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पर्ची बंटने के बावजूद नहीं घटी बस्तों की अहमियतपर्ची बंटने के बावजूद नहीं घटी बस्तों की अहमियत फर्रुखाबाद: चुनाव आयोग द्वारा भले ही घर-घर मतदाता पर्ची पहुंचाने की व्यवस्था की गयी हो लेकिन अभी भी बस्तों की अहमियत नहीं घटी। यह नजारा आज हो रहे विधानसभा चुनाव में साफ देखने को मिला। जहां पर प्रत्याशियों द्वारा अपने अपने बस्ते लगवाये गये। किसी पर भीड़ दिखायी दी तो कोई...

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यूपी चुनाव LIVE: तीसरे चरण का मतदान खत्म, करीब 65 फ़ीसदी हुआ मतदानयूपी चुनाव LIVE: तीसरे चरण का मतदान खत्म, करीब 65 फ़ीसदी हुआ मतदान उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान शुरू हो गया है. इस फेज में 12 जिलों की 69 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं. यह चरण इसलिए अहम है, क्योंकि इसमें सपा के गढ़ इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, बाराबंकी और फर्रुखाबाद में मतदान हो रहे हैं. इस चरण में कुल 826 प्रत्याशी मैदान में हैं और...

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विधानसभा अमृतपुर: ईवीएम खराब होने से कई जगह मतदान रुकाविधानसभा अमृतपुर: ईवीएम खराब होने से कई जगह मतदान रुका फर्रुखाबाद: (राजेपुर)लाख प्रयास के बाद भी आखिर ऐन मौके पर कई ईवीएम मशीने धोखा दे गयीं। जिससे विधानसभा क्षेत्र अमृतपुर के राजेपुर व ग्राम कड़क्का की ईवीएम मशीनें खराब होने से मतदान रुका। विधानसभा के ग्राम कड़क्का के बूथ संख्या 56 पर ईवीएम मशीन खराब होने से मतदान तकरीबन आधा...

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राजनीति का खंजर- केवल चार बचेंगेराजनीति का खंजर- केवल चार बचेंगे पांच साल तक नेताओ के हाथ में रहने वाला राजनैतिक खंजर एक दिन मतदाताओ के हाथ में रहता है| मतदान के दिन ये खंजर किस किस पर कैसे कैसे चलेगा ये वोटिंग मशीन में ही गुप्त रूप से दर्ज हो जायेगा| बात उत्तर प्रदेश के आम विधानसभा चुनाव 2017 के जनपद फर्रुखाबाद की चार विधानसभाओ के परिपेक्ष्य...

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बूथों पर अव्यवस्था के शिकार हुए मतदान कर्मीबूथों पर अव्यवस्था के शिकार हुए मतदान कर्मी फर्रुखाबाद: चुनाव आयोग के लाख प्रयास के बाद भी कहीं न कहीं खामी रह ही गयी। इसे किसके सर मड़ा जाये यह तो प्रशासन और चुनाव आयोग ही तय करे। लेकिन जब कई बूथों पर पोलिंग पार्टियां पहुंचीं तो उन्हें अव्यवस्था के शिकार हो गये। शनिवार शाम तक पोलिंग पार्टियां रवाना हुईं और जब बूथों...

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मतदान के लिये फ़ोर्स ने कमर कसी,अधिकारियों ने दिये टिप्समतदान के लिये फ़ोर्स ने कमर कसी,अधिकारियों ने दिये टिप्स फर्रुखाबाद : विधान सभा सामान्य निर्वाचन-2017 के लिये आगामी 19 फरवरी को मतदान को आयोग की मंशा के अनुसार निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं शान्तिपूर्वक रूप से सम्पन्न कराने के लिये जिला प्रशासन विभिन्न तैयारियॉ की जा रही है| मतदान को शान्तिपूर्वक सम्पन्न कराने में पुलिस फोर्स की बहुत...

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बादशाह झूठा नहीं होता, झूठा हो तो बादशाह नहीं होता: आजम खानबादशाह झूठा नहीं होता, झूठा हो तो बादशाह नहीं होता: आजम खान फर्रुखाबाद: (कमालगंज/जहानगंज ) भोजपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम जरारी में सपा प्रत्याशी के समर्थन में समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक मंत्री आजम खान ने जनसभा को सम्बोधित किया। इस दौरान आजम खान ने प्रधानमंत्री मोदी जी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने जनता से झूठा वादा...

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कन्नौज में पीएम मोदी बोले, आपके प्यार को विकास के रूप में लौटाऊंगाकन्नौज में पीएम मोदी बोले, आपके प्यार को विकास के रूप में लौटाऊंगा फर्रुखाबाद : सपा के गढ़ कन्नौज में परिवर्तन संकल्प महारैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इतना प्यार 2014 में दे दिया होता तो कितना अच्छा होता। आपने आंख की शर्म के कारण जिन पर कृपा की वह एक कुनबा टूट गया, लेकिन मैं आपसे वादा करता हूं अबकी बार आपके प्यार...

