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आशा की लापरवाही से जच्चा बच्चा की मौत

फर्रुखाबाद|18july: गाँव की आशा बहू की लापरवाही के कारण हजारों रुपये खर्च करने के बाबजूद भी जच्चा बच्चा की मौत हो गयी.

नगर सीमा से लगे ग्राम नेकपुर खुर्द निवासी जितेन्द्र शाक्य को गाँव की आशा की लापरवाही के कारण ऐसा सदमा लगा है की वह मरते दम तक नहीं भूल पायेंगे.

गाँव की लक्ष्मी के कहने पर जितेन्द्र बीते दिनों पत्नी सोनम देवी की डिलेवरी कराने डॉ सुषमा सिंह के अस्पताल में ले गए. पैदा हुए बच्चे के मर जाने पर सोनम को गंभीर अवस्था में डॉ जितेन्द्र कटियार के अस्पताल ले जाया गया. जहां उसकी मौत हो गयी.

जितेन्द्र ने बताया कि गाँव की लक्ष्मी डॉ सुषमा सिंह के अस्पताल में नौकरी करती है. डॉ ने मुंह मांगे रुपये लिए. पैदा हुआ पुत्र मर गया. ब्लीडिंग होने पर जब पत्नी की हालत गंभीर हो गयी तो उसका इलाज करने से मना कर दिया.

डॉ जितेन्द्र कटियार ने बच्चा दानी को निकालने के लिए रुपये लिए. बच्चादानी को सिल देने की जानकारी देकर डाक्टर ने बताया कि बिना बच्चा दानी निकाले पत्नी ठीक हो जायेगी.

चाँद घंटे में ही पत्नी ने दम तोड़ दिया. जानकारी करने पर पता चला कि पड़ोसी प्रधान सुमन देवी शाक्य की देवरानी संध्या शाक्य गाँव की आशा है जिन्होंने कभी भी पत्नी को गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य सम्बंधी कोई जानकारी नहीं दी. वह किसी के भी घर नहीं जाती है.

यदि पत्नी को सरकारी अस्पताल ले गया होता तो शायद वह बच जाती और हजारों रुपये बच जाते.

मांसपेशियों के लिए खतरनाक है ऊंची एड़ी

लंबे समय से ऊंची एड़ी की चप्पलें पहन रही महिलाएं यदि अचानक ही फ्लैट चप्पलें पहनना शुरू कर दें तो यह पिंडलियों की मांसपेशियों के लिए खतरनाक हो सकता है।

वेबसाइट ‘डेली मेल डॉट को डॉट यूके’ के मुताबिक अक्सर ऊंची एड़ी की चप्पलें पहनने वाली महिलाओं की मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं इसलिए जब वे फ्लैट चप्पलें पहनती हैं तो उन्हें परेशानी हो सकती है।

लंबे समय तक ऊंची एड़ी पहनने से पैरों की पिंडली की मांसपेशियां छोटी और कमजोर हो जाती हैं और जब ऐसी महिलाएं फ्लैट चप्पलें पहनती हैं तो मांसपेशियों में ज्यादा खिंचाव होता है जबकि वे इतने खिंचाव की आदी नहीं होतीं। इस वजह से पैरों में दर्द होता है और परेशानी होती है।

मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के मुताबिक जो महिलाएं दो साल तक प्रति सप्ताह पांच दिन ऊंची एड़ी की चप्पलें पहनती हैं उनकी पिंडलियों की मांसपेशियां 13 प्रतिशत तक संकुचित हो जाती हैं। यह प्रभाव स्थाई होता है और इसे दूर करने का केवल एक ही उपाय है कि हर दिन खिंचाव पैदा करने वाला व्यायाम किया जाए।

