हिंदी पत्रकारिता विशेष- खबरों के पुराने खंजर

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30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस होता है| देश भर के छोटे मीडिया संस्थानों और स्थानीय कस्बो में पत्रकारिता का जश्न मनाये जाने का दिन| मझोले और बड़े मीडिया संस्थान ऐसे दिवस नहीं मनाते| वे सतर्क रहते है कि हिंदी दिवस के बहाने मंच पर कोई उझबकी पत्रकार मीडिया मालिको के कपडे न उतार दे| अर्थयुग में ये बड़ी समस्या है| अंग्रेजीदां आदमी अपनी भाषा का रौब दिखाता है। लेकिन हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। अदालतों में हिंदी में बहस नहीं होती है। मुअक्किल को पता ही नहीं कि बहस उसके पक्ष में हो रही कि विपक्ष में, यह बड़ा दुखद है। हिंदी पूरे भारत में स्वीकार्य है। हिंदी को हम जितना अधिक बोलचाल में लेकर आएंगे। हिंदी उतनी ही समृद्ध हो जाएगी।

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इन्टरनेट पर हिंदी की स्वीकार्यता भी खूब बढ़ी है| अब हिंदी में सर्च हो रहा है और गूगल भी हिंदी के आगे नतमस्तक न होता तो करोडो के पाठक गवां देता| वैसे भाषा संवाद का माध्यम होती है उसमे प्रमुखता संवाद की होनी चाहिए ऐसी भाषा का क्या मतलब जिसे समझने के लिए शब्दकोष तलाशना पड़े| आज मोबाइल पर हिंदी में पढ़े जाने वाले कंटेंट खूब होने लगे है| आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर जेएनआई पर कुछ पुराने संस्मरण पेश कर रहा हूँ जो कभी भी पुराने नहीं हो सकते क्योंकि आज भी इससे नई पीड़ी के नारदियो को उर्जा मिलती है|

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