फर्रुखाबाद परिक्रमा: चरित्र प्रमाण पत्र की वैतरणी और बिना स्वागत का न्यू ब्रांड कमल

EDITORIALS

हमारा खुद ही इतना नाम,

हमें अनुशासन से क्या काम|

आज लम्बे समय के बाद त्रिपौलिया चौक पर मुंशी हर दिल अजीज और मियाँ झान झरोखे को हंसते खिलखिलाते जोर से तालियाँ बजाते झूमते हुए देखा| शनिवार की शाम थी लोग भी फुरसत में थे| मिशन 2012 का मामला है| छोटे-बड़े सभी दलों के छोटे-बड़े नेता प्रत्याशी संभावित प्रत्याशी उनके चिरकुट चमचे लंगर लंगोट लिए हर समय अपनी ऐसी तैसी करवाने और दूसरे की करने को तैयार रहते हैं| बिरादरी विरासत और कुनवापरस्ती की राजनीति करने वालों पर तो दोहरा संकट है| होर्डिंग अखबारी विज्ञापन चौक में ठंडा पानी गर्म चाय हार-फूल माला का स्वागत चौथे खम्बे की चापलूसी कुछ भी काम नहीं आ रही है|

मियाँ मस्ती में झूमते हुए बोले इस सप्ताह इतना मसाला मिला है कि समझ में नहीं आता शुरू खान से करें| मुंशी बोले कहीं से शुरू करो| नेताओं और उनके दलों की राजनीति तो कोल्हू के बैल जैसी हो गयी है| चाहें जितना चले और चाहें जितनी बाँहें फटकारें लौट फेरकर वहीं पर आकर टिकेंगें जहां से चले थे| नेताओं की यह बीमारी अब धीरे-धीरे कलम के सिपाहियों को भी लगती जा रही है| हम अपना स्वयं का कार्यक्रम ( पत्रकारिता दिवस) भी एक साथ बैठकर संपन्न नहीं कर सकते| मौक़ा हम स्वयं देते हैं| फिर शासक प्रशासक, पुलिस नेता, दबंग, माफिया हमारी मुंडी अपनी मर्जी के हिसाब से घुमाते हैं| विज्ञापन के मिड डे मील की तरह हमें भरमाये भी रहते हैं| हम बड़े तीस मार खां है| अपने लोगों को एकजुट करने के स्थान पर गंगा दरबाजे की यज्ञ कथा की तरह दोनों जगह बाहें हिलाते खींसे निपोर कर पहुँच जाते हैं|

हम सब कुछ चाहतें है परन्तु स्वयं के क्रिया कलापों पर विचार करना उनमे सुधार करना हमारे लिए नाकाबिले बर्दास्त है| कोई हमें प्रत्यक्ष धमकाकर मस्का लगाकर, दवाव बनाकर गिफ्ट देकर और जाने क्या-क्या करके हमारा प्रयोग रहा है| लेकिन हम हैं कि बस हम ही हैं|

मुंशी हर दिल अजीज को बीच में ही रोककर मियाँ झान झरोखे बोले कहाँ की बेसुरी आल्हा लेकर बैठ गए मुंशी| अपनी मत देखो दूसरों की देखो बड़ा मजा आता है| अब देखो अधीरपुर नरेश को साइकिल कबाड़ खाने में डालकर पूरे लाव लश्कर के साथ लखनऊ और ब्रांड न्यू कमल लेकर आ गये| जहां से बड़ी शान से गए थे लौटे तो बड़े बेआबरू होकर| जो लोग साथ गए थे उन्हें हांथी वाले हड़का रहे हैं क्यों गए वहां क्या रखा है ? हमारे साथ रहोगे तो ऐश करोगे| ऊपर से तुर्रा यह कि जहाँ आये हैं वहां के किसी स्थानीय सूरमा ने पूरा सप्ताह होने को आया| स्वागत, सत्कार और अभिनन्दन में एक शब्द भी कहने की हिम्मत या उदारता नहीं दिखाई|

