राम मंदिर, गौमाता, अपराध, सरकारी योजनाओ की चिल्ल पौ में कुछ खो सा रहा है……..

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Posted on : 26-11-2018 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

कार्तिक माह के आते आते वर्षांत का एहसास होने लगता है| नवम्बर में चुपके से गरीब के बिस्तर में सेंध लगाती मीठी सर्दी कब चिल्ला जाड़े में तब्दील हो जाती है इसका एहसास गरीब, अमीर और हुक्मरानों को अलग अलग तरीके से होता है| साहब लोगो को गरीबो के लिए कम्बल खरीदने के उपक्रम से इसका एहसास होता है तो छोटे साहबो को अलाव की| बच्चो के साहबो को स्वेटर और मोज़े खरीदने होते है तो ठेकेदारों को इन सबसे सरोकार होता है| इन सबके हिस्से में कुछ न कुछ आना होता है| मगर जिनके कारण साहब के हाथ गरम होने है उनकी चर्चा के बिना पूरी रामकथा बेकार है|

हर सकारात्मक पहलु का महत्त्व तभी है जब उसका नकारात्मक प्रभावशाली हो| गरीब और कमजोर है तभी जबर साहब के हाथ और जेब गरम है| अपराध और अपराधी है तभी पुलिस की पूछ है| वर्ना रामराज में पुलिस की क्या जरुरत? छाते तो तभी बिकेंगे जब बरसात होगी| अब बरसात होगी तो गरीब की छत टपकेगी| और बरसात नहीं होगी तो किसान बेहाल होगा| यानि सूखा पड़ेगा| सूखा पड़ेगा तो बीमा कम्पनी की पूछ होगी| यानि हर सुख दुःख के पीछे कोई न कोई कारण होना जरुरी है|

जनवरी में गंगा के तट पर रामनगरिया मेला का आयोजन होना है| अब लोकसभा चुनावो की तैयारियो का असर हिन्दुओ के तीज त्योहारों में खूब दिखेगा| तमाम बजट भी आएगा| गंगा के किनारे मेलो के लिए भी पैसा आने की भरपूर सम्भावना है| मगर अभी तक तो गंगा के पुल और उसके दोनों तरफ 10 किलोमीटर तक टूटी सड़के विकास के होने और न होने के बीच का अंतर खूब दिखा रहा है| गंगा में कल कल अविरल गिरता फर्रुखाबाद नगर का नाला और फतेहगढ़ में अर्धशोधित नालो का गन्दा पानी गंगा में नगर से गंगा के बहाव के बाद गिरता रहे, साहब की बला से| पिछले तमाम वर्षो में गंगा सफाई के नाम पर सैकड़ो करोड़ खर्च हो चुके है, गंगा अविरल हुई हो या नहीं, गंगा सफाई वाले साहब का विकास 2 किलोमीटर दूर से उनके आलिशान आशियाने से दिखाई पड़ने लगा है| इसमें विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष और सांसद जैसे जनप्रतिनिधियो को दोष देना बेकार है| इन तीनो के ही पास समाजसेवा का वो डमरू है जिसे बजाकर मदारी खेल सजाता है और जनता को ही जमूरा बना देता है| अब जनता भी इनके कहने पर जमा नहीं होती स्वागत सत्कार के लिए माला और तलवार अपने चमचो से पहले खुद ही भेजनी पड़ती है| खैर नेताओ से तो जनता का भरोसा उठ ही चुका है| मगर साहब की क्या कहे जिन्हें सब कुछ सही करने का वेतन करदाताओ की जेब से मिलना होता है| अब साहब गंगा में गिरने से न नाला रोक पाए और न ही गाय का पेट भर पाए| पाप लगना था लग गया| एक्स्ट्रा बगलियाई कुर्सी और चली गयी| और नासपीटे ये नारदियो को भी दूसरा कोई काम नहीं है… एक भी गाय दूध दे रही होती तो थोडा थोडा सबके घर भिजवा देते| अब ठंठ से क्या आसरा|

जाड़े में सबकी जय जय होगी| जन प्रतिनिधि से लेकर जिले के आला अफसरों को रात्रि प्रवास पर गाँव जाड़े में ही भेजा जाता है| क्या सुखद एहसास| प्रधान , ग्रामसचिव और लेखपाल सब व्यवस्था करेंगे| झमाझम टेंट, अलाव, और संगीत के साथ साथ भुने आलू और शकरकंद का आनंद लिया जायेगा| कुछ घंटे में ही भोज आदि कर छायाचित्र कैद कर वापसी होगी और वातानुकूलित (हीटर) कमरे में बची रात गुजरेगी| रामनगरिया मेला में गरीबो की बाढ़ आएगी| कुछ मिटटी का तेल चुरायेंगे कुछ मेले के प्लाट| दान पुण्य करने के पवित्र माघ के महीने में मजाल है कि साहब की जेब से एक रुपये का भी पुण्य दान हो जाए| दाल बाटी से लेकर भुने आलू का स्वाद भरपूर मिलेगा| मगर जिस पैसे से ये खरीद कर साहब को खिलाया जायेगा वो पैसा मालूम है कहाँ से आता है….इस दुनिया में सबसे अभिशप्त गरीब की खाल खीच कर….. यकीन नहीं होता| साइकिल स्टैंड के ठेकेदार जरूर होंगे| कार वाला भले ही मेले में बिना कर दिए मेले में चला जाए मगर मजाल क्या साइकिल वाला बिना पैसा दिए मेले में घुस जाए| कुछ कुछ समझ में आ रहा है न….| बड़ी मोटी खाल के होते रहे है इंचार्ज इन मेलो के| इस बार क्या अलग थोड़ी होगा| राम के नाम पर लगने वाले मेले की वो वो असल कहानियां जरुर आपको पेश करेंगे जिसे पढ़ कर आपकी रूह कांप उठेगी|

इक्कसवी सदी आज बालिग़ हो गयी….

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Posted on : 01-01-2018 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

इक्कसवी सदी के लिए आज 1 जनवरी 2018 का दिन महत्वपूर्ण हो चला है| खुशियां मनाने का दिन तो उसी का है| मन में जवान होने की उमंग और अभिलाषा में एक एक कर 17 साल कब गुजर गए पता ही नहीं चला| अब जब सदी जवानी की दहलीज छू रही है तो वो सवाल भी पूछेगी| बताओ बीते 17 साल में क्या क्या किया| इक्कसवी सदी का सपना राजीव गाँधी ने पाला था| सदी की शुरुआत में देश की कमान अटल बिहारी बाजपेयी के हाथो में हुआ करती थी और जवान होते होते मनमोहन सिंह की परिवरिश में नरेंद्र मोदी के हाथो में आ चुकी है| कैसे मेरे देश की परवरिश की?

