अन्ना का निहितार्थ्: साम्प्रदायिकता व जातिवाद के मुंह पर तमाचा

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फर्रुखाबाद: हाल में हुए अन्ना हजारे के आंदोलन का निहितार्थ भृष्टाचार के मुद्दे से काफी बड़ा है। अन्ना की जीत दर असल केवल भृष्टाचार के विरुद्ध उनकी विजय नहीं है। अन्ना ने जो एक इससे भी बड़ा काम किया है, वह है इस देश को जकड़ चुकी साम्प्रदायिक व जातिवादी राजनीति के मुंह पर जड़ा तमाचा।
देश में विगत लगभग 30 वर्षों से जनता को धर्म, जाति, क्षेत्र व भाषा के नाम पर बांटने की जो परिपाटी पनपी है उसपर अन्ना के आंदोलन ने एक बहुत करारी चोट की है। अन्ना के आंदोलन मे शामिल देश के सभी वर्गों, धर्मों, जातियों, क्षेत्रों के लोगों की सहभागिता ने राजनैतिक दलों को अवाक कर दिया है। सत्ता में बैठी कांग्रेस हो, देश के एक दर्जन राज्यों में शासन कर रही भाजपा हो या क्षेत्रीय दल। लोगों को उनकी वास्तविक समस्याओं व आवश्यकताओं से भटका कर तुच्छ सीमाओं में बांट कर अपनी तिजोरियां भरने वाले राजनीतिज्ञ व राजनैतिक पार्टियां सब के सब आवाक रह गये। सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से आया एक 74 वर्ष का बूढ़ा एक सार्वजनिक हित का मुद्दा लेकर खड़ा हुआ और दिल्ली में आकर अनशन पर बैठ गया। मात्र दस दिन के आंदोलन में करोड़ों लोग धर्म, जाति, क्षेत्र व भाषा की सीमायें तोड़ कर करोड़ों लोग उसके पीछे चल पड़े। सरकार से लेकर विपक्ष तक सब ने लाख हाथ पांव मारे व लुका छुपी का खेल खेला। खिसियाये नेता तो अन्ना को भृष्ट तक कहने से नहीं चूके। परंतु आखिर इन सबने घुटने टेके और माफी मांगी। अंत में प्रधानमंत्री को अन्ना के जनलोकपाल बिल को संसद में रखकर उस पर चर्चा करने की घोषणा करनी ही पड़ी। इसको अन्ना की आंशिक जीत कहा जा सकता है। आंशिक इस लिये कि, मै अभी भी जनलोकपाल बिल के कानून बन पाने के विषय में सशंकित हूं। क्योंकि मैं व्यक्तिगत स्तर पर मानता हूं कि कोई भी राजनैतिक पार्टी या सांसद मन से इस बिल को पारित करने के पक्ष में नहीं है। यह सब अंतिम समय तक इसमें रोड़ा अटकाने का प्रयास करते रहेंगे।

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जन लोकपाल बिल को कानून बनने में कुछ समय भले ही लग जाये, परंतु एक बड़ी सफलता अन्ना के आंदोलन को अवश्य मिली है। उन्होंने आगामी वर्षों में राजनीति की एक नयी दिशा तय कर दी है। अब राजनैतिक दल धर्म, जाति, क्षेत्र व भाषा के नाम पर बांट कर राजनीति नहीं कर पायेंगे। उनकों अब मुद्दों के आधार पर राजनीति करनी होगी। बहस अब मुद्दों पर होगी। जाहिर तौर पर इससे अपराधिक छवि के लोगों को भी चुनाव लड़ने में कठिनाई आयेगी।

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