लोहिया अस्‍पताल: जहां डाक्‍टर व वार्डब्‍वाय मरीज़ को हाथ लगाने से डरेते हैं, सफाई कर्मी लगाते हैं इंजेक्‍शन

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फर्रुखाबाद: समाजवादी पार्टी सरकार जहां एक तरफ फर्रुखाबाद से सटे कन्नौज व सैफई जिलों में अरबों की संख्या में धनराशि दोनो हाथों से बांट रही है या यूं कहिए कि आठ माह में ही सरकार ने इन दोनो जनपदों में विकास की गंगा ही बहानी शुरू कर दी है। लेकिन फर्रुखाबाद जैसे राजनीति के केन्द्र माने जाने वाले जनपद में सरकार का ध्यान क्यों नहीं है। जनपद की स्थिति इतनी खस्ता हाल हो गयी है कि करोड़ों की लागत से बने लोहिया अस्पताल में सरकार द्वारा एक डाक्टर तक मुहैया नहीं हो पा रहा है। जहां दुर्घटना या अन्य समस्याओं से ग्रसित होकर मरीज आपातकालीन विभाग में पहुंचता है जहां डाक्टर होने के बावजूद भी सफाई कर्मचारी मरीजों की मरहम पट्टी करते हैं। जिससे या तो मरीज कुछ दिनों में स्वर्ग सिधार जाता है और या यही कर्मचारी बाहर के प्राइवेट चिकित्सालयों से सम्पर्क कर मरीज को इतना भयभीत कर देते हैं कि वह लोहिया से अपना मरीज तत्काल उसके सामने बने प्राइवेट चिकित्सालयों में भर्ती करा देता है।

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अखिलेश राज में जहां एक तरफ सड़कों पर हूटर बजातीं फिर रहीं 108 नम्बर की एम्बुलेंसे उस समय बौनी साबित हो जाती हैं जब लोहिया अस्पताल पहुंचने के बाद मरीज को ठीक से उपचार नहीं मिल पाता और मिले भी कैसे जब दुर्घटना में आये मरीजों को टांके लगाने, इंजेक्शन लगाने, उनकी मरहम पट्टी करने के अलावा अन्य चिकित्सीय कार्य भी सफाई कर्मचारियों से कराये जाते हैं। न ही जल्दी बार्ड व्याय मरीज को हाथ लगाता है और न ही चिकित्सक। चिकित्सक तो सिर्फ कागजों में ही मरीज की इन्ट्री करने भर के लिए ही बैठते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। बसपा सरकार में भी यही हुआ और यही अब वर्तमान सरकार भी कर रही है। प्रश्न इस बात का खड़ा होता है कि जब अखिलेश सरकार अन्य जनपदों को अरबों रुपये की धनराशि बांट रही है तो वहीं आस पास के क्षेत्र के इकलौते बड़े सरकारी अस्पताल में चिकित्सकों तक का टोटा पड़ा हुआ है। जिस पर कई बार विभागीय अधिकारियों द्वारा लिखकर भी भेजा जा चुका है। लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात। कुल मिलाकर हर मामले में जनता को ही परेशानी उठानी पड़ती है।

बाइक की टक्कर से घायल छात्रा सोनम निवासी जैतपुर जहानगंज जब लोहिया अस्पताल पहुंची तो डाक्टर की मौजूदगी होने के बावजूद भी सफाई कर्मचारियों द्वारा ही उसका उपचार कराया गया। अब मरीज तो यह नहीं जानता कि इलाज करने वाला सफाई कर्मचारी है या मुख्य चिकित्साधिकारी। वह तो सिर्फ अपने इलाज से मतलब रखता है। अगर मरीज को जमीनी हकीकत पता चल जाये कि उसका इलाज करने वाला डाक्टर नहीं वल्कि लोहिया अस्पताल का सफाईकर्मी है तो शायद अपने मरीज की जान कोई भी जोखिम में डालना नहीं चाहेगा।

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