प्रदेश डुबा विधायक गए परदेश

बादल साहेब के नौं -रतन…
पंजाब भयंकर बाढ़ की चपेट में है और बदल साहेब के नौं रत्तन स्काट लैंड की तफरी पर गए हैं . सरकार के पास बाढ़ पीड़ितों के लिए धन का भारी ‘टोटा ‘(कमीं) है , फिर भी अपने आठ विधायकों के लिए स्काट लैंड भ्रमण का जुगाड़ बना ही लिया गया. ये विधायक स्काट लैंड जा
कर पता करेंगे की कैसे शराब के कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित जल से बचाव किया जाए . अब लोग यह न कहें की इन विधायको के पास कौन सी तकनिकी योग्यता है जिस के आधार पर ये प्रदूषण निरोधक जानकारी समझ पाएंगे . इस का भी हल तलाश लिया गया एक एक्सियन को भी अपने दल में शामिल कर हो गए ‘बदल साहेब के नौं रतन’.
अब विरोधी दल कांग्रेस को भला कब हजम होती यह ‘बादल नीति’ , लगे विरोध जताने -पंजाब आसमानी बादलों की ‘कृपा ‘ से बाढ़ में डूबा जा रहा है और ज़मीनी बादल साहेब के मंत्री आसमान में उड़ रहे हैं . इन्हें किसानो की और उनकी फसल की कोई प्रवाह नहीं . और तो और कांग्रेस के कैप्टन -महाराजा अमरेन्द्र सिंह भी यका यक कहीं से प्रकट हो गई और लगे किसानों की बदहाली पर आंसू बहाने -फसलें खराब हो रहीं हैं गरीब दाने दाने को मोहताज़ है -यह कैसा बादल राज़ है. कैप्टन साहेब के इस रुदन पर हमारी भी आँखें रुदाली हो उठीं ! पिछले दिनों किसी पत्रकार ने खुलासा किया की पंजाब का लाखों टन आनाज खुले आसमान के नीचे सड रहा है और आनाज की संभाल के लिए बनाये गए सरकारी ‘वेयर हाउसिस’ शराब के ठेकेदारों को गोदाम के तौर पर लीज़ पर दे रखे हैं. बाद में राज़ खुला तो ‘कैप्टन साहेब की कलई भी खुल गई. ये गोदाम
कैप्टन साहेब ने अपने मुख्या मंत्री काल में अपने चहेते ‘शराब माफियाओं ‘को औने पौने दामों पर लीज़ पर दिए थे. यह है कैप्टन साहेब का किसान और उसकी फसल के प्रति प्रेम ?

केंद्र ने राज्य सरकार को आपदा प्रबंधन के लिए २३१६.४६ करोड़ की राशि दे रखी है. फिर भी बाढ़ में घिरे किसानों को सरकारी मदद के नाम पर कोरे आश्वासनों के अतिरिक्त कुछ नहीं . थोड़ी बहुत सहायता संव्यमेवी संस्थाओं द्वारा पहुंचाई जा रही है. सबसे अधिक प्रभावित पटियाला ,मनसा और संगरूर जिलों में ३०० मकान गिरे हैं . अब सरकारी सहायता के तौर पक्के मकान के लिए २५०००/- और कच्चे मकान के लिए १००००/ की राशि निर्धारित है. और भूखे इंसान के लिए २०/- का खाना . आज की मैह्गाई में १००० ईंट का भाव ही ३५००/ है …अब जिन बाढ़ पीड़ितों का सब कुछ लुट गया इस सहायता राशि- वह भी यदि मिल पाई …तो क्या खाएंगे और क्या बनायेंगे?

रही बात हमारे जन प्रतिनिधियों की उनका ‘सोम रस प्रेम ‘ किसी से छिपा नहीं. पहले शराब माफिया कैप्टन साहेब के साथ था और अब बादल साहेब के साथ. तभी तो बाढ़ में डूबे प्रदेश के ‘आधुनिक रजवाड़े’ बाढ़ के पानी की चिंता छोड़, शराब के पानी की जांच के लिए ‘स्काट लैंड ‘के लिए उड़ गए हैं .

