सर सैयद अहमद ख़ाँ पुण्य दिवस : ‘हिन्दू और मुसलमान भारत की दो आँखें हैं’

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(जन्म-17 अक्टूबर 1817, दिल्ली; मृत्यु – 27 मार्च 1898, अलीगढ़)

सर सैयद अहमद ख़ाँ मुस्लिम शिक्षक, विधिवेत्ता और लेखक, ऐंग्लो-मोहमडन ओरिएंटल कॉलेज अलीगढ़, उत्तर प्रदेश, के संस्थापक थे। सर सैयद अहमद ख़ाँ ऐसे महान मुस्लिम समाज सुधारक और भविष्यदृष्टा थे, जिन्होंने शिक्षा के लिए जीवन भर प्रयास किया। सर सैयद अहमद ख़ाँ ने लोगों को पारंपरिक शिक्षा के स्थान पर आधुनिक ज्ञान हासिल करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि वह जानते थे कि आधुनिक शिक्षा के बिना प्रगति संभव नहीं है।[1] सर सैयद अहमद ख़ाँ मुसलमानों और हिन्दुओं के विरोधात्मक स्वर को चुप-चाप सहन करते रहे। इसी सहनशीलता का परिणाम है कि आज सर सैयद अहमद ख़ाँ को एक युग पुरुष के रूप में याद किया जाता है और हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही उनका आदर करते हैं। सर सैयद अहमद ख़ाँ ने सदा ही यह बात अपने भाषणों में कही थी कि, ‘हिन्दू और मुसलमान भारत की दो आँखें हैं’।

परिवार

सैयद अहमद ख़ाँ का जन्म 27 अक्टूबर, 1817 में दिल्ली के सादात (सय्यद) ख़ानदान में हुआ था। सैयद अहमद ख़ाँ ने सर्वोच्च ओहदे पर होने के बावज़ूद अपनी सारी ज़िन्दगी तंगदस्ती के साथ गुज़ारी। सर सैयद का परिवार प्रगतिशील होने के बावज़ूद पतनशील मुग़ल सल्तनत द्वारा बहुत सम्मानित था। उनके पिता, जिन्हें मुग़ल प्रशासन से भत्ता मिलता था, उन्होंने धर्म से लगभग संन्यास ले लिया था उनके नाना ने तत्कालीन मुग़ल बादशाह के प्रधानमंत्री के रूप में दो बार काम किया और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन भी महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे। सर सैयद को बचपन से ही पढ़ने लिखने का शौक़ था और उन पर पिता की तुलना में माँ का विशेष प्रभाव था। माँ के कुशल पालन पोषण और उनसे मिले संस्कारों का असर सर सैयद के बाद के दिनों में स्पष्ट दिखा, जब वह सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में आए।[1] सैयद के भाई ने दिल्ली के सबसे पहले छापेख़ानों में से एक की स्थापना की थी और उत्तरी भारत के मुसलमानों की प्रमुख भाषा उर्दू के पहले समाचार पत्रों में से एक का प्रकाशन शुरू किया था।

जीवन परिचय

22 वर्ष की अवस्था में पिता की मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और थोड़ी सी शिक्षा के बाद ही सैयद को आजीविका कमाने में लगना पड़ा। सर सैयद अहमद ख़ाँ ने 1830 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क के रूप में काम शुरू किया, किंतु वह हाथ-पर-हाथ धर कर बैठने वालों में से नहीं थे। उन्होंने मेहनत की और तीन वर्ष बाद 1841 ई. में मैनपुरी में उप-न्यायाधीश की योग्यता हासिल की और विभिन्न स्थानों पर न्यायिक विभाग में काम किया। सैयद अहमद को न्यायिक विभाग में कार्य करने की वजह से कई क्षेत्रों में सक्रिय होने का समय मिल सका। स्पष्ट है कि यह नौकरी अंग्रेज़ी सरकार की कृपा का परिणाम नहीं थी।

उपाधि से सम्मानित

  • सर सैयद को 1888 में सर की उपाधि[2] प्रदान की गई।
  • सर सैयद की विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर एडिनबरा विश्वविद्यालय ने उन्हें 1889 ई.में एल-एल.डी. की उपाधि से सम्मानित किया था।

