खबरीलाल: सियासी जंगल में आग- शेर बकरी एक घाट पर

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खबरीलाल रविवार को लौटने का वायदा करके चले गए। नतीजतन आज मैदान मुंशी हरदिल अजीज और मियां झान झरोखे के नाम था। मुंशी बोले मियां तुमने शेर बकरी का किस्सा सुना है। शेर की दहाड़ तथा बकरी की मिमियाहट कौन नहीं जानता। शेर हमेशा बकरी की ताक में रहता है। बकरी शेर की छाया से भी डरती है। परन्तु जंगल में जब आग लगती है। तब शेर बकरी थोड़ी देर के लिए ही सही अपनी लाग डांट और दुश्मनी भूलकर बचने के लिए एक ही ओर दौड़ते हैं। एक ही घाट पर अगल बगल खड़े होकर पानी पीते हैं।

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मुंशी की बात सुनकर मियां झान झरोखे बोले। मुंशी यह बात कौन नहीं जानता। इसमें नयी बात क्या है। मुंशी अपने स्वभाव के अनुसार हत्थे से उखड़ गए। बोले मियां कम से कम पूरी बात सुन लिया करो। तब कुछ कहा करो। मुंशी जरा नाराज न हो जायें। इसलिए मियां ने कानों पर हाथ रखकर क्षमा याचना की मुद्रा में कहा सारी मुंशी सारी। अब आप अपनी बात कहो। हम बीच में कुछ नहीं बोलेंगे।

मियां की इस अदाकारी पर मुंशी हंस दिए। बोले बात वह नहीं है जो तुम समझ रहे हो। भला हो अरविंद केजरीवाल का, पूर्व आईपीएस अधिकारी वाई पी सिंह का, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, सिविल सोसाइटी के तमाम महानुभावों का। इन लोगों ने अपने अपने ढंग से सियासी जंगल में ऐसी आग लगाई कि सियासी जंगल के शेर और बकरी (धुर विरोधी छोटी बड़ी पार्टियों के नेता और उनके कृपा अनुगृह प्राप्त लोग) एक ही घाट पर एकत्र हैं। एक ही स्वर में बोल रहे हैं। सारे के सारे अपने कथित गहरे सियासी मतभेदों को भूलकर अरविंद केजरीवाल को तरह तरह के विशेषणों से अलंकृत करने में लग गए हैं।

मुंशी बोले अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों सहयोगियों सलाहकारों की रणनीति गजब की है। इन लोगों ने जनलोक पाल बिल की अपरिहार्यता को रेखांकित करते हुए उसका विरोध करने के कारण सभी छोटे बड़े दलों का एक ही थैली के चट्टे बट्टे बना दिया। नतीजतन सभी को गुस्सा आ गया। सभी अपने आपसी मतभेद भूलकर अरविंद केजरीवाल पर राशन पानी लेकर दौड़ पड़े। कोई कहता अरविंद केजरीवाल झूठे आधारहीन आरोप लगा रहे हैं। उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। कोई कहता वह सुर्खियों में बने रहने के लिए इस प्रकार के सनसनीखेज बयान दे रह हैं। जिसका कोई सिर-पैर नहीं है। कोई कहता है अरविंद की कोई विश्वसनीयता नहीं है। उन्हें ऐसे ही बोलने दीजिए। उनकी बात का जनता में कोई असर नहीं है। बोलने दीजिए जबाव देने की भी कोई जरूरत नहीं है। कुछ दिनों बाद थक कर स्वयं शांत होकर बैठ जायेंगे। कहने का मतलब यह है कि प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया के जिस व्यक्ति ने भी किसी नेता से अरविंद केजरीवाल का नाम ले दिया। वह राशन पानी लेकर अरविंद के पीछे दौड़ पड़ा।

मुंशी बोले जैसे जैसे अरविंद केजरीवाल के खुलासों से सियासी जंगल की आग तेज होना शुरू हुई। छोटे बड़े प्रान्तीय राष्ट्रीय नेता और उनके चिल्लरों की जमात आपसी मतभेदों को भुलाकर ऊपर से नीचे तक एक जुट होकर अरविंद केजरीवाल के पीछे पड़ गई। कल तक यही नेता एक दूसरे पर घिनौने से घिनौने आरोप लगाने की प्रतियोगिता में लगे थे। जब केजरीवाल रावर्ट वाड्रा और सलमान खुर्शीद पर आरोप लगा रहे थे। तब भाजपा के नेता बड़े खुश थे। और अरविंद केजरीवाल का गुणगान करने में लगे हुए थे। कांग्रेसी भन्नाए हुए थे। परन्तु केजरीवाल ने जैसे ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी पर हमला किया। कांग्रेसियों ने राहत की सांस ली। लेकिन भाजपाइयों को सांप सूंघ गया। अब इन दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों के नेता एक साथ एक ही तरीके से केजरीवाल के आरोपों को नकार ही नहीं रहे हैं। उन्हें हताश, निराश, कुंठित व्यक्ति की बाजीगरी बता रहे हैं।