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यूपी चुनाव LIVE: दूसरे चरण का मतदान खत्म, 65.5 फीसदी लोगों ने डाले वोटयूपी चुनाव LIVE: दूसरे चरण का मतदान खत्म, 65.5 फीसदी लोगों ने डाले... उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के लिए 11 जिलों की 67 सीटों पर मतदान बुधवार को संपन्न हो गया. इसी के साथ सभी 721 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला भी ईवीएम में बंद हो गया. जो मतदान केंद्र के अंदर बच गए थे उन्हें शाम 6 बजे तक मतदान के अधिकार का इस्तेमाल करने दिया गया. चुनाव...

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राजनीति का खंजर- “केवल चार बचेंगे”

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Posted on : 18-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

पांच साल तक नेताओ के हाथ में रहने वाला राजनैतिक खंजर एक दिन मतदाताओ के हाथ में रहता है| मतदान के दिन ये खंजर किस किस पर कैसे कैसे चलेगा ये वोटिंग मशीन में ही गुप्त रूप से दर्ज हो जायेगा| बात उत्तर प्रदेश के आम विधानसभा चुनाव 2017 के जनपद फर्रुखाबाद की चार विधानसभाओ के परिपेक्ष्य में है| लिहाजा केवल चार बचेंगे और बाकी सब प्रत्याशी राजनीति के खंजर से घायल हो मैदान से बाहर हो जायेंगे| लोकतंत्र के पवित्र मतदान में खंजर शब्द का इस्तेमाल कुछ अजीब लग सकता है| मगर जिस तरह नेताओ ने पिछले सत्तर साल में सत्ता पाने के बाद जनता को भूल अपने लिए ही साधन जुटाने में प्राथमिकता दिखाई है “खंजर” शब्द माकूल लगता है| नेताओ के भ्रम को मतदाता तोड़ेगा और पांच साल में मिले कष्टों का भी आंकलन करने वाला है| चुनावी बुखार से पीड़ित सत्ताधारी “मुफ्त” माल से मतदाता को आकर्षित कर रहा है वहीँ विपक्ष सरकार की नाकामियों को कुरेद कुरेद कर खंजर की धार पैनी करने में जुटा रहा|

बात फर्रुखाबाद की चार विधानसभाओ में 19 को होने वाले मतदान के परिपेक्ष्य में है| वर्ष 2012 में अखिलेश यादव ने सत्ता संभाली| चुनाव में अखिलेश को लगभग हर वर्ग और युवाओ ने जमकर मतदान किया| वादे के अनुसार अखिलेश यादव ने हर 2012 के इंटरमीडिएट पास युवा को खूब ढोल पीट कर लैपटॉप बाट दिए| ढोल पीटने की बात इसलिए क्योंकि लैपटॉप बाटने में प्रचार और तरीके पर ही कुल लैपटॉप कीमत का 15 फ़ीसदी खर्च इस पर आया था जो लगभग 100 करोड़ से ऊपर का था| इसके बाद के वर्षो में पास हुए सभी इंटरमीडिएट छात्र छात्राओं को ये मुफ्त माल नसीब नहीं हुआ| बात समझने की ये है कि मुफ्त लैपटॉप योजना एक चुनावी गिफ्ट था न की सरकार की कोई योजना| योजना होती तो हर साल उतने ही बच्चो को लैपटॉप मिलता जितने की पहली बार मिले थे| खैर चुनावी वादा तो अखिलेश सरकार ने पूरा कर दिया|

बात मुफ्त में मिले माल की वफ़ादारी दिखाने का आया तो यूपी के मतदाता ने लोकसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को ठेंगा दिखा दिया| पूरे उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के वादे पर मिले सरकारी लैपटॉप पर मोदी का लाइव टेलीकास्ट देखा और भाजपा को सत्तर सीट से जितवा दिया| ये मतदाताओ का राजनैतिक खंजर ही था जो उसने सपा की पीठ में भोका था| और केवल मुलायम के परिवार को छोड़ कर कोई चुनाव नहीं जीत सका| वर्ष 2014 में सरकारी प्राइमरी स्कूल की लम्बे समय से लटकी नौकरी से लेकर उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक अफसरों के चयन आयोग में गड़बड़ी का मुद्दा शबाब पर था| युवा एक अदद नौकरी की तलाश में एक एक नौकरी के लिए लाखो रुपये खर्च कर चुका था| मगर भर्ती प्रक्रिया में इतने पेच होते कि नतीजा अदालतों में लटक जाता था| बात यहाँ तक पहुची की नाराज अभ्यर्थियो ने चयन के आयोग के बोर्ड पर “यादव आयोग” तक लिख दिया| केवल एक जाति विशेष को ही नौकरी में प्राथमिकता के आरोप लगने लगे| कहने का मतलब ये है कि पढ़े लिखे बेरोजगार युवा को मुफ्त का लैपटॉप या मोबाइल नहीं एक अदद नौकरी चाहिए| रोजगार के अवसर न के बराबर रहे|

