अन्नागीरी की बिसात पर लखनऊ की गद्दी के लिये मुलायम की शह

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लोकपाल के मसले पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट आते ही सियासी दल अब इसी के रास्ते लखनऊ की ‘राजगद्दी’ पाने की कोशिश में जुट गए हैं। कल रविवार 11 दिसंबर को जंतर-मंतर पर सज रहे अन्ना हजारे के मंच पर समाजवादी पार्टी जहां शिरकत कर सूबे की सियासत को सिरे चढ़ाएगी। उधर, बसपा सूत्रों की मानें तो माया सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का मसला उठाने के चलते पार्टी उनके मंच से दूर ही रहेगी। बसपा ने संकेत दिए हैं कि वह प्रदेश में अन्नागीरी का विरोध करेगी और पार्टी के खिलाफ टीम अन्ना के रुख का मुकाबला करेगी।

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टीम अन्ना के साथ संयुक्त मसौदा समिति के जरिए लोकपाल विधेयक के मसौदे की कसरत का विरोध करने वाली सपा अब अन्ना की मुहिम के समर्थन में जुट गई है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की लोकप्रियता के चलते अब पार्टी की सफाई है कि जब अन्ना संसदीय प्रणाली का विरोध कर रहे थे तब हम उनके साथ नहीं थे।

पार्टी के अनुसार, अन्ना अब संसद के सर्वोपरि होने की बात कर रहे हैं, इसलिए हम उनका समर्थन कर रहे है। लोकपाल बिल पर संसदीय स्थायी समिति के मसौदे को सपा ने आधा-अधूरा दस्तावेज बताया। पार्टी महासचिव और सांसद मोहन सिंह ने कहा कि जिन चार बिंदुओं पर केंद्र सरकार ने सर्वसम्मति बनाकर संसद में वायदा किया था, उन पर ढुलमुल रवैया अपनाया जा रहा है। सरकार इस मसले पर गतिरोध पैदा कर रही है। प्रधानमंत्री से लेकर ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने के मसले पर सपा टीम अन्ना की मांग का समर्थन कर रही है।

उधर, बसपा टीम अन्ना की मुहिम से खुद को अलग रखना चाहती है। पार्टी ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने के मसले पर सीधे समर्थन से परहेज करते हुए इस मुद्दे को संसद की सर्वसम्मति पर छोड़ने की बात कही है। दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं को शामिल करने की मांग दोनों दलों ने की है।

 

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