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फ़्लैश बैक: काला धन खपाने के लिए एक डॉक्टर ने खरीदे थे 13 एसी, 5 एलईडी और ….

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Posted on : 09-11-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: नोटबंदी का एक साल पूरा हुआ, कहीं जश्न मना तो किसी के जख्म हरे हुए| 8 नवम्बर 2016 वो दिन है जो इतिहास बन गया| रात 8 बजे उस दिन दफ्तर में सामान्य कार्य में लगा था कि 5 मिनट बाद ही जूनियर ने फोन पर बताया कि 500 का नोट बंद हो गया| किसी बात को एक बार में ही न मानने की आदत पत्रकार होने के कारण लग चुकी थी| आदतन पुष्टि के लिए दूसरे साधनो पर दिमाग लगाया और लैपटॉप पर एक साथ धड़ाधड़ 3 -4 न्यूज़ वेबसाइट खोल डाली| सब पर एक ही खबर… 500 और 1000 के नोट बंद बैंक बंद करने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी|

सबसे पहले घर पर पत्नी के पास फोन लगाया (मैं जानता हूँ कि ज्यादातर ने यही किया होगा), पूछा 500 और 1000 के कितने नोट है तुम्हारे पास| जबाब जैसा सबको मिला, मुझे भी मिला| पता नहीं देखना पड़ेगा| ऐसा जबाब सबको मिला होगा मगर कारण अलग अलग हो सकते है| किसी के पास बेहिसाब हो सकता था और किसी के पास जो था वो प्रथम दृष्टया बताना नहीं चाहती थी| दो दिन बैंक बंद रहेगी उसके बाद नोट बदली शुरू होगी| अपने को नोट बदलने की चिंता से ज्यादा चिंता उन लोगो की होने लगी जिनके पास बोरो में नोट थे| बेहिसाब थे| मोदी जानते थे कि ऐसे लोग गिनती के होंगे जिनके पास बेहिसाब दौलत होगी मेरे जैसे बहुतायत में| वोट बैंक के हिसाब से देखे तो चिंता बहुतायत की होती है| मोदी का तीर निशाने पर लगा| नोट बंदी के बाद कई राज्यों में भाजपा चुनाव जीतती जा रही है| क्योंकि हम भारतीयों में वसुधैव कुटुम्बकम ठूस ठूस कर भरा है| अपने घर में बिजली जाने पर फ्यूज चेक करने की जगह घर से बाहर निकल कर पडोसी की बिजली चेक करने की आदत जो है| पडोसी की भी बिजली नहीं आ रही तो संतोष हो जाता है| नोट बंदी से मुझ पर क्या असर पड़ा इससे ज्यादा ख़ुशी इस बात में जनता को हो रही थी कि फलां की “लुटिया डूबी”| मध्यमवर्गीय से लेकर निम्नवर्गीय भारतीय को कोई खास फरक नहीं पड़ रहा था| हाँ अगले तीन महीने टीवी न्यूज़ चेंनल वालो की उड़ के लग गयी थी| नवम्बर का महीना, मीठी सर्दी में नास्ता पानी करके मूंगफली चवाते हुए घर से निकलो, किसी एटीएम पर खड़े हो जाओ, ध्यान से गैर भाजपाई तलाशो और सरकार और नोट बंदी के खिलाफ बयान रिकॉर्ड करो और चलाओ| क्या धूम थी| कई मौते भी एटीएम के पास हो गयी| खैर वो सब तो टीवी पर खूब देखा| और अगले कई सालो तक हमारे बच्चो के बच्चो को भी टीवी वाले लाइब्रेरीज़ से विडियो निकाल निकाल कर दिखाते रहेंगे| हमने तो नोट बंदी के बाद दिसम्बर के आखिरी दिनों में 1 नोट 500 का और 1 नोट 1000 का छोड़ अपने नोट भी जमा कराये| पत्नी के सारे 786 क्रमांक वाले नोट रिजर्व बैंक की टकसाल में चले गए| मुझे याद है बड़े बेमन से दिए थे|

