दैत्य गुरू शुक्कराचार्य ने क्यों की थी देवकली शिव मंदिर की स्थापना……..

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फर्रुखाबाद: शाहजहांपुर जिले की सीमा पर स्थित भगवान शिव का पटना देवकली मंदिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सुप्रसिद्ध शिव मंदिर है। जिसे दैत्य गुरु शुक्कराचार्य की तपोस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहां भगवान शिव के आठ अंशों के प्रतीक आठ शिवलिंग स्थापित है। पुराणों के अनुसार सत्युग के चौथे चरण में इन शिवलिंगों की स्थापना दैत्य गुरु शुक्कराचार्य ने की थी।

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खुदाई में शुक्कराचार्य के समय के दो यज्ञ कुण्ड व दो मंदिर के नीचे दरबाजा मिला। जिसे न खोले ही मिट्टी में दबा दिये गये। शुक्कराचार्य भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। पुराणों में वर्णन है कि देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध हुआ करता था। दैत्यों को अपराजय बनाने के लिए उनके गुरु शुक्कराचार्य ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न कर संजीवनी विद्या सीख ली। युद्ध में मरने वाले दैत्यों को वे जीवित कर देते इससे देवता परेशान हो गये। इससे देवताओं ने अपने गुरु ये परामर्श कर उनके पुत्र कक्ष को अग्निवेश बनाकर शुक्कराचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने भेजा।
कक्ष की विद्धता से प्रसन्न होकर उसकी पुत्री उसे चाहने लगी। इसी बीच असुरों को पता चला गया कि कक्ष देव गुरु वृहस्पति का पुत्र है तो असुरों ने उसे क्षल से मारकर जंगल में पशुओं को खाने के लिए फेंक दिया। देवयानी को पता चला तो उसने पिता से संजीवनी विद्या से कक्ष को जीवित करवा लिया। इससे असुर नाराज हो गये। उन्होंने मौका देखकर कक्ष की दोबारा हत्या कर दी। उसके शव को जला दिया। उसकी राख सोमरस में घोलकर शुक्कराचार्य को पिला दी। शुक्कराचार्य ने योगबल से जान लिया कि कक्ष की हत्या कर दी गयी व उसकी राख उसके पेट में है। देवयानी ने उसे जीवित करने की जिद की। शुक्कराचार्य ने फिर से संजीवनी वि़द्या का प्रयोग किया। कक्ष जीवित होकर शुक्कराचार्य के पेट में पलने लगा। पेट में ही असुर गुरु से विद्या सीख ली।

विद्या सीखकर शुक्कराचार्य जी का पेट काटकर निकल आया और शुक्कराचार्य को भी जीवित कर दिया। मकसद पूरा हो जाने पर प्रेम विवाह का प्रस्ताव रखा। देवयानी ने उसके सामने प्रेम विवाह का प्रस्ताव रख दिया। कक्ष ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। देवयानी ने क्षुब्ध होकर उसको समस्त विद्या भूल जाने का श्राप दे दिया। कक्ष ने नाराज होकर उससे कहा कि तू ब्राहमण है लेकिन तेरा विवाह किसी क्षत्रिय से होगा। इसी बजह देवयानी का विवाह यति राजा से हुआ।

इस आश्रम में भगवान शिव के आठों स्वरूपों की स्थापना की थी। शुक्कराचार्य जी द्वारा स्थापिता शिवलिंग आज भी विराजमान हैं। यहां श्रद्धालुओं का तातां लगता है। देश के कोने कोने से श्रद्धालु आते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि शुक्कराचार्य की तपोभूमि पर आकर भगवान शिव के दर्शन करने वाले की हर मुराद पूरी होती है। वर्तमान में इस मंदिर की देखरेख महेशचन्द्र गिरी करते हैं।

महेशचन्द्र गिरी कहते हैं कि पुरातत्व अवशेष मिलने के बाद भी तपोभूमि को पर्यटन स्थल का दर्जा न मिल पाना खेद का विषय है। इससे श्रद्धालुओं की आस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। शिवरात्रि पर विशाल मेला लगता है। जिसमें सैकड़ों मील दूर से श्रद्धालु आते हैं।

 

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