बुधइआ न्यूनतम के लिए तरस रहा? सरकार ने मेट्रो और हाईवे दे दिए

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Posted on : 09-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

पांच साल तक सत्ता का लुफ्त उठाने वालो को जनता को हिसाब देना ही होगा| हालात कुछ ऐसे ही बन रहे है| मुफ्त लैपटॉप देने या रोजगार के स्थान पर 1 साल बेरोजगारी भत्ता देने भर से बात नहीं बनने वाली| अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है” का नारा केवल सुविधा सम्पन्न लोगो को ही बहला सकता जिनके पास हाईवे पर चलने लायक महगी गाड़िया है| आम आदमी आज भी न्यूनतम की जरुरत पूरी करने में असफल ही हो रहा है| शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर निजी शिक्षण संस्थानों और प्राइवेट हॉस्पिटल के खुलने से गरीब की जरुरत पूरी नहीं हो जाती|

जनपद फर्रुखाबाद की ही बात करे तो पिछले पाँच साल में जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल जिसकी ईमारत किसी बड़े पञ्च सितारा अस्पताल से कम नहीं लगती, मात्र रेफर केंद्र ही बना रहा| गंभीर बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर तो दूर की कौड़ी है न्यूनतम जरुरत के लिए डॉक्टर की कमी हमेशा बनी रही| सर्जन है तो फिजिशियन नहीं, और फिजिशियन है तो ओर्थपेडीक नहीं| अस्पताल में दबा होने के सरकारी दावे खूब किये गए मगर लोहिया अस्पताल के चारो तरफ बने मेडिकल स्टोर पर ग्राहक सरकारी अस्पताल से ही निकला| इतना ही नहीं स्वास्थ्या सेवा उपलब्ध कराने वाले सबसे बड़े अस्पताल से 200 गज दूरी पर ही सत्ताधारी दल का पार्टी कार्यालय भी है, इसके बाबजूद अस्पताल के अन्दर और बाहर सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहे| जिले प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर अधिकतर ताले ही लटके और टीकाकरण के आंकड़े खूब अच्छे दिखते रहे| जिले में मानको को ताक पर रखते हुए 50 से ज्यादा निजी अस्पताल जरुर खुल गए| जिनमे सरकारी अस्पताल से आया मरीज एक्सपोर्ट होता है|

शिक्षा के नाम पर पुराने रिटायर हुए शिक्षको के स्थान पर नए शिक्षक भारती हो गए| पहले के मास्टर रिटायर हो गए नए सर आ गए है| कोई एमबीए है तो कोई पीएचडी| ज्यादातर पढ़ाना नहीं चाहते| साल के आधे समय तो आदमी और जानवर की गिनती लगाते है| सरकारी काम है उसका मानदेय सरकार अलग से देती है| नेता जी ने कभी अपने इलाके के प्राथमिक स्कूल में जाकर नहीं देखा कि उनके वोटरों के बच्चो को पढ़ाई और उससे जरुरत की न्यूनतम मिल रही है या नहीं| जरुरत ही नहीं समझी| इन स्कूलों में उनके बच्चे तो पढ़ते नहीं| आज जिस वोटर की नेता चिरौरी कर रहा है उसी वोटर का बच्चा पांच साल से स्कूल में झाड़ू लगा रहा है| जमीन पर बैठता है, और घटिया मिड डे मील खाकर स्कूल जाने का नाटक कर रहा है| और नेता जी गरीब बच्चो के स्कूल में बैंच खरीदने के लिए विधायक निधि नहीं दी जिस पर उसके वोटर का बच्चा बैठ कर पढ़ सके| निधि निजी स्कूलों को  40 से 50 फीसद कमीशन लेकर बेच दी| पहली बार गरीबी से उठे विधायक ने बेचीं तो बेचीं खरबों की मिलकियत वाले भी इसी लाइन में रहे| न ईमान न धरम| लानत है ऐसे लोकतंत्र पर जिसमे जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के हिस्से को खा जाता हो| फिर भी लोकतंत्र है, चल रहा है|

केंद्र सरकार  द्वारा में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू करने के बाद अब तक 50000 से ज्यादा फर्जी राशन कार्ड निरस्त किये जा चुके है,  जिन पर  पिछले कई सालो से खुली लूट कोटेदारो और प्रशासनिक अफसरों ने की| और राशन कार्ड निरस्त होने का  काम आज भी चल रहा है| आज भी जिले तमाम कोटेदारो को उनके पास तय राशन कार्ड धारको से ज्यादा का राशन भेजा जा रहा है और कोटे बढ़ाने के एवज में सरकारी अफसरों ने कोई चूक भी नहीं की होगी| आंकड़े गवाह है| जबाब सरकार को देना है चुनाव सर पर है| 19 फरवरी को जनता बटन दबा कर हिसाब देगी| कब तक नेता जनता को हिन्दू मुस्लमान का आपसी खौफ दिखाकर अपना मतलब पूरा करते रहेंगे| नेता के लिए भी जनता के मन में कोई इज्जत का भाव कहीं नहीं दिखता|

आम आदमी न्यनतम की जरूरतों को पूरा करने में परेशान है| पिछले पञ्च सालो में कोई बड़ा रोजगार उत्पन्न नहीं हुआ| प्राथमिक शिक्षा में जितने मास्टर भरती हुए उतने ही रिटायर हो गए| नया रोजगार कहाँ उत्पन्न हुआ| एक एक प्राथमिक शिक्षक को नौकरी पाने के लिए 1 लाख रुपये तक आवेदन में खर्च करने पड़े|  शिक्षा का स्तर इतना घटिया और न्यूनतम हो चला है कि डिग्रीधारी सफाई कर्मी के लिए आवेदन कर रहा है| मुफ्त रेवडिया बाटने से न तो राज्य का भला होने वाला और न ही आम आदमी का| जितने रुपये से मुफ्त का प्रसाद बाटा जाने वाला है उससे नए उद्योग भी लगाये जा सकते थे और कोई नया प्रोजेक्ट भी खड़ा किया जा सकता है| मगर लोक लुहावन वादों और नारों से जनता को अपने पाले में कर लेने के लिए युवा मुख्यमंत्री भी जोर लगाये हुए है| जनता को सरकार के आखिरी साल के कार्यकाल में मिली 16 घंटे बिजली से ज्यादा 4 साल तक 16 घंटे कटने वाली बिजली शायद ज्यादा याद रहेगी| चुनाव है, जनता किसे चुने| 11 मार्च तक तो सपा बसपा और भाजपा तीनो की सरकार बन रही है| मुगालते में सब है| मगर मुगालते में अगर कोई नहीं है तो वो है ‘वोटर’ जो न्यूनतम के लिए आज भी आस लगाये बैठा है|