जनवरी आते आते अब नोट बंदी अब डिजिटल कैशलेस में तब्दील होने की हुंकार भर रही थी| मगर सर पर उत्तर प्रदेश का चुनाव थे| मध्य फरवरी तक बाजार में प्रयाप्त नोट आ चुका था और डिजिटल कैशलेस के फेफड़े किसी सांस के रोगी की तरह फूलने लगे| व्यापारियों ने अपने स्वाइप मशीने बंद कर अन्दर रख दी| 1 मार्च २०१७ के बाद कार्ड से पेमेंट करने पर बैंक चार्ज वसूलने लगी और कैशलेस की दम निकल गयी| सरकार बिकी मशीनों और मोबाइल में इंस्टाल पेटीम की संख्या बताकर आंकड़ेबाजी करती रही|

खैर अब बताते है उस बात को इसके लिए आपने पूरा लेख पढ़ डाला| भारतीय होने और भारतीयता दिखाने वाली आदत के अनुसार भारतीयों वाली बात हो जाए| नोट बंदी पर पडोसी का घर झाँक लिया जाए| कई दोस्तों और सूत्रों से मिली जानकारी की पुष्ठी कर लेने के बाद बताने वाली बात ये है कि नोट बंदी के दौरान किस किस ने काला धन सफ़ेद किया इसकी जानकारी सबसे ज्यादा जिन लोगो को है उनमे बैंक कर्मी और वो व्यापारी है जिनके यहाँ मोटा सौदा होता है| मसलन कार, बाइक, टीवी एसी के शोरूम वाले, भवन निर्माण सामग्री विक्रेता सुनार आदि| काला धन सफ़ेद करने के लिए लोगो ने भवन निर्माण सामग्री बेचने वाले और हार्डवेयर स्टोर्स पर अग्रिम करोडो धन जमा कर दिया| जिसमे तम तो ऐसे है जिन्होंने एक साल बीतने के बाद भी सामान नहीं लिया है| दुकानदारो ने इसी अग्रिम धनराशी से अपने बैंक के सीसी खातो में रकम जमा कर दी| बैंक को व्याज मिलना कम हो गया| अभी भी बैंक इस व्यथा से बाहर नहीं निकले है| बड़ी लम्बी जानकारी है कभी फुर्सत में लिखूंगा| चलते चलते बता दू आवास विकास में एक डॉक्टर ने नोट बंदी के दौरान 13 स्प्लिट एसी, 5 1.5 मीटर के एलईडी टीवी खरीद डाले| जिनमे से 2 आइटम को छोड़ कर साल भर बाद भी डिब्बे में ही बंद तहखाने में पड़े है| सनद रहे इस बार की दीवाली नोट बंदी के बाद की दिवाली थी मगर कमजोर नहीं रही| बाजार से बहुत सा कीमती सामान जिसका पैसा अग्रिम 500 और 1000 के नोट की शक्ल में नोटबंदी के बाद दुकानदार के पास जमा किया था इस दिवाली पर घर गया था| दुकानदार ने भी दिल खोल कर बैक डेट में बिलिंग कर खूब काले धन को सफ़ेद करने में आखिरी कील ठोकी थी| फिर मिलेंगे…..

