फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) अपार श्रद्धा व आध्यात्मिकता के उत्सव रामनगरिया में भक्ति के अलग-अलग रंग बिखर रहे हैं। माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथ पतिहि आव सब कोई। देव दनुज किन्नर नर श्रेणी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेणी।। गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने माघ माह में कल्पवास की जिस महिमा का जिक्र रामचरित मानस के बालकांड में किया है, वह पांचाल घाट गंगा तट पर मेला रामनगरिया में माघ पूर्णिमा स्नान से पहले ही साकार हो रहा है। जप-तप व ध्यान के प्रतीक कल्पवास में संतों के सानिध्य से कल्पवासियों को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलेगी। मन में श्रद्धा लिए गंगा मइया की भक्ति में गोता लगा रहे। हरदोई, शाहजहांपुर, बरेली, बदायूं, मैनपुरी, एटा, इटावा, कन्नौज आदि जिलों से भी बड़ी संख्या में कल्पवासी पहुंच गये हैं।
माघ मेले के महापर्व का साक्षी बनने के लिए दूर-दूर से आये गंगा मइया के भक्त कल्पवास करने आ गये है| माया-मोह से दूर रहकर श्रद्धालुओं की दिनचर्या धार्मिक कार्यों में गुजरेगी। 3 जनवरी को मेला शुभारम्भ से लेकर 3 फरवरी मेला समापन तक पूरे माह क्षेत्र में गंगा व ज्ञानगंगा का अनूठा संगम देखने को मिलेगा| वैष्णव, नागा संप्रदाय के संतों के समागम से भक्ति भाव की गंगा प्रभावित होगी| भांति भांति के अनुष्ठानों से रामनगरिया देव भूमि बनेगी। सभी प्राकृतिक नियमों के बंधन में बंधे रहे। गंगा की उठती लहरें व कलकल ध्वनि सभी को आर्शीवाद देगी। मंहगी कारों से घूमने वालों से लेकर सामान्य गृहस्थ यहां तंबुओं में रहकर सांसारिक माया से मुक्त हो वैराग्य जीवन का पालन करेंगे। इस अवधि में काया तो नहीं बदलती, लेकिन उनके अंतर्मन का कायाकल्प जरूर होगा। रामनगरिया में कल्पवासी तीन बार स्नान, एक बार सात्विक भोजन व दिन भर भजन पूजन में लीन रहगें हैं। एक माह में पांच शाही स्नान होंगे, जिससे इसे इसे मिनी कुंभ भी कहा जाता है| इस मेले में प्रदेश के अलग अलग जिलों से भी आकर लोग कल्पवास करते हैं| यह सद्कर्म श्रद्धालुओं को मुक्ति प्रदान करता है।
स्वामी श्रद्धानंद के प्रस्ताव से माघ मेले को मिला रामनगरिया नाम
इतिहास की मानें तो शमसाबाद के खोर में प्राचीन गंगा के तट पर ‘ढाई घाट का मेला’ लगता चला आ रहा है। यह मेला काफी दूर होने के कारण कुछ साधू-संत साल 1950 से माघ के महीने में कुछ दिन कल्पवास कर अपनी साधना करते थे, लेकिन आम जनता का इनसे कोई सरोकार नहीं होता था। साल 1955 में पूर्व विधायक स्वर्गीय महरम सिंह ने इस तरफ अपनी रुचि दिखाई। उन्होंने कल्पवास के दौरान पंचायत सम्मलेन, शिक्षक सम्मेलन, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी सम्मेलन तथा सहकारिता सम्मेलन का आयोजन कराया, जिसमें लोगों की दिलचस्पी बढ़ गयी। साल 1956 में विकास खंड राजेपुर तथा पड़ोसी जनपद शाहजंहांपुर के अल्लागंज क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने माघ मेले में गंगा के तट पर मड़ैया डाली व कल्पवास शुरू किया। देखते ही देखते मेले की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। साल 1965 में आयोजित हुए माघ मेले में पंहुचे स्वामी श्रद्धानंद के प्रस्ताव से माघ मेले का नाम रामनगरिया रखा गया। साल 1970 में गंगा तट पर पुल का निर्माण कराया गया|
मेला रामनगरिया: अपार श्रद्धा, सद्कर्म व आध्यात्मिकता का संगम