रचनाएँ

Blockquote-open.gif हम बीज बो रहे हैं वह एक घने वृक्ष के रूप में फैलेगा और उसकी शाखें देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैल जायेंगी। यह कॉलेज विश्वविद्यालय का स्वरूप धारण करेगा और इसके छात्र सहिष्णुता, आपसी प्रेम व सद्भाव और ज्ञान के सन्देश को जन-जन तक पहुँचायेंगे। – सर सैयद अहमद ख़ाँ Blockquote-close.gif

सर सैयद ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर काफ़ी लिखा। 19वीं शताब्दी के अंत में भारतीय इस्लाम के पुनर्जागरण की प्रमुख प्रेरक शक्ति हुई। उन्होंने उर्दू कृतियों में मुहम्मद के जीवन पर लेख (1870) और बाइबिल तथा क़ुरान पर टीकाएँ सम्मिलित हैं।

  • 23 वर्ष की आयु में धार्मिक पुस्तिकाएँ लिखकर, सर सैयद ने अपने उर्दू लेखन की शुरुआत की। उन्होंने 1847 में एक उल्लेखनीय पुस्तक अतहर असनादीद (महान लोगों के स्मारक) प्रकाशित की, जो दिल्ली के पुराविशेषों पर आधारित थी। उनकी पुस्तिका भारतीय विद्रोह के कारण[3] इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी।
  • उन्होंने 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज़ों का साथ दिया। परंतु अपनी पुस्तिका में उन्होंने कुशलता व निर्भीकता से ब्रिटिश प्रशासन की उन कमज़ोरियों और ग़लतियों को उजागर किया। जिनके कारण असंतोष और देशव्यापी विरोध पनपा था। इस पुस्तिका को अंग्रेज़ अधिकारियों ने बारीकी से पढ़ा और ब्रिटिश नीति पर इसका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा।
  • धैर्य और सहनशीलता की मूर्ति सर सैयद अहमद ख़ाँ ने अपनी गंभीर सूझ-बूझ के आधार पर ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना, जनक्रांति के कारणों पर 1859 ई. में ‘असबाबे-बगावते-हिंद’ शीर्षक एक महत्त्वपूर्ण पुस्तिका लिखी और उसका अंग्रेज़ी अनुवाद ब्रिटिश पार्लियामेंट को भेज दिया। सर सैयद के मित्र राय शंकर दास ने जो उन दिनों मुरादाबाद में मुंसिफ थे सर सैयद को समझाया भी कि वे पुस्तकों को जला दें और अपनी जान खतरे में न डालें। किंतु सर सैयद ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उनका यह कार्य देशवासियों और सरकार की भी भलाई के लिए आवश्यक है। इसके लिए जान-माल का नुक़सान उठाने का खौफ़ उनके मार्ग में अवरोधक नहीं बन सका। क्रांति के जोखिम भरे विषय पर कुछ लिखने वाले सर सैयद प्रथम भारतीय हैं।
  • दिल्ली के निवासकाल में ‘आसारुस्सनादीद’ शीर्षक पुस्तक लिखकर सर सैयद ने दिल्ली की 232 इमारतों का शोधपरक ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत किया और इस पुस्तक के आधार पर उन्हें रायल एशियाटिक सोसाइटी लन्दन का फेलो नियुक्त किया गया। गार्सां-द-तासी ने इसका फ़्रांसीसी भाषा में अनुवाद किया जो 1861 ई. में प्रकाशित हुआ।[4]
  • धर्म में उनकी सक्रिय रूचि थी, जो जीवनपर्यंत रही। उन्होंने बाइबिल की सहृदय व्याख्या से शुरुआत की और पैग़ंबर मुहम्मद पर पुस्तक लिखी, जिसका उनके पुत्र ने एस्सेज़ ऑन द लाइफ़ ऑफ़ मुहम्मद शीर्षक से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। उन्होंने क़ुरान पर आधुनिक व्याख्या के कई खंड लिखने के लिए भी समय निकाला। अपनी इन कृतियों में उन्होंने इस्लामी मत का समकालीन वैज्ञानिक तथा राजनीतिक प्रगतिशील विचारों से सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।

