भारत रत्‍‌न अटल के पैतृक गांव बटेश्वर में मना जश्न

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atal-bihariलखनऊ: वक्त के साथ यादें धूमिल होना लाजिमी है, मगर बटेश्वर की माटी में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बचपन की मीठी यादें, किशोरावस्था की कबड्डी, युवावस्था के स्वतंत्रता आदोलन और फिर प्रधानमंत्री बन शिखर पर बैठने तक की तस्वीर उभर आई है। जन्मदिन से एक दिन पहले उन्हें मिले भारत रत्‍‌न से उनका पैतृक गाव भी गदगद है। जश्न का माहौल है।

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वाजपेयी की जन्मस्थली बटेश्वर के लोगों को अब तक याद है कि उन्होंने युवावस्था में 16 अगस्त 1942 को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गाव के सैकड़ों लोगों के साथ आदोलन किया था। वन विभाग की जंगलात की कोठी को तोड़ डाला था, जिसमें उनके साथ दो दर्जन स्वतंत्रता सेनानी थे। गाव वाले नहीं भूले हैं कि 19 अप्रैल 1999 को उन्होंने बटेश्वर पहुंचकर आगरा-बटेश्वर रेल लाइन का तोहफा दिया था। अब कुछ ही दिनों में इस ट्रैक पर ट्रेन दौड़ने की उम्मीद है।

धूमधाम से मनाएंगे जन्मदिन

अटल बिहारी वाजपेयी के परिजन अश्वनी कुमार वाजपेयी ने बताया कि बटेश्वर में आज सीएचसी, टेलीफोन एक्सचेंज, टूरिस्ट होटल, रेल लाइन आदि सभी उनकी ही देन है। उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाएंगे। एक अन्य रिश्तेदार स्वदेश प्रकाश दीक्षित ने बताया कि अटलजी की अगुआई में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान तोड़ी गई जंगलात की कोठी को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।

जब गले मिले थे अटल

वाजेपयी के बचपन के मित्र नाथूराम वर्मा ने बताया कि बचपन में उनके साथ कबड्डी खेले हैं। सबसे पहले 1986 में वह गाव के बालकिशन शास्त्री, वीरेंद्र गुप्ता और शिवनरायन गोस्वामी के साथ वाजपेयी से मिलने दिल्ली गए थे। तब अटलजी ने उनको गले लगाया था। 1977 में जब वे पहली बार विदेश मंत्री बने, तब भी हम उनसे मिलने दिल्ली गए थे। मेरे मित्र को भारत रत्‍‌न मिल रहा है, इससे दिल में अपार खुशी है।

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