निजी स्कूलों पर विधायक निधि का तड़का- मनोज अग्रवाल ने दिए 3.42 करोड़ तो नरेंद्र ने दिखाया ठेंगा

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Posted on : 08-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: विधानसभा चुनाव 2017 में नेता गली गली विकास का डंका पीट रहे है मगर ये नहीं बता रहे है कि विधायक निधि जो जनता के टैक्स का पैसा है उसे नेताजी ने कैसे खर्च किया| तमाम बंदिशो और कानूनी अड़चनों के बाबजूद विधायको ने विधायक निधि का पैसा निजी स्कूलों पर दिल खोल कर लुटाया है| ये दरियादिली उन्होंने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नहीं दिखाई| वहीँ अमृतपुर से सपा विधायक नरेंद्र सिंह यादव ने विधायक निधि निजी स्कूलों को देने से खूब परहेज किया| नेताओ के निजी स्कूलों के प्रेम को देखते हुए ऐसे में अगर जनता ये कहती है कि विधायक निधि बिकती है तो कौन सा गुनाह करती है| निजी स्कूल और शिक्षा माफिया इसी विधायक और सांसद निधि  से ख़रबपति बने और नक़ल कराकर युवाओ को अशिक्षित बेरोजगार बना रहे है| गांव देहात में आज भी नालिया और सड़के टूटी पड़ी है और विकास के लिए तरस रही है|

नगरपालिका के अंतर्गत चलने वाले म्युनिसिपल इंटर कॉलेज में टूटी बिल्डिंग के लिए जहाँ छात्रों के आमरण अनशन के बाद मनोज अग्रवाल के वादे बाबजूद भवन नहीं बना वहीँ विधान परिषद् सदस्य रहे सदर से निर्दलीय प्रत्याशी मनोज अग्रवाल ने अपने कार्यकाल की कुल खर्च की गयी विधायक निधि का 80 फ़ीसदी हिस्सा निजी स्कूलों को दे दिया| इस बात पर अध्ययन करने की जरुरत अब जनता को है कि स्कूलों को कितने प्रतिशत कमीशन पर ये पैसा मिला था|
सदर विधानसभा फर्रुखाबाद से वर्तमान विधायक विजय सिंह ने अपने पिछले पांच साल के कार्यकाल में विधायक निधि से कुल 139 विकास कार्य कराये जिनमे से 31 निजी स्कूलों को विकास का लाभ मिला| विजय सिंह की विधायक निधि से कुल 6 करोड़ 87 लाख रुपया खर्च हुआ जिसमे से 1 करोड़ 65 लाख रुपया निजी स्कूलों को नसीब हुआ|

निजी स्कूलों को जनता का पैसा बाटने में कायमगंज सपा विधायक अजित कठेरिया भी अव्वल रहे| उन्होंने अपनी पहली विधायकी में ही सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले| अजीत में विधायक निधि से कुल 103 काम कराये जिनमे 53 काम निजी स्कूल में हुआ| कुल मिलाकर अजीत कठेरिया ने 5 करोड़ 94 लाख रुपये विधायक निधि से खर्च किये जिनमे खुद के लिए लैपटॉप के अलावा 4 करोड़ 18 लाख रुपये केवल निजी स्कूलों को ही बाट दिए| अजीत ने एक सपा नेता के स्कूल समेत चार स्कूलों को ही 1 करोड़ की सौगात से दी|

भोजपुर से सपा विधायक जमालुद्दीन सिद्दीकी ने भी शिक्षा पर खूब मेहरबानी दिखाई अलबत्ता इसके बाबजूद सरकारी आंकड़ो में शिक्षा के मामलो में कमालगंज जनपद के पिछड़े ब्लाक की श्रेणी में शामिल है| जमालुद्दीन ने पांच साल में विधायक निधि से कुल 5 करोड़ 4 लाख खर्च किये जिसमे से 3 करोड़ 12 लाख रुपये मदरसों और निजी स्कूलों को दिए|

अम्रतपुर विधानसभा से सपा विधायक और सपा प्रत्याशी नरेन्द्र सिंह यादव ने निजी स्कूलों को लगभग ठेंगा ही दिखाया| नरेन्द्र सिंह यादव ने विधायक निधि से कुल 107 कार्य कराये जिनमे स्कूलों को कुल ९ काम दिए उसमे भी रकम केवल 9 लाख रुपये ही खर्च की| नरेन्द्र सिंह यादव ने विधायक निधि का ज्यादातर हिस्सा सड़के, नाली, सोलर लाइट आदि बनबाने में ही खर्च कर दी|

जहाँ समाजवादी पार्टी काम बोलता के नारे पर प्रचार कर रही है वहीँ स्थानीय विधायक अपनी विधायक निधि के काम से जनता को लुभाने का कोई दावा नहीं कर रहे| कारण साफ़ है विधायक निधि में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है|

चुनाव प्रचार से स्थानीय मुद्दे गायब, राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे प्रत्याशी

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Posted on : 07-02-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS, Politics

फर्रुखाबाद: लोकतंत्र बड़ा गजब की चीज है और नेता उसमें नायाब नमूना। जनपद में 70 प्रत्याशी मैदान में हैं, मगर कमाल की चीज यह है कि किसी के पास आम जनता से जुड़ा स्थानीय मुद्दा और विकास का कोई खाखा नहीं है। विधायक निधि से सड़कें और नाली बनवाने के अलावा अगर कोई विकास होता है तो वह विधायक निधि से बनने वाले निजी स्कूल है। नेता विधायक बन जाने के बाद विधायक निधि के इस्तेमाल के अलावा क्या करेगा इसका कोई जबाब किसी नेता के पास नहीं है।

