फर्रुखाबाद परिक्रमा- भले ही बेहिसाब रोकड़ा खर्चा हुआ मगर खबरीलाल गौना नहीं होने दिया

EDITORIALS FARRUKHABAD NEWS

रात के दो बजे मुंशी हर दिल अजीज और मियां झान झरोखे के साथ डी० एन० कालेज मतगणना केन्द्र से बाहर निकलते ही खबरीलाल ने जोर का नारा लगाया! जय हो वोट भैया- फिर से पार लगा दी मनोज भैया की नैया! नारा इतना जोरदार और धमाके से लगाया गया था कि आनन फानन में तमाशवीनों की अच्छी खासी भीड़ तीनों लोगों के आस पास आकर खड़ी हो गई।

भीड़ में से एक ने आवाज लगाई! खबरीलाल जी इस चुनाव के सम्बंध में आपकी त्वरित टिप्पणी क्या है। खबरीलाल बोले भाइयों! यह यह भाषण देने का समय नहीं है। परन्तु लोकतंत्र में मतदाता ही भगवान है। यह बात एक बार पुनः सच साबित हो गई है। कंपिल से लेकर कमालगंज तक जहां जनता ने जमकर मतदान किया। वहीं सबसे अच्छे प्रत्याशी के न मिलने पर सबसे कम खराब प्रत्याशी को चुनने में जनता ने कोई कंजूसी नहीं की। मतदाता ने पूरे जिले में बसपा और भाजपा पर तो थोड़ा बहुत रहम किया। परन्तु सपा और कांग्रेस की वह फजीहत की है कि अगर इनके मठाधीशों, चाहें वह दिल्ली, लखनऊ के हों या जिले के, ने अपनी कार्य प्रणाली में सुधार न किया तब फिर यही कहना पड़ेगा कि घर में ही आग लग गई घर के चिराग से।

यह बातें चल रहीं थीं कि फर्रुखाबाद नगर पालिका परिषद की नवनिर्वाचित अध्यक्ष वत्सला अग्रवाल अपने पति और विवर्तमान अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के साथ मतगणना केन्द्र से बाहर निकलीं। खबरीलाल को भीड़ से घिरा देख दोनो पति पत्नी उधर ही आ गए। उत्साही समर्थकों ने मनोज और वत्सला की जिन्दाबाद के नारे लगाना शुरू किया। वैसे ही दोनो ने हाथ उठाकर अपने समर्थकों को रोक दिया। दोनो ने पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ खबरीलाल, मुंशी हर दिल और मियां झान झरोखे का अभिवादन किया और बोले- भैया खबरीलाल की जय, जनता जनार्दन की जय, नगर के प्रबुद्ध मतदाताओं की जय, लोकतंत्र की जय। जनता ने भी इन नारों का पूरा उत्साह से जबाव दिया। वत्सला और मनोज बोले हां भैया खबरीलाल अब बताइए आप क्या कह रहे थे।

खबरीलाल बोले हम तो कहते ही रहते हैं। कहते ही रहेंगे। परन्तु आज तो लोग आप दोनों को सुनना चाहते हैं। इससे पहले  कि नवनिर्वाचित अध्यक्ष महोदया से बोलने के लिए कहूं। निवर्तमान अध्यक्ष अपनी बात कहें।

मनोज बड़े संकोच के साथ बोले! भैया खबरीलाल आप इसे झूठी प्रशंसा न समझें। सही बात यह है कि जनता जनार्दन की ओर से इस चुनाव के सही और वास्तविक सूत्रधार आप और आप के साथी हैं। सबसे पहले आपने घर-घर गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले जनता को निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करने के लिए जागृत किया। सभी प्रत्याशियों की अच्छाइयों, बुराइयों को पूरी ईमानदारी से साफ-साफ जनता जनार्दन को बताया। सबसे अच्छे हम कभी नहीं रहे। लेकिन आपसे चुनाव दौरान रात में हुई लंबी बात के बाद हमने अपनी कमियों और गल्तियों को कम करना प्रारंभ कर दिया है। यह प्रयास हम और वत्सला आगे भी जारी रखेंगे।

मनोज बोले इस चुनाव ने हमारी आंखें खोल दीं हैं। इस चुनाव ने जाति विरादरी, धर्म आदि की दीवारों को तोड़ दिया है। खबरीलाल जी जिस तरह नाले मछरट्टे के पास अपनी स्वयं की बिरादरी का एक दर्जन भी वोट नहीं है। उसी तरह दो लाख से अधिक मतदाताओं वाली नगर पालिका में हमारी अपनी स्वयं की विरादरी का वोट भी बहुत ज्यादा नहीं है। उतने वोटों के बल पर अध्यक्षी तो दूर कोई प्रत्याशी सभासदी का चुनाव भी नहीं जीत सकता। चुनाव अभियान के प्रारंभ में ही मुझे आभास हो गया था कि मतदाता हमारे से नाराज हैं। सही है जो सत्ता में रहता है। उससे लोगों की नाराजगी होती ही है। परन्तु नाराजगी भी लोगों को अपनों से ही होती है गैरों से नहीं। आपके कहे अनुसार मैने नाराज अपनों से घर-घर जाकर भेंट की। उनसे वोट डालने का अनुरोध किया। मेरे लोगों ने मेरे अनुरोध को स्वीकार किया। इसके लिए मैं उन सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। यह कहते-कहते मनोज का गला भर आया और आंखें डबडबा आईं। इसके बाद वह हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

