश कर दिया। सतीश मिश्रा को चेहरा बना कर उन्होंने पूरे प्रदेश में दलित-ब्राह्मण सम्मेलनों की झड़ी लगा दी। 2007 में मायावती पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापस आईं जिसमें ब्राह्मण वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। सत्ता में आने के बाद उन्होंने सबसे पहला काम किया ठाकुर नेटवर्क को छिन्न-भिन्न करने का। ब्राह्मणों की पूछ प्रदेश और सरकार में एक बार फिर से बढ़ गई थी।

इन दोनों पार्टियों की लड़ाई में 10-15 साल के दौरान ठाकुर क्रमश: सपा की ओर झुकते गए और जवाब में ब्राह्मण बसपा की ओर चले गए। यह प्रदेश की राजनीति का वह पक्ष है जो सपा के साथ राजा भैया की दांत-काटी रोटी जैसी दोस्ती की वजह है। मजबूरी की यह दोस्ती इतना आगे बढ़ चुकी है कि सपा चाहकर भी राजा भैया से रिश्ता तोड़ नहीं सकती। वरना ऐसा नहीं है कि प्रतापगढ़ में यह कोई पहली घटना हुई है। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी द्वारा इस घटना के बाद चार मार्च को विधानसभा में दिए गए बयान के मुताबिक पिछले एक साल में प्रतापगढ़ में नौ प्रधान, बीटीसी और दूसरे जनप्रतिनिधियों की हत्या हो चुकी है। इससे भी ज्यादा सन्न करने वाली सच्चाई यह है कि इनमें से सात यादव थे। मतलब साफ है कि राजा भैया अखिलेश यादव की राजनीति की वह मजबूरी हैं जिसे ढोने के फायदे उनसे छुटकारा पाने के नुकसान से बहुत ज्यादा बड़े हैं।

भूमाफिया, सरकारी हुक्मरान और नेताओं को मालामाल कर रहा है 30 साल से चल रहा नगर का सर्वे

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Posted on : 16-03-2013 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS

Editorफर्रुखाबाद: नगर के कई सड़क छाप बिना कोई कल कारखाना लगाये अरबपति बन चुके है| नगर में अल्पसंख्यक समुदाय की दर्जनों सम्पतियाँ जो अब बहुसंख्यको की मिलकियत है| इस काम में जनपद में पिछले 30 साल से चल रहा सरकारी सर्वे माल खाकर बराबर मदद करता रहा| जानकारों का कहना है कि जब तक नगर में एक इंच भी जमीन नजूल, कब्रिस्तान या सरकारी बची रहेगी ये सर्वे चलता रहेगा| कम ही लोग जानते है कि इसका कार्यालय घटियाघाट के पास एक तंग गली के पुराने से मकान में है- नाम है “कार्यालय नायब तहसीलदार सर्वे| तीस सैलून में ये कार्यालय फर्रुखाबाद नगर का सर्वे का काम निपटा नहीं पाया है|

पुराने दस्ताबेजो में हेरफेर करके नजूल, तालाब, कब्रिस्तान और वक्फ की सम्पतियों का नामांतरण पिछले वर्षो में कराया जाता है| ये दस्ताबेज आमतौर पर सरकारी मुलाजिम के पास ही रहते है| जाहिर है सरकारी तंत्र बिना किसी लालच के अपनी कलम नहीं फसायेगा| यही लेखपाल सरकारी अफसरों से भी आदेश कराते रहे है| साल दर साल नगर की खली पड़ी जमीनों पर भूमाफिया, नेता और दबंग कब्जे कर बैठे| नगर में तैनात रहे कई लेखपालो के पास नॉएडा, दिल्ली और गाजियाबाद में करोडो के फ्लेट इन्ही कब्जो की देन है|
कैसे होता है ये खेल-
अदालत में एक फर्जी मुकदमा दाखिल कर उसे अफसरों को रिश्वत देकर जीते लेने और फिर उस अदालती आदेश के सहारे पुलिस की मदद से कब्ज़ा लेने की कहानी कोई नयी नहीं है| कई दर्जन लोग इस खेल में लिप्त है| इनमे से कई माननीय हो चुके है तो कई कतार में है| अचानक बढ़ी हुई इनकी सम्पत्ति किसी कल कारखाने से नहीं बल्कि मुफ्त जमीनों को हडपने से आई है| हो सकता आपके आसपास ऐसा ही कोई शातिर नेता या सरकारी अफसर रहीस हो रहा हो|

