फर्रुखाबाद परिक्रमा – अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर!

EDITORIALS FARRUKHABAD NEWS

 गड़करी साहब की जय जय बोलो!

कांग्रेस जो है सो है। परन्तु जवाब अपनी भाजपा का भी नहीं। कहावत है बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह। नीति नियति, चाल चलन, चरित्र नैतिकता आदि आदि का सारा ठेका भाजपा ने ले रखा है। ठीक है भैया। तुम्हारी पार्टी है। त्यागपत्र दो या नहीं तुम्हारी मर्जी। संविधान में संशोधन करके आजीवन अध्यक्ष बन जाओ हमें क्या परेशानी। परन्तु हे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के अनन्य भक्तों और समर्थकों के सिरमौर गड़करी साहब। आपको यह अधिकार किसने दिया कि आप अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वयं ही खारिज करके अपने आपको क्लीन चिट दे दें। भला यह भी कोई बात हुई। और किसी से न सही अपने वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी से ही सीख लेते। उन पर आरोप लगे। तत्काल त्यागपत्र यह कहते हुए दिया कि जब तक लगाए गए आरोपों की जांच नहीं होती वह निर्दोष साबित नहीं हो जाते, तब तक वह अपने पद पर नहीं रहेंगे। आप गड़करी साहब गंभीर आरोपों पर स्वयं वादी अदालत और न्यायाधीश बन गए। स्वयं के निर्दोष होने की घोषणा कर दी। बोलो जय श्री राम! बोलो गड़करी साहब की जय! सही कहा है-

एक राम ने सीता छोड़ी एक धोबी के कहने पर,
अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर!

सर्वोच्च संसद के अजब गजब खेल और नजारे!

अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान संसद की सर्वोच्चता का बखान किन किन लोगों ने किया था।
संसद को शान्तिपूर्ण और नियमों के अनुसार चलने देने का संकल्प संयुक्त सत्र में किन लोगों ने लिया था।
संसद सदस्यों ने अपने वेतन भत्ते और सांसद निधि में बढोत्तरी का प्रस्ताव चंद मिनटों में एक स्वर और एक मत से कब पारित किया था।
लोकपाल बिल महिला आरक्षण बिल आदि संसद में कब से विचाराधीन है। सोचिये विचारिए सर्वोच्च संसद के माननीय सदस्यगण और नेता एफ.डी.आई. के समर्थन और विरोध के कितने खेल खेल चुके हैं। आगे कितने खेल और खेलेंगे।

सोचिए और विचारिए जब भाजपा के धुर विरोधी बाम पंथियों को एफ.डी.आई. के मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होने में कोई परेशानी नहीं है। तब फिर एफडीआई और स्वयं भी एक दूसरे के प्रबल विरोधी सपा के साइकिल सिंह और बसपा के हाथी सिंह गांधी को भूल जाने वाली कांग्रेस के लिए तारनहार क्यों बन जाते हैं। वामपंथियों से सायकिल सिंह की दोस्ती जग जाहिर है। फिर यह कैसी बेरुखी-

कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगीं,
कोई यूं ही बेबफा नहीं होता!

हमारी अपनी राय में यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारी सर्वोच्च संसद में हमारे माननीय सदस्यगण कम मत प्रतिशत और वोटों के बंटवारे के बल पर निर्वाचित होकर सदन में पहुंचते हैं। इसी कारण वह राजनीति की विसात पर अपनी मनमानी करने और स्वार्थ पूर्ण बाजियां खेलने में न शर्माते हैं, नहीं डरते हैं।

हमारा कहना है कि देश की सर्वोच्च संसद में इस प्रकार के घृणित खेलों और परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान का संकल्प हमको आपको सबको करना होगा। कारण कोई भी हो। यदि हम आप सब यह नहीं करते हैं, तब फिर हममे से किसी को भी किसी भी राजनैतिक दल नेता या जनप्रतिनिधि को भला बुरा कहने का कोई हक नहीं है। नेताओं को भी देश हित में हिम्मत दिखानी होगी। वह जनता से अपील करें। वह चाहें जिसे वोट दें। परन्तु हर हाल में निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान अवश्य करें। शत प्रतिशत मतदान अवश्य करें। सच मानिए किसी प्रकार के चुनाव सुधारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