खबरीलाल ने नव निर्वाचित अध्यक्ष को बोलने के लिए कहा। उपस्थित सभी लोगों को विनम्रता से अभिवादन करते हुए वत्सला ने कहा। यह चुनाव मैं नगर की जनता, अपने पति और उनके उत्साही और कभी न थकने वाले समर्थकों के बल पर जीती हूं। वत्सला बोलीं यह सही है कि मनोज अग्रवाल के कार्यकाल में हुई गल्तियों की बजह से चुनाव में हमें मेहनत ज्यादा करनी पड़ी। परन्तु जो कार्यकर्ता है उससे कुछ न कुछ गल्तियां भी होती हैं। मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे से गल्तियां न हों। मेरे लिए राजनीति सेवा का माध्यम है। व्यापार नहीं है। मुझे और मेरे पति दोनो को अपने और पराए अच्छे और बुरे की पहिचान हो गयी है। वत्सला ने खबरीलाल की ओर मुखातिब होकर कहा भाई साहब! हमसे जहां कहीं जब भी कोई गलती हो आप हमें जरूर बतायें। हम न माने तब फिर हमारी गलती। आप सब मेरे भाई बहन चाचा ताऊ हैं। मैं आपकी बहन, भाभी, बेटी हूं। मुझे इसी तरह स्नेह सुझाव और सलाह देते रहिए। विश्वास कीजिए हम आपको आगे से शिकायत का मौका नहीं देंगे। इतना कहकर वत्सला सबके हाथ जोड़कर खबरीलाल और उनके साथियों को अभिवादन कर अपने समर्थकों के साथ चली गईं। मनोज अग्रवाल के कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच के सम्बंध में एक दिलजले ने पूंछ दिया। वत्सला ने टालने के अंदाज में कहा यह मेरा काम नहीं है। मैं जनादेश को सर्वोच्च मानकर नगर के बहुमुखी विकास के लिए कार्य करूंगी।

रनर रनर ही रहा- विवाह के बाद गौना नहीं हो पाया।

खबरीलाल ने फिर जोर से नारा जगाया – पैसे की खूब हुई बरबादी- पर इस बार नहीं चली उस्तादी। त्रिपौलिया चौक पर सुबह वैसे ही रविवार की बजह से अच्छी खासी भीड़ थी। खबरीलाल भी फतेहगढ़ मतगणना केन्द्र से आकर चौक में रुके। उन्हें देखकर भीड़ बढने लगी। विधायक विजय सिंह और पूर्व पालिका अध्यक्ष दमयंती सिंह भी घर जाते हुए चौक में खबरीलाल को देखकर रुक गए। विजय सिंह खबरीलाल से बोले। भैया! आपने हमें चेताया लेकिन देर से। कहावत है न आधी छोड़ एक को धावे, आधी रहे न पूरी पावे। इस नगर की जनता ने चार माह पहिले हमें कितनी विषम परिस्थितियों में विधायक बनाकर हमारा मान बढ़ाया। हमें पूरी निष्ठा से विधायक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए था। परन्तु हमने भी वही गलती कर दी जो पिछली बार मनोज अग्रवाल ने चेयरमैनी का चुनाव जीतने के बाद विधायक का चुनाव लड़कर की थी। हमने भी उसी तर्ज पर विधायकी जीतने के बाद चेयरमैनी के लिए ताल ठोंक दी। नतीजा सामने है। खबरीलाल बोले मायूस न हो विजय सिंह गल्ती किससे नहीं होती। तुम्हें अपनी गल्ती का एहसास हो रहा है। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

विधायक विजय सिंह थोड़ा आवेश में आकर बोले भैया खबरीलाल हम आपसे क्या कहें। न पढ़े न लिखे, न काम न धाम। सही सलाह देने वाला कोई है नहीं। सब वल्ली पर चढ़ाने वाले हैं। सब मतलबी लोग हैं। कोई पंचायत अपने पक्ष में कराना चाहता है। कोई जमीन जायदाद हथियाना चाहता है। कोई अपने गली मोहल्ले में हमारे नाम से अपनी दादागीरी करना चाहता है। ऐसी ऐसी ठकुरसुहाती करते हैं कि हमारा भी मन डोल जाता है। रावण के पास एक विभीषण था। सोने की लंका का क्या हाल हुआ। हमारे पास कैसे कैसे लोग हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं। हम सच कहते हैं हम सुधरना चाहते हैं। परन्तु यह जो हमारी फौज है न यह हमारी चापलूसी जयजयकार के अलावा कुछ करना नहीं चाहती।