सर सैयद अहमद ख़ाँ
Sir Syed Ahmed Khan

महाक्रान्ति

जब सर सैयद 40 वर्ष के हुए तो उस वक़्त हिन्दुस्तान एक नया मोड़ ले रहा था। 1857 की महाक्रान्ति और उसकी असफलता के दुष्परिणाम उन्होंने अपनी आँखों से देखे। उनका घर तबाह हो गया, निकट सम्बन्धियों का क़त्ल हुआ, उनकी माँ जान बचाकर एक सप्ताह तक घोड़े के अस्तबल में छुपी रहीं।[4] सर सय्यद की दूरदृष्टि इसकी गवाही दे रही थी कि सन् 1857 की जंग मुसलमानों की आर्थिक तंगी पैग़ाम दे रही है। जिसके इतिहास से आज हम सब वाकिफ़ हैं। इस जंग की अंग्रेज़ों की क़ामयाबी और हिन्दुस्तानियों की नाकामी साबित हुई और दिल्ली के आख़िरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अपमानित करके रंगून भेजा गया और उनका ख़ानदान अंग्रेज़ों की हाथों ख़त्म कर दिया गया और दौलत व जायदाद, सम्पत्ति जब्त कर ली गयी।

राष्ट्रभक्ति

1857 के अत्याचार हिन्दुस्तान पर अंग्रेज़ों ने जारी रखा। संवेदनशील व्यक्तियों और ऐसे लोग विशेषत: सर सय्यद मुसलमानों की इस बर्बादी को देखकर तड़प उठे और उनके दिलो-दिमाग़ में राष्ट्रभक्ति की लहर करवटें लेने लगीं। इस बेचैनी से सर सय्यद ने परेशान होकर हिन्दुस्तान छोड़ने और मिस्र में बसने का फ़ैसला ले लिया। अंग्रेज़ों ने सर सय्यद जैसे इन्सान को अपनी ओर करने के लिए मीर सादिक़ और मीर रुस्तम अली का बहुत बड़ा इलाक़ा बग़ावत के जुर्म में सर सय्यद अहमद खाँ को ताल्लुका जहानाबाद जो कि उस वक़्त एक लाख रुपये से ज़्यादा था, देने की लालच दी और यह ऐसा मौक़ा था कि सर सय्यद इनके जाल में फँस सकते थे। वे धनाढ्य की ज़िन्दगी बसर कर सकते थे। लेकिन वह बहुत ही बुद्धिमान और समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने सोचा कि मैं दोराहे पर खड़ा हूँ और सर सय्यद ने उस वक़्त लालच को बुरी बला समझकर ठुकरा दी और राष्ट्रभक्ति के ख़ूबसूरत हार को अपने गले में पहनना बेहतर समझा, क्योंकि उस वक़्त उनके दिल में अंग्रेज़ों की ओर से नफ़रत के शौले भड़क रहे थे और राष्ट्रभक्ति के लिए उनका दिल तड़प रहा था।

अपनी क़ौम की हिफ़ाज़त

सर सय्यद ने यह महसूस किया कि अगर हिन्दुस्तान के मुसलमानों को इस कोठरी से नहीं निकाला गया तो एक दिन हमारी क़ौम तबाह और बर्बाद हो जाएगी और वह कभी भी उठ न सकेगी। इसलिए उन्होंने मिस्र जाने का इरादा बदल दिया और कल्याण व अस्तित्व के चिराग़ को लेकर अपनी क़ौम और मुल्क़ की तरफ़ बढ़ने लगे और अपने एक चिराग़ से सैंकड़ों चिराग़ रोशन किए। उन्होंने 28 दिसम्बर 1889 को एजूकेशन कांफ्रेंस में एक भाषण दिया था, जिसमें भावनाओं को जिन शब्दों में ज़ाहिर किया था, वह इस प्रकार है-