करा के दिखाओ नकल विहीन परीक्षा

वर्षों पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी वी.एन. गर्ग ने नकल विहीन परीक्षा का कीर्तिमान स्थापित किया था। परीक्षा की तिथियां घोषित हो रही हैं। परीक्षा केन्द्रों की अंतिम सूची भी जारी हो रही है। प्रदेश में प्रगतिशील विचारों वाला युवा मुख्यमंत्री है। सकारात्मक परिवर्तन की बात हो रही है। जिले में वी.एन. गर्ग से भी कड़क और व्यवस्था प्रेमी जिलाधिकारी हैं। जिला विद्यालय निरीक्षक के भी बड़े नाम और काम हैं।

जिलाधिकारी जी, जिला विद्यालय निरीक्षक जी अपने सहयोगियों के सहयोग से यदि आप इस वर्ष परीक्षाओं को बिना नकल के संपन्न करा सके। तब फिर नेता या नेती आपसे या आपके लिए कुछ भी कहें। आपके नुकसान स्थानांतरण के लिए कितने भी पापड़ बेलें। इस जिले के लोग आपको याद रखेंगे।

हमें विश्वास है कि पूर्व जिलाधिकारी वी. एन. गर्ग की तरह आप जिले में नकल विहीन परीक्षायें सम्पन्न करने की हिम्मत अवश्य दिखायेंगे। हम सबकी शुभकामनायें आपके साथ हैं।

हम नहीं सुधरेंगे- हम हैं सलमान

ताबड़तोड़ गल्तियों और तुनकमिजाजी पर ही तरक्की मिलती हो! तब फिर सुधरने की क्या जरूरत है। सर्वोच्च संसद में हमारे विदेश मंत्री के वक्तव्य पर चर्चा होती है। उन्होंने भारत और चीन के बीच कोई एलओसी (लाइन आफ कन्ट्रोल- नियंत्रण रेखा) न होने की बात कही है। लंबे समय से उनके अनुसार इस पर वार्ता चल रही है।

सलमान साहब! आप यहां के सांसद हैं। देश के विदेश मंत्री हैं। सोच समझ कर बोलने में कुछ जाता नहीं है। ठीक है एल ओ सी तय नहीं है। आप या भारत सरकार जहां से भारत भूमि की शुरूआत मानती है। सर्वोच्च संसद में कांग्रेस सहित सारी राजनैतिक पार्टियों 1962 के चीनी आक्रमण के बाद लिए गए उस संकल्प को भूली नहीं है। इस संकल्प में चीन द्वारा कब्जा की गयी एक एक इंच भूमि वापस लेने तक चैन से न बैठने की बात कही गई है। चीन यदि वहां आकर, आगे आकर निश्चित रूप से हमारी भूमि में आकर अपनी सैनिक और असैनिक गतिविधियां अजमा देता हैं तब क्या हम एलओसी न होने की बात कहकर उसे ऐसा करने देंगे। बहुत हो चुका शब्दों का खेल। देश हित में सुधर जाओ। सोच समझ कर बोला करो।

पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव सहित कई वरिष्ठ पूर्व एवं वर्तमान सैन्य अधिकारी और जानकार लोग एक बार नहीं अनेक बार चीन की ओर से बढ़ते जा रहे खतरे के प्रति सरकार को आगाह कर चुके हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री की एक गलत वयानी के चलते हमने तिब्बती नेता दलाई लामा को अपने यहां शरण दे रखी है। वहीं चीन को तिब्बत और तिब्बतियों पर अमानवीय अत्याचार करने की खुली छूट दे रखी है। हम यह नहीं मान सकते कि आप इस ऐतिहासिक भूल और इससे हुए विनाश के विषय में नहीं जानते। हमारे और चीन के बीच स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न तिब्बत देश था। दलाई लामा उसके सर्वोच्च नेता हैं। परन्तु हमने हिन्दी चीनी भाई भाई की झोंक में तिब्बत को मिट जाने दिया। आज चीन हमारी भूमि पर अपनी सैनिक असैनिक गतिविधियां अंजाम दे रहा है। आप हैं जो एलओसी न होने की बात कहकर चीन को मनमानी करने के लिए उकसा रहे हैं। सुधर जाओ सलमान भाई। न सुधरने की बच्चों जैसी ऐसी जिद ठीक नहीं है।