तब बसपा की सरकार थी, दो साल पहले की बात है| बढ़पुर में क्रिश्चियन ग्राउंड के बाहर एक दबंग और एक छोटे से बड़े नेता के बीच सम्पत्ति का मामला उछला तो एक नया मामला पकड़ा गया| एक बसपा के बड़े नेता की बीबी नाम पुरानी तारीखों में दर्ज हुई जमीन पकड़ी गयी थी| उसमे एक मृतक लेखपाल की बीबी का भी नाम था| मामले में इसी सर्वे के कर्मचारियों ने नेताजी की बीबी और मृतक लेखपाल की बीबी सहित एक अन्य नाम के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने की संस्तुति की थी| नेताजी ने आनन् फानन उस महिला को अपनी बीबी मानने से इनकार कर दिया था| घटियाघाट सर्वे नायब तहसीलदार के कार्यालय से चली फाइल के पन्नो पर लिखी इबारत तहसील कार्यालय में बैठ कर बदली गयी| तत्कालीन एसडीएम ने जमीन को वापस सरकारी खाते में दर्ज करने के आदेश कर दिए थे| मायाराज में लखनऊ से बड़े साहब को फरमान आया| मगर मीडिया में मामला लीक हो चुका था| कुछ दस्ताबेज भी मीडिया के हाथ लग चुके थे| लिहाजा मामला थाने तो नहीं पंहुचा अलबत्ता फर्जीवाड़े को वापस कर लेने के आदेश जरुर साहब कर गए थे| नेताजी एमएलसी भी बन गए, उनकी सरकार भी चली गयी मगर अभी तक अनुसार सर्वे विभाग ने ये जमीने वापस सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं करा पायी|

पांच साल पहले ठंडी सड़क पर नरेश अग्रवाल (तब बसपा की टिकेट पर चुनाव लड़ने आये थे) और अन्य पर भी वक्फ की जमीन बैनामा कराने का मामला सुर्ख़ियों में आया था| वक़्त के साथ अफसरों से लेकर वक्फ बोर्ड भी बिना डकार के शांत हो गया| अब उसी जमीन पर एक विशाल बैंकेट हाल बन रहा है| जिसका नक्शा गोदाम का पास है| और साहब कहते है कि उनके पास कोई शिकायत नहीं है| हजारो बिगाह का तालाब सिकुड़ कर चंद फुट का रह गया| क्या सपा और क्या बसपा, जिसकी सरकार आई उनकी पार्टी के नेताओ पर कब्रिस्तान से लेकर वक्फ और अल्पसंख्यको (इसाई) समुदायों की सम्पत्ति पर कब्जे के मामले उठे, सड़क पर आये और कई अदालत में चले गए| दो पूर्व विधायक जिनका जुडाव अब सपा के साथ है भी कब्रिस्तानो के बैनामे कराने में पीछे नहीं रहे|

बढ़पुर स्थित बस अड्डे के सामने गोशाला, वक्फ और चारागाह की जमीन पर अब अरबो का एक बैंकेट हाल, पेट्रोल पम्प और एक बैंक बनी है| मामले की जाँच चल रही है| एक अफसर के तबादले के बाद दूसरा आता है और मायावी शांति के साथ तृप्त होकर आंखे बंद कर कब्जे की जगहों से आगे निकल जाता है| जांचो की फाइल उसे तब तक ही याद आती है जब तक कब्जेदार साहब के बंगले के दर्शन नहीं कर लेता उसके बाद तो उसे वो फाइल “कौन सी फाइल” लगने लगती है| भले ही विवाद के बाद मामला कानून व्यवस्था पर बन आये| जमीनों पर कब्जे के मामलों में पुराने अभिलेखों में बड़े पैमाने पर फेरबदल बहुत साल पहले ही किये जा चुके है| जो जमीन अभी खाली दिख रही है असल में वो खाली नहीं है| जरा टटोल कर देखिये तो सही जो जमीन कभी मुर्दों को चैन की नींद लेने के लिए दर्ज थी मालखानो की गठरी में सुरक्षित उनके दस्ताबेजो में जिन्दा नेता और भूमाफिया काबिज हो चुके है|