सवालों और जबाबो के बीच देश का युवा भी खड़ा है| स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार की तुलना अपने से ज्यादा तरक्की कर चुके पडोसी चीन से कर रहा है| चीन से हमने किसी चीज में तरक्की की हो या नहीं जनसंख्या वृद्धि में हम उनसे आगे निकलने में कामयाब रहे| देश में कोई काम करना हो चीन की तरफ देखना ही पड़ रहा है| द्वितीय विश्व युद्ध काल के दौरान जो औद्यौगिक क्रांति फ़्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे पश्चिमी देशो में हुई वैसी ही औद्यौगिक क्रांति चीन में हो रही है| चीन का बना सामान छोटे बड़े हर घर की जरुरत पूरी कर रहा है| इस दबदबे को भारतीय युवा को एक चुनौती मान कर चलना होगा| आखिर अब वो जवान हो चला है|

बात सवालों की है तो पहला सवाल ही युवा पूछता है कि सरकार ने 17 सालो में क्या किया? सरकार कहती है कि हमने विकास किया| सड़के बनबा दी| नए साल के पहले दिन घपलो घोटालो जैसी नकरात्मक बात नहीं करना चाहता| सरकार के विकास में बनी सड़को के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी विदेश से आयी| अब तैयार सड़को पर ढुलने वाला अधिकांश सामान भी चीन से बंदरगाहों के रास्ते होता हुआ हमारे घरो तक पहुंचेगा| आज़ादी के बाद स्वदेशीकरण के नाम पर चालू हुई सरकार की देशी कम्पनिया अधिकांश बंद हो चुकी है| इसलिए सरकार के भरोसे कोई काम करना इस सदी की सबसे बड़ी बेबकूफी होगी| युवाओ को जैसे हालात है की दशा में ही अपने लिए सरोकार तलाशना होगा क्योंकि अब वो जवान हो चला है| जोखिम लेने की हिम्मत जुटानी होगी| लोकतंत्र के माने तो अब बदल से गए है| आम जनता से सरोकार मात्र वोट लेना, सरकार बनाना और फिर अगले चुनाव की तयारी में जुट जाना भर रह सा गया है|

ऐसा नहीं कि हमने इक्क्सवी सदी के बचपन में कोई विकास नहीं किया मगर पडोसी का बच्चा दौड़ने लगा और हमारे ने अभी अभी ट्राईसाइकिल छोड़ी है इतना फरक तो हो ही चला है| हम सिर्फ पाकिस्तान से तुलना कर खुश होते रहे और चीन सिल्क रुट से आगे निकल गया| हम अपने घर में सिर्फ 2जी, 3जी और जीजाजी में उलझे रहे और पडोसी के घर में दुनिया भर से रिश्ते आने लगे| क्या शानदार तरक्की की है हमने| देश के किसान के हिस्से में हाइब्रिड बीज आ गया| बेचारा अपना देशी बीज जो हर साल पैदावार से बचा कर बो लेता था उसे भी खो चुका| अन्नदाता किसान “बेचारा” हो गया| हिन्दुस्तान में औद्यौगिक क्षेत्र में अनिश्चितता की स्थिति बानी हुई है| विदेशी सामान भारत के सामान से सस्ता होने के कारण बाजार से गायब हो रहा है| कारखाने बंद हो रहे है| हम बना बनाया सामान बाहर से मगा कर मात्र पैकिंग कर मेक इन इंडिया (मोबाइल और सोलर कम्पनिया) बनने में लग गए| क्या यही इक्कसवी सदी का भारत है? मेरे जवान होने पर यही तोहफा भारत के नेताओ ने मुझे दिया|

कुल मिलाकर दूर दूर तक झाँकने पर एक मात्र बाबा रामदेव ही इस इक्क्सवी सदी में क्रांतिदूत समझ में आते है| स्वदेशी अपनाओ के नारे को साकार करते करते वे स्वामी से योगा करते करते हुए उद्योगपति बन गए| एक पतंजलि ही इक्क्सवी सदी के बचपन में भरपूर जवानी की ओर चल पाया है| कोई सरकारी सहायता नहीं| खुद का हौसला और दूरदृष्टि| फिर सरकारी सहायता जो मिली वो बाबा की जरुरत नहीं प्रदेश की सरकारों की जरुरत थी| बाबा के व्यापार और उद्योग से टैक्स जो मिलना था| आज देश में जवानी की दहलीज पर खड़े युवा के सामने बहुत से रास्ते है| देश में एक बार फिर से औद्यौगिक क्रांति की जरुरत है| जिसे बिना किसी सरकारी सहायता से खड़ा करने का यत्न तलाशना होगा| सरकारों से उम्मीद लगाने में जैसे बचपन गुजरा है वैसे ही जवानी भी ढल जाएगी| देश में सिस्टम कहीं दिख नहीं रहा| कदम कदम बढ़ते हुए खुद के रास्ते के बनाने होंगे| स्वास्थ्य, शिक्षा जो सेवा थे अब चरम पर व्यवसाय है| और जो व्यवसाय होना था उसे पडोसी से पूरा कर लेने की फितरत हमारे कुछ नया सोचने के रास्ते बंद चुका है| जरुरत है उन्ही बंद रास्तो को फिर से खोलने की| भाषण देने से सब कुछ हो जाता तो भारत इक्कसवी सदी के शुरू होते ही जवान हो जाता क्योंकि तब जिन हाथो में भारत था उनसे अच्छा भाषण अभी मोदी नहीं दे पाते है| तो इक्क्सवी सदी के बालिग़ होने पर एक बार फिर से सभी को शुभकामनाये इस उम्मीद के साथ कि अब तुझ पर किसी की बंदिश नहीं है| 18 की हो गयी है तू अब फैसला लेने का हक तेरा है………

फ़्लैश बैक: काला धन खपाने के लिए एक डॉक्टर ने खरीदे थे 13 एसी, 5 एलईडी और ….

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Posted on : 09-11-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: नोटबंदी का एक साल पूरा हुआ, कहीं जश्न मना तो किसी के जख्म हरे हुए| 8 नवम्बर 2016 वो दिन है जो इतिहास बन गया| रात 8 बजे उस दिन दफ्तर में सामान्य कार्य में लगा था कि 5 मिनट बाद ही जूनियर ने फोन पर बताया कि 500 का नोट बंद हो गया| किसी बात को एक बार में ही न मानने की आदत पत्रकार होने के कारण लग चुकी थी| आदतन पुष्टि के लिए दूसरे साधनो पर दिमाग लगाया और लैपटॉप पर एक साथ धड़ाधड़ 3 -4 न्यूज़ वेबसाइट खोल डाली| सब पर एक ही खबर… 500 और 1000 के नोट बंद बैंक बंद करने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी|

सबसे पहले घर पर पत्नी के पास फोन लगाया (मैं जानता हूँ कि ज्यादातर ने यही किया होगा), पूछा 500 और 1000 के कितने नोट है तुम्हारे पास| जबाब जैसा सबको मिला, मुझे भी मिला| पता नहीं देखना पड़ेगा| ऐसा जबाब सबको मिला होगा मगर कारण अलग अलग हो सकते है| किसी के पास बेहिसाब हो सकता था और किसी के पास जो था वो प्रथम दृष्टया बताना नहीं चाहती थी| दो दिन बैंक बंद रहेगी उसके बाद नोट बदली शुरू होगी| अपने को नोट बदलने की चिंता से ज्यादा चिंता उन लोगो की होने लगी जिनके पास बोरो में नोट थे| बेहिसाब थे| मोदी जानते थे कि ऐसे लोग गिनती के होंगे जिनके पास बेहिसाब दौलत होगी मेरे जैसे बहुतायत में| वोट बैंक के हिसाब से देखे तो चिंता बहुतायत की होती है| मोदी का तीर निशाने पर लगा| नोट बंदी के बाद कई राज्यों में भाजपा चुनाव जीतती जा रही है| क्योंकि हम भारतीयों में वसुधैव कुटुम्बकम ठूस ठूस कर भरा है| अपने घर में बिजली जाने पर फ्यूज चेक करने की जगह घर से बाहर निकल कर पडोसी की बिजली चेक करने की आदत जो है| पडोसी की भी बिजली नहीं आ रही तो संतोष हो जाता है| नोट बंदी से मुझ पर क्या असर पड़ा इससे ज्यादा ख़ुशी इस बात में जनता को हो रही थी कि फलां की “लुटिया डूबी”| मध्यमवर्गीय से लेकर निम्नवर्गीय भारतीय को कोई खास फरक नहीं पड़ रहा था| हाँ अगले तीन महीने टीवी न्यूज़ चेंनल वालो की उड़ के लग गयी थी| नवम्बर का महीना, मीठी सर्दी में नास्ता पानी करके मूंगफली चवाते हुए घर से निकलो, किसी एटीएम पर खड़े हो जाओ, ध्यान से गैर भाजपाई तलाशो और सरकार और नोट बंदी के खिलाफ बयान रिकॉर्ड करो और चलाओ| क्या धूम थी| कई मौते भी एटीएम के पास हो गयी| खैर वो सब तो टीवी पर खूब देखा| और अगले कई सालो तक हमारे बच्चो के बच्चो को भी टीवी वाले लाइब्रेरीज़ से विडियो निकाल निकाल कर दिखाते रहेंगे| हमने तो नोट बंदी के बाद दिसम्बर के आखिरी दिनों में 1 नोट 500 का और 1 नोट 1000 का छोड़ अपने नोट भी जमा कराये| पत्नी के सारे 786 क्रमांक वाले नोट रिजर्व बैंक की टकसाल में चले गए| मुझे याद है बड़े बेमन से दिए थे|