मजाक बनकर रह गया सर्व शिक्षा अभियान

छात्रों को ड्रेस के साथ टाई नहीं, छात्राओं को ड्रेस के साथ दुपट्टा नहीं। पढ़ाई की जरूरत नहीं। फेल होंगे नहीं। हाजिरी होगी नहीं। मिड डे मील का कटोरा पहिले दिन से ही हाथ में है। जो मिल जाये उसे चुप चाप गृहण करो। सर्व शिक्षा अभियान के कर्ताधर्ताओं की जय जय कार करो। देश के भावी कर्णधारों के शिक्षकगणों की अपनी मजबूरियां समस्यायें शिकायतें हैं। निलंबन, स्थानांतरण समायोजन आदि आदि कई दरबाजों वाले इस विषम चक्रव्यूह में घिरा खड़ा है असहाय गोविंद का गुरू। गुरू को घेरे खड़े हैं त्रिपाठी कौशल और पटेल। उनके पीछे उनके अपने अपने काकश और सिन्डीकेट। शिक्षकों के विविध संगठन और उनके पदाधिकारी। साथी शिक्षकों के बीच वगावती तेवर। चाहें जो मजबूरी हो मांग हमारी पूरी हो। अधिकारियों के सामने सारी शेखी छूमंतर। भवन निर्माण, चाहर दीवारी निर्माण, मिड डे मील, ड्रेसों आदि ने किसी से नजरें मिलाने लायक ही नहीं रखा। गोविंदों के गुरुओं को। कौन किसके पायं लागे। चुपचाप पैसा फेंको। सर्व शिक्षा अभियान का कबाड़ा होते देखो।

सात माह में चले एक कोस

ऐतिहासिक तरक्की है। वर्षों से नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चली आ रही है। यहां जिले में जिलाधिकारी को दिया गया एक प्रार्थनापत्र स्वास्थ्य विभाग से सम्बंधित था। उसे मुख्य चिकित्साधिकारी के पास पहुंचने में पूरे सात माह लगे। अब इस पर अपेक्षित कार्यवाही कब होगी। यह कौन बताएगा। कोई नहीं। किसी के पास फिजूल बातों के लिए फुरसत नहीं है।

हमारी यही सजा होनी चाहिए। हमारा काम केवल प्रार्थनापत्र देना और इस या उस कार्य के लिए लाइन में खड़ा होना भर है। कितने प्रार्थनापत्र जिलाधिकारी के यहां पिछले दिनों में दिए गये। कितनों पर प्रभावी कार्यवाही हुई। तहसील दिवस, विभिन्न दरबारों में क्या हुआ। कुछ नहीं हुआ। निराश लोग लखनऊ में जनता दर्शन के लिए लगने वाली लाइन में लग गए। इस सबकी जरूरत क्या है। यदि सारे कार्य लखनऊ से होंगे। डा0 एम के दरबार से होंगे। तब फिर दर्जनों अधिकारियों, विभागों, सैकड़ों हजारों छोटे बड़े कर्मचारियों का क्या मतलब है।

इस सबके बीच पुलिस की महिमा सबसे न्यारी है। पुलिस मित्र है। मित्रता निभाना अच्छी तरह जानती है। जिस काम को न करने देने के लिए नियुक्त की जाती है। पैसा लेकर उसी काम को करने देने की खुली छूट दे देती है। है न मित्र पुलिस। दोस्ती हो तो ऐसी।

हमारा कहना है कि अपनी जिम्मेदारी को समझने की आदत डालो। पैसा बहुत कुछ है। लेकिन पैसा ही सब कुछ नहीं है। इस बात को जितनी जल्दी समझ जाओ उतना ही अच्छा है। अन्यथा कही तुम किसी की मजबूरी का फायदा उठाओगे। कहीं कोई तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठायेगा। पुलिस और प्रशासन का इकबाल राज्य करता है। अपना इकबाल बनाओ। लोभ, लालच, बेईमानी को छोड़ दो। निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम करो। फिर देखो कितना आनंद आता है।

विज्ञापन की बेचारगी और फंस गया मीडिया!