पांच साल तक आम आदमी की जो रोजमर्रा की तकलीफें हैं और जिनके लिए आम आदमी को या तो दर-दर की ठोकर खानी पड़ती है या रिश्वत देकर के काम चलाना पड़ता है, उसके लिए नेताओं के पास कोई समाधान नहीं। कोटेदार का भ्रष्टाचार, पुलिस का उत्पीड़न, सरकारी सहायता पाने के लिए लेखपाल द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्ट, सरकारी इलाज या किसान के ट्यूववेल का कनेक्शन हो, बिना रिश्वत आम आदमी निजात पाता नहीं दिख रहा और किसी नेता के पास अपने चुनावी पिटारे में इसका समाधान भी नहीं।

वक्त के साथ चुनाव की तकरीरें भी बदलीं और जनता की उम्मीदें भी मगर नेताओं ने अपना चुनावी फार्मूला नहीं बदला। कितने प्रतिशत सवर्ण वोट, कितने प्रतिशत ठाकुर, कितने प्रतिशत मुसलमान, कितने प्रतिशत दलित कुल मिलाकर मामला जातियों की गिनती लगाने में ही सिमट गया है। फर्रुखाबाद जनपद की चारों सीटों पर चुनाव लड़ रहे प्रमुख दलों के एक दर्जन प्रत्याशी भी इसी जमात में शामिल हैं। किसी ने रोजगार दिलाने के लिए स्थानीय तौर पर कोई कारखाना लगाने की बात नहीं की, उसके विधायक बनने पर कोटेदार ब्लैक में राशन बेचने की जगह आम जनता को ईमानदारी से बांट देगा ऐसा भी कोई वादा नहीं कर रहा और किसान को उसकी फसल के नुकसान होने पर लेखपाल बिना रिश्वत लिये मुआवजे के लिए रिपोर्ट लगा देगा ऐसी भी तकरीर एक भी नेता ने नहीं की है। कुल मिलाकर लब्बो लबाब यह है कि नेता भ्रष्टाचार के साथ है, अपराधियों को शरण दे रहा है और जनता को बेबकूफ बना रहा है। वरना राष्ट्रीय भ्रष्टाचार की जगह स्थानीय भ्रष्टाचार की चर्चा करता।

जागरूकता के दौर में अगर नेता जनता को बेबकूफ समझ रहा है तो वह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। 100-50 मोबाइल नम्बर जोड़कर व्हाट्सअप ग्रुप पर नेताओं की बम-बम वाली तस्वीरें खूब फायर हो रहीं हैं। मगर आम जनता में चर्चा नेताओं की उदासीनता, बेरुखी और मतलबीपन की ही हो रहीं हैं। वर्ष 2017 का चुनाव कई मायनों में इतिहास बनाने वाला है। जनता फोकट के चुनावी वादों से प्रभावित होती नहीं दिखायी पड़ रही है। सरकार बनने के बाद मुफ्त में मिलने वाले एक जीबी इंटरनेट या स्मार्टफोन की चर्चा बाजार में उतनी नहीं है जितनी कि मुफ्त बंटने वाले सामान के बजट पर आने वाले खर्च की है। क्योंकि नेता अपनी जेब से चुनावी वादे पूरा करने नहीं जा रहा जेब आयकरदाता की ही कटने वाली ही है।

विधानसभा 2017- फर्रुखाबाद की चारो विधानसभा में किस किस की इज्जत दांव पर

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Posted on : 22-01-2017 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, Election-2017, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद: अब जबकि सपा, बसपा और भाजपा तीनो मुख्य दलो ने अपने अपने प्रत्याशियो की घोषणा कर दी है, सबसे ज्यादा सिटिंग विधायको की इज्जत दांव पर होगी| उन्हें अपनी न केवल गद्दी बचानी है बल्कि ये भी साबित करना है कि वे अपने वादे पर खरे उतरे थे| विपक्षियो को कम से कम पिछले पांच साल का हिसाब भले ही न देना हो मगर वे पीड़ित जनता के कितने काम आये ये तो बताना ही पड़ेगा| फिलहाल जैसा उत्तर प्रदेश में माहौल चल रहा है, विकास और विनाश की जगह कानून व्यवस्था और जात पात के मुद्दे पर ही वोट पड़ने वाला है| नेता गला फाड़ फाड़ कर मंचो पर और मीडिया में चिल्लायेगा मगर चुनाव प्रचार का प्रोग्राम केवल और केवल जात के हिसाब से ही बनाएगा| मगर अंत में फैसला फ्लोटिंग वोट पर ही होगा यानि की लहर किसकी| क्योंकि जात के आंकड़े तो सबही के पास है| और उस हिसाब से सभी जीतेंगे|

नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं बनेगा अलबत्ता नोटबंदी से खर्चे में कमी जरूर होगी| खबर ये थी कि कुछ नेताओ ने ग्रामीण क्षेत्रो में कुछ खास प्रधानों के माध्यम से बैंको में 1000 और 500 के नॉट जमा कराये थे वे वापस नहीं आ पाए है| आपाधापी में और रिजर्व बैक की बंदिशों के कारण ज्यादातर नेताओ का पैसा जन धन खाते में जमा होने के कारण 5000/- प्रति खाता प्रति माह ही निकल पाया है और खाताधारक ग्रामीण क्षेत्रो की बैंको में सुबह से ही लाइन नेताओ के चक्कर में लगा हुआ है| नेताओ की साख इतनी गिर चुकी है कि अब ज्यादातर नेताओ को चुनाव में कोई उधार नहीं देता| कामगार अग्रिम पैसा लेकर ही नेताजी का काम करते है| क्योंकि जीत गया तो हनक में नहीं देता और हार गया तो फिर हार ही गया…..| कुल मिलाकर मामला अर्थव्यवस्था के आसपास खूब टिकेगा| क्योंकि चुनाव आयोग भी एक आदमी को कुर्सी पर बैठाने का 8 रुपया प्रत्याशी के खाते में जोड़ेगा ही|