विकास की बात करे तो जनपद फर्रुखाबाद में मुख्यालय को राज्य मार्ग से जोड़ने के लिए सडको का निर्माण हुआ| मगर मोहम्दाबाद से बेवर रोड की खस्ताहालत सड़क भ्रष्टाचार की चर्चा को गरम कर देती है| छोटे मोटे खडंजे नाली को छोड़ दे तो विधायको ने विधायक निधि का दो तिहाई से ज्यादा हिस्सा निजी स्कूलों के हवाले कर दिया| निजी स्कूलों को विधायक निधि या सांसद निधि बिना सुविधा शुल्क लिए मिल जाती हो ऐसा बहुत कम सुनने को मिला है| नगर की ठंडी सड़क जिस पर जिले का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट का कारोबार होता है गड्डो के हवाले ही रही| हाँ 35 हजार महिलाओ को समाजवादी पेंशन जरुर मिली| मगर इसमें भी तमाम जरुरतमंदो के आवेदन तभी स्वीकृत हो पाए जब उन्होंने प्रधानो और सूची पास करने वालो को कुछ भेट चढ़ाई| यही हाल कमोवेश हर सरकारी योजना का रहा| समाज कल्याण विभाग जिसके कंधो पर मुफ्त माल बाटने की जिम्मेदारी होती है वहां तक जिसका आवेदन बिना रिश्वत के पास होता हुआ पहुच गया तो उससे ज्यादा किस्मत वाला कोई नहीं था|

तो बात राजनीति के खंजर की है जो अब मतदाता के हाथ में है| विकास का एक और शानदार उदहारण लेते है| नगर क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे निर्दलीय प्रत्याशी मनोज अग्रवाल की पत्नी वत्सला अग्रवाल नगरपालिका की चेयरपर्सन है| नगरपालिका के अंतर्गत म्युनिसिपल अन्तर कॉलेज संचालित होता है| जिसके टूटे कक्षों के निर्माण के लिए छात्र संगठनों ने आमरण अनशन तक कर दिया| मगर टूटे कमरे न बन सके, अलबत्ता कथित शिक्षा प्रेमी विधान परिषद् सदस्य रहे मनोज अग्रवाल की विधायक निधि का 80 फ़ीसदी से ज्यादा का हिस्सा निजी स्कूलों को दिया था| अब जनता इसे भूल जाए ये कैसे हो सकता है कि आपने सरकारी स्कूल को चवन्नी देने में उदारता और फूर्ती नहीं दिखाई थी? जनता को याद भी रखना चाहिए| क्या ये विषय के नेता की जनता और समाज के प्रति उसकी ईमानदारी में शंका नहीं पैदा करता| खैर राजनीति का खंजर अब मतदाता के हाथ में है| मनोज अग्रवाल ने नगर में लगभग हर गली और नाली पक्की करा दी| दस साल से नगरपालिका पर उनके परिवार की सत्ता है| शहर पहले के मुकाबले साफ़ सुथरा हुआ| पीने के पानी की उपलब्धता भी बढ़ी| इसी के लिए जनता ने उन्हें चुना था| मगर इसलिए नहीं चुना था कि स्टील के सुन्दर बस अड्डे बाजार भाव से 40 फ़ीसदी महगे लगवाकर जनता के टैक्स का पैसा लुटा दो| जलकल विभाग में मोबाइल आधारित ऑटोमेटिक स्वचालित सिस्टम को बाजार भाव से 10 गुना महगा खरीद कर धन का गोलमाल कर लो| जनता को हिसाब भी चाहिए| हर गद्दीनशी को हिसाब देना ही होगा| राजनीति का खंजर मतदाता के हाथ में है और उसकी ख़ामोशी एक तूफ़ान का इशारा कर रही है|

नोटबंदी में केंद्र की सरकार ने आम आदमी को लाइन में लगवा दिया| आम आदमी बिना किसी आक्रोश के लाइन में लग गया| मात्र इस उम्मीद में कि भ्रष्टाचार रुकेगा, सरकार का टैक्स बढ़ेगा और उस पैसे से आम आदमी की न्यनतम जरूरते सरकार पूरी करेगी| अब विपक्ष उस पर चुटकी ले रहा है| कितना काला धन आया| अलबत्ता भाजपा जबाब दे रही है कि आ रहा है थोडा इन्तजार करिए| आखिर कितना इन्तजार? जबाब परिवर्तन की उम्मीद लगाये बैठी भाजपा को भी आने वाले समय में देना होगा|

