यूनियन बनाकर भिखारियों ने जारी किया फरमान

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beggarरायपुर। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में भिखारियों ने अपना संगठन बनाकर अजीबोगरीब फरमान जारी किया है। भिखारियों ने बगैर दाल और पकवान के होने वाले भिक्षुक भोजों का बहिष्कार शुरू कर दिया है। कई जिलों में पितृपक्ष के दौरान ऐसा ही देखा गया। बताया जाता है कि महंगाई की वजह से पितृपक्ष में भिखारियों को खाना खिलाने की परंपरा भी लगभग खत्म होती जा रही है। राजधानी रायपुर के भिखारी खाना खिलाने वाले जजमान को जो ‘मेनू’ दे रहे हैं, उससे उनके होश उड़ रहे हैं। उनके मेनू में दाल और पकवान को जरूरी कर दिया गया है, जिससे जजमान बिचक रहे हैं। वे भिक्षुक भोज कराने के बजाय सामान्य भंडारा करा रहे हैं। इससे भी भिक्षुक आक्रोशित हैं।

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ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि हिंदू धर्म के अनुसार, पितृपक्ष में कौओं या फिर भिखारियों को भोजन कराने से मृत व्यक्ति की आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है। रायपुर के तिल्दा इलाके में देवारपारा, गोवर्धनपारा, स्टेशन चौक आदि जगहों पर भिखारियों का डेरा है। पितृपक्ष में भिक्षुकों की ज्यादा मांग को देखते हुए तिल्दा के भिखारियों ने अघोषित तौर पर यूनियन बना ली है। यूनियन की सहमति के बगैर कोई भी भिखारी भोज में शामिल नहीं होता। बताया जाता है कि भिखारियों के यूनियन का मुखिया मंगलू केवट है। यदि किसी जजमान को भिक्षुक भोज कराना है, तो सबसे पहले उसे मंगलू से संपर्क करना पड़ता है।

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श्राद्ध में कई शहरवासी हर साल भिक्षुक भोज कराते हैं, लेकिन इस साल उन्हें यह महंगा पड़ रहा है। भिक्षुक भोज के लिए मंगलू से संपर्क करने पर वह जजमान से सबसे पहले एक सवाल करता है। वह पूछता है कि आप भोजन में क्या परोसेंगे? यदि कोई केवल चावल और सब्जी कहता है, तो मंगलू भिक्षुक भोज में आने से साफ मना कर देता है। वह अरहर की दाल और कोई एक पकवान आवश्यक रूप से परोसने को कहता है। इतना सुनते ही जजमानों के होश उड़ जाते हैं।

जानकारी के मुताबिक मंगलू के यूनियन में 100 भिखारी हैं और भोज कराने वालों को इन सभी को भोजन कराना होगा। इतना ही नहीं, 100 में से 20 भिखारी शारीरिक रूप से कमजोर हैं। ये ठीक से चल नहीं पाते। इन्हें रिक्शे पर ले जाना और वापस छोड़ना पड़ेगा। मंगलू की इस मांग से जजमान सोच में पड़ जाते हैं। कुछ लोग राह चलते भिखारियों को बुला रहे हैं और उन्हें द्वार पर खाना देकर भिक्षुक भोज की परंपरा की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं तो कई लोग छोटे से भंडारे का आयोजन कर रस्म पूरी कर रहे हैं। महंगाई के कारण कई लोग खाना खिलाने के बजाय अन्नदान कर यानी चावल और आलू दान कर इस परंपरा को निभा रहे हैं।

तिल्दा निवासी सुनील सिंह ने अपनी माता के श्राद्ध पर भिक्षुक भोज कराने को सोचा और वह भिखारियों के मुखिया मंगलू के पास पहुंचा, लेकिन उसकी लंबी-चौड़ी मांग को सुनकर उल्टे पांव लौट आया। फिर उसने राह चलते भिखारियों को बुला लिया और भोजन कराया। कमोबेश यही स्थिति सूबे के कुछ और इलाकों में भी देखने को मिल रही हैं। ऐसे में अब घर में भिक्षुक भोज कराने के बजाय लोग विभिन्न सामुदायिक भवनों में भोजन करा रहे हैं। तिल्दा में इस काम के लिए लोग झूलेलाल मंदिर के समाजसेवी धनराज खत्री से संपर्क कर रहे हैं। खत्री ने बताया कि वे सिंधी पंचायत भवन में भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं और भिखारियों को सीधे उनके मोहल्ले से बुलाकर यहां भोजन करा रहे हैं।

इसी तरह राजधानी रायपुर में अस्पताल या फिर लाखेनगर सिंधु भवन सहित कई और जगहों पर भोजन करवाए जा रहे हैं। इससे जजमानों का बजट भी ठीक रहता है और भिक्षुक भोज भी हो जाता है। इस साल पितृपक्ष में कई लोग सिंधी पंचायत भवन में भिक्षुक भोज का आयोजन कर चुके हैं। बहरहाल व्यक्तिगत रूप से अकेले भिक्षुक भोज का आयोजन कराने वालों के सामने समस्या जरूर आ खड़ी हुई है।

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