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया ……

साभार- एल आर गाँधी (ब्लॉग)

यूपी में मिड डे मील और दलित रसोइया

उत्तर प्रदेश में शिक्षा का नया सत्र शुरू होते ही पहले से लड़खड़ा रही मिड डे मील योजना में नया बखेड़ा शुरू हो गया| ये बखेड़ा मिड डे मील बनाने वाले रसोइये के चयन को लेकर है| उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव जीतेन्द्र कुमार के 24 अप्रैल 2010 के आदेश में रसोइये के चयन में आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के अनुपालन में प्रदेश भर से गाँव गाँव में दलित रसोइया खाना बनाने पहुचे और स्कूलों में छात्रों ने खाना खाने से इंकार कर दिया| मिड डे मील बहिष्कार और दलित रसोइया का प्रकरण कोई नया आदेश नहीं है| वर्ष 2007 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव ने 24 अक्टूबर 2007 में यह आरक्षण व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए थे| मगर अचानक इसी सत्र में बड़ा बखेड़ा क्यूँ शुरू हुआ ये बात गौर करने लायक है|

वर्ष 2004 में जब मिड डे मील योजना का प्रारंभ उत्तर प्रदेश में हुआ था तब रसोइये के चयन में आरक्षण और प्राथमिकता के नियम जैसी कोई बात नहीं थी| केंद्र सरकार के मिड डे मील योजना के नियम जो प्रदेशो को जारी किये गए उनमे भी आरक्षण जैसी कोई बात नहीं आई थी| सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चालू हुई मिड डे मील योजना का सञ्चालन बच्चो का बौधिक स्तर ऊँचा करना, बच्चो को शिक्षा के लिए प्रेरित करना, उनके स्वास्थ्य में सुधार लाना तथा शिक्षा का स्तर सुधारते हुए हर बच्चे को शिक्षित करना था| शुरुआत में भी कुछ स्थानों पर दलित रसोइये के चयन को लेकर कुछ जिलों में विवाद हुआ था मगर तब व्यावहारिक रूप से जहाँ इसका विरोध हुआ प्रधान/सरपंच और स्कूल के हेडमास्टर ने रसोइये के चयन में व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए आरक्षण के मानको को दरकिनार कर दिया और 3 साल तक इंतना हो हल्ला नहीं हुआ|

2007 में उठी थी मिड डे मील बहिष्कार की पहली चिंगारी

2007 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव के 24 अक्टूबर 2007 के रसोइये के चयन मे आरक्षण लागू करने के आदेश के बाद ये चिंगारी भड़क गयी थी| सिप्तम्बर 2007 में कन्नौज जनपद के मलिकपुर प्राथमिक और जूनियर विद्यालय में प्रधान ने पहले से खाना बना रही पिछड़ी जाति की महिला को हटाकर दलित महिला को लगा दिया| यादव बाहुल्य गाँव में बबाल हो गया, लगभग 300 पंजीकृत बच्चों में से 2 सैकड़ा बच्चों ने खाना खाने से इंकार कर दिया, मामला जिले के आला अधिकारी तक पंहुचा तो अधिकारिओं ने दबाब बनाया फिर क्या था बच्चों ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया| स्कूल के मास्टर और प्रधान सहित 5 लोगों के खिलाफ जाति भेदभाव फैलाने का मुकदमा दर्ज हो गया| शिक्षा में पुलिस का दखल शुरू हो गया| प्रयत्क्ष देखी बात है उस समय इलाके के थाना इंचार्ज भी स्कूल में बच्चो पर दबाब बनाने के लिए स्कूल में मिड डे मील के समय मय पुलिसिया ताम झाम के गए थे, बच्चे स्कूल में वावर्दी पुलिस देख भयभीत हो रहे थे, स्कूल में जाने की रूचि बढाने वाला कार्यक्रम नौनिहालों के दिलों में डर पैदा कर रहा था और आखिर एक दिन में केवल 20-22 बच्चे ही स्कूल आने लगे| राष्ट्रीय समाचार चेनल जी न्यूज़ ने पूरे दिन मिड डे मील कार्यक्रम को सजीव प्रसारित किया, देर रात गाँव में चौपाल लगाकर सभी वर्गों में जाति भेदभाव को मिटाने की चौपाल लगायी| मगर नतीजा कुछ नहीं निकला, आखिरकार रसोइया बदलना पड़ा|

फिर ये बहिष्कार की चिंगारी कानपुर होते हुए प्रदेश के कई जिलों में फ़ैल गयी और अधिअरियो ने दौड़ भाग करने के बाद निराश होकर ये मान लिया था कि ये सामाजिक परिवर्तन में कानून थोपने जैसा है| व्यवस्था परिवर्तन में समय लगता है| और ठन्डे बसते में सब कुछ चला गया| अगले दो साल तक कानपुर देहात जिले के कई ठाकुर बाहुल्य गाँव में मिड डे मील का चूल्हा ठंडा पड़ा रहा|

वर्ष 2009 में कोई बड़ा मामला प्रकाश में नहीं आया और सत्र बीत गया|

क्या केंद्र का कोई नया आदेश है?

