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बारात में दुल्हन के चाचा की गोली मारकर हत्याबारात में दुल्हन के चाचा की गोली मारकर हत्या फर्रुखाबाद:(कायमगंज) बीती देर रात बारात के दौरान बधू के चाचा की गोली मारकर हत्या कर दी गयी| हत्या होने से खुशियाँ मातम में बदल गयी| पुलिस ने शव का पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया| एक तरफ भतीजी की डोली उठी वही उसी घर से अर्थी उठायी गयी| कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला चौखड़िया...

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अग्निशमन दिवस पर 66 अग्निशमन कर्मी जले थे जिंदा

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Posted on : 15-04-2018 | By : JNI-Desk | In : FARRUKHABAD NEWS, FEATURED, जिला प्रशासन

फर्रुखाबाद:अग्निशमन दिवस अथवा राष्ट्रीय अग्निशमन सेवा दिवस पर रैली निकाल लोगों को जागरूक किया गया| सभी को आग बुझाने के तरीके बी बताये गये| 14 अप्रैल, 1944 को मुम्बई बंदरगाह में फोर्टस्टीकेन नामक मालवाहक जहाज जिसमें रूई की गांठें, विस्फोटक एवं युद्ध उपकरण भरे हुए थे, में अकस्मात आग लग गयी थी। आग को बुझाते समय जहाज में विस्फोटक सामग्री होने के कारण 66 अग्निशमन कर्मी आग की चपेट में आकर वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने व अग्नि से बचाव के उपाय बताने के लिए देशभर में यह दिवस मनाया जाता है।
जिले के दमकल प्रभारी भंवर सिंह यादव ने रविवार को रैली निकाली| जो पुलिस लाइन, कचेहरी, आवास-विकास, लालदरवाजा होते हुये आईटीआई चौराहा, सेन्ट्रल जेल चौराहा, जिला जेल चौराहा होते हुये पुलिस लाइन में समाप्त हुई| जंहा जगह लोगों को आग लगने के बचाव के बारे में भी अवगत कराया गया|
अग्निशमन दिवस पर क्या होता है|
अग्निशमन दिवस के अंतर्गत नागरिकों को अग्नि से बचाव तथा सावधानी बरतने के सम्बंध में जागृत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। अग्नि सुरक्षा सप्ताह का उद्देश्य नागरिकों को अग्निकांडों से होने वाली क्षति के प्रति जागरूक करना तथा अग्निकांडों को रोकने एवं अग्नि से बचाव के उपायों के संबंध में शिक्षित करना है। इसके साथ ही सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था, अग्निशामक उपकरणों का प्रयोग, आग की स्थिति में बचाव के उपाय, उद्योगों में अग्नि सुरक्षा व सावधानियां, विद्युत अग्नि सुरक्षा व सावधानी, बहुमंजिले भवनों में अग्नि सुरक्षा, विकलांग व्यक्तियों के लिए अग्नि सुरक्षा आदि की जानकारी दी जाती है|
क्यों मनाया जाता है
तेज उठती लपटें और उनके बीच किसी के उजड़ते आशियाने को बचाने की मंशा अग्निशमनकर्मियों में देखने को मिलती है। वे हर दिन आग से खेलने का काम करते हैं। इस खतरनाक काम को अंजाम देते हुए उन्हें अपनी जान की भी फिक्र नहीं होती। फिक्र होती है तो उन्हें सिर्फ उस जलते मंजर या फिर उसमें धधकती जिंदगी को बचाने की। आग लगने वाली जगहों पर फायरमैन सिर्फ एक फोन कॉल पर दौड़ पड़ते हैं। दूसरों के हिस्से की तपन को झेलते हुए जनता की रक्षा व सुरक्षा के लिए कृत संकल्पित इस जांबाज फायरमैन दल के लिए अग्निशमन दिवस महज कौशल प्रदर्शन का मंच नहीं है, वरन ये स्मृति दिवस है, उन 66 अग्निशमन कर्मचारियों की शहादत का, जिन्होंने जनसेवा करते हुए सहर्ष मृत्यु का वरण किया।
वह 14 अप्रैल, 1944 का एक धधकता शुक्रवार था, जब विक्टोरिया डाक बंबई में सेना की विस्फोट सामग्री से भरा पानी का जहाज लपटों के आगोश में समा गया। आग पर काबू पाने के लिए बंबई फायर सर्विस के एक सैकड़ा अधिकारी व कर्मचारी घटनास्थल पर भेजे गए। अटूट साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए इन जांबाज अग्निशमन कर्मचारियों ने धधकती ज्वाला पर काबू करने का भरसक प्रयत्न किया। आग पर नियंत्रण तो पा लिया गया, लेकिन इस कोशिश में 66 फायरमैन को अपनी जान की आहूति देनी पड़ी। उन्हीं 66 शहीद अग्निशमन कर्मचारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए अग्निशमन सेवा दिवस मनाया जाता है।
इस दिवस के विभिन्न आयोजन पूरे सप्ताह भर चलते हैं। सप्ताह के दौरान फायर ब्रिगेड द्वारा विभिन्न कारखानों, शैक्षणिक संस्थाओं, ऑइल डिपो आदि जगहों पर अग्नि से बचाव संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। अग्निशमन सप्ताह के अंतर्गत नागरिकों को अग्नि से बचाव तथा सावधानी बरतने के संबंध में जागृत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। इसका उद्देश्य अग्निकांडों से होने वाली क्षति के प्रति नागरिकों को जागरूक करना होता है।