“जो हाल इस समय क़ौम का था मुझसे देखा नहीं जाता था। कुछ दिनों तक मैं इस ग़म में डूबा रहा। आप विश्वास कीजिए इस ग़म ने मुझे निढाल कर दिया और मेरे बाल सफ़ेद कर दिए। जब मैं मुरादाबाद आया जो दु:खों का एक घर था और हमारी क़ौम के धनाढ्यों की बर्बादी का था। इस दु:ख में कुछ और बढ़ोत्तरी हुई लेकिन इस उस वक़्त ये विचार आया कि बहुत ही संवेदनहीनता की बात है कि अपनी क़ौम और देश को इस तबाही की स्थिति में छोड़कर मैं स्वयं किसी आराम वाली जगह में जा बैठूँ।”

उपरोक्त भाषण की रोशनी में यह कहना ग़लत न होगा कि उनके दिल में राष्ट्र के लिए जो दिया रोशन हुआ वह सिर्फ़ अंग्रेज़ों के अत्याचारों से हुआ था। यह सच है कि उन्होंने ग़ैर फ़ौजी अंग्रेज़ों को अपने घर में पनाह दी, लेकिन उनके समर्थक बिल्कुल न थे, बल्कि वह इस्लामी शिक्षा व संस्कृति के चाहने वाले थे। इसलिए उन्होंने उनको पनाह दी थी। और जिसको पनाह दी जाती है, उसकी इज्जत करना इन्सानी फ़र्ज़ है। सर सय्यद इस्लामी शिक्षा व संस्कृति को मुल्क़ पर खोल देना चाहते थे। अगर यह शिक्षा और संस्कृति हमारी क़ौम में पैदा हो जाए तो एक दिन ज़रूर क़ामयाब हो सकती है। लेकिन संवेदनहीन और जाहिल मुसलमानों ने कुछ मौलिवियों से फ़तवे लेकर उन्हें काफ़िर क़रार दिया। मगर सर सय्यद ने किसी की परवाह नहीं की और जो सोचा वही किया। किसी ने कितनी अच्छी बात कही है-

वो भला किसकी बात माने हैं भाई सय्यद तो कुछ दीवाने हैं।

सर सय्यद की दूरदृष्टि

सर सय्यद की दूरदृष्टि अंग्रेज़ों के षड़यंत्र से अच्छी तरह से वाक़िफ़ थी। उन्हें मालूम था कि अंग्रेज़ी हुकूमत हिन्दुस्तान पर स्थापित हो चुकी है और सर सय्यद ने उन्हें हराने के लिए शैक्षिक मैदान को बेहतर समझा। इसलिए अपने बेहतरीन लेखों के माध्यम से क़ौम में शिक्षा व संस्कृति की भावना जगाने की कोशिश की ताकि शैक्षिक मैदान में कोई हमारी क़ौम पर हावी न हो सके। मुसलमान उन्हें कुफ्र का फ़तवा देते रहे बावज़ूद इसके क़ौम के दुश्मन बनकर या बिगड़कर न मिले बल्कि नरमी से उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे। अच्छी तरह से जानते थे कि यह क़ौम जाहिल है, इसलिए उनकी बातों की परवाह किये बिना अपनी मन्ज़िल पर पहुँचने के लिए कोशिश करते रहे। आज मुस्लिम क़ौम ये बात स्वीकार करती है कि सर सय्यद अहमद खाँ ने क़ौम के लिए क्या कुछ नहीं किया।

संस्थाओं की स्थापना

सैयद के जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार उसके व्यापकतम अर्थों में करना था। मुस्लिम समाज के सुधार के लिए प्रयासरत सर सैयद ने (1858) में मुरादाबाद में आधुनिक मदरसे की स्थापना की।[1] यह उन शुरुआती धार्मिक स्कूलों में था जहाँ वैज्ञानिक शिक्षा दी जाती थी। उन्होंने 1863 में गाजीपुर में भी एक आधुनिक स्कूल की स्थापना की। उनका एक अन्य महत्तवाकांक्षी कार्य था- ‘साइंटिफ़िक सोसाइटी’ की स्थापना, जिसने कई शैक्षिक पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित किया उर्दू तथा अंग्रेज़ी में द्विभाषी पत्रिका निकाली।