फ़्लैश बैक- संतोष यादव की मदद न करना भारी पड़ा है सांसद मुकेश राजपूत को

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Posted on : 22-08-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: जरा फ़्लैश बैक में चलिए| तारीख 2 नवम्बर 2015 | जिला पंचायत सदस्य का चुनाव| स्थान राजेपुर मतगणना केंद्र| और राजेपुर चतुर्थ क्षेत्र का काउंटिंग हाल| यहाँ सीधा मुकाबला सांसद मुकेश राजपूत के समर्थक संतोष यादव और सुबोध यादव की पत्नी रश्मि यादव के बीच था| राजेपुर में जब कुछ मतपेटिया ही खुलनी बाकी रह गयी थी, लगभग आखिरी राउंड तक की गिनती तक संतोष यादव लम्बे अंतराल से बढ़त बनाये हुए थे फिर भी हारे घोषित किये गए और अपनी आवाज भी बुलंद नहीं कर पाए| तमाम प्रयासों के बाबजूद सांसद मदद को नहीं आये| और सुबोध यादव की पत्नी रश्मि यादव विजयी घोषित हुई और सुबोध यादव को फर्रुखाबाद की राजनीति मे पहला कदम रखने का मौका मिल गया| स्वयं तो वे कायमगंज क्षेत्र से हार ही गए थे| जिला पंचायत अध्यक्षी के दूसरे दौर में सांसद समर्थक प्रत्याशी की हार सांकेतिक रूप से सांसद की ही हार है जिसका बीज 2 नवम्बर 2015 में बोया गया था| आज पौधा बनकर लहराने लगा है| कल किसने देखा, वृक्ष बन कर अपने नीचे की हरियाली को भी सुखा दे|

जरा अतीत में लौटते है| उस समय जब जिला पंचायत सदस्य के चुनाव कई मतगणना चल रही थी| देर रात तक जिला मुख्यालय के एक दर्जन पत्रकार राजेपुर में ही डेरा डाले हुए थे| सांसद ने जिस सदस्य को चुनाव लड़ाया था वो पुकार रहा था| उसे जीत का प्रमाण पत्र न मिलने का अन्देशा हो चला था| तत्कालीन सरकार के अफसर सपा नेताओ की मदद आँख मीच कर रहे थे| लखनऊ से राजनेताओ और सचिवों के फोन जिले अधिकारियो को बार बार निर्देशित कर रहे थे| राजेपुर चतुर्थ क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे संतोष यादव मतगणना के आखिरी दौर तक आगे थे और अचानक मतगणना रुकी और फिर कई घंटे के बाद परिणाम आया कि संतोष यादव चुनाव हार गए| मीडिया और पुलिस कप्तान जो निरंतर मतगणना पर निगाह लगाये थे, वे भी बाजीगरी के आगे हार चुके थे| भाजपा समर्थित प्रत्याशी जिसे मुकेश राजपूत ने ही खड़ा किया था वो संतोष यादव तब विरोध की आवाज बुलंद न कर सका| उसकी मदद के लिये सांसद मुकेश राजपूत को भी कई फोन किये गए मगर वो भी मदद के लिये राजेपुर नहीं पहुचे| और फर्रुखाबाद में वो राजनैतिक बीज अंकुरित हो गया जो आज पौधा बन गया और उसी की मामूली हवा में ही मुकेश की चौसर के सारे पत्ते हवा में बिखर गए| न विधायक काम आये और न समर्थक| राजनीति मे गिरती विश्वसनीयता और धनबल का बढ़ता प्रभाव इसी का नाम है|

जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने वाला निरक्षर है| उसकी कमान निश्चित रूप से वही चलाएगा जिसने उन्हें जीतने के लिये आवश्यक व्यवस्था की है| ऐसा पहली बार नहीं हुआ है| मुकेश राजपूत को इसका बेहतर तजुर्बा है| अपनी पत्नी की अध्यक्षता वही चलाते रहे| इसलिए उन्हें टोकने का नैतिक अधिकार ही नहीं है| फिर दो साल के कार्यकाल के लिये बची जिला पंचायत की कुर्सी मुकेश राजपूत के लिये केवल आर्थिक सौदा था वहीँ सुबोध के लिये राजनैतिक स्थापत्य का पहला खम्भा| कौन नहीं जनता कि जिला पंचायत में पैसा कमाने के लिये ही पैसा लगाते रहे है राजनैतिक लोग| खेल धनबल का था| एक का पहले से ही फसा हुआ था दूसरे को लगाना था| नए खरीददार के लिये ज्यादा पैसा देकर सदस्य खरीदना घाटे का सौदा था लिहाजा सदस्य कम रह गए| इतिहास फिर दोहरा रहा है| सबक लेने की जरुरत है| एक पत्रकार गुरु की सलाह थी कभी कि घर की किसी दीवार पर पंछियों के परांगन के द्वारा पीपल का पौधा अगर उग आये तो उसे वृक्ष बनने से पहले ही उखाड़ देना चाहिए| वर्ना किसी दिन बड़ा होकर वो दीवार ही उखाड़ देगा| देश में मोदी की राजनीति से ये बेहतर समझा जा सकता है| विपक्ष शून्य की ओर भाजपा निरंतर प्रयास करती दिखाई पड़ रही है| मोदी और शाह की जोड़ी कांग्रेस मुक्त भारत की ओर चल पड़ी है| नया उदहारण तमिलनाडु का है| अब शीर्ष से भी भाजपाई सबक न ले सके तो फिर भगवान् ही मालिक………
इसे भी पढ़िए- राजेपुर में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि की सदस्यता की फिर चढ़ी बलि

उस स्याह रात का मंजर जब हत्यारो ने मौत के घाट उतार दिया ब्रह्मदत्त द्विवेदी को

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Posted on : 26-05-2017 | By : JNI-Desk | In : CRIME, EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, Politics, Politics-BJP

फर्रुखाबाद: प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था| रोमेश भंडारी राज्यपाल थे| बसपा और भाजपा में 6-6 महीने मुख्यमंत्री बनाकर सरकार बनाने के फार्मूले पर लखनऊ में बैठको का दौर चल रहा था| फार्मूले की अगुआई स्व ब्रह्मदत्त द्विवेदी कर रहे थे| वही समझौते का फार्मूला लेकर मायावती के पास आ-जा रहे थे| बताते है कि मायावती सिर्फ एक शर्त पर इस फार्मूले पर राजी थी कि भाजपा की पारी में सिर्फ ब्रह्मदत्त द्विवेदी मुख्यमंत्री बने| कल्याण सिंह के नाम पर मायावती नाक भौ सिकोड़ रही थी| इसी बीच प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेता की हत्या कर दी गयी| पक्ष हो या विपक्ष जनता भी मानती है कि अगर ब्रह्मदत्त द्विवेदी आज जिन्दा होते तो फर्रुखाबाद की विकास के रास्ते पर चलते हुए तस्वीर ही बदल जाती| मगर समय और नियति के आगे किसी की नहीं चलती| 17 साल बीत जाने के बाद भी याद करने पर उस काली रात का मंजर दिलो में सिहरन पैदा कर देता है|

लोहाई रोड के जिस मकान के बाहर ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या हुई थी वहाँ हर साल 10 फरवरी को उनकी याद में पुष्पांजलि और मशाल जलती है| अपने दोस्त रामजी अग्रवाल के भतीजे के तिलक में शामिल होने के लिए द्विवेदी पहुचे थे| एक गनर ब्रजकिशोर मिश्र और ड्राइवर के साथ| लगभग 11.30 से 12 बजे के बीच का समय था| सर्दी की रात में कार्यक्रम समापन की और हो चला था| द्विवेदी जी वापस घर जाने के लिए निकले ऊँचे मकान की सीड़ियो से उतरने के बाद अपनी कार तक पहुचे| खिड़की खोल कर बैठ गए| कार के शीशे खुले हुए थे| रामजी अग्रवाल उनका भतीजा और परिवार के अन्य सदस्य अपने मकान के गेट तक उन्हें छोड़ने के लिए आये थे और उनकी गाड़ी के रवाना होने का इन्तजार कर रहे थे| गनर गाड़ी के बाहर खड़ा था| तभी उनकी कार के चारो और से घेर कर फायरिंग होने लगी| लाबड़तोड़ गोलियां चली| ब्रह्मदत्त द्विवेदी और गनर बृजकिशोर सहित ड्राईवर और रामजी अग्रवाल के भतीजे के भी गोली लगी| बताते है कि दरवाजे पर खड़े लोग अपनी जान बचाने को घर में छुप गए| सड़क पर सन्नाटा हो गया| ऊपरी मंजिल की बालकनी या छत पर खड़े मनोज अग्रवाल ने अपनी पिस्तौल निकाल गोली चलाई| ऊंचाई और दूरी के कारण शायद पिस्तौल स्वचालित हथियारो के आगे नाकाम साबित हो रही थी| मगर फिर भी हिम्मत की गयी| मगर सब बेकार गया| दुर्दांत हत्यारे अपने मकसद में कामयाब हो गए| लगभग 20 से 25 मिनट तक पूरे लोहाई रोड सन्नाटा|