नवरात्रि विशेष: जिन्दगी की सांझ में अकेली माँ की ममता

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Posted on : 20-03-2018 | By : JNI-Desk | In : FARRUKHABAD NEWS, FEATURED, जिला प्रशासन, सामाजिक

फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) माँ एक शब्द जिसमे पूरा विश्व समाहित है आज वृद्धावस्था में किसी वृद्धाश्रम के एक कोंने में पड़ी अस्तिस्व को तलाश कर रही है| वही ममता की तलाश में लोग माँ के दरवार में हाजिरी लगाने और ममता पाने की चाह में घंटो लाइन में लगे इंतजार करते देखे जा सकते है| माँ लाड़-प्यार से बच्चों की परवरिश करती हैं। उन्हें अच्छे से अच्छा खिलाने-पिलाने की कोशिश करती हैं। खुद पुराने कपड़े बरसों तक पहन लेती हैं, लेकिन अपने बच्चों को नये-नये कपड़े पहनाती हैं। खुद मेहनत-मजदूरी करके अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए उन्हें अच्छी तालीम दिलाती हैं, लेकिन बाद में यही बच्चे अपनी मां को बोझ समझने लगते हैं। जिस तरह
पुराना सामान घर के स्टोर में पहुंचा दिया जाता है या कबाड़ी को बेच दिया जाता है, उसी तरह कुछ बच्चे अपनी मां को वृद्धाश्रम
छोड़ आते हैं। अपनी जिन्दगी की सांझ में बुजुर्ग उस वक्त अकेले रह जाते हैं, जब उन्हें अपने बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।नवरात्र का त्योहार चल रहा है| हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखने वाले लगभग सभी घरों में माँ की प्रतिमा की स्थापना की गयी है| मंगलवार को मेरा भी मन हुआ की मन्दिर में माँ के दरबार में माथा टेक कर आशीर्वाद ले लूँ| तभी रास्ते में इटावा-बरेली हाई-बे पर एक वृद्धा आश्रम का बोर्ड लगा देखा| अचानक मन में ख्याल आया की क्यों ना पहले वृद्धा आश्रम में झांककर देख लिया जाये| माँ तो यंहा भी होंगी|
आश्रम के भीतर घुसते ही एक राजेपुर निवासी 65 वर्षीय रामदेवी पत्नी पुत्तु लाल डंडे के सहारे आते मिली| गेट पर ही उन्होंने देखते हुये कहा की बेटा खुश रहो खूब बड़े आदमी बनो, जीवन में तरक्की करो अचानक मन में पुन: ख्याल आया की मै मंदिर क्यों जा रहा था इसी आशीर्वाद के लिये| लेकिन यंहा तो इतने सारे आशर्वाद मिल गये की अब मंदिर जाने का ख्याल मन से निकाल दिया| रामदेवी ने बताया की लगभग एक साल पूर्व उनका बेटा रामनिवास उन्हें यंहा छोड़ गया था| उसका विवाह हो गया वह पत्नी के साथ रहता है| लेकिन अचानक उनकी आँखों से आंसू छलक उठे| इतना सब होने के बाद भी रामदेवी के मुंह से अपने बेटे के लिये कोई अपशब्द नही निकला|
जब अंदर गये तो कई बुजुर्ग महिलायें बैठी अपने भूत, भविष्य व वर्तमान को याद करती मिली| उन्ही में मोहम्मदाबाद के पिपरगाँव निवासी कलावती मिली| वह भी जिन्दगी के अंतिम पायदान पर नजर आ रही थी| उन्होंने बताया की उनके तीन पुत्र है| एक बड़े पुत्र की मौत हो चुकी है| दो पुत्र है| पौत्र-पौत्री भी है| उनकी याद आती है कभी कभी मिलने आते है| यह कहते हुये कलावती के आंखो में भी आंसू आ गये| माँ को इस तरह रोते संतान होने के बाद भी पहली बार देखा वह भी उस समय जब लोग माँ के दर्शन के लिये लम्बी कतारों में खड़े हो|
समाज कल्याण विभाग द्वारा अनुदानित वृद्धाश्रम फूलमती भवन नरायनपुर में संचालित है| जिसके लिपिक मयंक ने जेएनआई को बताया की उनके पास 28 वृद्ध महिलाएं है| जिसकी व्यवस्था वृद्धाश्रम में की जाती है| लेकिन एक बात फिर खनी पड़ेगी क्या इन माँ से मिलने के लिये समाज में कोई नही जो उन्हें वह प्यार दे सके जिसकी वो इस उम्र में हकदार है|