समाजवादी पार्टी को सबसे बड़ा इम्तिहान देना है| जनपद की चारो विधानसभाओ पर उसका कब्ज़ा है| पांच साल में अवैध खनन, जमीनों के कब्जे, विरोधियो पर फर्जी मुकदमे और जिसने सरकार के पक्ष में नहीं बोला उसकी सरकारी सुविधाओ से कटौती| ये जमीनी मुद्दे है| चुनाव में कर्ज माफ़ी, मुफ्त माल और चुनावी लालीपॉप से ज्यादा ये मुद्दे काम करते है| पांच साल में समाजवादी पार्टी में जमकर रार भी हुई| बाहर से आये नेताओ ने समाजवादी पार्टी में दो फाड़ करा दिए| जो चुनाव तक आते आते आते तीन हो गए| अखिलेश गुट, शिवपाल गुट और तीसरा गुट| समाजवादी पार्टी इस चुनाव में आंतरिक संकट में है| पूरे चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव की जनसभा के अलावा दूसरे किसी नेता ने कोई असर नहीं किया| फर्रुखाबाद की सपा में तीनो गुटों को अपने अपने अस्तित्व की चिंता है| ऊपर से चारो विधायको का रिपोर्ट कार्ड भी कोई खास मुकाम नहीं बना पाया| कायमगंज के विधायक की टिकेट काट कर भाजपा के आयातित प्रत्याशी सुरभि दोहरे गंगवार को दी गयी जिनकी पूरी ताकत अपने सजातीय कुर्मी वोट को अपने लिए लामबंद करने में ही लगी रही| सपा को कायमगंज में विधायक रहे अजीत का भी हिसाब देना है और कई गुटों से मुकाबला भी करना है| कमोवेश सपा के लिए सभी विधानसभा क्षेत्रो में एक जैसी चुनौतिया है|

राजनीति कौशल के खिलाड़ी इतने चतुर निकलते है कि अपनी नाकामियों के किस्सों को अपने बाजू में इस बात से छिपाते है कि दाग उनके विपक्ष से कम है| मायावती की सरकार में भ्रष्टाचार के आसमान छूते भाव से मुखर होकर जनता ने युवा अखिलेश यादव को गद्दी सौपी तो जमीनों के कब्जे, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था पर सवाल उठे| जनता तो जनता है| अगर नेता प्रयोग करता है तो जनता भी करती ही है| चुनाव को जात पात में धकेल कर असल मुद्दों को पटरी से उतारने की कोशिश भले ही नेता करते हो मगर आखिरी फैसला मतदाता को ही करना है जिसके हाथ में एक दिन के लिए ही सही राजनीति का खंजर रुपी वोटिंग मशीन का बटन तो है….

फर्रुखाबाद में 30 फ़ीसदी चंचल मतदाता लगाएगा प्रत्याशियो की नैया पार

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Posted on : 10-02-2017 | By : JNI-Desk | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

विकास का मुद्दा लगभग गायब हो चला है| समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों को मुस्लिम वोटरों की दरकार है| भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या ने कह ही दिया है कि उन्हें मुस्लिम मतदाता की जरुरत नहीं है| उत्तर प्रदेश के 19 फ़ीसदी मुस्लिम मतदाताओ के सामने सपा और बसपा कटोरा लिए खड़े है| दोनों ही दल मुस्लिमो के विकास का दावा  ठोक रहे है| जबकि देश में 60 साल के राज में मुस्लिमो की दशा और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन किये हुए है| सपा के लिए कांग्रेस का गठबंधन कोई विशेष लाभ का सौदा नहीं दिख रहा| मुस्लिम वोटो के ठेकेदारों ने भी बसपा के पक्ष में फ़तवा जारी कर दिया है|

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के प्रथम चरण के चुनाव में 11 फरवरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोट डाले जायेंगे| प्रथम चरण से उठी हवा अंतिम चरण तक कायम रहेगी ऐसा राजनैतिक विश्लेषक मानते है| फिलहाल फर्रुखाबाद जनपद की चारो सीटो पर मुकाबला सपा और भाजपा में होने के आसार लगने लगे है| हालाँकि सदर सीट पर बसपा प्रत्याशी उमर खान मुस्लिम प्रत्याशी होने के नाते कुछ मजबूत स्थिति में दिख रहे है| 19 फरवरी को होने वाली वोटिंग का रुख कुछ कुछ साफ़ हो चला है| चारो विधानसभाओ में प्रत्याशियो के पास विकास के नाम पर गिनाने को कुछ खास नहीं है| नाली, खडंजा, सड़के हैन्डपम्प और निजी स्कूलों के विकास के अलावा सत्ताधारी विधायको के पास गिनाने को कुछ नहीं और विपक्ष में रहे बसपा और भाजपा के प्रत्याशियो ने जनता के हित में ऐसा कोई आन्दोलन खड़ा नहीं किया जो याद रखने लायक हो|

