उच्च न्यायालय ने माना शस्त्र लाइसेंस को व्यक्ति का मूल अधिकार

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उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा है कि अपनी रक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस लेना व्यक्ति के जीवन के मूल अधिकार में शामिल है। यदि कोई नागरिक शस्त्र लाइसेंस की मांग अपनी सुरक्षा के लिए करता है तो उसकी मांग मनमाने तौर पर अस्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने बार-बार निर्देश के बावजूद शस्त्र लाइसेंस देने से इनकार करने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। गाजियाबाद के एक याचिका कर्ता के पक्ष में दिये गये निर्णय में उन्होंने राज्य सरकार पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाते हुए जिलाधिकारी को शस्त्र लाइसेंस के मामले में नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार को हर्जाना राशि  जिम्मेदार अधिकारी से वसूल करने की छूट दी है।

गाजियाबाद के साहिबाबाद करहैदा निवासी तेज पाल सिंह चौहान का कहना था कि हाईकोर्ट द्वारा जिलाधिकारी को दो बार निर्णय लेने के आदेश दिए जाने के बावजूद एक ही आधार पर अर्जी निरस्त कर दी गई। जिलाधिकारी का मानना है कि याची शस्त्र चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं है और भाइयों के बीच सिविल वाद चल रहा है। लिहाजा शस्त्र का दुरुपयोग हो सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि शस्त्र लाइसेंस देने से केवल इस आधार पर इनकार किया जा सकता है कि स्वयं की सुरक्षा के नाम पर लाइसेंस लेकर उसका वह दुरुपयोग कर सकता है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों को अंग्रेजी राज की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्हें जनतांत्रिक देश के कानून के मुताबिक फैसला लेना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन की सुरक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस लेने का अधिकार है।