मुंशी बोले ठीक कहते हो मियाँ| अब वह चोर अपने इन्द्रनाथ को देखो लकवाग्रस्त हाँथ की लम्बे समय तक तेल मालिश करते रहे| साहब और मेमसाहब अपने अमले के साथ कथित रूप से हथियाए हुए घर पर हाजिरी देते थे| इन्द्रनाथ को अपनी योग्यता पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो गया| आव न देखा ताव ठोक दिया मेमसाहब के मुकाबले अपना दावा| चापलूसी का वह नजारा देखने को मिला कि सब इन्द्रनाथ के पीछे राशन पानी लेकर पिल पड़े| आखिर सवाल तो अपने-अपने नंबर बढवाने का था| राजनीति भी करते हैं चुनाव भी लड़ना चाहते हैं| परन्तु भरोसा न अपने पर है और न ही अपनी पार्टी पर| इसलिए एक अदद रेडीमेड संगठन गैंग बिग्रेड, आर्मी, मंच आदि के नाम से अपने तरकश में रखकर निकालते बैठाने, बनाने, भंग करने निष्कासित करने का खेल चौथे खम्बे के बहादुर जाबांजों के सहयोग से खेलते रहते हैं| मन में यह एहसास भी बना रहता है कि हम भी कुछ है|

लम्बी हो रही बात को समेटने के अंदाज में मियाँ झना झरोखे से बोले जनता और नेता के बीच अब तू डाल-डाल मै पात-पात की स्थित बन रही है| बिरादरी और निहित स्वार्थों का आलम यह है कि नेताओं की आगरा से शुरू हुई दोस्ती भले टूट गयी हो परन्तु जो लोग जिला मुख्यालय पर क्रान्ति करने के लिए जुटते है| वही दो दिन बाद साइकिल की सवारी करने में इंच मात्र शर्माते नहीं| न उन्हें आसन का डर है और न ही प्रशासन का| जो लोग हांथी पर सवार होकर पेट्रोल, डीजल के दाम घटाने की जंग लड़ आये वही लोग दो दिन बाद फर्रुखाबाद केसरी के मजमे में शामिल हो चलो अमृतपुर की ओर का राग अलाप रहे थे| उन्हें याद दिलाया-

हमें नेकी से क्या लेना, बड़ी पर मिलने लगा इनाम|

हमारा खुद है इतना नाम , हमें अनुशासन से क्या काम||

मियां और मुंशी बोले अच्छ तो हम चलते हैं|

चरित्र प्रमाण पत्र या स्वर्ग की सीढी-

पता नहीं लम्बे समय से स्वास्थ्य लाभ कर रहे जिलाधिकारी को यह पता है कि नहीं उनके हस्ताक्षरों से जारी होने वाले चरित्र प्रमाण पत्र स्वर्ग की सीढी हो गये हैं| बताते हैं कि स्वर्ग की सीढी उन्ही को मिलती है जो काम चाहे जैसा करें लेकिन दान-पुण्य बिना नागा जीवन भर करते रहे| ठीक इसी तर्ज पर आपका चरित्र चाहें जैसा हो| अच्छा या बुरा इससे किसी को कुछ लेना देना नहीं है| अन्ना हजारे और बाबा रामदेव चाहें जितना जोर लगा लें चरित्र प्रमाण पत्र की सोने की सीढी के तहसील से लेकर वाया पुलिस प्रशासन नौ सीढियां हैं| हर सीढी का निश्चित दान-पुण्य नजराना शुकराना या जो कुछ भी कहें, उसकी अदायगी के बिना आगे बढ़ना चरित्रवान से चरित्रवान व्यक्ति के लिए भी संभव नहीं है| उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में जिलाधिकारी के सीधे हस्तक्षेप से इसमें कुछ सुधार होगा|

