यूपी पीसीएस-2011 में कैसे छाए यादव

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9september2010murder investigationडेस्क: उत्तर प्रदेश पीसीएस-2011 की मुख्य परीक्षा के नतीजे पिछले साल जुलाई में जब आए तो वे अपने साथ एक तूफान भी लेकर आए थे. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों में लगातार धांधली का आरोप लगाते आ रहे छात्रों के सब्र का बांध अचानक टूट गया और इलाहाबाद
की सड़कों पर जमकर बवाल हुआ. गोलियां चलीं, सिर फूटे, बसों के शीशे टूटे और गिरफ्तारियां हुईं. छात्रों का आरोप था कि दूसरे इम्तिहान तो अपनी जगह हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पीसीएस इम्तिहान तक में पूरी तरह ‘‘यादववाद’’ चला है|

छात्रों ने इस तरह के नतीजों के लिए आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव पर पक्षपात के आरोप लगाए. यादव इन आरोपों से बच भी नहीं सकते थे क्योंकि आयोग के अध्यक्ष के नाते किसी भी परीक्षा परिणाम की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है. बाद में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नीतियों में बदलाव किया और न्याय की उम्मीद में छात्र अपने कमरों में लौट गए. इसके बाद दिसंबर 2013 में
पीसीएस-2011 का फाइनल रिजल्ट सामने आया और छात्रों का भरोसा फिर टूट गया. आयोग को पता था कि ये नतीजे नया बखेड़ा लेकर आएंगे इसलिए आयोग ने बड़ी सफाई से पहले तो नंबर ही एक महीने बाद सार्वजनिक किए और वे भी इस तरह कि कोई छात्र सिर्फ अपने नंबर देख सके, वह भी पासवर्ड से. यानी उत्तर प्रदेश पीसीएस-2011 में क्या गोरखधंधा हुआ, इसे बड़ी सफाई से छुपा लिया गया|

लेकिन इंडिया टुडे ने चार महीने की पड़ताल के बाद आयोग के सिमसिम दरवाजे को खोल लिया और परीक्षा में मिले नंबरों के गोरखधंधे तक पहुंच बनाई. इंडिया टुडे ने पीसीएस-2011 में सफल हुए सभी 389 अभ्यर्थियों के आधिकारिक अंकपत्र की प्रतियां हासिल कीं, जो न तो आरटीआइ के जरिए दी जा रही हैं और न ही कोई छात्र किसी दूसरे छात्र के अंक आयोग की वेबसाइट पर देख सकता है|

बहरहाल, पीसीएस-2011 के नतीजों में दो तथ्य सबसे चौंकाने वाले रहे. पहला-अन्य पिछड़ा वर्ग में चयनित 86 छात्रों में से करीब 50 छात्र यादव जाति के रहे. इससे भी बड़ा चौंकाने वाला तथ्य रहा-एकाध अपवाद को छोड़कर यादव जाति के सफल अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में 200 में से 135 से 140 के बीच अंक मिलना (देखें टेबल-2). 140 अंक का आंकड़ा इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि आयोग में
पिछले कुछ साल से परंपरा रही है कि छात्रों को साक्षात्कार में 80 से 140 के बीच अंक दिए जाते हैं. अगर किसी को 80 से कम या 140 से ज्यादा अंक मिलते हैं तो साक्षात्कार मंडल का अध्यक्ष उस पर अपनी विशेष टिप्पणी करता है|

