सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे को…………….

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फर्रुखबाद, पुरानी कहावत है कि सैया भये कोतवाल अब डर काहे को…………… कहावत की खूवसूरती यह है कि दोनों ओर से सटीक बैइती है। चाहे सैया कोतवाल हो जाये या कोतवाल सैंया हो जाये।

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थाना कमालगंज के सामने गुजर रही लकड़ी से भरी  ट्राली को देखकर बरबस ही यह कहावत याद आ जाती है। यूं तो पेड़ों के काटने पर प्रतिबंध है। यदि किसी सामान्य आदमी को किसी निर्माण कार्य में बाधक या किसी अन्य कारण से पेड़ काटना हो तो उसे पुलिस से लेकर वन विभाग तक कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इसका अंदाला लगाने के आपको एक बार इस अनुभव से गुजरना लाजिमी है, कयोंकि मेरा दाव है कि मुशी प्रेम चंद्र के बाद शब्दों में इसे बयान करने की क्षमता किसी में पायी ही नहीं गयी और उनको गुजरे काफी जमाना हो चुका है। परंतु स्थिति यह है कि पुलिस के पास आने वाली यकजाई की एक बड़ी  मद कटान भी है। कमालगंज, शमसाबाद, कायमगंज जहानगंज क्षेत्र में धड़ल्ले से लकड़ी का कटान होता है व आरा मशीने भी चल रही है। मजे की बात है कि इसमें वन विभाग, पुलिस व जिला पंचायत तक के कर्मचारी अपसी तालमेंल का एसा उदाहरण पेश करते हैं जिसे देख कर आम आदमी हैरत से दांतों तले उगली दबाये रह जाता है।

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