फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) कायमगंज, सदर और अमृतपुर विधानसभा के दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में, कई रास्ते कटे; प्रशासन राहत पहुंचाने में जुटा, तो सियासी चेहरे राहत वितरण में आगेफर्रुखाबाद। जनपद में गंगा और अन्य नदियों के बढ़े जलस्तर के कारण कायमगंज, सदर और अमृतपुर विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में हैं। कई गांवों का मुख्य मार्ग से संपर्क प्रभावित है, जगह-जगह सड़कें कट गई हैं और ग्रामीणों को आवागमन के साथ ही रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिला प्रशासन और सरकार
की ओर से बाढ़ प्रभावित लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाने और प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी व्यवस्थाएं बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।बाढ़ की इस आपदा के बीच राहत कार्यों को लेकर अब सियासत भी गर्म होती दिखाई दे रही है। सरकार की ओर से भेजी जा रही राहत सामग्री के
वितरण कार्यक्रमों में सत्ता से जुड़े कई नेता मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। राहत सामग्री के साथ फोटो खिंचवाने और उसे प्रचारित करने की होड़ भी दिखाई दे रही है। वहीं आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर टिकट की दावेदारी कर रहे कई सत्ताधारी दल के नेता भी सामाजिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से वितरित की जा रही राहत सामग्री के कार्यक्रमों में सक्रिय नजर आ रहे हैं। राहत पीड़ितों के लिए या सियासी चेहरा चमकाने के लिए? बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आपदा के समय राहत किस उद्देश्य से पहुंचाई जा रही है। ग्रामीणों को इस समय भोजन, पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा, दवाएं और आवागमन की सुविधा की जरूरत है। प्रशासन अपने स्तर से राहत पहुंचाने में जुटा है, लेकिन राहत वितरण के कार्यक्रमों में राजनीतिक चेहरों की सक्रियता ने चर्चाओं को जन्म दे दिया है।आरोप यह भी लग रहे हैं कि सरकार की ओर से उपलब्ध कराई जा रही राहत सामग्री के वितरण में कुछ जनप्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता स्वयं आगे आकर उसका श्रेय लेने में लगे हैं। वहीं अपने निजी स्तर से राहत सामग्री उपलब्ध कराने के सवाल पर कई राजनीतिक दावेदारों की सक्रियता दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद प्राथमिकता है या आगामी चुनाव की तैयारी? टिकट के दावेदारों की बढ़ी सक्रियता: आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों में टिकट के संभावित दावेदारों की गतिविधियां पहले से ही तेज हैं। बाढ़ को चुनाव से पहले की अंतिम बड़ी बाढ़ के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचने वाले राजनीतिक चेहरों की संख्या भी बढ़ती
दिखाई दे रही है।कई संभावित दावेदार स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के राहत वितरण कार्यक्रमों में पहुंचकर ग्रामीणों से संपर्क साध रहे हैं। कहीं खाद्य सामग्री बांटी जा रही है तो कहीं पानी, कपड़े और अन्य जरूरी सामान का वितरण किया जा रहा है। राहत वितरण के दौरान राजनीतिक दावेदारों की मौजूदगी और उसके प्रचार-प्रसार को लेकर भी चर्चाएं हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले जनता के बीच लगातार संपर्क बनाए रखना हर दावेदार की रणनीति का हिस्सा होता है। ऐसे में बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनना और राहत कार्यों में भागीदारी करना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारी राहत का श्रेय लेने की होड़? सरकार की ओर से बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए राहत सामग्री भेजी जा रही है। जिला प्रशासन की निगरानी में अलग-अलग क्षेत्रों में राहत पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी प्रभावित गांवों तक पहुंचकर स्थिति का जायजा ले रहे हैं तथा जरूरत के अनुसार राहत कार्य संचालित कर रहे हैं।लेकिन दूसरी ओर, राहत सामग्री वितरण के कार्यक्रमों में राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी और उनके प्रचार को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्ष और स्थानीय स्तर पर चर्चाओं में यह सवाल उठ रहा है कि सरकार की ओर से भेजी गई सामग्री का वितरण करना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है या इसे राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर प्रस्तुत करना? अपनी जेब पर ताला, सरकारी राहत पर स्वागत-सत्कार बाढ़ पीड़ितों की मदद के नाम पर राजनीतिक सक्रियता तो दिखाई दे रही है, लेकिन निजी स्तर पर राहत सामग्री उपलब्ध कराने के मामले में कई राजनीतिक चेहरों की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा के समय यदि कोई जनप्रतिनिधि या चुनावी दावेदार वास्तव में लोगों की मदद करना चाहता है तो उसे सरकारी राहत के साथ-साथ अपने स्तर से भी जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए।लोगों का सवाल है कि यदि राहत सामग्री सरकार की ओर से आई है तो उसका वितरण करना प्रशासन और संबंधित व्यवस्था की जिम्मेदारी है। ऐसे में नेताओं द्वारा केवल वितरण कार्यक्रम में पहुंचकर फोटो खिंचवाने और उसका प्रचार करने से बाढ़ पीड़ितों की वास्तविक समस्या का समाधान नहीं होगा। सड़कें कटीं, गांवों का संपर्क टूटा, ग्रामीण परेशान बाढ़ का असर केवल घरों और खेतों तक सीमित नहीं है। कई स्थानों पर सड़कें कट जाने से ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क प्रभावित हुआ है। आवागमन बाधित होने के कारण ग्रामीणों को बाजार, अस्पताल और अन्य जरूरी स्थानों तक पहुंचने में परेशानी हो रही है। पशुपालकों के सामने पशुओं के चारे और सुरक्षित स्थान की समस्या भी बनी हुई है।ऐसे हालात में ग्रामीणों को राजनीतिक भाषणों और फोटो से ज्यादा ठोस मदद की जरूरत है। उन्हें उम्मीद है कि प्रशासन और सरकार राहत सामग्री के साथ-साथ चिकित्सा, पेयजल, पशु चारा, नाव और आवागमन जैसी व्यवस्थाओं को भी प्राथमिकता देगी। चुनाव से पहले बाढ़ ने नेताओं की परीक्षा भी ली आगामी विधानसभा चुनाव से पहले आई यह बाढ़ राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। चुनाव से पहले जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे संभावित प्रत्याशियों के लिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचना एक अवसर भी है और परीक्षा भी।अब देखना यह होगा कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद राहत कार्यों में सक्रिय दिखाई देने वाले राजनीतिक चेहरे क्या ग्रामीणों के बीच लंबे समय तक मौजूद रहते हैं या राहत सामग्री वितरण के साथ उनकी सक्रियता भी समाप्त हो जाती है। फिलहाल कायमगंज, सदर और अमृतपुर विधानसभा क्षेत्रों के बाढ़ प्रभावित गांवों में ग्रामीणों को वास्तविक राहत की जरूरत है। जो राहत पंहुची उसमे सरकारी राहत की मात्रा अधिक हैँ | इस समय में राजनीतिक श्रेय की होड़ से ऊपर उठकर यदि जनप्रतिनिधि और टिकट के दावेदार अपने संसाधनों से भी पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आएं तो निश्चित रूप से इसका लाभ उन परिवारों को मिलेगा, जो बाढ़ के कारण इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं।
बाढ़ में बहती सियासत: सरकारी राहत सामग्री के सहारे चेहरा चमकाने में जुटे नेता जी!
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