जनवरी आते आते अब नोट बंदी अब डिजिटल कैशलेस में तब्दील होने की हुंकार भर रही थी| मगर सर पर उत्तर प्रदेश का चुनाव थे| मध्य फरवरी तक बाजार में प्रयाप्त नोट आ चुका था और डिजिटल कैशलेस के फेफड़े किसी सांस के रोगी की तरह फूलने लगे| व्यापारियों ने अपने स्वाइप मशीने बंद कर अन्दर रख दी| 1 मार्च २०१७ के बाद कार्ड से पेमेंट करने पर बैंक चार्ज वसूलने लगी और कैशलेस की दम निकल गयी| सरकार बिकी मशीनों और मोबाइल में इंस्टाल पेटीम की संख्या बताकर आंकड़ेबाजी करती रही|

खैर अब बताते है उस बात को इसके लिए आपने पूरा लेख पढ़ डाला| भारतीय होने और भारतीयता दिखाने वाली आदत के अनुसार भारतीयों वाली बात हो जाए| नोट बंदी पर पडोसी का घर झाँक लिया जाए| कई दोस्तों और सूत्रों से मिली जानकारी की पुष्ठी कर लेने के बाद बताने वाली बात ये है कि नोट बंदी के दौरान किस किस ने काला धन सफ़ेद किया इसकी जानकारी सबसे ज्यादा जिन लोगो को है उनमे बैंक कर्मी और वो व्यापारी है जिनके यहाँ मोटा सौदा होता है| मसलन कार, बाइक, टीवी एसी के शोरूम वाले, भवन निर्माण सामग्री विक्रेता सुनार आदि| काला धन सफ़ेद करने के लिए लोगो ने भवन निर्माण सामग्री बेचने वाले और हार्डवेयर स्टोर्स पर अग्रिम करोडो धन जमा कर दिया| जिसमे तम तो ऐसे है जिन्होंने एक साल बीतने के बाद भी सामान नहीं लिया है| दुकानदारो ने इसी अग्रिम धनराशी से अपने बैंक के सीसी खातो में रकम जमा कर दी| बैंक को व्याज मिलना कम हो गया| अभी भी बैंक इस व्यथा से बाहर नहीं निकले है| बड़ी लम्बी जानकारी है कभी फुर्सत में लिखूंगा| चलते चलते बता दू आवास विकास में एक डॉक्टर ने नोट बंदी के दौरान 13 स्प्लिट एसी, 5 1.5 मीटर के एलईडी टीवी खरीद डाले| जिनमे से 2 आइटम को छोड़ कर साल भर बाद भी डिब्बे में ही बंद तहखाने में पड़े है| सनद रहे इस बार की दीवाली नोट बंदी के बाद की दिवाली थी मगर कमजोर नहीं रही| बाजार से बहुत सा कीमती सामान जिसका पैसा अग्रिम 500 और 1000 के नोट की शक्ल में नोटबंदी के बाद दुकानदार के पास जमा किया था इस दिवाली पर घर गया था| दुकानदार ने भी दिल खोल कर बैक डेट में बिलिंग कर खूब काले धन को सफ़ेद करने में आखिरी कील ठोकी थी| फिर मिलेंगे…..

फ़्लैश बैक- संतोष यादव की मदद न करना भारी पड़ा है सांसद मुकेश राजपूत को

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Posted on : 22-08-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: जरा फ़्लैश बैक में चलिए| तारीख 2 नवम्बर 2015 | जिला पंचायत सदस्य का चुनाव| स्थान राजेपुर मतगणना केंद्र| और राजेपुर चतुर्थ क्षेत्र का काउंटिंग हाल| यहाँ सीधा मुकाबला सांसद मुकेश राजपूत के समर्थक संतोष यादव और सुबोध यादव की पत्नी रश्मि यादव के बीच था| राजेपुर में जब कुछ मतपेटिया ही खुलनी बाकी रह गयी थी, लगभग आखिरी राउंड तक की गिनती तक संतोष यादव लम्बे अंतराल से बढ़त बनाये हुए थे फिर भी हारे घोषित किये गए और अपनी आवाज भी बुलंद नहीं कर पाए| तमाम प्रयासों के बाबजूद सांसद मदद को नहीं आये| और सुबोध यादव की पत्नी रश्मि यादव विजयी घोषित हुई और सुबोध यादव को फर्रुखाबाद की राजनीति मे पहला कदम रखने का मौका मिल गया| स्वयं तो वे कायमगंज क्षेत्र से हार ही गए थे| जिला पंचायत अध्यक्षी के दूसरे दौर में सांसद समर्थक प्रत्याशी की हार सांकेतिक रूप से सांसद की ही हार है जिसका बीज 2 नवम्बर 2015 में बोया गया था| आज पौधा बनकर लहराने लगा है| कल किसने देखा, वृक्ष बन कर अपने नीचे की हरियाली को भी सुखा दे|

जरा अतीत में लौटते है| उस समय जब जिला पंचायत सदस्य के चुनाव कई मतगणना चल रही थी| देर रात तक जिला मुख्यालय के एक दर्जन पत्रकार राजेपुर में ही डेरा डाले हुए थे| सांसद ने जिस सदस्य को चुनाव लड़ाया था वो पुकार रहा था| उसे जीत का प्रमाण पत्र न मिलने का अन्देशा हो चला था| तत्कालीन सरकार के अफसर सपा नेताओ की मदद आँख मीच कर रहे थे| लखनऊ से राजनेताओ और सचिवों के फोन जिले अधिकारियो को बार बार निर्देशित कर रहे थे| राजेपुर चतुर्थ क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे संतोष यादव मतगणना के आखिरी दौर तक आगे थे और अचानक मतगणना रुकी और फिर कई घंटे के बाद परिणाम आया कि संतोष यादव चुनाव हार गए| मीडिया और पुलिस कप्तान जो निरंतर मतगणना पर निगाह लगाये थे, वे भी बाजीगरी के आगे हार चुके थे| भाजपा समर्थित प्रत्याशी जिसे मुकेश राजपूत ने ही खड़ा किया था वो संतोष यादव तब विरोध की आवाज बुलंद न कर सका| उसकी मदद के लिये सांसद मुकेश राजपूत को भी कई फोन किये गए मगर वो भी मदद के लिये राजेपुर नहीं पहुचे| और फर्रुखाबाद में वो राजनैतिक बीज अंकुरित हो गया जो आज पौधा बन गया और उसी की मामूली हवा में ही मुकेश की चौसर के सारे पत्ते हवा में बिखर गए| न विधायक काम आये और न समर्थक| राजनीति मे गिरती विश्वसनीयता और धनबल का बढ़ता प्रभाव इसी का नाम है|

जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने वाला निरक्षर है| उसकी कमान निश्चित रूप से वही चलाएगा जिसने उन्हें जीतने के लिये आवश्यक व्यवस्था की है| ऐसा पहली बार नहीं हुआ है| मुकेश राजपूत को इसका बेहतर तजुर्बा है| अपनी पत्नी की अध्यक्षता वही चलाते रहे| इसलिए उन्हें टोकने का नैतिक अधिकार ही नहीं है| फिर दो साल के कार्यकाल के लिये बची जिला पंचायत की कुर्सी मुकेश राजपूत के लिये केवल आर्थिक सौदा था वहीँ सुबोध के लिये राजनैतिक स्थापत्य का पहला खम्भा| कौन नहीं जनता कि जिला पंचायत में पैसा कमाने के लिये ही पैसा लगाते रहे है राजनैतिक लोग| खेल धनबल का था| एक का पहले से ही फसा हुआ था दूसरे को लगाना था| नए खरीददार के लिये ज्यादा पैसा देकर सदस्य खरीदना घाटे का सौदा था लिहाजा सदस्य कम रह गए| इतिहास फिर दोहरा रहा है| सबक लेने की जरुरत है| एक पत्रकार गुरु की सलाह थी कभी कि घर की किसी दीवार पर पंछियों के परांगन के द्वारा पीपल का पौधा अगर उग आये तो उसे वृक्ष बनने से पहले ही उखाड़ देना चाहिए| वर्ना किसी दिन बड़ा होकर वो दीवार ही उखाड़ देगा| देश में मोदी की राजनीति से ये बेहतर समझा जा सकता है| विपक्ष शून्य की ओर भाजपा निरंतर प्रयास करती दिखाई पड़ रही है| मोदी और शाह की जोड़ी कांग्रेस मुक्त भारत की ओर चल पड़ी है| नया उदहारण तमिलनाडु का है| अब शीर्ष से भी भाजपाई सबक न ले सके तो फिर भगवान् ही मालिक………
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उस स्याह रात का मंजर जब हत्यारो ने मौत के घाट उतार दिया ब्रह्मदत्त द्विवेदी को

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Posted on : 26-05-2017 | By : JNI-Desk | In : CRIME, EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, Politics, Politics-BJP

फर्रुखाबाद: प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था| रोमेश भंडारी राज्यपाल थे| बसपा और भाजपा में 6-6 महीने मुख्यमंत्री बनाकर सरकार बनाने के फार्मूले पर लखनऊ में बैठको का दौर चल रहा था| फार्मूले की अगुआई स्व ब्रह्मदत्त द्विवेदी कर रहे थे| वही समझौते का फार्मूला लेकर मायावती के पास आ-जा रहे थे| बताते है कि मायावती सिर्फ एक शर्त पर इस फार्मूले पर राजी थी कि भाजपा की पारी में सिर्फ ब्रह्मदत्त द्विवेदी मुख्यमंत्री बने| कल्याण सिंह के नाम पर मायावती नाक भौ सिकोड़ रही थी| इसी बीच प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेता की हत्या कर दी गयी| पक्ष हो या विपक्ष जनता भी मानती है कि अगर ब्रह्मदत्त द्विवेदी आज जिन्दा होते तो फर्रुखाबाद की विकास के रास्ते पर चलते हुए तस्वीर ही बदल जाती| मगर समय और नियति के आगे किसी की नहीं चलती| 17 साल बीत जाने के बाद भी याद करने पर उस काली रात का मंजर दिलो में सिहरन पैदा कर देता है|

लोहाई रोड के जिस मकान के बाहर ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या हुई थी वहाँ हर साल 10 फरवरी को उनकी याद में पुष्पांजलि और मशाल जलती है| अपने दोस्त रामजी अग्रवाल के भतीजे के तिलक में शामिल होने के लिए द्विवेदी पहुचे थे| एक गनर ब्रजकिशोर मिश्र और ड्राइवर के साथ| लगभग 11.30 से 12 बजे के बीच का समय था| सर्दी की रात में कार्यक्रम समापन की और हो चला था| द्विवेदी जी वापस घर जाने के लिए निकले ऊँचे मकान की सीड़ियो से उतरने के बाद अपनी कार तक पहुचे| खिड़की खोल कर बैठ गए| कार के शीशे खुले हुए थे| रामजी अग्रवाल उनका भतीजा और परिवार के अन्य सदस्य अपने मकान के गेट तक उन्हें छोड़ने के लिए आये थे और उनकी गाड़ी के रवाना होने का इन्तजार कर रहे थे| गनर गाड़ी के बाहर खड़ा था| तभी उनकी कार के चारो और से घेर कर फायरिंग होने लगी| लाबड़तोड़ गोलियां चली| ब्रह्मदत्त द्विवेदी और गनर बृजकिशोर सहित ड्राईवर और रामजी अग्रवाल के भतीजे के भी गोली लगी| बताते है कि दरवाजे पर खड़े लोग अपनी जान बचाने को घर में छुप गए| सड़क पर सन्नाटा हो गया| ऊपरी मंजिल की बालकनी या छत पर खड़े मनोज अग्रवाल ने अपनी पिस्तौल निकाल गोली चलाई| ऊंचाई और दूरी के कारण शायद पिस्तौल स्वचालित हथियारो के आगे नाकाम साबित हो रही थी| मगर फिर भी हिम्मत की गयी| मगर सब बेकार गया| दुर्दांत हत्यारे अपने मकसद में कामयाब हो गए| लगभग 20 से 25 मिनट तक पूरे लोहाई रोड सन्नाटा|

घटना के कुछ समय बीत जाने के बाद आखिर फिर हिम्मत जुटाकर वापस लोग जुटे और रामजी अग्रवाल के भतीजे की टाटा सूमो में द्विवेदी जी को लिटाकर पहले डॉ जितेन्द्र कटियार के नर्सिंग होम जो चंद कदमो कि दूरी पर था वहाँ लाया गया| मगर डॉ जितेन्द्र कटियार का दरवाजा नहीं खुला तो आनन् फानन में बढ़पुर स्थित डॉ एन सी जैन के नर्सिंग होम में लाया गया| जहाँ उन्हें डॉ जैन ने मृत घोषित कर दिया| एक विकास का दिया बुझ चुका था| प्रभुदत्त, सुधांशु, डॉ हरिदत्त कोई कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था| यकीन नहीं कर पा रहा था कि उनका कोई करीबी इस तरह दुनिया से विदा हो जायेगा| गनेश दुबे, सदानंद शुक्ल, स्व बागीश अग्निहोत्री, राम चन्द्र कुशवाहा, मोती लाल गुप्ता, अजय पाराशर, अयोध्या प्रकाश सिंह जैसे तमाम चेहरे जैन अस्पताल के बाहर मौजूद थे| मोबाइल का जमाना नहीं था| बेसिक फोन से जहाँ तक सूचना पहुचती दो चार को लोग बताते और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ते| मंजुल दुनिया से विदा हो चुका था| खामोश चेहरा, बंद आँखे और शांत शरीर जीवन के अंतिम पड़ाव की तस्वीर साफ़ थी मगर यकीन फिर भी नहीं हो रहा था| लोग शव देखने के बाद भी इशारो इशारो में एक दूसरे से पूछ कर पुष्टि कर लेना चाहते थे कि क्या उनका नेता क्या बाकई चला गया!