वर्ष 2010-11 का सत्र शुरू होने से पहले ही नए सत्र के लिए मिड डे मील बनाने वाले रसोइयों को रखने के लिए केंद्र सरकार ने व्यवस्था परिवर्तन किया| मगर व्यवस्था परिवर्तन में रसोइयों को मिड डे मील बनाने के एवज में मिलने वाले पारिश्रमिक व्यवस्था को बदला गया न कि सख्ती से आरक्षण लागू करने की बात कही गयी| भ्रष्ट्राचार से ग्रसित मिड डे मील योजना में रसोइयों के हित साधने की कोशिश हुई| पहले रसोइयों को खाना खाने वाले प्रति बच्चो के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता था अब 25 बच्चो के लिए खाना बनाने पर 1000 रुपये रसोइया देने की व्यवस्था मानदेय के रूप में देने की बात की गयी है| पैसा पहले भी सरकारी मिलता था अब भी सरकारी मिलेगा तो नए सिरे से आरक्षण लागू करने की बात उस मामले में क्यूँ खडी हो गयी जिसमे स्वतंत्रता का अधिकार प्रभावित हो रहा हो (स्वेक्षा से खाना खाने या न खाने की)|

इस व्यवस्था में प्रथम रसोइया अनुसूचित जाति, दूसरा सामान्य जाति से, तीसरा पिछड़ा वर्ग से तो चौथा फिर सामान्य से तथा पांचवा फिर अनुसूचित जाति से होगा ऐसा आदेश उत्तर प्रदेश सरकार से किया गया है|

मौका चुनावी है

उत्तर प्रदेश में इस साल पंचायत के चुनाव होने है| ऐसे में वर्तमान प्रधानो/सरपंचो को गाँव में जातीय राजनीती करने के स्कूल के मिड डे मील का अखाडा मिल गया है| व्यवस्था को सामान्य रूप से चलाने के लिए पिछले उत्तर प्रदेश सरकार के आरक्षण आदेश को पिछले तीन साल से अनदेखा करने वाले प्रधान अब अपनी प्रधानी के अंतिम चरण में इसे लागू क्यूँ करना चाहते है| लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत में अचानक यह दलित प्रेम जागना वोटो की राजनीती भी हो सकती है| दलित वोटो को इकठ्ठा रखने का बढ़िया हथियार भी हो सकता है| मगर इस सबसे सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का क्या होगा जिसका उद्देश्य देश के लिए स्वस्थ और शिक्षित नौजवान बनाना था| इस पर चर्चा कहीं क्यूँ नहीं| सब नेता खामोश है, अधिकारी कुर्सी बचाने और माया को खुश करने में लगे है और देश के सरकरी प्रारम्भिक शिक्षा की अर्थी निकली जा रही है| क्या ऐसी व्यवस्था जिसके लागू करने से देश की विकासपरख योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होता हो उस पर आरक्षण व्यवस्था को सख्ती से लागू करना उचित होगा विचारणीय प्रश्न है|

जिलापंचायत अध्यक्ष व् उनके पति के खिलाफ साजिश

फर्रुखाबाद|17july: पंचायत चुनाव में विरोधियों से विना लड़े ही उनको मैदान से बाहर कर देने की बहुत बड़ी साजिश रची गयी है. इसी षड्यंत्र के तहत जिला पंचायत सदस्य श्रीमती सौभाग्यवती राजपूत व् उनके पति मुकेश राजपूत जिला पंचायत सदस्य आदि के मतदाता सूची से नाम काट दिए गए हैं.

राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष मुकेश राजपूत ने पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के लोगों ने उनके अलावा जिला पंचायत सदस्य जाकिर आदि प्रधान, बीडीसी के नाम मतदाता सूची से कटवा दिए हैं.

श्री राजपूत ने स्पष्ट किया कि अनियमिताएं एवं लापरवाही वरतने वाले जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी का वेतन रोका गया है न कि कर्मचारियों का.

पार्टी के मुखिया एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का वचाव करते हुए श्री राजपूत ने कहा कि अब चाहे पूर्व मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव नाक रगड़ कर गिड़गिड़ाये मुसलमान सपा के पास जाने वाला नहीं है. भाजपा के खत्म हो जाने के कारण मुलायम कांग्रेस से जुड़ गया है.

मंजू चौधरी को जानते हो?

गाँव के बच्चो को मंजू चौधरी की कई साल से तलाश थी| अब ख़त्म हो गयी है| ताजी सूचना के मुताबिक मंजू चौधरी को निलंबित कर दिया गया है| उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद के राजेपुर ब्लाक के गाँव माखन नगला स्थित प्राथमिक पाठशाला में हेड के रूप में कार्यरत शिक्षिका मंजू चौधरी अब प्रदेश में कार्यरत सरकारी लाखों शिक्षको में ख़ास हैं|

मंजू का इनाम खतरे में?

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में गैर जिम्मेदार मास्टर निलंबन को सजा नहीं इनाम मानते है, मंजू को भी बड़ी मुश्किल से ये इनाम पाया है| मंजू को कई साल से स्कूल से गायब रहने और गैरहाजिर होने पर वेतन हड़प कर लेने के मामले में निलंबित नहीं किया गया है| उन्हें ये इनाम जनगणना कार्य न करने पर राजस्व विभाग की कृपा से मिला है| एसडीएम ने जनगणना कार्य में रूचि न लेने पर बेसिक शिक्षा विभाग के फर्रुखाबाद कार्यालय को निलंबन के लिए पत्र लिखा था| मंजू चौधरी के घोटालों पर पर्दा डालने वाले राजेपुर ब्लाक के सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी नागेन्द्र चौधरी ने जेएनआई को फोन पर बताया कि मंजू का निलंबन कर दिया गया है मगर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी आरएसपी त्रिपाठी के मुताबिक उन्हें ठीक से याद नहीं की शिक्षिका निलंबित किया है या नहीं|

कोई मूंछो वाले मंजू चौधरी की हाजिरी पर दस्खत करते है!

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद के राजेपुर ब्लाक के गाँव माखन नगला स्थित प्राथमिक पाठशाला में हेड के रूप में कार्यरत शिक्षिका मंजू चौधरी अब प्रदेश में कार्यरत सरकारी लाखों शिक्षको में ख़ास हैं| माखन नगला स्कूल में तैनात मंजू अधिकांश छात्रों ने उनका चेहरा नहीं देखा है| हाँ हाजिरी रजिस्टर साथ लेकर कभी कभी कोई मुछों वाले मास्टर साहब आते है (उनके पति जो कानपुर में ओरडीनेन्स फेक्ट्री में कर्मी है) और दस्खत कर चले जाते हैं|

कोई फोटो ही भिजवा दे!

वैसे तो उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जिनके गायब रहने से अधिकारिओं की जेबें गरम हो रही होंगी मगर फर्रुखाबाद जनपद की इन ख़ास शिक्षिका मंजू चौधरी का कोई फोटो किसी को मिले तो जरूर जेएनआई के दफ्तर भेज दें ताकि गाँव के उस स्कूल के बच्चो को दिखाया जा सके कि ये थी आपकी मैडम मंजू चौधरी जिन्होंने आपको पढ़ाने के नाम पर पिछले कई सालों में सरकार से कई लाख रुपये मुफ्त में पायें है|

पूर्व डीजीपी की रिश्तेदार की नृसंश हत्या

कानपुर: शहर के पॉश इलाके स्वरूप में हैलट अस्पताल के सामने घर में अकेली रह रही एक वृद्ध महिला और उसकी वृद्ध नौकरी की नृशंस हत्या कर दी गयी।