ये संस्थाएँ सभी नागरिकों के लिए थीं और हिन्दू तथा मुस्लिम मिलकर इनका संचालन करते थे। 1860 के दशक के अंतिम वर्षों का घटनाक्रम उनकी गतिविधियों का रुख़ बदलने वाला सिद्ध हुआ। उन्हें 1867 में हिन्दुओं की धार्मिक आस्थाओं के केंद्र, गंगा तट पर स्थित बनारस (वर्तमान वाराणसी) में स्थानांतरिक कर दिया गया। लगभग इसी दौरान मुसलमानों द्वारा पोषित भाषा, उर्दू के स्थान पर हिन्दी को लाने का आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन तथा साइंटिफ़िक सोसाइटी के प्रकाशनों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी लाने के प्रयासों से सैयद को विश्वास हो गया कि हिन्दुओं और मुसलमानों के रास्तों को अलग होना ही है। इसलीए उन्होंने इंग्लैंड की अपनी यात्रा (186970) के दौरान ‘मुस्लिम केंब्रिज’ जैसी महान शिक्षा संस्थाओं की योजना तैयार कीं। उन्होंने भारत लौटने पर इस उद्देश्य के लिए एक समिति बनाई और मुसलमानों के उत्थान और सुधार के लिए प्रभावशाली पत्रिका तहदीब-अल-अख़लाक (सामाजिक सुधार) का प्रकाशन प्रारंभ किया।

सैयद ने 1886 में ऑल इंडिया मुहमडन ऐजुकेशनल कॉन्फ़्रेंस का गठन किया, जिसके वार्षिक सम्मेलन मुसलमानों में शिक्षा को बढ़ावा देने तथा उन्हें एक साझा मंच उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया जाते थे। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना होने तक यह भारतीय इस्लाम का प्रमुख राष्ट्रीय केंद्र था।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

सैयद जी का शिक्षा-संस्था खोलने का विचार हुआ तो सैयद जी ने अपनी सारी जमा-पूँजी यहाँ तक कि मकान भी गिरवी रख कर यूरोपीय शिक्षा-पद्धति का ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से इंगलिस्तान की यात्रा की। लौटकर आए तो कुछ वर्षों के भीतर ही मई 1875 में अलीगढ़ में ‘मदरसतुलउलूम’ एक मुस्लिम स्कूल स्थापित किया गया और 1876 में सेवानिवृत्ति के बाद सैयद ने इसे कॉलेज में बदलने की बुनियाद रखी। सैयद की परियोजनाओं के प्रति रूढ़िवादी विरोध के बावज़ूद कॉलेज ने तेज़ी से प्रगति की और 1920 में इसे विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।[4]

Blockquote-open.gif सर सय्यद का फ़ैसला कि तमाम कोशिशें मुसलमानों को नये दौर की तालीम देने पर पूरी ताक़त लगा दी ये बिल्कुल सही था। बिना इस तालीम के मेरा ख़्याल है कि मुसलमान नये तरह की राष्ट्रीयता में कोई हिस्सा नहीं ले सकते। बल्कि वे हमेशा के लिए हिन्दुओं के ग़ुलाम बन जाएँगे। जा तालीम में आगे थे और आर्थिक दृष्टिकोण से भी मज़बूत थे।- पं. जवाहर लाल नेहरू Blockquote-close.gif

सर सैयद अहमद ख़ाँ का उद्देश्य

भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के पुर्नजागरण के प्रतीक सर सैयद अहमद ख़ाँ का उद्देश्य मात्र अलीगढ़ में एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना ही नहीं था बल्कि उनकी हार्दिक कामना थी कि अलीगढ़ में उनके द्वारा स्थापित कॉलेज का प्रारूप एक ऐसे केन्द्र का हो जिसके अधीन देश भर की मुस्लिम शिक्षा संस्थायें उसके निर्देशन में आगे बढ़ें ताकि देश भर के मुसलमान आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकें। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अधीन स्थापित होने वाले नये केन्द्रों के गठन से सर सैयद अहमद ख़ाँ का सपना साकार होने जा रहा है।

