बाल कैंसर दिवस विशेष: गलत रहन-सहन व खानपान से बच्चों में पनप यह बीमारी

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फर्रुखाबाद:(जेएनआई ब्यूरो) कैंसर ऐसी बीमारी है जो शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकती है। इसी के आधार पर अलग-अलग 100 से ज्यादा तरह के कैंसर अब तक पहचाने गए हैं। मगर बच्चों में होने वाले ज्यादातर कैंसर रोगी एक ही तरह की बीमारी का शिकार होते हैं और वह है ब्लड कैंसर।
हर साल 15 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय बाल कैंसर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य बच्चों में होने वाले कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाना तथा कैंसर के गुणवत्तापूर्ण उपचार के लिए कार्य करना है। कैंसर बच्चों में बहुत बड़ा मृत्यु कारक है।
जनपद के दो मासूमों ने ब्लड कैंसर से जीती जंग
अंशिका त्रिवेदी को महज 16 साल की उम्र में ब्लड कैंसर एएमएल (एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया) हो गया था। अंशिका ने बताया कि शुरू से कभी मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। वर्ष 2017 में अचानक मुझे लेट्रिन से ब्लड आया तो मैं डर गई उसके बाद बुखार आया और चक्कर आने लगा। इसके बाद काफी डॉक्टरों को दिखाया सबने यही बात बताई कि कमजोरी है अच्छा खान-पान किया जाए।
इसके बाद जब मुझे कोई आराम नहीं मिला तो आगरा के अस्पताल में इलाज कराया| मेरी हालत बहुत ही नाजुक थी मुझे तीन दिन तक आईसीयु में रखा गया| जहाँ पर सभी जांचे हुई तो मेरे माता पिता को मेरे कैंसर ग्रसित होने की बात पता चली|  तो जैसे हम लोगों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा पर हिम्मत नहीं हारी| मुझे फिर दिल्ली में एम्स अस्पताल के कैंसर विभाग में दिखाया गया जहाँ पर चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ० समीर बख्सी ने मेरा इलाज किया मेरी कीमो होती थी, मेरे बाल झड़ने लगे, जिससे मुझे काफी खराब लगता था।
अंशिका कहती हैं कि जब में अस्पताल आती थी तो बोर्ड पर कैंसर रोग के बारे में लिखा देखती थी। फिर सोचती थी कि मुझे कैंसर नहीं होगा, होता तो मम्मी पापा जरूर बताते। फिर धीरे-धीरे समझ आ गया कि मुझे कैंसर है। यह सुनकर मैं बुरी तरह से टूट गई थी फिर मम्मी पापा पर गुस्सा आया कि उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया। फिर यह ख्याल आया कि वो कितनी तकलीफ में होंगे। मेरे एक भाई है और मैं अपने माता पिता की अकेली बेटी हूँ | मम्मी अभी भी मुझे लेकर काफी फिक्रमंद रहती हैं। दो साल तक इलाज करने के बाद आज मैं कैंसर मुक्त हूं। अंशिका कहती हैं कि अपनी पढाई समाप्त करने के बाद किसी एनजीओ के साथ मिलकर कैंसर पीड़ित बच्चों के लिय कुछ करना चाहूंगी |
प्रशांत गुप्ता निवासी चांदपुर के बेटे शौर्य को 4 साल की उम्र में ब्लड कैंसर हुआ था। शौर्य के बाबा पदम् गुप्ता ने बताया कि शौर्य अक्सर बीमार रहता था, उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था । स्थानीय डॉक्टरों का इलाज चलता था वो ठीक हो जाता था बाद में फिर से बीमार पड़ जाता था।25 दिसम्बर 2019 में पीजीआई लखनऊ लेकर गया जहां जांच में उसे ब्लड कैंसर, एएलएल की पुष्टि हुई। जहां पर उसका आज भी इलाज चल रहा है लेकिन अब वह स्वस्थ है । शौर्य के बाबा कहते हैं कि यह बेहद मुश्किल होता है कि आपका बच्चा आपकी नजर के सामने इतनी बड़ी बीमारी से लड़ रहा है। इसी बीच आपको हिम्मत नहीं हारनी है साथ में बच्चे को भी नार्मल रखना है। कैंसर से जूझ रहे अभिभावकों को ज्यादा मनोबल की जरूरत होती है अस्पताल में आने वाले अभिभावकों को मुश्किल की घड़ी में प्यार के दो बोल बोलने से बड़ा सहारा मिलता है।
जोगराज अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. युवराज सिंह का कहना है कि ल्यूकेमिया एक तरह के ब्लड कैंसर की शुरुआती स्टेज है। इसका इलाज आसानी से किया जा सकता है, मगर तब जब इस रोग का शुरुआत में ही पता चल जाए। ल्यूकेमिया की सही समय पर जांच और चिकित्सा से इसे ठीक किया जा सकता है। बच्चों के कैंसर का इलाज बहुत बेहतर होता है| बच्चों में कैंसर सबसे जादा अमेरिका में मिलता है| उसके जोगराज अस्पताल में दो बच्चे थे जो ठीक हो गये|
अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी व गैर संचारी रोगों के नोडल अधिकारी डॉ० दलवीर सिंह का कहना है कि कैंसर लाइफ स्टाइल से जुड़ी बीमारी है यानि यह बीमारी इंसानों में उनके अनियमित रहन-सहन और गलत खानपान की वजह से बढ़ रही है। बच्चे भी इस खतरनाक और जानलेवा बीमारी का तेजी से शिकार हो रहे हैं। इससे बचाव के लिए दिनचर्या बेहतर करने की जरूरत है।

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