घटना के कुछ समय बीत जाने के बाद आखिर फिर हिम्मत जुटाकर वापस लोग जुटे और रामजी अग्रवाल के भतीजे की टाटा सूमो में द्विवेदी जी को लिटाकर पहले डॉ जितेन्द्र कटियार के नर्सिंग होम जो चंद कदमो कि दूरी पर था वहाँ लाया गया| मगर डॉ जितेन्द्र कटियार का दरवाजा नहीं खुला तो आनन् फानन में बढ़पुर स्थित डॉ एन सी जैन के नर्सिंग होम में लाया गया| जहाँ उन्हें डॉ जैन ने मृत घोषित कर दिया| एक विकास का दिया बुझ चुका था| प्रभुदत्त, सुधांशु, डॉ हरिदत्त कोई कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था| यकीन नहीं कर पा रहा था कि उनका कोई करीबी इस तरह दुनिया से विदा हो जायेगा| गनेश दुबे, सदानंद शुक्ल, स्व बागीश अग्निहोत्री, राम चन्द्र कुशवाहा, मोती लाल गुप्ता, अजय पाराशर, अयोध्या प्रकाश सिंह जैसे तमाम चेहरे जैन अस्पताल के बाहर मौजूद थे| मोबाइल का जमाना नहीं था| बेसिक फोन से जहाँ तक सूचना पहुचती दो चार को लोग बताते और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ते| मंजुल दुनिया से विदा हो चुका था| खामोश चेहरा, बंद आँखे और शांत शरीर जीवन के अंतिम पड़ाव की तस्वीर साफ़ थी मगर यकीन फिर भी नहीं हो रहा था| लोग शव देखने के बाद भी इशारो इशारो में एक दूसरे से पूछ कर पुष्टि कर लेना चाहते थे कि क्या उनका नेता क्या बाकई चला गया!

प्रशासन से लेकर पुलिस तक खामोश थी| जिलाधिकारी अरविन्द कुमार, पुलिस अधीक्षक अखिलेश मल्होत्रा, अपर पुलिस अधीक्षक एस एन सिंह, कोतवाल ओपी शर्मा सब डॉ जैन के अस्पताल पहुचे| पुलिस अधीक्षक ने डीजीपी और डीआईजी को सूचना दी| जिलाधिकारी ने फोन पर कमिश्नर कानपुर को द्विवेदी जी की हत्या की सूचना दी| लोग पीसीओ खोजने में लगे थे| सूचना देने के लिए बेसिक फोन तलाश किये जा रहे थे| खबरनवीसों में अखबारो के पत्रकार सक्रिय हो चुके थे| तब टीवी का जमाना नहीं था| रेडियो पर समाचार प्रमोद कुदेसिया ने प्रसारित करवाया| सत्यमोहन पाण्डेय अपने कार्यालय में समाचार भेजने में लगे थे| मगर शहर ख़ामोशी से सो रहा था|
घटना स्थल पर स्वर्गीय द्विवेदी की कार खड़ी थी| पुलिस जांच पड़ताल में लगी थी| रात सुबह की और बढ़ रही थी और भाजपा कार्यकर्ता जैन अस्पताल पहुँच रहे थे| द्विवेदी परिवार के सभी सदस्य यहाँ मौजूद थे| ब्रह्मदत्त द्विवेदी की पत्नी स्व प्रभा द्विवेदी और उनके पुत्र मेजर सुनील द्विवेदी सुबह 4/5 बजे के आसपास लखनऊ से फर्रुखाबाद पहुच चुके थे| दोनों लोग उस दिन लखनऊ में ही थे| हर चेहरा उदास और शांत| कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था| यह पहली बार देखा था जब हर कार्यकर्त्ता दिल से दुखी दिखा|

