भ्रातृ द्वितीया: भाई-बहन का पर्व

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दिवाली के बाद द्वितीया तिथि को भ्रातृ द्वितीया भाई-बहन का पर्व माना जाता है। उस दिन भाई बहन के यहां जाकर बहन के हाथ का भोजन करना श्रेयस्कर मानते हैं। सूर्य का पुत्र यमराज और पुत्री यमुना दोनों भाई-बहन हैं।
किंवदंती है कि यमुना की प्रार्थना पर ही यमराज ने यमुना से कहा-आज के दिन जो भाई अपनी बहन के यहां भोजन करेगा, उसे यमराज का भय नहीं रहेगा। इसीलिए यह भैया दूज पर्व के नाम से जाना जाता है। विशेष ध्यान देने की बात है कि आज हम सब इस भौतिक चकाचौंध से प्रभावित हो अंधे होकर लक्ष्मी के पीछे दौ़ड रहे हैं। किंतु आज इसका खुला दुरूपयोग हो रहा है। आज धनार्द्धमं तत: सुखम् यह आप्त वाक्य न रहकर विद्या विवादाय धनं मदाय: शक्ति परेषाम पर पीडनाय: का राज्य है। साथ ही यौवनं धनसम्पत्ति प्रभूत्वमविवेकता: का खुला तांडव नृत्य देखने में आ रहा है। ऎसा क्यों!
यह एक अति विचारणीय विषय है। इसका प्रमुख कारण देखा-देखी की हो़ड और विचार शक्ति की कमी है। यदि इस हो़ड की तरफ से ध्यान हटाकर शांतचित्त से विचार करें तो स्वत: ह्वदय में जागृति पैदा होगी कि विद्या विवाद के लिए नहीं, ज्ञान के लिए, धन संचय के लिए नहीं, दान के लिए है और शक्ति पर पी़डा के लिए नहीं, रक्षण के लिए होनी चाहिए। धन की तीन गतियां होती हैं- दान, भोग और नाश। प्रथम दान अपनी शक्ति के अनुसार गरीब, दीन-दु:खी, ब्रा±मण, धर्म-स्थान व यज्ञादि कायोंü में सहयोग देना और अतिथि सेवा आदि दान है।
दूसरा स्थान भोग का है। अपनी शक्ति के अनुसार उचित खानपान, रहन-सहन, व्यावहारिक कार्य, कुटुम्बों का परिपालन, प़डोसियों की देखभाल आदि भोगजन्य कार्य हैं। यदि इन दोनों मागोंü में समुचित व्यय नहीं किया गया तो अंतिम गति नाश की है। नाश की गतियाँ भी अनेक हैं। जुआ, वैश्यावृत्ति, चोरी, डकैती व अग्नि, उपद्रव आदि के द्वारा धन का नाश होता है। अत: कहने का अभिप्राय है कि लक्ष्मी का कृपा पात्र बनना ब़डे सौभाग्य की बात है और अनिवार्य भी है।
किंतु सूक्ति है-
भवन्ति नम्रास्स्त्रव: फलोeमै: नवाम्बुर्भिभूरिविलम्बिनोधना:।
अनुद्धत्ता सत्पुरूषा: समृद्धिभि: स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्||
दीपावली त्योहार की शुरूआत व समापन की अवधि पांच दिनों की होती है। पर्व की शुरूआत धनतेरस से होती है और भ्रातृ द्वितीया को उनका समापन होता है।