यानी बिना किसी अतिरिक्त जवाबदेही के साक्षात्कार में 140 तक अंक दिए जा सकते हैं. परीक्षा परिणाम में ऐसा संयोग बना कि यादव जाति के वे छात्र जिनके अंक मुख्य परीक्षा में तमाम दूसरे छात्रों से कम थे, वे भी साक्षात्कार में अधिकतम अंक पाने में कामयाब रहे.
दूसरी ओर सामान्य वर्ग के छात्रों को साक्षात्कार में औसतन 115 अंक, गैर यादव ओबीसी जातियों के छात्रों को औसतन 110 अंक और अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों को साक्षात्कार में औसतन 105 अंक मिले. पीसीएस के टॉपर हिमांशु कुमार गुप्ता को भी साक्षात्कार में महज 115 अंक ही मिले (देखें-टेबल 1, 3 और 4). यही नहीं, सामान्य श्रेणी में जो ओबीसी कैटेगरी के छात्र अपग्रेड हुए हैं, वे सारे छात्र भी संयोग से सिर्फ यादव जाति के हैं. सामान्य कैटेगरी में चयनित हुए यादव छात्रों को मिला लिया जाए तो कुल यादव छात्रों की संख्या 54 तक पहुंच जाती है (सफल यादव अभ्यर्थियों की यह संख्या उनके उपनाम में जुड़े यादव शब्द और कुछ मामलों में जुटाई गई जानकारी पर आधारित है|