कुल मिलाकर सभी प्रत्याशी जात पात का खेल खेल रहे है| नेताओ के जनसम्पर्क और भ्रमण कार्यक्रम जाति के हिसाब से तय हो रहे है| नुक्कड़ सभाओं में कुछ कहने के लिए है नहीं| और ज्यादा बड़ी बात ये है कि इन्हें इनके समर्थको के सिवाय कोई सुनाता ही नहीं| दरवाजे पर वोट मांगने पहुचे नेता को मतदाता बड़ी हिकारत भरी नजर से देखते हुए कुटिल व्यंग्यात्मक मुस्कान फेकते हुए वोट देने का वादा कर पीछा सा छुड़ा रहा है| स्टार प्रचारको को बुलाकर मीडिया में जगह भरी जा रही है| फ़िल्मी सुन्दरियों के चुनाव प्रचार के रेट हाई होने और चुनाव आयोग को हिसाब देने से डरे नेताओ ने अभिनेत्रियो को बुलाने का अब तक कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है|

और जो स्टार प्रचारक पार्टी के नेता भी बुलाये जा रहे है वे भी जाति के हिसाब से| ठाकुर नेता ठाकुर बाहुल्य इलाके में दहाड़ेगा और मुस्लिम नेता मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रो में| मायावती और अखिलेश मुसलमानों को अपने पक्ष में वोट करने के कारण समझायेंगे और अमित शाह और केशव मौर्या प्रदेश में भ्रष्टाचार  और कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाएंगे| समर्थक ताली बजायेंगे| वो दौर अब नहीं रहा जब रेली में आम आदमी जाता था और वापस आकर अपने गाँव मोहल्ले में रेली की चर्चा कर माहौल बनता था| नेताओ की सभा की ताह्सीर हेलीकाप्टर से उडी धुल के बैठने के साथ ही समाप्त हो जाती है| 70 वोटर वोट किसे देना तय कर चुका है| आमतौर पर फ्लोटिंग वोटर जो लगभग 30 फ़ीसदी आँका जाता है और किसी पार्टी या प्रत्याशी के साथ तटस्थ नहीं होता सबसे प्रभावी होता है| यही 30 फ़ीसदी वोटर हवा के रुख के साथ वोट करने वाला है| इसमें इस बार सबसे ज्यादा संख्या मुस्लिमो की ही होनी है| वैसे इनकी पहचान बहुत मुश्किल नहीं होती| तमाम बार इन 30 फ़ीसदी वोटरों को मतगणना के बाद मतगणना केन्द्रों से बाहर निकलते विजयी प्रत्याशी के साथ भीड़ बढ़ाते देखा है|

 

बुधइआ न्यूनतम के लिए तरस रहा? सरकार ने मेट्रो और हाईवे दे दिए

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Posted on : 09-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

पांच साल तक सत्ता का लुफ्त उठाने वालो को जनता को हिसाब देना ही होगा| हालात कुछ ऐसे ही बन रहे है| मुफ्त लैपटॉप देने या रोजगार के स्थान पर 1 साल बेरोजगारी भत्ता देने भर से बात नहीं बनने वाली| अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है” का नारा केवल सुविधा सम्पन्न लोगो को ही बहला सकता जिनके पास हाईवे पर चलने लायक महगी गाड़िया है| आम आदमी आज भी न्यूनतम की जरुरत पूरी करने में असफल ही हो रहा है| शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर निजी शिक्षण संस्थानों और प्राइवेट हॉस्पिटल के खुलने से गरीब की जरुरत पूरी नहीं हो जाती|