कुल मिलाकर नोट एक बार फिर बाटेंगे| सिटिंग विधायको को अपना हिसाब देना ही होगा| बीच चुनाव में ये मुद्दा उठेगा| जनता, सोशल मीडिया और विपक्षी कमर कैसे बैठे है| विधायक निधि कैसे कैसे कहाँ खर्च की ये सवाल झूम के उठेगा| कितनी स्कूल को दी और कितने से सड़क नाली और हैण्डपम्प कराये| नेताओ को ये भी बताना होगा कि वे कमाते कैसे है, यानि की उनका सोर्स ऑफ़ इनकम क्या है| कुछ भी हो सकता है, खेती किसानी, जमीनों का धंधा, उद्योग व्यापार, कमीशनखोरी आदि आदि| अब पब्लिक सोशल मीडिया वाली है| बड़े मिर्ची लगने वाले सवाल सोशल मीडिया पर दागने वाले है| अखिलेश यादव की मोबाइल योजना में पंजीकरण कराने वाले सभी सपाई है ऐसा सोचना आत्ममुग्ध होने से अधिक कुछ नहीं होगा|

भाजपा के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी ने एक नयी लकीर पिछले तीन महीने में खींची है| अमीर और गरीब के बीच की चर्चा| इसका असर जरूर दिखेगा| ग्रामीण इलाको में सुबह और शाम को चौपार में जलती पोर (अलाव) पर इसके अलावा अभी भी कोई चर्चा नहीं है| बड़े आदमी पकडे गए| गरीब इसी बात से खुश है| परेशानी भले ही हुई हो मगर किया अच्छा| इस चर्चा पर सभी शामिल होते है इसमें पार्टीबंदी लागू नहीं होती| सपा काम गिनाएगी| बसपा कानून व्यवस्था पर चिल्लाएगी| भ्रष्टाचार पर दोनों चुप रहेंगे| क्यों? इस पर शोध बाकी है| दोनों दल चुनाव बाद एक दूसरे को जेल भेजने के दावे करेंगे और भूल जायेंगे| पहले ऐसा हो चुका है| कुल मिलाकर कुछ नया होने वाला है भूल जाइये| पुराने कलमकार मुलायम के साथी जो चुनावों में अपनी लेखनी से नेताओं की मरम्मत करते थे अबकी बार साइकिल चलाएंगे| मगर नगर में चलाएंगे या फिर विदेश में ये अभी कहना मुश्किल है| वैसे राजनीती कुछ भी कराये| बाप बेटे में फूट करा दे| चाचा भतीजे में दंगल करा दे| भाई से भाई लड़ा दे|

तो एक बार फिर से मैदान ए जंग में मेजर सुनील दत्त द्विवेदी और विजय सिंह, नरेन्द्र सिंह यादव और सुशील शाक्य, अजीत कठेरिया और अमर सिंह खटिक, नागेन्द्र सिंह राठौर और अरशद जमाल सिद्दीकी मुकाबले में हाजिर है| जाँचिये, परखिये और कीजिये विचार…

मिलते है अलगे लेख में…

नोट बंदी असर: गरीब खोमचे वालो की सेल बढ़ी, शोरूम सन्नाटे में

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Posted on : 15-11-2016 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

फर्रुखाबाद; प्रधानमंत्री मोदी के 500 और 500 के पुराने नोटों के चलन से बाहर कर देने के बाद गरीबो को फायदा दिखने लगा है| रोज मजदूरी करके कमाने वालो को काम मिल रहा है| पहले भवन निर्माण में कमर तोड़ने वाली मजदूरी मिलती थी इन दिनों काले धन वाले उन्हें नोट बदलवाले के लिए ले जा रहे है| बस लाइन में लगे रहो और नोट बदलवाओ| इस दौरान उनके खाने पीने और नाश्ते का इंतजाम भी किया जा रहा है| इधर बैंको के सामने भीड़ लग है उधर रेहड़ी और ठेले वालो की लाटरी निकल आई है| भीड़ वाली जगह पर केले, मूंगफली, सेव चाट के ठेले लगाने को मिल रहे है| लाइन में लगे बोर न हो इसलिए मूंगफली का लिफाफा हर तीसरे हाथ में नजर आ रहा है| अब योजना का विरोध करने का मतलब ये भी हो सकता है कि

वैसे किसी भी घटना के दो पहलु होते ही है| नजरिया आपका है कि आप किस अंदाज में किस नजरिये से उसे देखते और महसूस करते है| घर की वो महिलाए जो बाहर जाने तो तरसती रहती है उन्हें खुले में लाइन में लगकर नोट बदलना किसी नए काम को सीखने जैसा लग रहा है| हालाँकि कुछ बुजुर्ग महिलाए और पुरुष जिनकी उम्र लाइन में लगने की नहीं रह गयी है उन्हें मजबूरी में लगना पड़ रहा है| तकलीफ हो रही है| मगर ऐसे लोगो को तकलीफ केवल नोट बदलने में ही हो रही है ऐसा नहीं है| उन्हें तो कोटेदार से भी हर माह दो चार पड़ रहा है जहाँ लाइन भी है, घटतौली भी है और घटिया सामान भी मिलता है| मोदी के फैसले का विरोध करने वाले शायद उनकी तकलीफों को दूर करने के लिए कभी कोटेदारो से नहीं भिड़े होंगे| खैर नजरिया अपना अपना है| सबसे बड़ा दर्द तो उस आदमी का है जो काला धन लिए बैठा है| ऐसे लोगो की कमाई पर बट्टा लगा है|

8 नबम्बर की रात 8 बजे जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने नोटों को बंद करने का फैसला लिया उसके तुरंत बाद हमारे एक व्यापारी मित्र ने तर्क किया की इससे भाजपा को नुक्सान होगा| समझाने में मैंने सिर्फ इतना ही कहा की पिछले 70 साल में इस देश में हर फैसले सिर्फ वोट बैंक को निशाने पर रख कर किये गए कभी राष्ट्र हित में फैसला नहीं हुआ, इस बार हुआ है| नरेगा चालू हुई इसमें 18 साल से ऊपर के लोगो को काम मिलना था| उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप बाटे जिन्हें भी 18 साल से ऊपर की उम्र के लोगो को मिलना था| समाजवादी पेंशन योजना में भी शत प्रतिशत वोटरों को ही फायदा मिलना है| कुल मिलाकर चुनावों में घोषित की गयी भिविन्न पार्टियों द्वारा योजनाओ पर नजर डाले तो निशाने पर कहीं न कहीं वोटर ही रहा| शून्य से 17 साल तक उम्र वालो के लिए क्या हुआ| केंद्र सरकार का प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का सालाना बजट कुल 23 हजार करोड़ से ज्यादा अब तक न हो पाया जबकि समाजसेवा के नाम पर देश में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के प्राइवेट स्कूलों की कमाई 1 लाख 32 हजार करोड़ सालाना से ज्यादा है| ये प्राइवेट स्कूल चलाने वाले कोई आम आदमी नहीं है| पिछले सत्तर सालो में केंद्र और राज्य सरकारों के संरक्षण में इन्हें फलने फूलने का मौका मिला| इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे वोटर नहीं थे लिहाजा इन्हें न तो लैपटॉप मिला और न ही इनके लिए केंद्र और राज्य सरकार ने मनरेगा जैसी कोई टैक्स पोषित योजना से लाभ पहुचाया| चूँकि वे वोटर नहीं थे|