साक्षी महाराज उस दिन अनन्त होटल में थे| साक्षी महाराज ने राम नगरिया के बड़े क्षेत्र में अपना पंडाल लगाकर उसी दिन भागवत कथा शुरू की थी जिस रात यह घटना हुई| साक्षी जी भी जैन अस्पताल पहुंचे थे| हर शख्स की पूरी रात जागते ही कट गयी और शव पोस्टमार्टम के लिए फतेहगढ़ ले जाया गया| अब रिटायर हो चुके कन्हैया ने ही पोस्ट मार्टम किया था| पोस्टमार्टम हाउस का वह मंजर पहली बार दिखा था| जहाँ धर्म, जाति और दलीय सीमाएं टूट गई थीं| ऐसी भीड़ पहली बार देखी गयी थी| पूरे पोस्टमार्टम के दौरान भीड़ बढ़ती रही| जो आ जाता वो रुक जाता था| साक्षी, उर्मिला भी पहुंचे थे| पोस्टमार्टम के बाद शव को पहले ब्रह्मदत्त द्विवेदी के घर पर लाया गया| उसके बाद दिन में लोगों के अंतिम दर्शनार्थ भारतीय पाठशाला ले जाया गया| ऍफ़आईआर हो चुकी थी| एक नामजद और 3-4 अज्ञात में मुकदमा कोतवाली में लिखा जा चुका था| सुबह दोपहर की और बढ़ रही थी| पूरी भारतीय जनता पार्टी फर्रुखाबाद में पहुच रही थी| पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपयी, लालकृष्ण अडवाणी, विनय कटियार, प्रेमलता कटियार, लालजी टंडन, कलराज मिश्र से लेकर हर नामी भाजपाई चेहरा फर्रुखाबाद पहुच रहा था| मगर मायावती और कल्याण सिंह नयी आये| आम जनता में सुबह जब लोग घर से निकलते तो खबर मिलती और जिसे जैसा साधन मिलता वो सेनापत स्ट्रीट पहुच रहा था| नेहरू रोड उस जमाने में जाम की स्थिति में पहुच चुका था|

आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूबे जेल प्रशासन में ये तो होना ही है…….

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Posted on : 26-03-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

पोशम्पा भाई पोशम्पा, डाकिये ने घडी चुराई, अब तो जेल में जाना पड़ेगा, जेल की रोटी खाना पड़ेगा, जेल का पानी पीना पड़ेगा…. बचपन के खेल में कहीं न कहीं सत्य का आभास कराया जाता रहा है| मगर शायद प्रशासनिक अफसरों की आँख का पानी मर गया है इसलिए उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि उनके खुद के बच्चे भी सवाल पूछ सकते है कि “क्या पापा जेल की रोटी और पानी ख़राब होता है?” और ख़राब होता है तो क्यों? और आप तो जिले के बड़े अफसर हो| जेल में निरीक्षण करते रहते हो| क्या आपको भी उसके खराब होने का हिस्सा मिलता है?