जनपद फर्रुखाबाद की ही बात करे तो पिछले पाँच साल में जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल जिसकी ईमारत किसी बड़े पञ्च सितारा अस्पताल से कम नहीं लगती, मात्र रेफर केंद्र ही बना रहा| गंभीर बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर तो दूर की कौड़ी है न्यूनतम जरुरत के लिए डॉक्टर की कमी हमेशा बनी रही| सर्जन है तो फिजिशियन नहीं, और फिजिशियन है तो ओर्थपेडीक नहीं| अस्पताल में दबा होने के सरकारी दावे खूब किये गए मगर लोहिया अस्पताल के चारो तरफ बने मेडिकल स्टोर पर ग्राहक सरकारी अस्पताल से ही निकला| इतना ही नहीं स्वास्थ्या सेवा उपलब्ध कराने वाले सबसे बड़े अस्पताल से 200 गज दूरी पर ही सत्ताधारी दल का पार्टी कार्यालय भी है, इसके बाबजूद अस्पताल के अन्दर और बाहर सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहे| जिले प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर अधिकतर ताले ही लटके और टीकाकरण के आंकड़े खूब अच्छे दिखते रहे| जिले में मानको को ताक पर रखते हुए 50 से ज्यादा निजी अस्पताल जरुर खुल गए| जिनमे सरकारी अस्पताल से आया मरीज एक्सपोर्ट होता है|

शिक्षा के नाम पर पुराने रिटायर हुए शिक्षको के स्थान पर नए शिक्षक भारती हो गए| पहले के मास्टर रिटायर हो गए नए सर आ गए है| कोई एमबीए है तो कोई पीएचडी| ज्यादातर पढ़ाना नहीं चाहते| साल के आधे समय तो आदमी और जानवर की गिनती लगाते है| सरकारी काम है उसका मानदेय सरकार अलग से देती है| नेता जी ने कभी अपने इलाके के प्राथमिक स्कूल में जाकर नहीं देखा कि उनके वोटरों के बच्चो को पढ़ाई और उससे जरुरत की न्यूनतम मिल रही है या नहीं| जरुरत ही नहीं समझी| इन स्कूलों में उनके बच्चे तो पढ़ते नहीं| आज जिस वोटर की नेता चिरौरी कर रहा है उसी वोटर का बच्चा पांच साल से स्कूल में झाड़ू लगा रहा है| जमीन पर बैठता है, और घटिया मिड डे मील खाकर स्कूल जाने का नाटक कर रहा है| और नेता जी गरीब बच्चो के स्कूल में बैंच खरीदने के लिए विधायक निधि नहीं दी जिस पर उसके वोटर का बच्चा बैठ कर पढ़ सके| निधि निजी स्कूलों को  40 से 50 फीसद कमीशन लेकर बेच दी| पहली बार गरीबी से उठे विधायक ने बेचीं तो बेचीं खरबों की मिलकियत वाले भी इसी लाइन में रहे| न ईमान न धरम| लानत है ऐसे लोकतंत्र पर जिसमे जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के हिस्से को खा जाता हो| फिर भी लोकतंत्र है, चल रहा है|

केंद्र सरकार  द्वारा में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू करने के बाद अब तक 50000 से ज्यादा फर्जी राशन कार्ड निरस्त किये जा चुके है,  जिन पर  पिछले कई सालो से खुली लूट कोटेदारो और प्रशासनिक अफसरों ने की| और राशन कार्ड निरस्त होने का  काम आज भी चल रहा है| आज भी जिले तमाम कोटेदारो को उनके पास तय राशन कार्ड धारको से ज्यादा का राशन भेजा जा रहा है और कोटे बढ़ाने के एवज में सरकारी अफसरों ने कोई चूक भी नहीं की होगी| आंकड़े गवाह है| जबाब सरकार को देना है चुनाव सर पर है| 19 फरवरी को जनता बटन दबा कर हिसाब देगी| कब तक नेता जनता को हिन्दू मुस्लमान का आपसी खौफ दिखाकर अपना मतलब पूरा करते रहेंगे| नेता के लिए भी जनता के मन में कोई इज्जत का भाव कहीं नहीं दिखता|

आम आदमी न्यनतम की जरूरतों को पूरा करने में परेशान है| पिछले पञ्च सालो में कोई बड़ा रोजगार उत्पन्न नहीं हुआ| प्राथमिक शिक्षा में जितने मास्टर भरती हुए उतने ही रिटायर हो गए| नया रोजगार कहाँ उत्पन्न हुआ| एक एक प्राथमिक शिक्षक को नौकरी पाने के लिए 1 लाख रुपये तक आवेदन में खर्च करने पड़े|  शिक्षा का स्तर इतना घटिया और न्यूनतम हो चला है कि डिग्रीधारी सफाई कर्मी के लिए आवेदन कर रहा है| मुफ्त रेवडिया बाटने से न तो राज्य का भला होने वाला और न ही आम आदमी का| जितने रुपये से मुफ्त का प्रसाद बाटा जाने वाला है उससे नए उद्योग भी लगाये जा सकते थे और कोई नया प्रोजेक्ट भी खड़ा किया जा सकता है| मगर लोक लुहावन वादों और नारों से जनता को अपने पाले में कर लेने के लिए युवा मुख्यमंत्री भी जोर लगाये हुए है| जनता को सरकार के आखिरी साल के कार्यकाल में मिली 16 घंटे बिजली से ज्यादा 4 साल तक 16 घंटे कटने वाली बिजली शायद ज्यादा याद रहेगी| चुनाव है, जनता किसे चुने| 11 मार्च तक तो सपा बसपा और भाजपा तीनो की सरकार बन रही है| मुगालते में सब है| मगर मुगालते में अगर कोई नहीं है तो वो है ‘वोटर’ जो न्यूनतम के लिए आज भी आस लगाये बैठा है|

