लिंजीगंज अस्पताल में बदहाल व्यवस्था, सोते मिले कर्मचारी

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FARRUKHABAD : वैसे तो स्वास्थ्य महकमें की स्थिति से अब सभी भली भांति परिचित हैं। फिर भी व्यवस्था में दिनों दिन कोई सुधार नहीं हो रहा है। लोहिया अस्पताल की बदहाल व्यवस्था तो किसी तरह से ढर्रे पर चल रही है लेकिन जिस तरह से लिंजीगंज अस्पताल सफेद हाथी बना हुआ है उससे आये दिन मरीज भटकते रहते हैं।

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7 जुलाई 2010 को बसपा के तत्कालीन स्वास्थ्यमंत्री अंटू मिश्रा के द्वारा लिंजीगंज स्वास्थ्यकेन्द्र का उदघाटन किया गया था। जिसमें लोहिया अस्पताल जैसी ही सारी सुविधायें मुहैया कराने की बात कही गयी थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। डाक्टरों के अभाव और बचे खुचे डाक्टरों की लापरवाही के चलते लिंजीगंज स्वास्थ्यकेन्द्र सफेदहाथी बना हुआ है। न ही मरीजों के भर्ती होने की कोई व्यवस्था है, न ही उनके उपचार की। वर्तमान में महज डा0 अंकुर, डा0 दीपक कटारिया के अलावा, सीएमएस सरला रघुवंशी के कंधों पर पूरे अस्पताल की देखरेख है। यह बात तो मानने वाली है कि कर्मचारियों की कमी है, लेकिन कमी होने के बावजूद भी कर्तव्यपरायणता में यह कितना खरे उतर रहे हैं, किसी से छिपा नहीं है। दोपहर बाद लिंजीगंज अस्पताल में जेएनआई के कैमरे में कैद हुईं तस्वीरों को तो देखकर लगता khali pade badहै कि जैसे इस अस्पताल में इंसान आते ही नहीं। चारों तरफ खूंखार कुत्ते विचरण करते फिर रहे हैं। दरबाजे से घुसते ही सफाई कर्मचारी मुन्नी चारपाई पर सोती मिली और स्टाफनर्स सोयश दयाल एक कुर्सी पर बैठी हुई थीं। बाकी न आपातकालीन चिकित्साकक्ष में कोई डाक्टर था और न ही फार्मासिस्ट कक्ष मे। 1 मई से तो किसी भी प्रकार का मरीज भर्ती ही नहीं किया गया। मौके पर मौजूद सफाईकर्मी मुन्नी ने मीडियाकर्मियों के पहुंचने के बाद डाक्टर अंकुर व फार्मासिस्ट को सूचना दी।

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सूचना पर डाक्टर अंकुर व फार्मासिस्ट के के अस्थाना मौके पर तो आ गये लेकिन जब उनसे मरीजों के पंजीकरण रजिस्टर मांगा तो उन्होंने दिखाने से इंकार कर दिया। डा0 doctor roomअंकुर ने कहा कि वह सरकारी मामला है इसे वह नहीं दिखायेंगे। जिसके बाद डा0 अंकुर की फोन पर मुख्य चिकित्साधिकारी डा0 राकेश कुमार ने जमकर क्लास लगा दी और तत्काल मरीज उपस्थित रजिस्टर दिखाने की बात कही। तब जाकर मरीजों का उपस्थिति रजिस्टर डाक्टर ने दिखाया। अस्पताल में शौचालय, महिला बार्ड, पुरुष शौचालय में ताले लटके मिले। बार्ड पूरी तरह से खाली थे। जिसमें एक भी मरीज नहीं था।

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