बड़ा प्रासंगिक सवाल है| रिश्वतखोर होना आज के जमाने में एक एडवांस कल्चर का भाग है या फिर बेशर्मी की हद| जेल में खाना ख़राब क्यों? जबकि बजट शारीरिक जरूरतों और सेहत के पैमाने के हिसाब से टैक्सपेयर के पैसे से बनाया जाता है| अस्पताल में इलाज का अभाव क्यों? दवा का बजट तो ठीक ठाक है| 31 मार्च को जिले के अफसर एक ही दिन में लाखो करोडो क्यों और कैसे ऊपर का कमा लेते है इस बात में ही जेल की खराब दाल रोटी और दवा के अभाव का राज छिपा होता है| जानते सब है| जो जेल में कर रहे है वे भी और जिन्हें जेल की निगरानी का जिम्मा दिया गया है वे भी, मगर काल्पनिक संतुष्टि के चलते मानने को तैयार नहीं|

वैसे जेल में जो सक्षम परिवार के लोग बन्द है वे तो जेल की रोटी दाल भी नहीं खाते| उनके लिए तो जेल से बाहर रोज का खाना आता है| उनके हिस्से का राशन तो अफसरों को खाने को मिल ही रहा है| जो गरीब जेल में बन्द होता है उसके हिस्से का भी राशन खा जाना “डोम’ (डोम- मृत्यु के समय मुर्दे से उसके जलने का टैक्स वसूलने वाला) होने से कम नहीं| गरीब होना ही सबसे बड़ा अभिशाप है| पुलिस भी सबसे पहले उसे ही पकड़ कर अंदर कर महीनों से गैर खुलासे हुए केस खोल कर उस पर लाद कर अपनी नौकरी बचा लेती है|

तो फर्रुखाबाद की जेल में कोई पहली बार आक्रोशित उपद्रव नहीं हुआ है| कभी केंद्रीय कारागार में तो कभी जिला जेल में| जहाँ मुलाकात से लेकर मोबाइल से बात करने की वसूली का खेल चलता हो| जहाँ प्रति माह चूना डाल कर औचक निरीक्षण कर अफसर अपनी नौकरी पूरी करते रहे हो| वहां जेल में आंदोलन हो जाना, दो चार के सर फूट जाना कोई खास खबर नहीं है| खास खबर तो तब होगी जब ऐसा होना बन्द हो जायेगा| सरकार बदली है….. सरकारी अफसर और तंत्र वही है…… अगली घटना होने पर जारी….

रिश्वत वसूली ऊपर वाले के लिए करनी पड़ती है…

Comments Off on रिश्वत वसूली ऊपर वाले के लिए करनी पड़ती है…

Posted on : 22-03-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

भाई साहब फाइल पर साहब का अप्र्रोवल लेना है खर्चा दो| दफ्तर के बाबू ने बड़ी शालीनता से ठेकेदार से रिश्वत की मांग अपने साहब के लिए कर दी| साथ ही ठेकेदार पर एहसान भी लाद दिया, आप तो घर के आदमी है मुझे कुछ नहीं चाहिए| रिश्वत कोई अपने लिए नहीं वसूलता है यहाँ सब ऊपर वाले के लिए रिश्वत लेते है| लेखपाल, वीडीओ, दफ्तरों के बाबू, कचहरी से लेकर म्युनिसिपल कारपोरेशन तक में हर कोई ऊपर वाले लिए रिश्वत वसूल रहा है| बाबू ने साहब के लिए, और साहब ने बड़े साहब के लिए, बड़े साहब ने अपने से ऊपर के लिए| यही व्यवस्था कहकर आम जनता से रिश्वत वसूलने का चला है| सिपाही, लेखपाल, वीडीओ, बाबू, ये सब ऊपर वाले के लिए रिश्वत लेते है और मजे हुए सेल्समेन की तरह रिश्वत की बारीकियां समझा कर सकल घरेलु रिश्वत में लगातार महगाई दर बढ़ने के अनुपात में इजाफा करते रहते है| बड़े बाबू ने चश्मा आँखों पर लगाया, ठेकेदार से मिले हुए रुपये गिने और दराज में सरकाए फिर ठेकेदार की ओर देख कर दुख साझा करते हुए कहा- अब तो अंग्रेजो के भारत से जाने के बाद ही कुछ बदल सकता है|