आजाद भारत में देश के अपना सविधान लागू होते समय आरक्षण को दस साल के लिए लागू किया गया था मगर उसे सात बार बढ़ाया गया| चूँकि उसे बढ़ाए जाने या बंद किये जाने से वोटर प्रभावित हो रहा था| देश की सत्ता के शीर्ष पद पर बैठ कर राष्ट्र हित की जगह वोट हित में फैसला लेने का सिलसिला चलता रहा है| कोई बदलाव आया तो विरोध और समर्थन की स्थिति सामने आई है| मोदी ने नोट बंदी के फैसले से एक लकीर खीच दी है जहाँ से दो रास्ते होने तय है| वनवास या एक बार फिर राजतिलक| जनता उन्हें किस रास्ते पर भेज ये जनता पर छोड़ दीजिये| जनता को बरगलाने की कोशिश राजनितिक दल न करे तो ही अच्छा क्योंकि अब तकनीक की क्रांति का युग है| आप तो बस राजेश खन्ना पर फिल्माया और किशोर कुमार का गया फिल्म “रोटी’ के गीत का आनद ले– ये पब्लिक है सब जानती है….|

नए डीएम के पहुचने से पहले ही उनकी कार्यप्रणाली का व्हाट्सअप सन्देश फर्रुखाबाद पहुच गया|

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Posted on : 28-08-2016 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

Editorमेरे व्हाट्स अप में लगभग पचास ग्रुप है जिनमे से मैंने एक भी नहीं बनाया है| जिले और प्रदेश स्तर के ग्रुप है| अधिकतर पत्रकारों ने बनाये है| लगभग 10 साल क्षेत्रीय और राष्ट्रीय टीवी मीडिया में काम के दौरान प्रदेश भर में मेरा मोबाइल नंबर बटा था इसलिए आस पास के किसी प्रदेश के किसी जिले में ग्रुप बने मैं जोड़ दिया जाता हूँ| ऐसे ही एक ग्रुप में पिछले दिनों हुए जिलाधिकारियो के तबादले के साथ ही उनकी कार्यप्रणाली (गुण दोष उदहारण सहित ) का एक सन्देश वायरल हुआ| मैंने भी पढ़ा और डिलीट कर दिया|

DM FARRUKHABAD BINDजमाना कितना बदल गया है| अफसर के पहुचने के पहले ही उनके गुण दोष की खबर पहुच जाती है| सम्भल कर काम करने की जरुरत है| जनता का भरोसा सिस्टम से उठ रहा है| समस्या आने पर सिस्टम तो ढूंढे नहीं मिल रहा| कार्यपालिका नौकरी बचाने में लगा है| विधायिका आजीवन सत्ता में रहने की जुगाड़ में लगी है| न्यायपालिका काम के बोझ तले दबा काम कम होने का इन्तजार कर रही है| और इन सब के बीच जनता अपने अनुकूल व्यवस्था ढून्ढ रही है| मगर व्यवस्था है कि कार्यपालिका और विधायिका की सहचरी बनी हुई है|

वैसे मेरी पत्रकारिता और सोच सकारात्मक पहलु को लेकर ही रही है| पढ़ने वाला उसे किस रूप में देखे ये उस पर होता है| हम किसी कमी को लिखते है उसे सही करने के उद्देश्य से मगर जो पात्र इसमें संलग्न होता है उसे नकारात्मक ही समझ आता है|

तो नए डीएम ने चार्ज संभाल लिया है| फर्रुखाबाद की टकसाल अब उनके कब्जे में है| टकसाल से याद आया कि ये अंग्रेजो के जमाने में स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था है| डीएम तब कलेक्टर कहलाते थे| और उनकी जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार के लिए राजस्व कलेक्ट करने की होती थी| राजस्व वसूली में सख्ती करनी पड़ती थी और कई बार विद्रोह हो जाता था उसे कुचलने के लिए उन्हें कई शक्तिया प्रदान की गयी थी| धारा 144, और आई पी सी 147, 151 जैसी अन्य कई| तब राजस्व का बड़ा भाग खेती की जमीन और अफीम आदि से आता था| अब लगान तो नगण्य है| आज़ादी के बाद लगान के विरोध करने और उसे देने में आनाकानी करने के सामूहिक किस्से सुनने तक को नहीं मिलते| मगर कुछ लीक पीटी परम्पराए अब भी सत्य नारायण की कथा की तरह चल रही है जिसमे कथा कलावती और लीलावती की है, सत्यनारायण की कथा तो कहीं है नहीं|

उस जमाने में जो राजस्व जमा होता था उसे जिले की टकसाल में रखा जाता था| उसका इंचार्ज कलेक्टर होता था| तो आज भी उसी टकसाल के रजिस्टर पर अपने पहले हस्ताक्षर के साथ ही शुरू होता है किसी भी नए डीएम का कार्यकाल|

केंद्र और राज्य में अलग अलग सरकारों से उत्तर प्रदेश में इ-गवर्नेंस को लग रहा पलीता

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Posted on : 10-07-2016 | By : पंकज दीक्षित | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, Lokvani Jan Seva Kendra, Politics