एम. ए. यू. कॉलेज के आधारशिला समारोह में 8 जनवरी, 1877 को लॉर्ड लिटन के सम्मुख सर सैयद ने कहा था कि आज जो “हम बीज बो रहे हैं वह एक घने वृक्ष के रूप में फैलेगा और उसकी शाखें देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैल जायेंगी। यह कॉलेज विश्वविद्यालय का स्वरूप धारण करेगा और इसके छात्र सहिष्णुता, आपसी प्रेम व सद्भाव और ज्ञान के सन्देश को जन-जन तक पहुँचायेंगे।” आज इस संस्था के छात्र 92 देशों में फैले हुए हैं और देश का यह मात्र पहला ऐसा संस्थान है जिसके छात्र पूरी दुनियाँ में अपने संस्थापक सर सैयद का जन्म दिवस मनाते हैं। सर सैयद भारतीय मुसलमानों के ऐसे पहले समाज सुधारक थे जिन्होंने अज्ञानता की काली चादर की धज्जियाँ उड़ाकर मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना जागृत की।[5]

कॉलेज में अनेक भाषाओं में शिक्षा

सर सैयद के ‘एम. ए. यू. कॉलेज’ के द्वार सभी धर्मावलम्बियों के लिए खुले हुए थे। पहले दिन से ही अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत भाषा कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गई। स्कूल के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन को भी अपेक्षित समझा गया और इसके लिए पं. केदारनाथ अध्यापक नियुक्त हुए। सकूल तथा कॉलेज दोनों ही स्तरों पर हिन्दू अध्यापकों की नियुक्ति में कोई संकोच नहीं किया गया। कॉलेज के गणित के प्रोफेसर जादव चन्द्र चक्रवर्ती को अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई। एक लंबे समय तक चक्रवर्ती गणित के अध्ययन के बिना गणित का ज्ञान अधूरा समझा जाता था।[4]

राजनीति

सैयद मुसलमानों को सक्रिय राजनीति के बजाय शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देते थे। बाद में जब कुछ मुसलमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित हुए, तो सैयद ने इस संगठन और इसके उद्देश्य का जमकर विरोध किया, जिनमें भारत में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना भी एक उद्देश्य था। उन्होंने दलील दी कि सांप्रदायिक तौर पर विभाजित और कुछ वर्गों के लिए सीमित शिक्षा तथा राजनीतिक संगठन वाले देश में संसदीय लोकतंत्र से केवल असमानता ही बढ़ेगी। मुसलमानों ने आमतौर पर उनकी राय मानी और कई सालों बाद अपना राजनीतिक संगठन बनाने तक वह राजनीति से दूर रहे।

उन्होंने यह भगीरथ प्रयास किया कि मुसलमान व ब्रिटिश सबसे अच्छे मित्र हैं। मुस्लिम राजनीति में सर सैयद की परंपरा मुस्लिम लीग (1906 में स्थापित) के रूप में उभरी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में स्थापित) के विरूध्द उनका प्रोपेगंडा था कि कांग्रेस हिन्दू आधिपत्य पार्टी है और प्रोपेगंडा आज़ाद-पूर्व भारत के मुस्लिमों में जीवित रहा। कुछ अपवादों को छोड़कर वे कांग्रेस से दूर रहे और यहाँ तक कि वे आज़ादी की लड़ाई से भी हिस्सा नहीं लिया। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ब्रिटिश-भारत के मुस्लिम बहुल राज्यों मसलन-बंगाल, पंजाब में लगभग सभी स्वतंत्रता सेनानी हिन्दू या सिख थे।[6]