निजी स्कूलों पर विधायक निधि का तड़का- मनोज अग्रवाल ने दिए 3.42 करोड़ तो नरेंद्र ने दिखाया ठेंगा

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Posted on : 08-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: विधानसभा चुनाव 2017 में नेता गली गली विकास का डंका पीट रहे है मगर ये नहीं बता रहे है कि विधायक निधि जो जनता के टैक्स का पैसा है उसे नेताजी ने कैसे खर्च किया| तमाम बंदिशो और कानूनी अड़चनों के बाबजूद विधायको ने विधायक निधि का पैसा निजी स्कूलों पर दिल खोल कर लुटाया है| ये दरियादिली उन्होंने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नहीं दिखाई| वहीँ अमृतपुर से सपा विधायक नरेंद्र सिंह यादव ने विधायक निधि निजी स्कूलों को देने से खूब परहेज किया| नेताओ के निजी स्कूलों के प्रेम को देखते हुए ऐसे में अगर जनता ये कहती है कि विधायक निधि बिकती है तो कौन सा गुनाह करती है| निजी स्कूल और शिक्षा माफिया इसी विधायक और सांसद निधि  से ख़रबपति बने और नक़ल कराकर युवाओ को अशिक्षित बेरोजगार बना रहे है| गांव देहात में आज भी नालिया और सड़के टूटी पड़ी है और विकास के लिए तरस रही है|

नगरपालिका के अंतर्गत चलने वाले म्युनिसिपल इंटर कॉलेज में टूटी बिल्डिंग के लिए जहाँ छात्रों के आमरण अनशन के बाद मनोज अग्रवाल के वादे बाबजूद भवन नहीं बना वहीँ विधान परिषद् सदस्य रहे सदर से निर्दलीय प्रत्याशी मनोज अग्रवाल ने अपने कार्यकाल की कुल खर्च की गयी विधायक निधि का 80 फ़ीसदी हिस्सा निजी स्कूलों को दे दिया| इस बात पर अध्ययन करने की जरुरत अब जनता को है कि स्कूलों को कितने प्रतिशत कमीशन पर ये पैसा मिला था|
सदर विधानसभा फर्रुखाबाद से वर्तमान विधायक विजय सिंह ने अपने पिछले पांच साल के कार्यकाल में विधायक निधि से कुल 139 विकास कार्य कराये जिनमे से 31 निजी स्कूलों को विकास का लाभ मिला| विजय सिंह की विधायक निधि से कुल 6 करोड़ 87 लाख रुपया खर्च हुआ जिसमे से 1 करोड़ 65 लाख रुपया निजी स्कूलों को नसीब हुआ|

निजी स्कूलों को जनता का पैसा बाटने में कायमगंज सपा विधायक अजित कठेरिया भी अव्वल रहे| उन्होंने अपनी पहली विधायकी में ही सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले| अजीत में विधायक निधि से कुल 103 काम कराये जिनमे 53 काम निजी स्कूल में हुआ| कुल मिलाकर अजीत कठेरिया ने 5 करोड़ 94 लाख रुपये विधायक निधि से खर्च किये जिनमे खुद के लिए लैपटॉप के अलावा 4 करोड़ 18 लाख रुपये केवल निजी स्कूलों को ही बाट दिए| अजीत ने एक सपा नेता के स्कूल समेत चार स्कूलों को ही 1 करोड़ की सौगात से दी|

भोजपुर से सपा विधायक जमालुद्दीन सिद्दीकी ने भी शिक्षा पर खूब मेहरबानी दिखाई अलबत्ता इसके बाबजूद सरकारी आंकड़ो में शिक्षा के मामलो में कमालगंज जनपद के पिछड़े ब्लाक की श्रेणी में शामिल है| जमालुद्दीन ने पांच साल में विधायक निधि से कुल 5 करोड़ 4 लाख खर्च किये जिसमे से 3 करोड़ 12 लाख रुपये मदरसों और निजी स्कूलों को दिए|