प्रशासन से लेकर पुलिस तक खामोश थी| जिलाधिकारी अरविन्द कुमार, पुलिस अधीक्षक अखिलेश मल्होत्रा, अपर पुलिस अधीक्षक एस एन सिंह, कोतवाल ओपी शर्मा सब डॉ जैन के अस्पताल पहुचे| पुलिस अधीक्षक ने डीजीपी और डीआईजी को सूचना दी| जिलाधिकारी ने फोन पर कमिश्नर कानपुर को द्विवेदी जी की हत्या की सूचना दी| लोग पीसीओ खोजने में लगे थे| सूचना देने के लिए बेसिक फोन तलाश किये जा रहे थे| खबरनवीसों में अखबारो के पत्रकार सक्रिय हो चुके थे| तब टीवी का जमाना नहीं था| रेडियो पर समाचार प्रमोद कुदेसिया ने प्रसारित करवाया| सत्यमोहन पाण्डेय अपने कार्यालय में समाचार भेजने में लगे थे| मगर शहर ख़ामोशी से सो रहा था|
घटना स्थल पर स्वर्गीय द्विवेदी की कार खड़ी थी| पुलिस जांच पड़ताल में लगी थी| रात सुबह की और बढ़ रही थी और भाजपा कार्यकर्ता जैन अस्पताल पहुँच रहे थे| द्विवेदी परिवार के सभी सदस्य यहाँ मौजूद थे| ब्रह्मदत्त द्विवेदी की पत्नी स्व प्रभा द्विवेदी और उनके पुत्र मेजर सुनील द्विवेदी सुबह 4/5 बजे के आसपास लखनऊ से फर्रुखाबाद पहुच चुके थे| दोनों लोग उस दिन लखनऊ में ही थे| हर चेहरा उदास और शांत| कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था| यह पहली बार देखा था जब हर कार्यकर्त्ता दिल से दुखी दिखा|

साक्षी महाराज उस दिन अनन्त होटल में थे| साक्षी महाराज ने राम नगरिया के बड़े क्षेत्र में अपना पंडाल लगाकर उसी दिन भागवत कथा शुरू की थी जिस रात यह घटना हुई| साक्षी जी भी जैन अस्पताल पहुंचे थे| हर शख्स की पूरी रात जागते ही कट गयी और शव पोस्टमार्टम के लिए फतेहगढ़ ले जाया गया| अब रिटायर हो चुके कन्हैया ने ही पोस्ट मार्टम किया था| पोस्टमार्टम हाउस का वह मंजर पहली बार दिखा था| जहाँ धर्म, जाति और दलीय सीमाएं टूट गई थीं| ऐसी भीड़ पहली बार देखी गयी थी| पूरे पोस्टमार्टम के दौरान भीड़ बढ़ती रही| जो आ जाता वो रुक जाता था| साक्षी, उर्मिला भी पहुंचे थे| पोस्टमार्टम के बाद शव को पहले ब्रह्मदत्त द्विवेदी के घर पर लाया गया| उसके बाद दिन में लोगों के अंतिम दर्शनार्थ भारतीय पाठशाला ले जाया गया| ऍफ़आईआर हो चुकी थी| एक नामजद और 3-4 अज्ञात में मुकदमा कोतवाली में लिखा जा चुका था| सुबह दोपहर की और बढ़ रही थी| पूरी भारतीय जनता पार्टी फर्रुखाबाद में पहुच रही थी| पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपयी, लालकृष्ण अडवाणी, विनय कटियार, प्रेमलता कटियार, लालजी टंडन, कलराज मिश्र से लेकर हर नामी भाजपाई चेहरा फर्रुखाबाद पहुच रहा था| मगर मायावती और कल्याण सिंह नयी आये| आम जनता में सुबह जब लोग घर से निकलते तो खबर मिलती और जिसे जैसा साधन मिलता वो सेनापत स्ट्रीट पहुच रहा था| नेहरू रोड उस जमाने में जाम की स्थिति में पहुच चुका था|

आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूबे जेल प्रशासन में ये तो होना ही है…….

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Posted on : 26-03-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

पोशम्पा भाई पोशम्पा, डाकिये ने घडी चुराई, अब तो जेल में जाना पड़ेगा, जेल की रोटी खाना पड़ेगा, जेल का पानी पीना पड़ेगा…. बचपन के खेल में कहीं न कहीं सत्य का आभास कराया जाता रहा है| मगर शायद प्रशासनिक अफसरों की आँख का पानी मर गया है इसलिए उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि उनके खुद के बच्चे भी सवाल पूछ सकते है कि “क्या पापा जेल की रोटी और पानी ख़राब होता है?” और ख़राब होता है तो क्यों? और आप तो जिले के बड़े अफसर हो| जेल में निरीक्षण करते रहते हो| क्या आपको भी उसके खराब होने का हिस्सा मिलता है?

बड़ा प्रासंगिक सवाल है| रिश्वतखोर होना आज के जमाने में एक एडवांस कल्चर का भाग है या फिर बेशर्मी की हद| जेल में खाना ख़राब क्यों? जबकि बजट शारीरिक जरूरतों और सेहत के पैमाने के हिसाब से टैक्सपेयर के पैसे से बनाया जाता है| अस्पताल में इलाज का अभाव क्यों? दवा का बजट तो ठीक ठाक है| 31 मार्च को जिले के अफसर एक ही दिन में लाखो करोडो क्यों और कैसे ऊपर का कमा लेते है इस बात में ही जेल की खराब दाल रोटी और दवा के अभाव का राज छिपा होता है| जानते सब है| जो जेल में कर रहे है वे भी और जिन्हें जेल की निगरानी का जिम्मा दिया गया है वे भी, मगर काल्पनिक संतुष्टि के चलते मानने को तैयार नहीं|

वैसे जेल में जो सक्षम परिवार के लोग बन्द है वे तो जेल की रोटी दाल भी नहीं खाते| उनके लिए तो जेल से बाहर रोज का खाना आता है| उनके हिस्से का राशन तो अफसरों को खाने को मिल ही रहा है| जो गरीब जेल में बन्द होता है उसके हिस्से का भी राशन खा जाना “डोम’ (डोम- मृत्यु के समय मुर्दे से उसके जलने का टैक्स वसूलने वाला) होने से कम नहीं| गरीब होना ही सबसे बड़ा अभिशाप है| पुलिस भी सबसे पहले उसे ही पकड़ कर अंदर कर महीनों से गैर खुलासे हुए केस खोल कर उस पर लाद कर अपनी नौकरी बचा लेती है|

तो फर्रुखाबाद की जेल में कोई पहली बार आक्रोशित उपद्रव नहीं हुआ है| कभी केंद्रीय कारागार में तो कभी जिला जेल में| जहाँ मुलाकात से लेकर मोबाइल से बात करने की वसूली का खेल चलता हो| जहाँ प्रति माह चूना डाल कर औचक निरीक्षण कर अफसर अपनी नौकरी पूरी करते रहे हो| वहां जेल में आंदोलन हो जाना, दो चार के सर फूट जाना कोई खास खबर नहीं है| खास खबर तो तब होगी जब ऐसा होना बन्द हो जायेगा| सरकार बदली है….. सरकारी अफसर और तंत्र वही है…… अगली घटना होने पर जारी….

रिश्वत वसूली ऊपर वाले के लिए करनी पड़ती है…

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Posted on : 22-03-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

भाई साहब फाइल पर साहब का अप्र्रोवल लेना है खर्चा दो| दफ्तर के बाबू ने बड़ी शालीनता से ठेकेदार से रिश्वत की मांग अपने साहब के लिए कर दी| साथ ही ठेकेदार पर एहसान भी लाद दिया, आप तो घर के आदमी है मुझे कुछ नहीं चाहिए| रिश्वत कोई अपने लिए नहीं वसूलता है यहाँ सब ऊपर वाले के लिए रिश्वत लेते है| लेखपाल, वीडीओ, दफ्तरों के बाबू, कचहरी से लेकर म्युनिसिपल कारपोरेशन तक में हर कोई ऊपर वाले लिए रिश्वत वसूल रहा है| बाबू ने साहब के लिए, और साहब ने बड़े साहब के लिए, बड़े साहब ने अपने से ऊपर के लिए| यही व्यवस्था कहकर आम जनता से रिश्वत वसूलने का चला है| सिपाही, लेखपाल, वीडीओ, बाबू, ये सब ऊपर वाले के लिए रिश्वत लेते है और मजे हुए सेल्समेन की तरह रिश्वत की बारीकियां समझा कर सकल घरेलु रिश्वत में लगातार महगाई दर बढ़ने के अनुपात में इजाफा करते रहते है| बड़े बाबू ने चश्मा आँखों पर लगाया, ठेकेदार से मिले हुए रुपये गिने और दराज में सरकाए फिर ठेकेदार की ओर देख कर दुख साझा करते हुए कहा- अब तो अंग्रेजो के भारत से जाने के बाद ही कुछ बदल सकता है|