(वैसे ही आंकड़े में मामूली संशोधन की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है).
साक्षात्कार के अंकों के अलावा मुख्य परीक्षा में अपनाई जा रही स्केलिंग प्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं| स्केलिंग व्यवस्था इसलिए अपनाई जाती है कि गणित और विज्ञान जैसे कई विषयों में कला संकाय के कई विषयों की तुलना में ज्यादा नंबर दिए जाते हैं. इस
विविधता को एकरूपता देने के लिए छात्र को मिले वास्तविक अंकों को स्केलिंग फॉर्मूले के हिसाब से संशोधित कर दिया जाता है. आयोग परीक्षा के विज्ञापन के समय इस फॉर्मूले को प्रकाशित करता है. प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे विक्की खान के शब्दों में, ‘‘करीब एक पन्ने के इस फॉर्मूले को आम आदमी ठीक वैसे ही समझ सकता है, जैसे क्रिकेट प्रेमी डकवर्थ लुइस फॉर्मूले को समझते हैं. समझने से
ज्यादा उस पर भरोसा करना होता है.’’ लेकिन पीसीएस-2011 में यह भरोसा भी टूटा है. मुख्य परीक्षा के हिंदी के पेपर को लें तो एक छात्र को पहले और दूसरे पेपर में क्रमशः 140 और 132 नंबर मिले, जिन्हें स्केलिंग के बाद 187.47 और 158.32 आंका गया. वहीं दूसरे छात्र के 140 और 120 नंबरों को क्रमशः 136.82 और 118.11 आंका गया. इन दोनों मामलों में भी संयोग से स्केलिंग में ज्यादा नंबर पाने वाले
छात्र यादव हैं|
पीसीएस परीक्षा के अंतिम परिणाम का यह विश्लेषण एक बार फिर आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव की भूमिका को संदिग्ध बना देता है. हालांकि यादव का इस बारे में कहना है कि आयोग के अध्यक्ष का पद संवैधानिक है और ‘‘मुझे न्यायाधीशों की तरह प्रतिक्रिया देना अनिवार्य नहीं है.’’ लेकिन वे यह जुमला जोडऩा नहीं भूलते कि मामला ‘‘अदालत में विचाराधीन है.’’ इस मसले पर बातचीत
आयोग के सचिव करते हैं और उनका भी नाम संयोग से अनिल कुमार यादव है| लेकिन इस इनकार के बावजूद पहले से ही जाति विशेष
को सरंक्षण देने के आरोपों से घिरी और लोकसभा चुनाव 2014 में मात खा चुकी सपा सरकार के लिए पीसीएस परीक्षा का यह विश्लेषण नया सिरदर्द देने वाला है. आयोग के कई परीक्षा परिणामों को इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनौती देने वाले वकील संतोष श्रीवास्तव की बात पर गौर करें, ‘‘सबसे पहला सवाल यह उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश में ओबीसी में कोई 234 जातियां शामिल हैं. ऐसे में अगर सिर्फ एक जाति के लोग ओबीसी का 58 फीसदी कोटा ले जाएंगे और बाकी 230 जातियां सिर्फ 42 फीसदी हिस्सेदारी पर सिमट जाएंगी तो आरक्षण की मूल भावना का मतलब ही क्या रहेगा. कोई कितना भी मेधावी क्यों न हो, लेकिन ये नतीजे जाति विशेष की ओर नतीजों का झुकाव दिखा रहे हैं.’’
उधर, ‘‘प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति’’ के बैनर तले पीसीएस-2011 के नतीजे के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले अवनीश कुमार पांडेय सीधे आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हैं, ‘‘इलाहाबाद में लड़के-लड़कियां 10-10 साल से इस उम्मीद में तैयारी करते रहते हैं कि एक न एक दिन उनकी मेहनत रंग लाएगी. लेकिन आयोग जिस तरह से हर परीक्षा परिणाम में एकतरफा रवैया अपना रहा है, उससे छात्रों का दिल टूट रहा है और दिमाग गुस्से से उबल रहा है.’’ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ‘‘ब्राह्मी’’ सामान्य हिंदी’’ किताब के लेखक अवनीश की बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. सपा के एक वरिष्ठ राज्यसभा सांसद के करीबी माने जाने वाले यादव के
लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बनने के बाद आए कुछ अन्य परीक्षा नतीजों पर गौर करें तो भी ‘‘यादववाद’’ के आरोप को बल मिलता है. पिछले साल सीधे इंटरव्यू के जरिए पीडब्ल्यूडी में जूनियर इंजीनियर (कंप्यूटर) के 48 पदों पर हुई भर्ती में ओबीसी के हिस्से में 58 फीसदी (यादव 42 फीसदी) और सामान्य वर्ग की श्रेणी में 23 फीसदी (ब्राह्मण 12.5 फीसदी) पद आए. राज्य सरकार के संस्कृति निदेशालय में क्षेत्र सहायक के एक मात्र पद पर जब इंटरव्यू के माध्यम से भर्ती हुई तब भी इसी जाति का अभ्यर्थी सबसे योग्य निकला. कॉमर्स प्रवक्ता पद पर जब दो भर्तियां होनी थीं तो आरक्षित और अनारक्षित दोनों पदों पर जाति विशेष के व्यक्ति का चयन हुआ. समाजशास्त्र के प्रवक्ता के लिए जब 19 पदों पर भर्तियां हुईं, तो सामान्य वर्ग की 9 सीटों में से 4 सीटें यादव जाति के खाते में चली गईं. सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी के लिए इलाहाबाद आए गरीब परिवार के 23 वर्षीय शालिग्राम बिंद की हताश टिप्पणी देखिए, ‘‘अगर इसी तरह यादवों की भर्ती होती रही तो हम जैसे दबों- कुचलों को तो पीसीएस में बैठने का इरादा ही छोड़ देना चाहिए.’’ हिंदी साहित्य, अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र से बी.ए. करने के बाद कंपीटिशन की दुनिया में कदम रखने वाले इस अति पिछड़ा वर्ग के लड़के का पस्त हौसला आयोग की साख के संकट को और बढ़ा देता है. जौनपुर से इलाहाबाद आए 37 वर्षीय जटाशंकर मौर्य 2011 का पीसीएस मेन्स क्वालीफाइ नहीं कर पाए और अब कहते हैं, ‘‘पीसीएस का जो हुआ सो हुआ, जिन परीक्षाओं के नतीजे आने हैं, अगर उनमें भी यही नतीजा रहा तो मैं तो बरबाद हो जाऊंगा.’’
नतीजों में पक्षपात किया गया है या फिर यादव समाज के अभ्यर्थी वाकई अत्यंत मेधावी हो गए हैं, यह तो अदालतें या आयोग के कर्ताधर्ताओं का अंतःकरण की बता सकता है.

लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए ऐसे परिणाम शुभ सियासी संकेत तो जरूर ही नहीं लाएंगे. क्या कहते हैं अध्यक्ष वहीं यूपी पीसीएस के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव कहते हैं, ” आयोग के अध्यक्ष का पद संवैधानिक पद है और मैं कोई प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य नहीं हूं. वैसे भी मामल अभी अदालत में है.”
(यूपी पीसीएस के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव )
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