विधायक अपनी रौं में बहे जा रहे थे। देखा आपने हम पहिले चक्र से ही पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गए। कहां गया मुसलमान, कहां गया ठाकुर, कहां गया सुनार। कहां गए विभिन्न पार्टियों में हमारे समर्थकों की लंबी जमात। सेनापति से नाराज ब्राहृमण कहां चला गया। मनोज से नाराज उनकी वरादरी का वोट कहां चला गया। हमें तो उतना वोट भी नहीं मिला जितना चार माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में मिला था। अब तो दोनो की फिगर सामने है।

विधायक को इस तरह बोलते देख खबरीलाल भी थोड़ा भावुक हो गए। बोले कैसी कमजोरी की बातें करते हो। हिम्मत रखो, तुम्हारा नाम विजय सिंह है। एक साहब परीक्षा में फेल हो गए। बोले इससे तो सप्लीमेंन्ट्री आ जाती साल बच जाती है। अगले साल प्रथम श्रेणी में पास हो गए। क्या पता यह हार ही तुम्हारे अंदर सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ कर तुम्हें या दमयंती को लोकसभा का चुनाव जिता दे।

विजय सिंह बोले भैया खबरीलाल। वेमतलब का ढाढस मत बंधाओ। भैया खबरीलाल। हम मनोज अग्रवाल नहीं है। विधायकी हारे रोकड़ा पानी की तरह बहाकर एमएलसी बन गए। वह तो व्यापारी हैं। नहीं होगा ईंटों की एक फैक्ट्री और खोल लेंगे। प्रापर्टी डीलिंग या अन्य बेनामी कार्य और शुरू कर देंगे। यहां चार माह में दो चुनाव, मुकदमों का बेहद खर्चीला चक्कर और जाने क्या क्या। अब तुमसे क्या छुपायें चुनाव जीत जाते लोग सबर किये रहते। अब तो आज से ही भुगतान के लिए चढ़ाई शुरू कर देंगे। यहां तो विधायकी के वेतनभत्ता और विधायक निधि ही है। आप जानते हैं खबरीलाल जी विधायक निधि में कमीशन खाना हमारे लिए हराम है। इस चुनाव ने हमें कहीं का नहीं रखा। न घर का रखा न घाट का। इलाहाबाद में चुनाव याचिका दुश्मनों ने कर रखी है। अब उसकी पैरवी इज्जत बचाने के लिए करनी पड़ेगी।

खबरीलाल बोले विजय सिंह हिम्मत रखो। तुम्हारे ऊपर मुसीबतों का यह पहाड़ पहली बार तो आया नहीं। हिम्मत से काम लो सब ठीक हो जाएगा। विजय सिंह बोले आपकी बातें खबरीलाल भैया बहुत सकून देती हैं। हम हिम्मत भी रखेंगे और सुधरने की पूरी कोशिश सच्चे मन से करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे सच्चे मित्र हमारा फिर हर बार की तरह साथ देंगे। फिर यह कहते हुए –
गिरते हैं सहसवार ही मैदाने जंग में
वह तिफ्ल क्या क्या गिरें जो घुटनों के बल चलें।

विजय सिंह नाला मछरट्टे की ओर बढ़ गए। खबरीलाल ने जब दमयंती सिंह से कुछ कहने का अनुरोध किया। त बवह नई नवेली दुल्हन की तरह शर्माती हुईं बोलीं। हम कभी इनके सामने बोलीं हैं। विवाह के बाद गौना कराया नहीं। अब बोलने को कहते हो। अब यह सियासत का तामझाम छोड़कर विक्की सिक्की और करन के शादी व्याह में लगूंगी। इतना कहकर दमयंती भी विधायक विजय सिंह के पीछे चलीं गईं।