पढोगे तो नाम करोगे-

परीक्षाओं के परिणाम आ रहे हैं| सारा हताशा, निराशा और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच शानदार ढंग से पास होने वालों की निरंतर बढ़ती संख्या मन को प्रसन्न करती है| कोई डाक्टर, इंजीनियर और डीएम बनकर देश समाज की सेवा करना चाहता है| किसी को देश के मौजूदा हालात अच्छे नहीं लगते वह उसमे परिवर्तन का सपना देख रहे हैं| लडकियां लड़कों से लगभग हर परीक्षा में आगे हैं| अच्छ लक्षण है, सबकी आंखों में चमक और अपना सपना है| सपने देखना और उन्हें साकार करना आगे बढ़ाना और देश समाज और परिवार की सेवा करना अच्छा है| देश के भावी कर्णधारों, अपनी मेहनत, निष्ठा, लगन पुरुषार्थ से आगे| अपने सपने साकार करो देश और समजा के सपने अपने आप साकार होंगें|

अच्छी संस्थाओं की जल्दबाजी-

जिस संस्था की सदस्यता की शर्त या न्यूनतम योग्यता विधि स्नातक हो ना हो उसकी प्रतिष्ठा तो अपने आप में ही बहुत शानदार होगी| निश्चित रूप से इन संस्थानों के क्रिया-कलाप और कार्य प्रणाली भी अनुकरणीय होगी|

परन्तु जिला वार एसोसिएशन के संदर्भ में पता नहीं कि किस कारण इस बार ऐसा हुआ| एक सदस्य ने अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव में सदर सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने हेतु समर्थन माँगा| एसोसिएशन के पदाधिकारी पता नहीं उधार खाए बैठे थे| आनन्-फानन बिना विधिवत बैठक बुलाये सदस्यों को सूचना दिए बिना घोषणा कर दी| नतीजतन विरोध शुरू हो गया| अध्यक्ष जी के पास पत्र उलाहने आलोचनाओं के तीर आने शुरू हो गए| देखना है जल्दबाजी की गलती के बाद अब यह संस्था अपना सम्मान, गरिमा और मर्यादा बचाने के लिए करती है|

और अंत में-

लोक शाही पर हावी हुई तानाशाही |

अंततः वही हुआ जिसकी आशंका कल देर शाम से नजर आ रही थी| कहाँ हवाई अड्डे पर ठाठ बाट का स्वागत| मंत्री समूह के बीच लम्बी मैराथन बैठकें| लगा बाबा के सामने पूरी केंद्र सरकार शीर्षासन कर रही है| परन्तु सत्ता का खेल बड़ा निर्मम है| बाबा की कथित सहमति का लिखा पत्र जैसे ही जनता के बीच आया| बाबा हत्थे से उखड गए| फिर तो रात में जो हुआ वह अकल्पनीय था| गिरफ्तारी, लाठीचार्ज, आंसूगैस, पत्थरबाजी, अफरा-तफरी| फिर मामला और गडकरी की हुंकार, विरोधियों के खुले वार| बाबा की तो बाबा जाने परन्तु उनके खेल को बिगाड़ने में सरकार के साथ ही मामला और उसके सहयोगी संगठन भी बराबर के जिम्मेदार हैं|

भाजपा का यह खेल पहली वार नहीं है मुंह फैलाकर लगाम लेना इनका पुराना काम है| अब बाबा की अनुपस्थित में भाजपा पूरी तरह से आ गयी है बाबा के समर्थन में| ऐसे में दिग्विजय सिंह को भी अपनी पीठ ठोंकने का मौक़ा मिल गया| एक मुद्दे पर चल रहे सफल आंदोलन में पलीता लगाने की भाजपा विहिप और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ढेरों बधाईयाँ| बहुत दिनों बाद नरेन्द्र मोदी को बाँहें फैलाने का मौक़ा मिला| दोस्तों से इस कदर सदमें उठाये जाने पर दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा| परन्तु सरकार ने देर रात में जो कुछ किया उस पर माफी का कोई सवाल नहीं| पूरे देश में इस क्रूर और निरंकुश हिंसा का विरोध होना चाहिए|

(लेखक वरिष्ट पत्रकार के साथ वकील व समाजवादी चिंतक है)

प्रस्तुति-

सतीश दीक्षित (एडवोकेट)
1/432, आवास विकास कालोनी फर्रुखाबाद

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