सब कुछ जानते हुए भी बड़े उत्सुकता भाव से ठेकेदार ने पूछा ट्रेजरी में भी देना पड़ता है| हाँ भाई ………(गाली निकलते हुए) बिना लिए फाइल अप्रूव कहा करते है| कोई न कोई कुइरी/नुक्ता लगा देंगे| ठेकेदार ने भी कुटिल भाव से पुछा उसके बाद फाइल कहाँ जाएगी| ट्रेजरी के बाद कलेक्टर साहब के पास जाएगी| मतलब कलेक्टर का भी देना होगा? मगर इस काम में कलेक्टर का तो कोई रोल नहीं है| हाँ भाई साहब यही तो रोना है, घाघ बाबू ने ठेकेदार के साथ सुहानुभूति दिखाते हुए कहा- जिले में कोई भुगतान हो कलेक्टर का तो जाता ही है| तो कुल मिलाकर तुम्हे क्या बचता है| ठेकेदार ने बड़े बाबू के साथ कुटिल सुहानुभूति दिखाते हुए पूछ ही लिया कि ख़ामो खाम ही तुम लोग (निचले स्तर के सरकारी कर्मी) बदनाम होते हो|

बड़े बाबू ने बगल की कुर्सी खीच कर ठेकेदार को अपने पास में बैठाते हुए कान में बताया …………. (गाली देते हुए) इसलिए कभी जिले में नए आये कलेक्टर और कप्तान साहब को कभी यह कहते हुए सुना कि उनके कार्यकाल में कोई रिश्वत नहीं लेगा| कोई नहीं कहता| सिस्टम बन गया है| इमानदार से इमानदार कलेक्टर भी मोटा माल ऊपर के कमा लेता है| अब तो अग्रवाल साहब इन्तजार करो आजादी का… जाने ससुरी कब मिलेगी|

शाम तक दफ्तर में बड़े बाबू ने 10 फाइल निपटाई| दोपहर बाद साहब अपने केबिन में आये तो फाइलों के साथ बड़े बाबू साहब के कमरे में पंहुचा और साहब का हिस्सा गिन दिया| साहब के हिसाब में एक फाइल के पैसे कम थे| तो साहब ने आँखे तरेरी| कितनी फाइल है| साहब 10 है मगर एक की सिफारिश थी| बड़े बाबू को वर्षांत के अंत में आज कुछ ठीक ठाक हिस्सा मिल गया था| पांच बजते ही बड़े बाबू ने छाता झोला उठाया और घर की ओर चल पड़े| सुनसान सड़क पर कुछ देर आगे ही तमंचे के साथ मुह पर कपडा बांधे गुंडों ने घेर लिया| बड़े बाबू का झोला छीनने लगे| बड़े बाबू ने प्रतिशोध किया तो गुंडे ने एक जोरदार घूँसा मुह पर जड़ दिया| बड़े बाबू चिलाये…. बचाओ मार डाला|

रसोईघर से हाथ में चिमटा लिए बबुआइन कमरे की ओर दौड़ी …… अरे किसने मार डाला| देर तक सोयेंगे और नींद में भी बड़बड़ाएगे| बड़े बाबू बिस्तर के नीचे पड़े थे| माल कमाकर लौट रहे थे, गुंडों ने सपना तोड़ दिया था| 6 बज चुके थे, साहब ने जल्दी आने को कहा था| जल्दी जल्दी तैयार हुए और सोच रहे थे कि कहीं आज दफ्तर से लौटते समय बाकई गुंडे मिल गए तो…….

भर दी झोली वोटरों ने, उम्मीद पर खरे होकर दिखाओ….

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Posted on : 11-03-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: 2017 के चुनाव में वोटरों ने भाजपा की झोली उम्मीद से ज्यादा ही भर दी है इस उम्मीद के साथ कि जो कहा है कर के दिखाओ| न भ्रष्टाचार न गुंडाराज के होल्डिंग से शुरू हुआ चुनाव जैसे जैसे परवान चढ़ा नरेंद्र मोदी ने वोटरों की उम्मीदे जगा दी| जनता ने ख्वाव देखा कि भाजपा सरकार आते ही रिश्वतखोरी बंद हो जाएगी| अवैध जमीन कब्जे बन्द हो जायेंगे| गरीब को भी इन्साफ मिल जायेगा| आधी रात को भी माँ बहनो के लिए सड़क परनिर्भय होकर निकलना अब हो जायेगा| कोई सरकारी कर्मचारी और अफसर अब रिश्वत के बिना काम करेगा| सपने तो बहुत से मोदी ने पाल दिए है उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा अब सवाल खड़ा होगा| अगर खरे न उतरे तो फिर वही होगा जो इस बार हुआ है|
फर्रुखाबाद की जनता ने विजय सिंह, नरेंद्र सिंह यादव, जमालुदीन सिद्दीकी के पुत्र अरशद जमाल, मनोज अग्रवाल, उमर खान, सुरभि गंगवार को नकार मेजर सुनील, सुशील शाक्य, नागेन्द्र सिंह और अमर सिंह को सर पर बैठाया है| मगर जिन्हें जिताया है उनके भी रिकॉर्ड में कोई उपलब्धि नहीं है केवल मोदी के कहने पर जिताया है| ये मोदी की लहर का चुनाव था, भ्रष्टाचार और गुंडाराज के खिलाफ चुनाव था| इसमें कोई शक नहीं| उपलब्धि अब इन जीते हुए प्रत्याशियो को बनानी है अपने राजनैतिक भविष्य के लिए वार्ना कितने ही विधायक एक बार चुनाव जीत हाशिये पर जा चुके है| अगर मोदी ने कहा है कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा तो जनता ने उन्हें पसंद कर लिए| भरोसा भी कर लिया| क्या यही भरोसा फर्रुखाबाद के चारो जीते हुए भाजपा प्रत्याशी जनता को दिल पायेंगे| ये वो सवाल है जिस पर वोपक्ष की नजर 5 साल रहेगी|

इसमें कोई दो राय नहीं कि यूपी की जनता परिवर्तन चाहती थी| जमीनी हकीकत कुछ और थी और मुख्यमंत्री अखिलेश तक पहुची रिपोर्ट कुछ और| मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिंचाने वाले उन्ही फोटो की दम पर पुलिस और प्रशासन पर हनक बनाते और अवैध कब्जे और अवैध खनन में लगे थे| उसी हनक पर विरोधियो पर सरकारी तरीको से अत्याचार कराते रहे| जनता वास्तव में भ्रष्टाचार और गुंडाराज से त्रस्त थी और मोदी ने इसे कैश कर लिया| ये राजनीती है, दाव चलने और बिसात बिछाने में माहिर खिलाड़ी ही इसके विजेता बनते है| जनता तो बस उम्मीद में जीती है| साल दर साल उम्मीद में काटती जाती है| तो उम्मीद कितनी पूरी होती है इसकी बानगी भी कुछ दिनों में दिखने लगेगी| सवाल फिर से खड़े होंगे कि भाजपा की झोली तो भर दी है अब गरीब और मजबूर की बारी है…….