हत्यारों दोनों के गले दबाने के बाद के बाद हाथ की नसें काट दी। मामले का खुलासा बीती देर शाम को नौकरानी के आने पर हुआ। मृतक वृद्ध महिला पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह की रिश्तेदार बताई जा रहीं हैं।

हत्या की सूचना मिलते ही आईजी और डीआईजी भारी फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए। डॉग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ की टीम को भी बुलाया गया।

आईजी ने हत्या के पीछे प्रापर्टी विवाद होने की आशंका व्यक्त की है। पुलिस ने इसी दिशा में अपनी जांच भी शुरू कर दी है। स्वरूप नगर पुलिस ने मृतका के पुत्र की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार लखनऊ में रहने वाले इनकम टैक्स के रिटायर्ड ज्वाइंट कमिश्नर भीम देव सिंह का मकान स्वरुप नगर में हैलट अस्पताल के सामने है। मकान की देख रेख करने के लिए भीमदेव सिंह की सास देव मुन्नी देवी (90) उसमें रहती थी।

वृद्ध देव मुन्नी देवी की सेवा के लिए परिजनों ने नौकरानी गीता (75) को उनके साथ रखा था। देव मुन्नी देवी का बेटा प्रभु नरायण सिंह एनटीसी का रिटार्ड अधिकारी है और जूही लाल कालोनी में अपने परिवार के साथ रहता है। जबकि बेटी कुमुद सिंह पति भीमदेव के साथ गोमती नगर लखनऊ में रहती है।

बताते है कि पड़ोसी प्रदीप सोनी ने वृद्धा और नौकरानी को गुरुवार को देखा था इसके बाद दोनों नहीं दिखाई दी। शुक्रवार की देर शाम चौका बर्तन करने नौकरानी शुकंतला घर पहुंची और दरवाजा खटखटाया, जब अन्दर से कोई जवाब नहीं मिला तो उसने मकान के किराएदार मेडिकल स्टोर वालों को इस बात की जानकारी दी।

मेडिकल स्टोर वालों ने जूही में रहने वाले देव मुन्नी देवी के बेटे प्रभु नरायण को इस बात की खबर दी। खबर मिलते ही प्रभु फौरन वहां पहुंचे। उनके खटखटाने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो अनहोनी की आशंका हुई।

उन्होंने फौरन पुलिस को मामले की सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और छत के रास्ते मकान के अन्दर पहुंची तो दोनों वृद्ध महिलाओं के रक्तरंजित शव अलग-अलग कमरे में पड़े थे। पहले कमरे में गले में साड़ी बंधा देव मुन्नी देवी का शव पड़ा था, जबकि सीता का शव बगल के कमरे में पड़ा था उसके गले में पतली डोर लपटी थी।

दोनों के हाथों की नसें कटी होने के कारण कमरों में खून ही खून पड़ा था। फर्श में सूख चुके खून को देखर यह अंदाजा लगाया गया कि हत्या कई घंटों पहले की गई थी। घटना हाई प्रोफाईल परिवार से जुड़ी होने के कारण आईजी जीएल मीना, डीआईजी प्रेम प्रकाश, एसपी पश्चिम मोहित गुप्ता और कई क्षेत्राधिकारी मौके पहुंच गए। डीआईजी ने फौरन प्रिगंर एक्सपर्ट टीम को मौके पर बुलाया और कमरों की बारीकी से जांच पड़ताल करायी।
लेकिन टीम को हत्यारों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। प्रभु नरायण ने बतायाकि मां के हाथ में सोने की चूडियां थी जिन्हें हत्यारे उतार ले गए। घर के बाकी समान से कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी थी।

जिसके चलते यह बात साफ हो गयी की हत्या के पीछे लूटपाट का इरादा नहीं था। प्रभु के मुताबिक वह लोग प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के रिश्तेदार हैं। डीआईजी प्रेम प्रकाश ने पुलिस की कई टीमें बना कर हत्यारों की जल्द गिरफ्तारी के निर्देश दिए हैं।

