ईदुल अजहा की कुर्बानी सिर्फ जानवर के गले पर ही नहीं, नफ्स की ख्वाहिशात पर भी छुरी चलाना है

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मजहबे इस्लाम के दो खास त्योहार हैं ईदुल फित्र और ईदुल अजहा। ईदुल अजहा जिसे बकरीद के नाम से भी जाता जाता है, बेहद खास दिन है। ईदुल अजहा पर हर मुस्लिम मालदार पर कुर्बानी करना वाजिब (आवश्यक) है। कुर्बानी करने की मंशा सिर्फ कुर्बानी के जानवर के गले पर छुरी चलाना नहीं है बल्कि अपने नफ्स (दिल) की ख्वाहिशात को दबाते हुए अल्लाह के हुक्म पर अमल करना है।

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इंसान की यह खासियत होती है कि वह जिसके साथ कुछ समय गुजारता है, उससे उसे लगाव पैदा हो जाता है। इसी तरह कुर्बानी के जानवर को भी घर में पालने-पोसने के बाद उससे लगाव होने के बावजूद उसे अल्लाह के हुक्म को पूरा करने के लिए कुर्बान कर दिया जाता है।

जिस तरह पैगंबर हजरत इब्राहिम (अ.) को अल्लाह का हुक्म हुआ था कि वह अपने इकलौते बेटे हजरत इस्माइल (अ.) को कुर्बान करे और वे दोनों इसके लिए तैयार हुए सिर्फ अल्लाह के फरमान (हुक्म) की वजह से। अल्लाह ने उनके जज्बे को कुबूल फरमाकर उनके बेटे की जगह दुंबे (भेड़) को भेज दिया। उनके तरीके पर अमल करते हुए ही कुर्बानी की जाती है।

यह जरूरी है कि हर वो शख्स जो कुर्बानी करता है, पूरे इख्लास (तन्मयता) के साथ कुर्बानी करे। इसमें दिखावा न हो ताकि अल्लाह हमारी नियत और जज्बे को कुबूल फरमाकर हमारी कुर्बानी को कुबूल फरमाए। जिलहज के इस महीने में हज भी अदा किया जाता है। यह इस्लामी साल का आखिरी महीना है तथा इसके बाद इस्लामी नववर्ष का पहला महीना मोहर्र शुरू होगा।

ईदुल अजहा की 27 अक्टूबर को होने वाली नमाज के लिए सभी मस्जिदों में तैयारियां पूरी कर ली गयी है। इसमें नगर पालिका परिषद में आवारा गंदे जानवरों के मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों व मस्जिदों के आसपास विचरण पर रोक लगाने की व्‍यवस्‍था की गयी है। ईदगाह में नमाज के समय एक-एक टैकर की व्यवस्था करने व जलापूर्ति सुनिश्चित करने की व्‍यवस्‍था की गयी है।

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