Editorफर्रुखाबाद: केंद्र और राज्य सरकार में अपने अपने कामो को प्रचारित करने के चक्कर में उत्तर प्रदेश में इ-गवर्नेंस की ऐसी तैसी हो रही है| इसका खामियाजा उत्तर प्रदेश के 2 लाख से ज्यादा लोकवाणी/जन सेवा केंद्र संचालकों के साथ साथ जनता भी भुगत रही है| राज्य सरकार द्वारा संचालित इ-डिस्ट्रिक्ट सेवाओं को केंद्रीय CSC से जोड़ने की जगह प्राइवेट 5-6 कम्पनियो को ठेके पर दे दिया गया है| ये कम्पनिया ही लूट का माध्यम बनी हुई है| जहाँ देश के कई प्रदेशों में जनता को 100 से ऊपर सरकारी सेवाएं इन केंद्रों से मिल रही है वहीँ उत्तर प्रदेश में इन केंद्रों पर राज्य सरकार की 4-5 सेवाओं से से काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है भले ही 27 सेवाओं की लिस्टिंग कर इ गवर्नेंस का ढिंढोरा पीटा जा रहा हो| सरकारी बाबू तंत्र अभी भी गिद्ध नजर से अपने टुकड़े को नहीं छोड़ रहा| और इन सबके बीच एक और दलाल के बैठा देने से सेवाएं सस्ती नहीं महगी ही पड़ रही है| और केंद्र संचालक को भी कुछ मिल नहीं रहा| कुल मिलाकर चुनाव में राज्य की सबसे बड़ी आबादी ग्रामीण जनता मेट्रो और आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे से गुजर कर वोट देने नहीं जाएगी उसे तो पटवारी, ग्राम सचिव, सरकारी दफ्तरों के बाबुओं की घूस और प्रायमरी स्कूल के मास्टर के स्कूल आने ही याद आएगी|

उठ प्रदेश में इ डिस्ट्रिक्ट दवाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए पहले से चल रहे लोकवाणी केंद्रों के बीच कुल 5-6 कंपनियों को घुसेड़ कर दलाली का रेट बढ़ा दिया गया है| अब लोकवाणी केंद्र सीधे इन आई सी के कंट्रोल में न होकर सजह, वयमतेक, सी एम एस कंप्यूटर लिमिटिड जैसे कंपनियों के हवाले कर दिया गया है| टेंडर देते समय उत्तर प्रदेश की सरकार के अधिकारियो ने देश के प्रगतिशील प्रदेशों के मॉडल को न अपनाकर लगता है कमीशन की संस्कृति ही अपनाई है| वर्ना ऐसा न होता की जो सबसे ज्यादा काम कर रहा है उसे सबसे कम पैसे मिलते| उदहारण के लिए कानपूर मंडल में इ डिस्ट्रिक्ट का काम हथियाने वाली कम्पनी अपने जन सेवा केंद्र संचालक को केवल 1.67 रुपये का भुगतान प्रति फ़ार्म कर रही है| अब जिस जन सेवा केंद्र में लाखो रुपये लगाकर केंद्र खोला हो वो 1.67 रुपये प्रति फार्म में जनता का काम कैसे करे? सवाल बड़ा है मगर जबाबदेही किसी की नहीं|

केंद्र सरकार की होल्डिंग वाली कम्पनी इ गवर्नेंस प्राइवेट लिमिटिड और csc-spv ने उत्तर प्रदेश को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इ डिस्ट्रिक्ट सेवाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रस्ताव भेज था मगर यूपी के अफसरों/मंत्रियो ने इस निशुल्क प्रस्ताव को दरकिनार कर प्राइवेट कंपनियों को इ डिस्ट्रिक्ट सेवा देने के लिए टेंडर स्वीकृत कर दिए| नतीजा ये हुआ कि इन कंपनियों ने जन सेवा केंद्र खोलने के लिए संचालकों से मनमाने शुल्क करोडो में वसूल डाले (ऐसा नहीं माना जा सकता कि ये सब सरकारी अफसरों की सहमति से न हुआ हो)| एक एक संचालक से 9000/- प्रति केंद्र लिखापढ़ी में और 10 से 15हजार तक जो जागरूक नहीं थे उनसे अंडर टेबल भी लिए गए| बात यहीं तक नहीं रही| लोकवाणी केंद्रों पर पहले सरकार ने 20 रुपये का शुल्क प्रति आवेदन रख था| उसमे से 10 रुपये सरकार ले लेती थी| अब नए बिचौलिए के आने से उस 20 रुपये में से 18.37 रुपये संचालक से ले लिए जाते है| यानि की कुल मिलाकर 1.67 में जन सेवा केंद्र संचालक को काम करना है| है न कमाल की बात| भारत के अन्य किसी भी प्रदेश में जन सेवा केंद्र संचालक को इतने कम रुपये में काम के लिए नहीं कहा जाता| आंध्रा प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, बिहार यहाँ तक की पडोसी राज्य उत्तरांचल तक में ये सेवाएं जनता को देने के लिए जन सेवा केंद्रों पर 30 रुपये से 50 रुपये के बीच में शुल्क निर्धारित है| इन प्रदेशों में काम ईमानदारी से करने पर भी संचालक ठीक ठाक कमा लेता है| मगर उत्तर प्रदेश में 1 रुपये में काम करने के लिए कह कर सरकार खुद भ्रष्टाचार करने के लिए एक तरीके से प्रोत्साहित करती है| क्योंकि जो काम 30 रुपये में होता हो उसे 1 रुपये में करने के लिए कहना क्या है?

अब केंद्र सरकार की सीएससी और राज्य सरकार की इ डिस्ट्रिक्ट सेवा अलग अलग प्लेटफॉर्म में होने के कारण संचालक को अलग अलग जगह माथा मारना पड़ता है| दोनों ही अपने अपने कामो का ढोल पीटते है| जहाँ केंद्रीय सीएससी को लेने के लिए जोर शोर से बिना शुल्क का प्रचार किया जाता है वहीँ उत्तर प्रदेश की इ डिस्ट्रिक्ट सेवाओं को संचालित करने के लिए खूब भ्रष्टाचार हो रहा है| कहीं कोई बंदिश नहीं है| लूटो और हिस्सा दो| मगर इन सबमे पिसता कौन है? छोटा मोटा कारोबार करने वाला केंद्र संचालक और आम जनता|

