“छोटू” की आंखों में हसरतों के दिये और हाथों में करवा, कलैंडर….

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फर्रुखाबाद: कल मनाये जाने वाले सुहागिनों का सबसे बड़ा वृत करवाचौथ की तैयारियों में कई बड़े दुकानदार अपनी दुकानों को कई फुट आगे बढाकर सामान सजाये हुए हैं वही दूसरी तरफ एक मासूम बच्चा बंटी खुद को चलती फिरती दूकान बनाए गर्दन में करवाचौथ के कैलेण्डर टाँगे आवाज लगाते ५ रूपये, ५ रूपये चिल्ला रहे हैं| लेकिन करवाचौथ क्या होता है इसके बारे में पूंछे जाने पर अपनी भाषा में आश्चर्य से कहते हैं कि जौ का होत है हमे नाहीं मालूम….हम तो बस ५ रुपया को कलनडर बेच रहे है भैया ले लो न एक चलो ४ रुपया ही दे दियो? मासूम की समझदारी से द्रवित बेचारा पत्रकार खुद को अविवाहित बताकर कन्नी काट आगे बढ़ गया| पर “बंटी” की बड़ी बड़ी काजल लगी मासूम आंखों में टिमटिमाते हसरतों के दिये शायद ही किसी को नजर आये हों।

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एक तरफ सरकार सब पढ़े सब बढे का नारा देकर खुद अपने आप अपनी पीठ ठोंक रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसे मासूम सड़क पर घूमकर दो वक्त की रोटी के लिए इस निर्दयी संसार सेजूझ रहे हैं| इन्हें जगह-जगह होटलों में “छोटू” कहकर बुलाया जाता है या मैकेनिक की दूकान में अबे कमीने मर गया? जैसे अपशब्द व गाली देकर आवाज लगाई जाती है| होटल पर काम करता छोटू हो या मैकेनिक की दूकान पर हथियार पकडे “पप्पू”?? क्या यही है हमारा भविष्य का नागरिक? इतना सब देखने के बाद जब उस मासूम बंटी से पूंछा तो उसने जवाब दिया कि मेरे घर में पिता जी शराब पीते हैं व कभी-कभी ही काम पर जाते हैं| घर का खर्च चलाने के लिए माँ और मै खुद कोई न कोई काम करता रहता हूँ|

बंटी ने बताया कि मेरी माँ ने सड़क के किनारे टाट बिछवाकर चूरा की दुकान लगवा दी| व मेरे गले में ये कैलेण्डर टांग दिए| बस फिर क्या करवाचौथ और क्या दीवाली सिर्फ बिक्री ही करना है| करवाचौथ के बारे में उसे  कुछ नहीं मालूम| बंटी ने बताया कि अभी कलेंडर बेंचूंगा व दीपावली को रुई डालिए में रखकर फेरी लगाऊंगा| उस मासूम ने बताया कि दीपावली वाले दिन जब सारे बच्चे अपने माँ-बाप के साथ पटाखे छुडा रहे होते हैं तब मै अपनी माँ के साथ दुकान लगाए रहता हूँ जब तक दुकान खत्म होती है तब तक दीवाली भी समाप्त हो जाती है| ऐसे हजारों बंटी हैं जो दीपावली की चमक व होली के रंग के बारे में अछूते रह जाते हैं, और हम अपनी खुशियों के बीच इनकी चीत्कार सुन नहीं पाते। आइये इस दीपावली पर अपने आस पड़ोस में भी झांक कर देखें, कोई बंटी, पप्पू या छोटू आंखों में हसरतों के चिराग लिये तो नहीं बैठा।

 

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