‘बच्‍चों को नहीं खाने देंगे दलित के हाथ से खाना’

कन्नौज: उत्‍तर प्रदेश के कन्‍नौज जिले में उच्‍च जाति के अभिभावकों ने अपने बच्‍चों को स्‍कूल से सिर्फ इसलिए निकाल लिया क्‍योंकि वहां मिड-डे मील पकाने वाला खानसामा दलित था। वो नहीं चाहते हैं कि एक दलित के हाथ का बना खाना उनके बच्‍चे खाएं।

कन्‍नौज ही नहीं बल्कि कानपुर, इलाहाबाद और शाहजहांपुर समेत कई जिलों में उच्‍च जाति के लोग इस बात के खिलाफ हैं कि सरकारी स्‍कूलों में दलित खानसामे रखे जाएं। सीएनएन-आईबीएन की एक खबर के मुताबिक अभिभावकों ने कई बार स्‍कूलों में जाकर विरोध भी दर्ज किया है।

कन्‍नौज के एक स्‍कूल टीचर वीरपाल सिंह के मुताबिक अपने बच्‍चों को स्‍कूल से निकालते वक्‍त कई अभिभावकों ने यह बात कही।

खैर स्‍कूलों में दलित बवर्चियों की नियुक्ति जारी रहे चाहे नहीं, लेकिन लोगों के इस विरोध से मुख्‍यमंत्री मायावती के उस फरमान की खिलाफत तेज हो गई है, जिसमें कहा गया था कि 25 छात्रों के स्‍कूल में एक दलित महिला को नियुक्‍त किया जाएगा। जाहं 100 बच्‍चे होंगे वहां एक दलित महिला और गैर दलित बवर्ची नियुक्‍त किया जाएगा। यदि छात्रों की संख्‍या बढ़ती है तो दलित खानसामे की नियुक्ति भी की जाएगी।

बसपा की नई कमेटी में पुराने चहरे

फर्रुखाबाद|15july: बसपा के जोनल को आर्डीनेटर केके गौतम, राजाराम आनंद एवं सेवाराम एडवोकेट ने नई कार्यकारिणी घोषित कर दी है. गंगाराम जाटव एवं राधेश्याम कटियार जिला प्रभारी बनाए गये. जब कि रामानंद प्रजापति की पुनः जिलाध्यक्ष पद पर ताजपोशी कर दी गयी है.

नागेन्द्र शाक्य जिला उपाध्यक्ष, राम नरेश गौतम महासचिव, अजय भारती सदर क्षेत्र के जिला सचिव, ब्रह्मानंद भारती भोजपुर विधान सभा क्षेत्र से जिला सचिव तथा अनंगपाल कुशवाह अम्रतपुर विधान सभा क्षेत्र से जिला सचिव बनाए गए. सुरेश वर्मा लोधी की कार्यालय सचिव पर एवं रवीन्द्र दीक्षित की खजांची पद पर नियुक्ति की गयी है.

नागेन्द्र शाक्य दो बार लोक सभा क्षेत्र के प्रभारी तथा रामनरेश गौतम तीन बार जिलाध्यक्ष पद पर तैनात रह चुके हैं. तरक्की करने के बजाय इन लोगों के पर कतरे गए हैं.

एमडीएम रिपोर्ट: बैलेंस शीट में करोडो का हेर फेर?

यूपी में इन दिनों मिड डे मील योजना को लेकर हाहाकार मचा है, जिले के शिक्षा विभाग से लेकर राजस्व प्राशसनिक अमला गाँव गाँव दौरे कर स्कूलों में मिड डे मील पर शिकंजा कसने में लगा है| कहीं दलित के हाथ का बना खाना खाने से इंकार का मामला तो कहीं प्रधान और ग्राम सचिव द्वारा मिड डे मील के खाली खातों को लेकर| सर्व शिक्षा अभियान योजना में दोपहर को स्कूल में बने बनाये भोजन उपलब्ध करने की योजना यूपी में भ्रष्टाचार के भगौने में उबल रही है| केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गए धन को खर्च दिखा नए साल में बजट उगाह लेने की फिकर में उत्तर प्रदेश के नौकरशाहों ने वो कारनामे कर डाले जिसकी उम्मीद नहीं थी|