राजनीति का खंजर- “केवल चार बचेंगे”

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Posted on : 18-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

पांच साल तक नेताओ के हाथ में रहने वाला राजनैतिक खंजर एक दिन मतदाताओ के हाथ में रहता है| मतदान के दिन ये खंजर किस किस पर कैसे कैसे चलेगा ये वोटिंग मशीन में ही गुप्त रूप से दर्ज हो जायेगा| बात उत्तर प्रदेश के आम विधानसभा चुनाव 2017 के जनपद फर्रुखाबाद की चार विधानसभाओ के परिपेक्ष्य में है| लिहाजा केवल चार बचेंगे और बाकी सब प्रत्याशी राजनीति के खंजर से घायल हो मैदान से बाहर हो जायेंगे| लोकतंत्र के पवित्र मतदान में खंजर शब्द का इस्तेमाल कुछ अजीब लग सकता है| मगर जिस तरह नेताओ ने पिछले सत्तर साल में सत्ता पाने के बाद जनता को भूल अपने लिए ही साधन जुटाने में प्राथमिकता दिखाई है “खंजर” शब्द माकूल लगता है| नेताओ के भ्रम को मतदाता तोड़ेगा और पांच साल में मिले कष्टों का भी आंकलन करने वाला है| चुनावी बुखार से पीड़ित सत्ताधारी “मुफ्त” माल से मतदाता को आकर्षित कर रहा है वहीँ विपक्ष सरकार की नाकामियों को कुरेद कुरेद कर खंजर की धार पैनी करने में जुटा रहा|

बात फर्रुखाबाद की चार विधानसभाओ में 19 को होने वाले मतदान के परिपेक्ष्य में है| वर्ष 2012 में अखिलेश यादव ने सत्ता संभाली| चुनाव में अखिलेश को लगभग हर वर्ग और युवाओ ने जमकर मतदान किया| वादे के अनुसार अखिलेश यादव ने हर 2012 के इंटरमीडिएट पास युवा को खूब ढोल पीट कर लैपटॉप बाट दिए| ढोल पीटने की बात इसलिए क्योंकि लैपटॉप बाटने में प्रचार और तरीके पर ही कुल लैपटॉप कीमत का 15 फ़ीसदी खर्च इस पर आया था जो लगभग 100 करोड़ से ऊपर का था| इसके बाद के वर्षो में पास हुए सभी इंटरमीडिएट छात्र छात्राओं को ये मुफ्त माल नसीब नहीं हुआ| बात समझने की ये है कि मुफ्त लैपटॉप योजना एक चुनावी गिफ्ट था न की सरकार की कोई योजना| योजना होती तो हर साल उतने ही बच्चो को लैपटॉप मिलता जितने की पहली बार मिले थे| खैर चुनावी वादा तो अखिलेश सरकार ने पूरा कर दिया|

बात मुफ्त में मिले माल की वफ़ादारी दिखाने का आया तो यूपी के मतदाता ने लोकसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को ठेंगा दिखा दिया| पूरे उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के वादे पर मिले सरकारी लैपटॉप पर मोदी का लाइव टेलीकास्ट देखा और भाजपा को सत्तर सीट से जितवा दिया| ये मतदाताओ का राजनैतिक खंजर ही था जो उसने सपा की पीठ में भोका था| और केवल मुलायम के परिवार को छोड़ कर कोई चुनाव नहीं जीत सका| वर्ष 2014 में सरकारी प्राइमरी स्कूल की लम्बे समय से लटकी नौकरी से लेकर उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक अफसरों के चयन आयोग में गड़बड़ी का मुद्दा शबाब पर था| युवा एक अदद नौकरी की तलाश में एक एक नौकरी के लिए लाखो रुपये खर्च कर चुका था| मगर भर्ती प्रक्रिया में इतने पेच होते कि नतीजा अदालतों में लटक जाता था| बात यहाँ तक पहुची की नाराज अभ्यर्थियो ने चयन के आयोग के बोर्ड पर “यादव आयोग” तक लिख दिया| केवल एक जाति विशेष को ही नौकरी में प्राथमिकता के आरोप लगने लगे| कहने का मतलब ये है कि पढ़े लिखे बेरोजगार युवा को मुफ्त का लैपटॉप या मोबाइल नहीं एक अदद नौकरी चाहिए| रोजगार के अवसर न के बराबर रहे|

विकास की बात करे तो जनपद फर्रुखाबाद में मुख्यालय को राज्य मार्ग से जोड़ने के लिए सडको का निर्माण हुआ| मगर मोहम्दाबाद से बेवर रोड की खस्ताहालत सड़क भ्रष्टाचार की चर्चा को गरम कर देती है| छोटे मोटे खडंजे नाली को छोड़ दे तो विधायको ने विधायक निधि का दो तिहाई से ज्यादा हिस्सा निजी स्कूलों के हवाले कर दिया| निजी स्कूलों को विधायक निधि या सांसद निधि बिना सुविधा शुल्क लिए मिल जाती हो ऐसा बहुत कम सुनने को मिला है| नगर की ठंडी सड़क जिस पर जिले का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट का कारोबार होता है गड्डो के हवाले ही रही| हाँ 35 हजार महिलाओ को समाजवादी पेंशन जरुर मिली| मगर इसमें भी तमाम जरुरतमंदो के आवेदन तभी स्वीकृत हो पाए जब उन्होंने प्रधानो और सूची पास करने वालो को कुछ भेट चढ़ाई| यही हाल कमोवेश हर सरकारी योजना का रहा| समाज कल्याण विभाग जिसके कंधो पर मुफ्त माल बाटने की जिम्मेदारी होती है वहां तक जिसका आवेदन बिना रिश्वत के पास होता हुआ पहुच गया तो उससे ज्यादा किस्मत वाला कोई नहीं था|

तो बात राजनीति के खंजर की है जो अब मतदाता के हाथ में है| विकास का एक और शानदार उदहारण लेते है| नगर क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे निर्दलीय प्रत्याशी मनोज अग्रवाल की पत्नी वत्सला अग्रवाल नगरपालिका की चेयरपर्सन है| नगरपालिका के अंतर्गत म्युनिसिपल अन्तर कॉलेज संचालित होता है| जिसके टूटे कक्षों के निर्माण के लिए छात्र संगठनों ने आमरण अनशन तक कर दिया| मगर टूटे कमरे न बन सके, अलबत्ता कथित शिक्षा प्रेमी विधान परिषद् सदस्य रहे मनोज अग्रवाल की विधायक निधि का 80 फ़ीसदी से ज्यादा का हिस्सा निजी स्कूलों को दिया था| अब जनता इसे भूल जाए ये कैसे हो सकता है कि आपने सरकारी स्कूल को चवन्नी देने में उदारता और फूर्ती नहीं दिखाई थी? जनता को याद भी रखना चाहिए| क्या ये विषय के नेता की जनता और समाज के प्रति उसकी ईमानदारी में शंका नहीं पैदा करता| खैर राजनीति का खंजर अब मतदाता के हाथ में है| मनोज अग्रवाल ने नगर में लगभग हर गली और नाली पक्की करा दी| दस साल से नगरपालिका पर उनके परिवार की सत्ता है| शहर पहले के मुकाबले साफ़ सुथरा हुआ| पीने के पानी की उपलब्धता भी बढ़ी| इसी के लिए जनता ने उन्हें चुना था| मगर इसलिए नहीं चुना था कि स्टील के सुन्दर बस अड्डे बाजार भाव से 40 फ़ीसदी महगे लगवाकर जनता के टैक्स का पैसा लुटा दो| जलकल विभाग में मोबाइल आधारित ऑटोमेटिक स्वचालित सिस्टम को बाजार भाव से 10 गुना महगा खरीद कर धन का गोलमाल कर लो| जनता को हिसाब भी चाहिए| हर गद्दीनशी को हिसाब देना ही होगा| राजनीति का खंजर मतदाता के हाथ में है और उसकी ख़ामोशी एक तूफ़ान का इशारा कर रही है|