सामूहिक सुधार के लिए

सर सैयद अहमद ख़ाँ की क़ब्र, अलीगढ़
Tomb Of Sir Syed Ahmed Khan, Aligarh

मुसलमानों के सामूहिक सुधार के लिए वे इंग्लैण्ड गये और वहाँ विश्वविद्यालयों में जाकर शिक्षा व संस्कृति का गहन अध्ययन किया। अंग्रेज़ी मैगज़ीन जो सुधार के लिए ‘टैटलर इस्पैक्टर’ और ‘गार्जियन’ निकाले जाते थे, उनकी फ़ाइलों को देखकर बहुत ही प्रभावित हुए। वहीं से सर सय्यद को अपनी क़ौम को जागरुक करने के लिए एक माध्यम मिल गया। जिसकी तलाश में वे सदा ही भटकते रहे थे। जब वे यूरोप से वापस हुए तो उन्होंने 24 दिसम्बर, 1870 को ‘तहजीबुल अख़्लाक़’ के नाम से मैगज़ीन जारी किया, जिसमें मुसलमानों के कल्याण से सम्बन्धित लेख छापे जाते थे। इस मैगज़ीन को जारी करने का उद्देश्य सिर्फ़ यही था कि जिस प्रकार यूरोप के लोग संस्कृति और शिक्षा में आगे बढ़ रहे हैं और विकास कर रहे हैं, उसी तरह से हमारी क़ौम में यही बातें आ जाएँ तो दूसरे धर्मों के नौजवानों के साथ एकजुट होकर अंग्रेज़ों से स्वयं मुक़ाबला कर सकते हैं और ये किसी के दास बनकर रहना पसन्द नहीं करेंगे। ये बात सर सय्यद के दिमाग़ में उलझन बनकर रह गयी थी, लेकिन वह इन तमाम बातों से नहीं घबराये, बल्कि अपनी कोशिशों में व्यस्त रहे और इशारों में ही लोगों को समझाते रहे। वो अच्छी तरह से जानते थे कि ये सारी बातें खुलकर कह दी गयीं तो अंग्रेज़ भी फाँसी के तख़्ते लटकाने से नहीं चूकेंगे। जिस तरह से मौलाना मौ. हुसैन आज़ाद के वालिद मौलवी बाकर हुसैन को थोड़ी ही देर में जल्लाद के हवाले कर दिया गया था। इस सिलसिले में पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि-

“सर सय्यद का फ़ैसला कि तमाम कोशिशें मुसलमानों को नये दौर की तालीम देने पर पूरी ताक़त लगा दी ये बिल्कुल सही था। बिना इस तालीम के मेरा ख़्याल है कि मुसलमान नये तरह की राष्ट्रीयता में कोई हिस्सा नहीं ले सकते। बल्कि वे हमेशा के लिए हिन्दुओं के ग़ुलाम बन जाएँगे। जा तालीम में आगे थे और आर्थिक दृष्टिकोण से भी मज़बूत थे।”

सर सय्यद ने क़ौम की ख़िदमत के साथ-साथ मातृभाषा (उर्दू) का दामन कभी नहीं छोड़ा। उन्हें पूरा विश्वास था कि जो सभ्यता उर्दू भाषा में पायी जाती है, वह किसी अन्य भाषा में नहीं है। लिहाज़ा इस भाषा को संवारने के उद्देश्य से उर्दू मैगज़ीन छापने का फ़ैसला किया, जिससे उर्दू भाषा को बढ़ावा मिला।

सेवा से अवकाशप्राप्त

सेवा से अवकाशप्राप्त करने के बाद वह पूरी तरह से स्कूल के विकास और धार्मिक सुधार में लग गए। हालांकि इस दौरान उन्हें धार्मिक नेताओं के ज़ोरदार विरोध का सामना करना पड़ा। पर सर सैयद ने घुटने नहीं टेके और अपने काम में लगातार लगे रहे। इस दौरान उन्हें ब्रिटिश राज का समर्थन मिला। उनके कई विचारों को लेकर विवाद भी हुआ जिनमें 1857 उर्दू का महत्त्व आदि है। उन्होंने उर्दू को लोकप्रिय बनाने और आम मुस्लिमों की भाषा बनाने के लिए काफ़ी प्रयास किया। उनकी देख-रेख में पश्चिमी कृतियों का उर्दू में अनुवाद कराया गया। उनके द्वारा स्थापित स्कूलों में शिक्षा का माध्यम उर्दू को बनाया गया।[1] सर सैयद ने सामाजिक सरोकारों के लिए भी काम किया और 1860 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में अकाल पीडि़तों को राहत पहुँचाने के लिए सक्रिय रूप से योगदान किया।

मृत्यु

इस महान शिक्षाविद् और समाज सुधारक व्यक्तित्व की जीवनलीला 27 मार्च 1898 को समाप्त ज़रूर हो गई किंतु उसका प्रकाश आज भी करोड़ों भारतवासियों को रोशनी प्रदान कर रहा है।[4]