हम तो दबके रह गए समर्थन के बोझ से-

हाजी ठहरे सीधे सादे और कारोबारी आदमी। उस्ताद के अखाड़े के पहलवान रहे। पहले स्वयं चुनाव लड़ने का मन बनाया। सीट आरक्षित हो गई तब फिर बेगम को उतार दिया चुनाव मैदान में। दाम दुकड़ा माल की कोई कमी नहीं। कहावत है जहां गुड़ होता है चीटे भी वहीं जाते हैं। झुंड के झुंड लोग अपना इतिहास और औकात भूलकर समर्थन के लिए आने लगे। माल मलीदा खाने लगे। न किसी से सलाह न मशबरा। हम तो आखिर हमीं हैं। न कोई मीटिंग न प्रस्ताव। समर्थन वेहिसाब सलमा बेगम न हुईं प्रणव मुकर्जी हो गईं। चार माह पहिले हुए विधानसभा चुनाव में अपनी जमानतें गंवा चुकीं दो बेगमें भी अपने समर्थन की पोटली लेकर आ गईं। पिं्रस भी अपने साजिदों के साथ आ गए। राजा और युवराज भी पीरों फकीरों की तरह आशीर्वाद देने लगे। मांगें बिन मांगे समर्थन की बाढ़ आ गई। इसे सम्हालने में पैसा पानी की तरह बहाया गया। हाजी के समर्थन में विधानसभा का चुनाव लड़े तीन तीन प्रत्याशी खुले तौर पर थे। नतीजतन सलमा बेगम भी तीसरे नंबर पर रहीं। देखना है हाजी लोकसभा चुनाव स्वयं लड़ते हैं या किसी को समर्थन देते हैं। भले आदमी हैं। उन्हें भी इस चुनाव में बहुत कुछ सीखने को मिला है। इसलिए उन्हें कुछ सलाह देने की जरूरत नहीं है। हां कभी भेंट हो गई तब उन्हें भी वह सब बता देंगे जो खेल उनके साथ हुआ है।

भाजपाई फिर हुए शर्मिन्दा

दिग्गज नेताओं की मजबूत टीम- समर्पित कार्यकर्ताओं की लंबी फौज। विधानसभा चुनाव में हुए अपमान का बदला लेने का सुनहरा अवसर। परन्तु नतीजा जमानत जप्त और चौथा नम्बर। कलराज मिश्र भी आए, बलराज सिंह भी लगे। सुशील सत्यपाल, मिथलेश, मेजर सब जी जान से लगे। इनकी निष्ठा पर कौन संदेह करेगा भला। शमशाबाद में कमल खिला। परन्तु कायमगंज और फर्रुखाबाद में सब कुछ तहस नहस हो गया। देखना है हर हाल में तौर तरीके न सुधारने की कसम खाए बैठे भाजपा के दिग्गज नेता चुनाव में शर्मनाक हार के लिए चिंतन मनन और समीक्षा बैठक में क्या फरमाते हैं। पारिया साहब यह पढ़े लिखे अधिवक्ताओं का चुनाव नहीं है। यह आम मतदाता का चुनाव है। कहां फंस गए इस चक्कर में कम से कम डा0 रजनी सरीन को विश्वास में लेकर पालिका चुनाव के उनके अपने अनुभव जान लिए होते। तब फिर चुनाव मैदान में उतरने से पहिले सौ बार सोचते। चलिए छोड़िए अब पछताए होत क्या जब चिड़यां चंुग गईं खेत। आप बहादुर और हिम्मती आदमी हैं। हमें पूरा विश्वास है यह चुनाव आपका पहिला परन्तु अंतिम चुनाव नहीं होगा। लगे रहो मुन्ना भाई की तर्ज पर लगे रहिए।

और अंत में ………………….यह तो होना ही था।

स्थानीय निकाय चुनाव में पेड न्यूज और विज्ञापनों के माध्यम से चुनाव मैदान में डटे नेताओं की भी इस बार मतदाता ने जमकर फजीहत की। किसी को फायदा और किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए खड़े प्रत्याशियों को उनके अच्छे बैकग्राउंड के बाद भी इरादे सही न होने के कारण मतदाता ने कोई भाव नहीं दिया। इन प्रायोजित प्रत्याशियों को अपनी हार का गम नहीं है। एक ओर प्रायोजक भली बुरी कह रहे हैं। दूसरी ओर प्रायोजित धनराशि के लगभग पूरी खर्च हो जाने का मलाल है। अगर परिणाम का अंदाज होता तब कुछ तो बचा लेते।

चलते-चलते………… अपनी ही सेनाओं से जूझ रहे सेनापति

जिले में जनसेवकों और जनप्रतिनिधियों की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। दुश्मनों और विरोधियों से नहीं अपनी ही सेनाओं (सहयोगियों और समर्थकों) से जूझना पड़ रहा है। नगर निकाय चुनावों में जनप्रतिनिधियों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। उनकी सेनाओं ने सहयोग ही नहीं किया। गेहूं की सरकारी खरीद में किसानों का न्यूनतम पांच प्रतिशत और अधिकतम पन्द्रह प्रतिशत ही खरीदा गया। बांकी सबका सब बिचौलियों ने खरिदवा दिया। वरिष्ठ अधिकारी जूझते रहे सेना माल काटती रही। अब बरसात आ गई। खेल खत्म पैसा हजम। बच्चों बजाओ ताली न तुम खाली न हम खाली। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट
आवास विकास कालोनी
फर्रुखाबाद