एक नजर इधर भी-

उत्तर प्रदेश मध्याह भोजन प्राधिकरण लखनऊ में उपलब्ध मिड डे मील के कन्वर्जन कास्ट और खाद्यान के दस्तावेज बताते है कि प्रदेश में जिलों से आने वाले वार्षिक उपभोग और स्वीकृत धनराशी में करोडो का गोलमाल हो गया| जिलों में तैनात बेसिक शिक्षा विभाग के बाबुओ को मिड डे मील के खातों के रख रखाव की जिमेदारी सौपी गयी| सर्व शिक्षा अभियान में प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त हुए कर्मी सिर्फ मोहर बन कर रह गए| इन बाबुओ द्वारा तैयार मिड डे मील की बैलेंस शीट में भारी गड़बड़ी हो रही है| किसी जिले में प्राप्त धनराशी से ज्यादा खर्च हो गया तो कहीं करोडो कहाँ खर्च हुए इसका हिसाब देने में असमर्थ हो गए| हर साल जिलों से मुख्यालय पर भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर जब प्रदेश की बैलेंस शीट तैयार की जाती है तो गड़बड़ा जाती है| फिर ये बैलेंस शीट वापिस जिलों में संसोधन के लिए भेजी जाती है|

वर्ष 2009-10 को अंतिम अवशेष के साथ मुख्यालय को भेजी गयी रिपोर्ट में जनपद आगरा में 1.09 करोड़, बहराइच में .60 करोड़, बलरामपुर में १.१९ करोड़, गोरखपुर में 3.82 करोड़, हरदोई में 16 करोड़, जालौन में .55 करोड़ तो जौनपुर में 3.45 करोड़, कौशाम्बी में .25 करोड़ तो लखीमपुर खीरी जनपद में 9 करोड़ के हेरफेर पर उत्तर प्रदेश मध्याह भोजन प्राधिकरण लखनऊ द्वारा जनपदों से जबाब तलब किया गया है|

उत्तर प्रदेश के पिछले दो साल के खातों के अन्वेषण से पता चलता है कि हर साल वर्ष के अंत में मुख्यालय को भेजी जाने वाली क्लोसिंग रिपोर्ट में भरी वित्तीय अनियमितता हो रही है| केवल जबाब मांगने का पत्र और मुख्यालय द्वारा केंद्र को भेजी गयी रिपोर्ट की कापी देख कर जिले की बैलेंस शीट बनाने को पत्र जारी होतें है| जाहिर है जिलों के पास कोई पुख्ता और सही रेकॉर्ड्स नहीं है, और न ही इन्हें उत्तर प्रदेश लेखा नियंत्रण के आडिट में फसने का डर है क्यूंकि सर्व शिक्षा अभियान का आडिट सीए द्वारा कराया जाता है| लेकिन यही कागजी गोलमाल और अन्क्देबजी का नतीजा है कि आज उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानो/सरपंचो के पास फसे प्राधिकरण के अरबो रुपये वापस लेने का कोई मंत्र नहीं है| हमाम में सब नंगे है|
देखें रिपोर्ट और सबूत- यहाँ क्लिक करें
भाग1

भाग2

भारत में शिक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी लगभग 1900 लाख रुपये की सहायता के दुरूपयोग पर ब्रिटिश सरकार यू ही नहीं खफा है| सर्व शिक्षा अभियान के लिए उन मदों पर खर्च किया गया जिनकी जरूरत नहीं थी| बिना बिजली का इंतजाम किये कंप्यूटर खरीद किये गए, ए सी लगाये गए, कीमती बिस्तर खरीदे गए, 7531 रगीन टेलीवीजन, कीमती फोटोकॉपी मशीन, फेक्स खरीद डाले गए| मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा ब्रिटिश सरकार को उपलब्ध करायी करायी गयी रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है, अब ब्रिटिश सरकार भारत को शिक्षा में मदद पर कटौती करने का विचार बना रहा है| उसका मानना है कि रईस भारत को अब मदद की जरूरत नहीं है|

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