जिंदल उद्योग समूह और जी न्यूज का प्रकरण अदालत में है। इसलिए उस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं है। परन्तु इस प्रकरण ने मीडिया की ताकत और कमजोरी दोनो को एक साथ उजागर कर दिया है। मीडिया बहुत ताकतवर है। किसी की कहीं भी कभी भी ऐसी तैसी कर सकता है। करता है फिर अपनी ताकत पर प्रसन्न होता है। स्वतंत्र होने का दावा करता है। परन्तु विज्ञापन के लिए विज्ञापनदाताओं की गुलामी करने को सदैव तैयार रहता है। यह संक्रामक बीमारी कस्बों, नगरों, महानगरों से लेकर देश और प्रदेश तक में फैल गयी है। गांवों में विज्ञापन नहीं मिल सकता। मीडिया वहां नहीं जाता। पेड न्यूज प्रायोजित खबरों की बातें चुनाव आयोग तक के संज्ञान में हैं। विज्ञापन की बेचारगी ने मीडिया की गरिमा और मर्यादा को कमजोर किया है। मीडिया अब मिशन नहीं रही। रह भी नहीं सकती। व्यापार बन गयी है। लाखों करोड़ों नहीं अरबों, खरबों का निवेश है। व्यापार के अपने गुण दुर्गुण हैं। दुर्गुणों से बचना चाहिए। आप कितने भी ताकतवर हों। जिस क्षण आप किसी से कुछ मांगते हैं। भले ही वह विज्ञापन ही क्यों न हो। कमोवेश आप याचक की भूमिका में आ जाते हैं। आप कमजोर हो जाते हैं। वह चाहें हम हों, आप हों या मीडिया। कहा भी है-

अपनी अगराज किसी से कभी कहकर देखो,
फिर उसके बाद उसके बदलते हुए तेवर देखो।

और अंत में- कौन केजरीवाल – भुलक्कड़ विदेश मंत्री

ऐसी कमजोर याददाश्त लेकर विदेशों में देश के हितों की हिफाजत कैसे कर सकोगे। अरे वही केजरीवाल जिनके लिए लंदन से लौटकर आपको अपने आवास पर पत्रकार वार्ता में अपनी सफाई देनी पड़ी थी। वही केजरीवाल जिन्होंने आपको आपके उत्साही समर्थकों की तमाम कोशिशों के बाद भी आपके संसदीय क्षेत्र में जिला मुख्यालय पर लोहिया मैदान में अपनी बेहद कामयाब रैली की थी। वही केजरीवाल जिन्हें आपने गटर का कीड़ा और जाने क्या क्या कहकर अपमानित। सम्मानित किया था-
दुश्मनी जम के करो, मगर यह ख्याल रहे,
जब कभी फिर से मिलें शर्मिंदा न हों।

चलते चलते……………………….. लो कर लो बात

चुनाव न हों! तब फिर अपनी जमीन पर पुरखों की धरती पर आने की फुरसत कामयाब लोगों को कम ही मिलती है। पत्रकारिता और राजनीति में अनेक आयाम कायम करने वाले पूर्व सांसद संतोष भारती को कौन नहीं जानता। गणेशपुर, खिमशेपुर के सर्वोदयी भैरों सिंह भारती के इस छोटे ने बहुत कम उम्र में जिला छोड़ कानपुर, लखनऊ होते हुए दिल्ली की राह पकड़ी थी। जेपी आंदोलन, अमृत की शादी, वीपी सिंह का आंदोलन, सांसदी और जाने क्या क्या लंबी दास्तां है। वह व्यस्त होते चले गए। जिले में आना कम हो गया। सत्य के मनमोहन से आज सुबह सुना है कि संतोष आ रहे हैं। सुना है समर्थकों से मिलकर चुनावी संभावनाओं को तलाशेंगे। 1989 के ऐतिहासिक चुनाव में संतोष ने वर्तमान विधि मंत्री सलमान खुर्शीद को पटकनी दी थी। परन्तु उसके बाद दुबारा दल बदल करके भी नहीं जीते। सुरेश त्रिवेदी तब भी उनके हमराज, हम सफर और दोस्त थे। आज भी हैं। ऐसी दोस्ती बड़े भाग्य से मिलती है।

इस सादगी पे कौन न मिट जाए ए खुदा,
लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।

आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट