माघ मेले से विदाई की बेला में छलकीं कल्पवासियों की आँखें

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फर्रुखाबाद:(ब्यूरो) न कभी पहले मिले थे, न किसी प्रकार की जान पहचान। कोई रिश्तेदारी नहीं, किसी से खून का रिश्ता भी नहीं। फिर भी एक माह में मानवीय रिश्ता ऐसा बना कि एक दूसरे से बिछड़ते वक्त आंखें नम हो उठीं। बात हो रही है कल्पवास करने के लिए मेला क्षेत्र में आए लोगों की। माघी पूर्णिमा स्नान के बाद से तपस्थली छोड़ रहे कल्पवासियों को जितना अपनों से मिलने की खुशी थी, उतना ही यहां से जाने का गम भी सता रहा था।
नगर के पांचाल घाट पर मेंला रामनगरिया में गंगा की रेत पर एक महीने का कल्पवास चला| पूर्णिमा स्नान के साथ पुन: वे अपने घर लौटने की तैयारी में जुट गए। किसी का बेटा लेने आया था तो किसी का भाई और पौत्र। बच्चे तो तंबुओं से पूजा पाठ और रसोई के सामान व बिस्तर आदि निकालकर वाहन पर रखने में जुटे थे तो कल्पवासी एक-दूसरे का कुशलक्षेम ही पूछते नजर आए। शिविर उखड़ता देख उन्हें ऐसा लग रहा था मानों कोई अनमोल चीज उनसे अलग हो रही हो। जनपद हरदोई के हरपालपुर से आयीं बिट्टो देवी और उनके भाई कलक्टर का कहना था कि यहां आए दूसरे कल्पवासी हमारे लिए देवदूत के समान हैं जिनसे बिछड़ने पर आंतरिक पीड़ा हो रही है। अब हमें अगले साल यहां आने का इंतजार रहेगा।
नंबरों का किया आदान-प्रदान
कल्पवासियों ने मेला क्षेत्र से जाते समय एक-दूसरे के मोबाइल नंबरों लिए। भविष्य में एक दूसरे का हालचाल लेने की बात कही तो कुछ लोगों ने शादी-ब्याह में आने का न्यौता भी दिया।
सूना हो रहा मेला क्षेत्र
माघ मास पूरा होने और माघी पूर्णिमा का स्नान संपन्न होने के साथ ही मेला क्षेत्र सूना होने लगा था । संतों व कल्पवासियों के शिविर रात से ही उखड़ने लगे। जबकि कुछ लोग भोर में ही स्नान करके जाम से बचने के लिए अपने घर को रवाना हो गए।  कुछ सोमबार को स्नान करने के बाद अपना शिविर उखाड़ना शुरू किया।

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