नोटबंदी में केंद्र की सरकार ने आम आदमी को लाइन में लगवा दिया| आम आदमी बिना किसी आक्रोश के लाइन में लग गया| मात्र इस उम्मीद में कि भ्रष्टाचार रुकेगा, सरकार का टैक्स बढ़ेगा और उस पैसे से आम आदमी की न्यनतम जरूरते सरकार पूरी करेगी| अब विपक्ष उस पर चुटकी ले रहा है| कितना काला धन आया| अलबत्ता भाजपा जबाब दे रही है कि आ रहा है थोडा इन्तजार करिए| आखिर कितना इन्तजार? जबाब परिवर्तन की उम्मीद लगाये बैठी भाजपा को भी आने वाले समय में देना होगा|

समाजवादी पार्टी को सबसे बड़ा इम्तिहान देना है| जनपद की चारो विधानसभाओ पर उसका कब्ज़ा है| पांच साल में अवैध खनन, जमीनों के कब्जे, विरोधियो पर फर्जी मुकदमे और जिसने सरकार के पक्ष में नहीं बोला उसकी सरकारी सुविधाओ से कटौती| ये जमीनी मुद्दे है| चुनाव में कर्ज माफ़ी, मुफ्त माल और चुनावी लालीपॉप से ज्यादा ये मुद्दे काम करते है| पांच साल में समाजवादी पार्टी में जमकर रार भी हुई| बाहर से आये नेताओ ने समाजवादी पार्टी में दो फाड़ करा दिए| जो चुनाव तक आते आते आते तीन हो गए| अखिलेश गुट, शिवपाल गुट और तीसरा गुट| समाजवादी पार्टी इस चुनाव में आंतरिक संकट में है| पूरे चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव की जनसभा के अलावा दूसरे किसी नेता ने कोई असर नहीं किया| फर्रुखाबाद की सपा में तीनो गुटों को अपने अपने अस्तित्व की चिंता है| ऊपर से चारो विधायको का रिपोर्ट कार्ड भी कोई खास मुकाम नहीं बना पाया| कायमगंज के विधायक की टिकेट काट कर भाजपा के आयातित प्रत्याशी सुरभि दोहरे गंगवार को दी गयी जिनकी पूरी ताकत अपने सजातीय कुर्मी वोट को अपने लिए लामबंद करने में ही लगी रही| सपा को कायमगंज में विधायक रहे अजीत का भी हिसाब देना है और कई गुटों से मुकाबला भी करना है| कमोवेश सपा के लिए सभी विधानसभा क्षेत्रो में एक जैसी चुनौतिया है|

राजनीति कौशल के खिलाड़ी इतने चतुर निकलते है कि अपनी नाकामियों के किस्सों को अपने बाजू में इस बात से छिपाते है कि दाग उनके विपक्ष से कम है| मायावती की सरकार में भ्रष्टाचार के आसमान छूते भाव से मुखर होकर जनता ने युवा अखिलेश यादव को गद्दी सौपी तो जमीनों के कब्जे, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था पर सवाल उठे| जनता तो जनता है| अगर नेता प्रयोग करता है तो जनता भी करती ही है| चुनाव को जात पात में धकेल कर असल मुद्दों को पटरी से उतारने की कोशिश भले ही नेता करते हो मगर आखिरी फैसला मतदाता को ही करना है जिसके हाथ में एक दिन के लिए ही सही राजनीति का खंजर रुपी वोटिंग मशीन का बटन तो है….

फर्रुखाबाद में 30 फ़ीसदी चंचल मतदाता लगाएगा प्रत्याशियो की नैया पार

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Posted on : 10-02-2017 | By : JNI-Desk | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

विकास का मुद्दा लगभग गायब हो चला है| समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों को मुस्लिम वोटरों की दरकार है| भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या ने कह ही दिया है कि उन्हें मुस्लिम मतदाता की जरुरत नहीं है| उत्तर प्रदेश के 19 फ़ीसदी मुस्लिम मतदाताओ के सामने सपा और बसपा कटोरा लिए खड़े है| दोनों ही दल मुस्लिमो के विकास का दावा  ठोक रहे है| जबकि देश में 60 साल के राज में मुस्लिमो की दशा और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन किये हुए है| सपा के लिए कांग्रेस का गठबंधन कोई विशेष लाभ का सौदा नहीं दिख रहा| मुस्लिम वोटो के ठेकेदारों ने भी बसपा के पक्ष में फ़तवा जारी कर दिया है|

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के प्रथम चरण के चुनाव में 11 फरवरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोट डाले जायेंगे| प्रथम चरण से उठी हवा अंतिम चरण तक कायम रहेगी ऐसा राजनैतिक विश्लेषक मानते है| फिलहाल फर्रुखाबाद जनपद की चारो सीटो पर मुकाबला सपा और भाजपा में होने के आसार लगने लगे है| हालाँकि सदर सीट पर बसपा प्रत्याशी उमर खान मुस्लिम प्रत्याशी होने के नाते कुछ मजबूत स्थिति में दिख रहे है| 19 फरवरी को होने वाली वोटिंग का रुख कुछ कुछ साफ़ हो चला है| चारो विधानसभाओ में प्रत्याशियो के पास विकास के नाम पर गिनाने को कुछ खास नहीं है| नाली, खडंजा, सड़के हैन्डपम्प और निजी स्कूलों के विकास के अलावा सत्ताधारी विधायको के पास गिनाने को कुछ नहीं और विपक्ष में रहे बसपा और भाजपा के प्रत्याशियो ने जनता के हित में ऐसा कोई आन्दोलन खड़ा नहीं किया जो याद रखने लायक हो|

कुल मिलाकर सभी प्रत्याशी जात पात का खेल खेल रहे है| नेताओ के जनसम्पर्क और भ्रमण कार्यक्रम जाति के हिसाब से तय हो रहे है| नुक्कड़ सभाओं में कुछ कहने के लिए है नहीं| और ज्यादा बड़ी बात ये है कि इन्हें इनके समर्थको के सिवाय कोई सुनाता ही नहीं| दरवाजे पर वोट मांगने पहुचे नेता को मतदाता बड़ी हिकारत भरी नजर से देखते हुए कुटिल व्यंग्यात्मक मुस्कान फेकते हुए वोट देने का वादा कर पीछा सा छुड़ा रहा है| स्टार प्रचारको को बुलाकर मीडिया में जगह भरी जा रही है| फ़िल्मी सुन्दरियों के चुनाव प्रचार के रेट हाई होने और चुनाव आयोग को हिसाब देने से डरे नेताओ ने अभिनेत्रियो को बुलाने का अब तक कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है|

और जो स्टार प्रचारक पार्टी के नेता भी बुलाये जा रहे है वे भी जाति के हिसाब से| ठाकुर नेता ठाकुर बाहुल्य इलाके में दहाड़ेगा और मुस्लिम नेता मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रो में| मायावती और अखिलेश मुसलमानों को अपने पक्ष में वोट करने के कारण समझायेंगे और अमित शाह और केशव मौर्या प्रदेश में भ्रष्टाचार  और कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाएंगे| समर्थक ताली बजायेंगे| वो दौर अब नहीं रहा जब रेली में आम आदमी जाता था और वापस आकर अपने गाँव मोहल्ले में रेली की चर्चा कर माहौल बनता था| नेताओ की सभा की ताह्सीर हेलीकाप्टर से उडी धुल के बैठने के साथ ही समाप्त हो जाती है| 70 वोटर वोट किसे देना तय कर चुका है| आमतौर पर फ्लोटिंग वोटर जो लगभग 30 फ़ीसदी आँका जाता है और किसी पार्टी या प्रत्याशी के साथ तटस्थ नहीं होता सबसे प्रभावी होता है| यही 30 फ़ीसदी वोटर हवा के रुख के साथ वोट करने वाला है| इसमें इस बार सबसे ज्यादा संख्या मुस्लिमो की ही होनी है| वैसे इनकी पहचान बहुत मुश्किल नहीं होती| तमाम बार इन 30 फ़ीसदी वोटरों को मतगणना के बाद मतगणना केन्द्रों से बाहर निकलते विजयी प्रत्याशी के साथ भीड़ बढ़ाते देखा है|