फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, वतन पर मर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा, ये कविता सेन्ट्रल जेल फतेहगढ़ में स्थापित शहीद मणीन्द्र नाथ बनर्जी की प्रतिमा व स्मारक पर लागू होती। इस स्मारक की स्थापना ही इसलिए की गयी थी, ताकि लोग शहीदों के बलिदान को नमन कर सकें, लेकिन जेल विभाग और सत्ता नसीन लोगों के उदासीनता के चलते व प्रचार प्रसार की कमी के कारण ये स्मारक शोपीस बनकर रह गया है। आज यह स्मारक दुर्दिन झेल रहा है। उन्हें चार फूल तो नसीब नही होते उसकी जगह पर बल्कि गंदगी के अम्बार लगे नजर आते हैं, कारागार विभाग एक समय की सफाई की व्यवस्था ही नही कर पा रहा है|
शहीदों की शहादत को याद करने और उनके शौर्य को नमन करने के लिए लाखों की लागत से तत्कालीन कारागार अधीक्षक एचपी यादव नें अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले शहीद मणीन्द्र नाथ बनर्जी के नाम का
शहीद स्मारक 15 जून 1985 को बनवाया था| वह आज बदहाली के आंसू बहा रहा है। हाल ही में गणतंत्र दिवस आ रहा है| उस दिन कारागार विभाग के अधिकारी एकत्रित होकर स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर फिर किनारा कर लेंगे| उसके बाद कोई स्मारक पर झाँकने तक नही आता| जिससे स्मारक बदहाल है|
मणीन्द्र नाथ के विषय में जाने
शहीद मणीन्द्र नाथ बनर्जी का जन्म 13 जनवरी 1909 में वाराणसी के सुबिख्यत एवं कुलीन पाण्डेघाट स्थित माँ सुनपना देवी के उदर से हुआ था| इसके पिता ताराचन्द्र बनर्जी एक प्रसिद्ध होम्योपैथिक के चिकित्सक थे| उनके पितामह श्रीहारे प्रसन्न बनर्जी डिप्टी कलक्टर के पद पर आसीन रहे| जिन्होंने 1899 में बदायूं से बिर्टिश शासन की नीतियों से दुखी होकर अपने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया और स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गये|
श्री बनर्जी आठ भाई थे इन आठो भाईयो को मात्रभूमि के प्रति बहुत लगाव था| उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका अदा की| काकोरी कांड से सम्बंधित राजेन्द्र लाहिडी को फांसी दिलाने में सीआईडी के डिप्टी अधीक्षक जितेन्द्र नाथ बनर्जी ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी| जिसे बनर्जी ने बर्दाश्त ना कर सके और उन्होंने जितेन्द्र से बदला लेने की ठान ली| 13 जनवरी 1928 को जितेन्द्र नाथ बनर्जी से वाराणसी गुदौलिया में बदला ले लिया| इस शौर्यपूर्ण कार्य के लिये उन्हें दस वर्ष की सजा व तीन माह तन्हाई की सजा मिली| 20 मार्च 1928 को उन्हें वाराणसी केन्द्रीय कारागार से केन्द्रीय कारागार फतेहगढ़ भेजा गया| जंहा उन्होंने अन्य राजनैतिक बन्दियो को उच्च श्रेणी दिलाने के लिये भी संघर्ष किया| 20 जून 1934 को सांयकाल आठ बजे कारागार के चिकित्सालय में उन्होंने अंतिम साँस ली| उनका अंतिम संस्कार 21 जून 1934 को पांचाल घाट पर गंगा किनारे किया गया था|
शहीद क्रांतिकारी प. रामनरायण आजाद के पौत्र बॉबी दुबे ने बताया की शहीदों को सम्मान मिलना चाहिए| जिन्होंने देश की खातिर जान दी वह सम्मान के पात्र है| शहीद बनर्जी युवा अवस्था में ही अंग्रेजो के खिलाफ अनशन करते हुए जेल में अपने प्राण दिये थे, उनके स्मारक का रखरखाब जेल के अधिकारीयों की जिम्मेदारी है| वह उस पर जल्द ध्यान दें नही तो फिर क्रातिकारी बंशज इसमे आगे आयेंगे|
हिन्दू महासभा के युवा प्रदेश अध्यक्ष विमलेश मिश्रा ने बताया की यह बेहद गंभीर विषय है| शहीदों के सम्मान में कोई भी लापरवाही बर्दाश्त नही होगी| सेंट्रल जेल के अधिकारियों को चाहिए की वह शहीद के स्मारक की नियमित सफाई पर ध्यान दें, यदि जल्द सफाई आदि की व्यवस्था नही की जाती तो संगठन आन्दोलन के लिए बाध्य होगा|



