सपा सरकार में ही सपा कार्यकर्ताओ पर पुलिस की घेराबंदी क्यों? बोया पेड़ बबूल का…

Editorफर्रुखाबाद: कक्षा 5 में सवाल पढ़ाया और पूछा जाता था कि “बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय”| इस मुहावरे का प्रयोग शायद वो लोग नहीं कर पाये जिन्होंने नक़ल छाप स्कूलों से फर्स्ट डिवीज़न प्रमाण पत्र हासिल किये और नेताजी से सम्मानित हुए| ऐसे ही छात्र आज राजनीति में नारे लगा रहे है और अपनी ही सरकार में पुलिस की घेराबंदी के शिकार हो रहे है| क्या दोष छात्रों या कार्यकर्ताओ का है? शायद नहीं| जिस स्कूल में पढ़े वहां नक़ल उपलब्ध थी और जहाँ राजनीती सीखी वहां भी वही करना शायद यही सिखाया गया, जो बीते दिनों अपने ही मंत्री शिवपाल सिंह यादव के स्वागत में कर बैठे| आखिर नेताजी ही कभी नारा दिया था- “बंद तुम्हारी खुली हमारी” और “हल्ला बोल”|

तो जैसे कोचिंग मिली उसी का रूप देखने को मिल रहा है| अपनी ही सरकार में सपा महासचिव के जिला आगमन पर रस्सो से घेर दिए गए सपा के कार्यकर्ता| ताकि सपा के महासचिव की क्लास में पहले जैसा हुल्लड़ प्रदर्शन न हो सके| क्योंकि शिवपाल सिंह ने भले ही छोड़ दिया, महासचिव को बर्दास्त नहीं होगा| मगर प्रदर्शन तो हुआ, अंदर भी और बाहर भी| अंदर टीका टिपण्णी और दूसरो को नीचे दिखाने का काम और बाहर नारेबाजी| अंदर कोई किसी को कांग्रेसी तो कोई भाजपाई बता रहा था तो बाहर मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे| इतना सब होने के बाद भी आम जनता को खबर नहीं मिली| आम जनता आम समय में अब इस सब को आम बात मानती है| सिर्फ चुनाव के समय ही मंथन करती है कि कौन हुल्लड़बाज, कौन लफ़्फ़ाज़, कौन बडबुक, कौन जमीनी, कौन आसमानी और किसने की कितनी बेईमानी| उसी आधार पर ईवीएम का बटन दबा देता है| देख लो न दिल्ली का नजारा| करे रहो हुड़दंग और लगाये रहो अखबारों की कतराने अपनी फाइल में|

बात चली तो बता दे मगर सबूत नहीं है| जिले के कई सीनियर और लालबत्ती धारी नेताओ ने आम चर्चाओ के दौरान बताया था कि सपा के मुखिया मुलायम सिंह सपा कार्यकर्ताओ को अधिकारियो से काम करवाने के कैसे कैसे तरीके सिखाते है| उन्ही में से कुछ का प्रदर्शन सपा कार्यकर्ताओ ने मुलायम सिंह के अनुज और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के आगमन पर हेलीपेड पर स्वागत में कर डाला| धक्कामुक्की, नारेबाजी और अराजक प्रदर्शन| अपनी ही सरकार के खिलाफ| अपनी ही सरकार के अधिकारियो के खिलाफ| अपने ही सपा नेताओ के खिलाफ| महिलाओ को धकिया दिया| बुजुर्गो को धकिया दिया| बेचारे नीचे गिर पड़े| मगर हुल्लड़बाज कार्यकर्ताओ को न तो शर्म आई और न ही कोई मलाल हुआ| आखिर कोचिंग तो ऐसी ही मिली थी शायद| इसे कहते है “बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय”|

पिछले पंद्रह सालो में प्रदेश से विपक्ष गायब लगता है| सपा सरकार में बसपा और भाजपा आम आदमी को इन्साफ दिलाने के प्रदर्शन नहीं करते| जो कुछ होता है सत्ताधारी दल को खुद ही करना पड़ता है| बसपा सरकार में बसपाई प्रदर्शन करते रहे और सपा सरकार में सपाई| आखिर जिम्मेदारी विपक्ष की जो निभानी है| अपने अपात्र चहेतो को समाजवादी पेंशन नहीं मिली तो प्रदर्शन| राशन घोटालेबाजी में अफसर कार्यवाही कर दे तो प्रदर्शन| अपने अप्पत्र चहेतो को लोहिया आवास न मिले तो प्रदर्शन| और अफसर न दे तो अफसर के खिलाफ मुख्यमंत्री को चिट्ठी| क्या यही लोकतंत्र है| गरीब अगर विपक्ष का है तो सरकारी लाभ से वंचित रह जाने पर उसके लिए कोई शिकवा शिकायत और प्रदर्शन नहीं| क्या सरकार सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओ, नेताओ और समर्थको के लिए होती है| इस बात को नक़ल माफियाओ के स्कूल/कॉलेज में डिग्री पाने वाले शायद नहीं समझेंगे| वैसे समय बदल रहा है| वर्ना दिल्ली में केजरीवाल के आने की आहात दुबारा न मिलती|