अम्रतपुर विधानसभा से सपा विधायक और सपा प्रत्याशी नरेन्द्र सिंह यादव ने निजी स्कूलों को लगभग ठेंगा ही दिखाया| नरेन्द्र सिंह यादव ने विधायक निधि से कुल 107 कार्य कराये जिनमे स्कूलों को कुल ९ काम दिए उसमे भी रकम केवल 9 लाख रुपये ही खर्च की| नरेन्द्र सिंह यादव ने विधायक निधि का ज्यादातर हिस्सा सड़के, नाली, सोलर लाइट आदि बनबाने में ही खर्च कर दी|

जहाँ समाजवादी पार्टी काम बोलता के नारे पर प्रचार कर रही है वहीँ स्थानीय विधायक अपनी विधायक निधि के काम से जनता को लुभाने का कोई दावा नहीं कर रहे| कारण साफ़ है विधायक निधि में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है|

चुनाव प्रचार से स्थानीय मुद्दे गायब, राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे प्रत्याशी

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Posted on : 07-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS, Politics

फर्रुखाबाद: लोकतंत्र बड़ा गजब की चीज है और नेता उसमें नायाब नमूना। जनपद में 70 प्रत्याशी मैदान में हैं, मगर कमाल की चीज यह है कि किसी के पास आम जनता से जुड़ा स्थानीय मुद्दा और विकास का कोई खाखा नहीं है। विधायक निधि से सड़कें और नाली बनवाने के अलावा अगर कोई विकास होता है तो वह विधायक निधि से बनने वाले निजी स्कूल है। नेता विधायक बन जाने के बाद विधायक निधि के इस्तेमाल के अलावा क्या करेगा इसका कोई जबाब किसी नेता के पास नहीं है।

पांच साल तक आम आदमी की जो रोजमर्रा की तकलीफें हैं और जिनके लिए आम आदमी को या तो दर-दर की ठोकर खानी पड़ती है या रिश्वत देकर के काम चलाना पड़ता है, उसके लिए नेताओं के पास कोई समाधान नहीं। कोटेदार का भ्रष्टाचार, पुलिस का उत्पीड़न, सरकारी सहायता पाने के लिए लेखपाल द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्ट, सरकारी इलाज या किसान के ट्यूववेल का कनेक्शन हो, बिना रिश्वत आम आदमी निजात पाता नहीं दिख रहा और किसी नेता के पास अपने चुनावी पिटारे में इसका समाधान भी नहीं।

वक्त के साथ चुनाव की तकरीरें भी बदलीं और जनता की उम्मीदें भी मगर नेताओं ने अपना चुनावी फार्मूला नहीं बदला। कितने प्रतिशत सवर्ण वोट, कितने प्रतिशत ठाकुर, कितने प्रतिशत मुसलमान, कितने प्रतिशत दलित कुल मिलाकर मामला जातियों की गिनती लगाने में ही सिमट गया है। फर्रुखाबाद जनपद की चारों सीटों पर चुनाव लड़ रहे प्रमुख दलों के एक दर्जन प्रत्याशी भी इसी जमात में शामिल हैं। किसी ने रोजगार दिलाने के लिए स्थानीय तौर पर कोई कारखाना लगाने की बात नहीं की, उसके विधायक बनने पर कोटेदार ब्लैक में राशन बेचने की जगह आम जनता को ईमानदारी से बांट देगा ऐसा भी कोई वादा नहीं कर रहा और किसान को उसकी फसल के नुकसान होने पर लेखपाल बिना रिश्वत लिये मुआवजे के लिए रिपोर्ट लगा देगा ऐसी भी तकरीर एक भी नेता ने नहीं की है। कुल मिलाकर लब्बो लबाब यह है कि नेता भ्रष्टाचार के साथ है, अपराधियों को शरण दे रहा है और जनता को बेबकूफ बना रहा है। वरना राष्ट्रीय भ्रष्टाचार की जगह स्थानीय भ्रष्टाचार की चर्चा करता।

जागरूकता के दौर में अगर नेता जनता को बेबकूफ समझ रहा है तो वह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। 100-50 मोबाइल नम्बर जोड़कर व्हाट्सअप ग्रुप पर नेताओं की बम-बम वाली तस्वीरें खूब फायर हो रहीं हैं। मगर आम जनता में चर्चा नेताओं की उदासीनता, बेरुखी और मतलबीपन की ही हो रहीं हैं। वर्ष 2017 का चुनाव कई मायनों में इतिहास बनाने वाला है। जनता फोकट के चुनावी वादों से प्रभावित होती नहीं दिखायी पड़ रही है। सरकार बनने के बाद मुफ्त में मिलने वाले एक जीबी इंटरनेट या स्मार्टफोन की चर्चा बाजार में उतनी नहीं है जितनी कि मुफ्त बंटने वाले सामान के बजट पर आने वाले खर्च की है। क्योंकि नेता अपनी जेब से चुनावी वादे पूरा करने नहीं जा रहा जेब आयकरदाता की ही कटने वाली ही है।

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