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि केंद्र और राज्य में अलग अलग पार्टी की सरकार होने मायने विकास में असंतुलन और प्रचार की रस्साकसी है| इनके बीच खड़ा वोटर यानि की आम आदमी केंद्रीय और राज्य के संघीय ढांचे में काम के बटवारे से होने वाले नुकसान का ही भागीदार है| सरकार प्रचार की प्रतिद्वन्धितता में फसी है और जिन्हे इनके बीच रहना और काम करना है उनसे पुछा भी नहीं जाता की तुम्हे क्या ठीक लगता है| ये लोकतंत्र है| एक बार वोट देने के बाद पांच साल तक मनमानी का लाइसेंस देने से ज्यादा कुछ नहीं है वर्तमान का लोकतंत्र| अन्ना आंदोलन में उठी आवाज राइट तो रिकॉल शायद कहीं खो गयी| उत्तर प्रदेश के 2.5 लाख लोकवाणी संचालकों से एक बार भी पुछा नहीं गया कि क्या ठीक रहेगा| केंद्र की सी एस सी से जुड़ना या फिर अलग से प्राइवेट कम्पनियो को बीच में बिठा कर दलाली बढ़ा देना| जिनके कंधो पर जनता तक जन सेवा केंद्रों की सेवा जनता तक पहुंचाने का काम था उनके कंधे और छील दिए गए| कभी पूछा नहीं गया कि दूर गाँव में बिना बिजली के कैसे केंद्र चलाते हो? सोलर प्लेट खरीदने के लिए एक ग्रामीण लोकवाणी संचालक ने गाँव के साहुकार से खेत का एक टुकड़ा गिरवी रखकर ब्याज में पैसे लिए थे| कमाई नहीं आई तो खेत चला गया| अखिलेश सरकार की योजनाओं को ग्रामीणों तक पहुंचाने वाला वो जन सेवा केंद्र संचालक खेत भी गवां बैठा| अब सरकार बदलने का इन्तजार नहीं करे तो क्या करे ?………

गौरैया दिवस: खो गयी प्यारी चिड़ियाँ की चहचहाहट

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Posted on : 20-03-2016 | By : JNI-Desk | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, FEATURED, राष्ट्रीय, सामाजिक

indexफर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) कहाँ खो गई हो तुम कि तुम्हें याद करना पड़ता है।अब तो तुम हर दिन मेरे घर दाना खाने और पानी पीने भी नही आती | शायद हम ने हीं तुम्हारे रहने के जगह छीन ली है।वरना तुम तो रोशनदानों और पंखों के ऊपर भी घर बसा लेती थी। तुम्हारी ची-ची, चूँ-चूँ की झंकार अच्छी लगती थी। छिछले पानी में नहाती थी ,छोटे- छोटे चोंच से अपने पंख संवारती औरसुखाती थी । फिर फुर्र से उड़ जाती थी । यही कहते अब हम सब उन लोगो को सुनते है जो गौरया के बारे में जानते है| नई पीडी को शायद ही गौरैया देखने को मिले| आज विश्व गौरैया दिवस है। विश्व गौरैया दिवस पहली बार वर्ष 2010 ई. में मनाया गया था। यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है।

जैसा कि आप सबको विदित है की गौरैया आजकल अपने अस्तित्व के लिए हम मनुष्यों और अपने आस पास के वातावरण से काफी जद्दोजहद कर रही है। ऐसे समय में हमें इन पक्षियों के लिए वातावरण को इनके प्रति अनुकूल बनाने में सहायता प्रदान करनी चाहिए। तभी ये हमारे बीच चह चहायेंगे। गौरैया की घटती संख्या के कुछ मुख्य कारण है – भोजन और जल की कमी, घोसलों के लिए उचित स्थानों की कमी तथा तेज़ी से कटते पेड़ – पौधे। गौरैया के बच्चों का भोजन शुरूआती दस – पन्द्रह दिनों में सिर्फ कीड़े – मकोड़े ही होते है। लेकिन आजकल हम लोग खेतों से लेकर अपने गमले के पेड़ – पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग करते है जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते है और ना ही इस पक्षी का समुचित भोजन पनप पाता है। इसके अतिरिक्‍त गौरया शिकारियों के निशाने पर आ गई है, जो उन्‍हें कामोत्‍तेजक और गुप्‍त रोगों के पक्‍के इलाज के लिए दवा के रूप में बेचते हैं। इसलिए गौरैया समेत दुनिया भर के हजारों पक्षी हमसे रूठ चुके है और शायद वो लगभग विलुप्त हो चुके है या फिर किसी कोने में अपनी अन्तिम सांसे गिन रहे है। हम मनुष्यों को गौरैया के लिए कुछ ना कुछ तो करना ही होगा वरना यह भी मॉरीशस के डोडो पक्षी और गिद्ध की तरह पूरी तरह से विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए हम सबको मिलकर गौरैया का संरक्षण करना चाहिए।

इंसान और गौरया के बीच का रिश्ता कई सदियों से चला आ रहा है और ऐसा कोई पक्षी नहीं है, जो इंसान की रोजमर्रा की जिन्‍दगी से गौरया की तरह जुड़ा हो। ये ऐसा पक्षी है, जो हमारी बचपन की मधुर यादों को तरोताजा कर देता है और अपनी उपस्थिति से घरों में भी ताजगी भर देता है। कई पक्षी दर्शक और पक्षी विज्ञानी अपनी यादों के बारे में चाव से बताते हैं कि किस तरह गौरया की उड़ान में उनमें पक्षियों को निहारने की उत्सुकता भरी होती है। का घौंसला लगभग पड़ोस के हर घर, सामाजिक स्‍थान जैसे बस स्‍टॉप और रेलवे स्‍टेशनों पर देखने को मिलता था, जहां वो झुंड में रहती हैं और अनाज और छोटे-मोटे कीड़ों पर बसर करती हैं।

बदकिस्मती से गौरया अब लुप्‍त होने वाली प्रजाति बन गई है। जिस तरह से अन्‍य सभी पौधे और जानवर जो कि पहले बहुतायत संख्‍या में थे और आज एक अनिश्चित भविष्‍य का सामना कर रहे हैं, उसी तरह से गौरया की संख्‍या भी उनकी प्राकृतिक श्रेणी से घटती जा रही है। आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापटनम के अध्‍ययन में ये बात सामने आई है कि आंध्र प्रदेश के ग्रामीण तटवर्तीय क्षेत्र में गौरया की संख्‍या 60 प्रतिशत से ज्‍यादा घटी है।

नारी मै कोमल हूँ लेकिन कमजोर नही

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Posted on : 08-03-2016 | By : JNI-Desk | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS

NISHA TIVARIफर्रुखाबाद:आज की नारी का संसार चुनौती भरा जरुर है पर आज उसमे चुनौतिओ से लड़ने का साहस आ गया है यह तो तय है कि आज की नारी पहले की तुलना में कही ज्यादा आजाद है कुछ आज़ादी इन्हें समाज ने दी तो कुछ उन्हों ने अपनी काबिलियत के बल पर खुद ही हासिल की है| अपनी प्रतिभा के बल पर यह साबित किया है की नारी अब किसी भी कार्य में कमजोर नहीं है| परिवार व अपने भविष्य दोनों में तालमेल बैठा तो आज की नारी का कौशल काबिले तारीफ है फिर भी कुछ लोग यह कहते है कि आज की नारी शसक्त नहीं है| ऐसी मानसिकता वाले लोगो के लिए मै कुछ कहना चाहती हूँ| यह मत भूले नारी कोमल है कमजोर नहीं :शक्ति का नाम ही नारी है|
जग को जीवन देनें वाली मौत भी इससे हारी है |

चुनौतियों का हंसकर स्वागत करने वाली नारी आज हर छेत्र में अपना नाम कर रही है आज की नारी सीमा सुरक्षा, स्टेशन कंट्रोलर, ट्रेन चालक,से लेकर आसमान नापने व समुद्र की गहराइयो में जाने तक पुरुषो से कही आगे आ रही है| टेसी थॉमस देश की पहली महिला है जिन्होंने देश के मिसाईल कार्य को देखरेख किया है इन्हें मिसाइल वुमैन के नाम से भी जाना जाता है इन्हों ने अपनी मंजिल के सामने किसी की परवाह नहीं की नारियो की आज़ादी की मिसाल कायम करती इन नारियो को कौन नहीं जानता आज यह कामयाब है| पर ऐसा नहीं है कि इनकी राहे बहुत आसन थी लेकिन इन्होने और इनकी जैसी हजारो लाखो महिलाओ ने हर रुकवाट का अपने तरीके से सामना किया और अपना रास्ता खुद बनाया|

वही आजाद होकर उन्होंने दूसरी महिलाओ के लिए भी आज़ादी की राहे खोलने का प्रयास किया| लेकिन अभी भी अगर कोई यह कहता है की नारी ससक्त नहीं है तो मेरी समझ से वह बुद्धहीन है| लोगो से मै यह कहना चाहती हूँ की यह मत भूले किसी बात में कम तो नहीं| सारे अधिकारों की अधिकारी है|| और कोमल है कमजोर नहीं| शक्ति का नाम ही नारी है|| सभी जानते है की जब परीक्षा होती है तो मीडिया की पहली खबर यही होती है की बालिकाओ ने फिर मारी बाज़ी

सामाजिक और राजनितिक स्तर पर की जा रही पहलों का ही नतीजा है की आज परिवारों में बालिकाओ का स्वागत किया जाने लगा है| नारीओ को ससक्त करने और उनकी सुरक्षा करने के लिए केंद्र ने सभी केंद्र शासित प्रदेशो के पुलिस फाॅर्स में नारीओ को 33 प्रतिशत, नौकरियों में आरक्षण देने का निर्देश दिया है| कल तक भावात्मक रूप से कमजोर नारिया आज आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बन रही है| कुछ एक स्थानो पर बदलाव की जरुरत है लेकिन इस का मतलब यह नहीं की सरकार ही सब कुछ करे हम सब को मिलकर इस दिशा में कार्य करने है यह बदलाव खुद की सोच में होना चाहिए क्योकि सोच बदलेगी तभी देश बदलेगा |
निशी तिवारी
नेकपुर चौरासी (कक्षा-11)

अब अपने पैरो पर खड़ी हो सकेगी घायल बेबा साधना

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Posted on : 01-03-2016 | By : JNI-Desk | In : EDITORIALS, FARRUKHABAD NEWS, जिला प्रशासन

SADHANAफर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) बीते दिनों सांड के द्वारा चुटहिल कर दिये जाने के बाद उसकी टांग टूट गयी थी| जिसके इलाज के लिये जेएनआई ने पहल की और कई मददगारो से मिली आर्थिक मदद के बाद आखिर घायल बेबा साधना का सोमबार देर रात आपरेशन हो गया| अब वह कुछ ही दिनों में अपने पैरो पर खड़ी हो सकेगी|

शहर के ग्राम सातनपुर निवासी बेबा साधना पत्नी चन्द्रकिशोर वर्मा शहर से पैदल अपने घर आ रही थी| तभी उसके गाँव के निकट एक सांड ने महिला को जमीन पर पटक दिया| जिससे उसकी सीधे पैर की हड्डी टूट गयी| लेकिन आर्थिक तंगी का बोझ अधिक होने के कारण महिला ने अपना इलाज कराने में असमर्थ थी| जिसके इलाज के लिये जेएनआई ने पहल की तो जनपद और जनपद के बाहर से कई मददगारो ने उसे आर्थिक मदद देने में तनिक भी देर नही की| जिसमे कमालगंज के व्लाक प्रमुख राशिद जमाल सिद्दीकी और उनके बड़े भाई विधान सभा भोजपुर के प्रभारी अरशद जमाल सिद्दीकी, चिकित्साधिकारी डॉ० देवदत्त राजपूत, गौसपुर के प्रधान पति उवैस, कमालगंज के समीर नर्सिंग होम, कन्नौज जनपद के छिबरामऊ जीटी रोड के गुरु कृपा ट्राली व बाड़ी रिपेयर पप्पू शर्मा, कमालगंज के रेलवे ठेकेदार असलम सिद्दीकी, हिन्दू महासभा सहित कई लोगो ने महिला की मदद को अपनेहाथ बढ़ा कर जेएनआई का साथ दिया| जिससे महिला साधना अब अपने पैरो पर दोबारा खड़ी हो सकेगी|

बहुत सीधी सी बात यह है की केबल धर्म और जाति की राजनीति करने वाले जनपद के ना जाने कितने संगठन, अपने को समाज सेवी कहने वाले ना जाने कितने की चेहरे सामने नही आये| फ़िलहाल जेएनआई टीम उन सभी को सलाम करती है जिनके सहयोग से बेबा साधना अब पैर का आपरेशन होने जाने से जमीन पर दोबारा पैर रख सकेगी| यही हकीकत में सच्ची सेवा है|