नये नियमों ने उड़ाई पुरानों की नींद,सहकारी संगठनों पर वर्चस्व की लड़ाई,

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लखनऊ: भाजपा सहकारी संगठनों पर वर्चस्व के लिए लगातार उपक्रम कर रही है। पहले नियमावली में संशोधन कर समितियों के सदस्य बनने और चुनाव लडऩे की प्रक्रिया बदली गई। अब प्रशासकीय अधिकार के जरिये सपा की घेराबंदी की जा रही है। पिछले दो दशक में सहकारी समितियों पर सपा का वर्चस्व हो गया है। भाजपा सरकार ने कई ऐसे नियम बनाए हैं जिनमें सपा घिर गई है।

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प्रदेश में सात हजार प्रारंभिक कृषि ऋण सहकारी समितियां और करीब तीन हजार आवास समितियां हैं। सरकार ने सहकारी समितियों के चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिए हैं। इस चुनाव कार्यक्रम से पहले ही सरकार ने नियमों में संशोधन किये। पहले यह तय था कि 120 दिन पुराने सदस्य को ही चुनाव लडऩे का मौका मिलेगा लेकिन, नये संशोधन में यह अवधि घटाकर 45 दिन कर दी गई। इस बीच निकाय चुनाव के चलते सहकारिता चुनाव कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया।

सरकार ने नियमावली में एक और बड़ा संशोधन किया। दो बार समिति में लगातार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष रहने वालों को तीसरी बार चुनाव लडऩे पर रोक लगा दी गई। इसका सीधा असर यह हुआ कि सहकारिता की चुनावी लड़ाई में वर्षों से काबिज होते आ रहे लोग स्वत: बाहर हो गए। पिछली सरकार ने प्रशासकीय अधिकार समाप्त कर दिए थे। इस बार योगी की कैबिनेट ने सहकारी संस्था के कर्मचारियों के स्थानांतरण, निलंबन और अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रारंभ करने का अधिकार शीर्ष संस्था के प्रबंध निदेशक को सौंप दिया है।

अब एमडी द्वारा अपने अधिकार का उपयोग कर वर्षों से जमें लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। इस तरह सहकारी संगठनों पर वर्चस्व के लिए भाजपा सरकार ने न केवल लड़ाई छेड़ दी है, बल्कि सपा की मजबूत घेरेबंदी कर दी है।

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