सब कुछ जानते हुए भी बड़े उत्सुकता भाव से ठेकेदार ने पूछा ट्रेजरी में भी देना पड़ता है| हाँ भाई ………(गाली निकलते हुए) बिना लिए फाइल अप्रूव कहा करते है| कोई न कोई कुइरी/नुक्ता लगा देंगे| ठेकेदार ने भी कुटिल भाव से पुछा उसके बाद फाइल कहाँ जाएगी| ट्रेजरी के बाद कलेक्टर साहब के पास जाएगी| मतलब कलेक्टर का भी देना होगा? मगर इस काम में कलेक्टर का तो कोई रोल नहीं है| हाँ भाई साहब यही तो रोना है, घाघ बाबू ने ठेकेदार के साथ सुहानुभूति दिखाते हुए कहा- जिले में कोई भुगतान हो कलेक्टर का तो जाता ही है| तो कुल मिलाकर तुम्हे क्या बचता है| ठेकेदार ने बड़े बाबू के साथ कुटिल सुहानुभूति दिखाते हुए पूछ ही लिया कि ख़ामो खाम ही तुम लोग (निचले स्तर के सरकारी कर्मी) बदनाम होते हो|

बड़े बाबू ने बगल की कुर्सी खीच कर ठेकेदार को अपने पास में बैठाते हुए कान में बताया …………. (गाली देते हुए) इसलिए कभी जिले में नए आये कलेक्टर और कप्तान साहब को कभी यह कहते हुए सुना कि उनके कार्यकाल में कोई रिश्वत नहीं लेगा| कोई नहीं कहता| सिस्टम बन गया है| इमानदार से इमानदार कलेक्टर भी मोटा माल ऊपर के कमा लेता है| अब तो अग्रवाल साहब इन्तजार करो आजादी का… जाने ससुरी कब मिलेगी|

शाम तक दफ्तर में बड़े बाबू ने 10 फाइल निपटाई| दोपहर बाद साहब अपने केबिन में आये तो फाइलों के साथ बड़े बाबू साहब के कमरे में पंहुचा और साहब का हिस्सा गिन दिया| साहब के हिसाब में एक फाइल के पैसे कम थे| तो साहब ने आँखे तरेरी| कितनी फाइल है| साहब 10 है मगर एक की सिफारिश थी| बड़े बाबू को वर्षांत के अंत में आज कुछ ठीक ठाक हिस्सा मिल गया था| पांच बजते ही बड़े बाबू ने छाता झोला उठाया और घर की ओर चल पड़े| सुनसान सड़क पर कुछ देर आगे ही तमंचे के साथ मुह पर कपडा बांधे गुंडों ने घेर लिया| बड़े बाबू का झोला छीनने लगे| बड़े बाबू ने प्रतिशोध किया तो गुंडे ने एक जोरदार घूँसा मुह पर जड़ दिया| बड़े बाबू चिलाये…. बचाओ मार डाला|

रसोईघर से हाथ में चिमटा लिए बबुआइन कमरे की ओर दौड़ी …… अरे किसने मार डाला| देर तक सोयेंगे और नींद में भी बड़बड़ाएगे| बड़े बाबू बिस्तर के नीचे पड़े थे| माल कमाकर लौट रहे थे, गुंडों ने सपना तोड़ दिया था| 6 बज चुके थे, साहब ने जल्दी आने को कहा था| जल्दी जल्दी तैयार हुए और सोच रहे थे कि कहीं आज दफ्तर से लौटते समय बाकई गुंडे मिल गए तो…….

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