मुंशी की बात सुनकर मियां झान झरोखे बोले सच कहते हो मुंशी। भाजपा और कांग्रेस के नेता एक दूसरे पर जो आरोप लगाते हैं। माया और मुलायम तथा इन दोनो नेताओं के सहयोगी एक दूसरे पर जो आरोप लगाते हैं। विहार के नीतीश तथा गुजरात के मोदी एक दूसरे के लिए जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं। तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता एक दूसरे के लिए जो कुछ भी कहते हैं। दलित और पिछड़े नेता अगड़े और पिछड़े नेता अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक नेता, जातिवादी नेता, साम्प्रदायिकता फैलाने वाले नेता भ्रष्टाचार और कदाचार में डूबे नेता, शालीनता और शिष्टाचार में कथित रूप से फंसे नेता एक दूसरे के लिए आज कल क्या नहीं कह रहे हैं। इसमें से यदि दश प्रतिशत भी सही हो। तब फिर इनमें से अधिकांश की जगह जेल है।

मियां बोले मुंशी सही बात यह है कि हाय तोबा चाहें जितना भी क्यों न हो। परन्तु इनमें से बाल बांका आज तक किसी का नहीं हुआ। विहार के लालू पासवान एक तरफ और भाजपाई जदयू एक तरफ। वामपंथियों की शिव सैनिकों। उग्रवादियों नक्सलियों आदि की महिमा ही न्यारी है। इनके चाल चलन चरित्र को लेकर क्या कहा जाए। परन्तु इन सबको आज कल अरविन्द केजरीवाल और उनके कट्टर समर्थक ही सबसे बुरे दिखाई देते हैं। कोई भी इनकी आलोचना ही करेगा। या उन्हें राजनीति में उतरने और चुनाव लड़ने की विन मांगी सलाह देंगे।

मुंशी मियां की बात को बीच में ही काटते हुए बोले। दूर क्यों जाओ मियां। राजनैतिक पार्टियों की अपनी स्वयं की विश्वसनीयता कितनी है। इसका अंदाजा अपने फर्रुखाबाद से ही लगा लीजिए। यहां 2009 के लोक सभा चुनाव में कुल मतदाताओं का केवल 47 प्रतिशत वोट पड़ा। इसमें कांग्रेस भाजपा, सपा व सपा अन्य पार्टियों और निर्दलियों सभी वोट है। परन्तु 53 प्रतिशत मतदाताओं ने किसी भी पार्टी और नेता को भरोसे लायक नहीं समझा। अल्पमत के बाद भी सत्ता में पहुंच गए नेता यदि इतराने लगे अहंकार में डूब जायें। तब फिर नजारा आज जैसा ही होगा। ऐसी मस्ती के आलम में यदि अरविंद केजरीवाल जैसा संकल्प का धनी इन नेताओं की हकीकत का आइना दिखाने लगे। तब फिर नजारा वही होगा जो आज कल देश की राजधानी में तथा इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के सौजन्य से घर घर पहुंच रहा है। दिखाई दे रहा है।

मियां झान झरोखे बोले मुंशी यह खेल अभी लंबा चलेगा। रुकेगा नहीं। अरविन्द का खेल पूरे शबाब पर है। अब उसमें महाराष्ट्र के लवासा प्रोजेक्ट को लेकर महाराष्ट्र में शक्तिकेन्द्र समझे जाने वाले पवार परिवार को भी पूर्व आईपीएस अधिकारी वाई.पी. सिंह ने लपेट लिया है। कुछ और भी नए खिलाड़ी सियासी जंगल की आग को तेज करने के लिए आगे आयेंगे। सियासी जंगल की यह आग जैसे जैसे तेज होती जाएगी। शेर और बकरी की तरह एक दूसरे को पानी पी पी कर कोसने वाले नेता अपने आपसी मतभेद भुलाकर अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों को कोसने डांटने फटकारने की जुगलबंदी में मजबूती से एक साथ खड़े होते जायेंगे। गड़करी पवार का बचाव करेंगे। पवार कांग्रेस के राष्ट्रीय जीजा जी राबर्ट वाड्रा का बचाव करेंगे। मुलायम सिंह राजनैतिक चातुर्य का परिचय देते हुए सलमान खुर्शीद को मुसीबत में फंसा बताकर अरविंद केजरीवाल के थक कर चुप हो जाने की सलाह देंगे। सियासत के जंगल में बढ़ती जा रही यह आग आने वाले दिनों में वह तमाशे दिखाएगी कि बड़े से बड़े हुनर बाजों को दांतों तले उंगली दवानी पड़ेगी।

गांधी की उलट घिसो और जो धूल झड़े
उसके प्रलेप से अपनी कुंठा के मुख पर
ऐसी नक्कासी गढ़ो कि जो देखे बोले
आखिर गांधी भी और बात क्या कहते थे।

देश तो आजाद होते हो गया, किन्तु तूने क्या किया
घूस खोरी ढील यह सत्ता धता, भाई भतीजावाद
महज तेजी और बाजार काले
क्रोध से सब दूषणों की फेर माला
दूसरों को गालियों से पाट डाला
गालियां तुझको न कोई दे सके
इसके लिए बोल तूने क्या किया।

जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

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