आस्था:शीतला माता के दर्शन से मिलती चेचक से मुक्ति

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फर्रुखाबाद: नवरात्रि का त्योहार शुरू हो गया है| घर-घर में देवी की पूजा अर्चना की जा रही है| हर मंदिर को लेकर कोई ना कोई आस्था जुडी है| यही कुछ बढ़पुर के शीतला माता मंदिर में आने वाले श्रधालुओं को भी देखने को मिलता है| मान्यता है कि यंहा आने से चेचक जैसे गम्भीर रोग से लोगों को आराम मिलता है|
मंदिर कमेटी के अध्यक्ष भीम प्रकाश कटियार ने बताया कि बीते वर्ष 1824 में चेचक का प्रकोप फैला| गम्भीर बीमारी से हजारों लोग विस्तर पकड़े हुये थे| सभी बढ़पुर निवासी रायबहादुर को देवी ने सपना दिया की उनकी प्रतिमा तालाब में है उसे बाहर निकाल कर स्थापित करो जिससे चेचक के रोगियों को आराम मिलेगा| उसी हिसाब से जब रायबहादुर ने तालाब में मूर्ति तलाश की तो उन्हें मिल गयी| उन्होंने अपने परिवारी गेदनलाल के साथ मिलकर देवी की स्थापना करा दी|
जिसके बाद चेचक के रोगियों को आराम मिल गया| तभी से चेचक से ग्रसित लोग मंदिर में देवी दर्शन के लिये आते है और उन्हें आराम मिलता है| नवरात्र के प्रथम दिन मंदिर में श्रद्धा का सैलाब उमड़ा| लोग घंटों लाइन में लगे रहे तब उन्हें शीतला माता के दर्शन हुए|

एक विधालय जो बन सकता सबके लिये प्रेरणा

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Posted on : 23-02-2018 | By : JNI-Desk | In : FARRUKHABAD NEWS, FEATURED, जिला प्रशासन, सामाजिक

फर्रुखाबाद:(दीपक शुक्ला) कहते है कि यदि सोच अच्छी हो तो बड़े से बड़े पहाड़ को भी आदमी काट सकता है| इसी अच्छी सोंच का परिणाम है कि प्रधान ने नौनिहालों को उनका असली हक दिया जो उन्हें मिलना चाहिए| विधालय सभी के लिये प्रेरणा श्रोत बन सकता है| आज विधालय की चर्चा सोशल मिडिया में भी आम है|
विकास खंड बढ़पुर के प्राथमिक विधालय विजाधरपुर आज जिले के अन्य विधालयों व अन्य प्रधानो के लिये एक आदर्श साबित हो सकता है| ग्राम प्रधान ओम प्रकाश सक्सेना ने गाँव के नौनिहालों को एक खुशनुमा माहौल में पढ़ाने के लिये जो लगन मेहनत की उसका नतीजा आज सुन्दर और आकर्षक विधालय के रूप में सामने है| विधालय की जमीन पर पत्थर लगाकर फर्श तैयार की गयी है| कमरों में लोहे के मजबूत दरवाजे और पूरे भवन पर तरह-तरह के जानकारी परक लेख लिखे है| जिसे पढ़ने से कई महत्वपूर्ण जानकारी मिलने का अहसास होता है| विधालय में घुसते ही लगेगा की किसी अंग्रेजी माध्यम विधालय में प्रवेश किया हो| अंदर जो शौचालय बने है वह देखने लायक है| साफ-सफाई इतनी की देखते बनती है| खेलने के लिये भी इंतजाम किये गये है|
मजे की बात है इतना होने के बाद भी बच्चो का मध्यान्ह भोजन अभी भी चूल्हे पर बनता है और बच्चे जमीन पर बैठते है| यह सब नही होता कोई जान ही नही सकता की विधालय परिषदीय है| बीएसए अनिल कुमार से जब जेएनआई ने बात की तो उन्होंने बताया कि जल्द ही वह विधालय का दौरा करेगे| और जो बची हुई समस्या है उसे जल्द समाप्त किया जायेगा| वही ग्राम प्रधान को जिलाधिकारी से सम्मान दिलाने के लिये लिखा जायेगा|

खास खबर:बाबुल की चौखट से गुम हो रही शहनाई की गूंज

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Posted on : 31-01-2018 | By : JNI-Desk | In : FARRUKHABAD NEWS, FEATURED, जिला प्रशासन

फर्रुखाबाद:(दीपक-शुक्ला) अत्याधुनिक युग में परंपराओं को ग्रहण लगा है। धीरे-धीरे शादी समारोहों से बाबुल की दुआओं भरे गीतों के बोल और शहनाई की गूंज डीजे और बैण्डबाजों की धुनों में गुम हो गई है। अब हॉट सॉग्स की चहुंओर धूम मची है। महिला संगीत का क्रेज भी धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। एक जमाना था जब शहनाई को परम्परा का हिस्सा मानते थे| लेकिन आधुनिकता के आगे शाहनाई की सुरीली आवाज धीमी होती जा रही है| जनपद में महज दो शहनाई बजाने वाले उस्ताद है| लेकिन बढती उम्र व महगाई ने उनकी कमर तोड़ दी| हालत यह है की दूसरों के घर खुशी का माहौल बनाने वाले उनके परिवार गरीबी और समाज व सरकार की अनदेखी के शिकार है|
गुजरे जमाने की बात हुई जब शादी विवाह एवं अन्य समारोहों में शहनाई सुनाई पड़ती थी और शुभ घड़ी में इसे शुभ भी माना जाता था। ऐसा नहीं कि शहनाई शुभ अवसरों पर ही अनूठा वातावरण उत्पन्न करती थी, बल्कि मातम में भी शहनाई की धुन माहौल को गमगीन बना देती थी। शुभ अवसरों पर बजने वाली शहनाई की धुन को डीजे की तेज ध्वनि ने दबा दिया है। यदाकदा ही कहीं शहनाई के स्वर सुनने को मिलते हैं। राग-रागिनी के स्वरों को तालबद्ध करके शहनाईवादक कहीं भी किसी भी उत्सव व समारोह में संगीत का एक अनूठा वातावरण उत्पन्न कर देते थे, लेकिन बदलते परिवेश में सात सुरों के साथ अनोखा तारतम्य बिठाने वाली शहनाई आज तेज संगीत के प्रवाह में लुप्त प्राय: हो चुकी है। यदा-कदा ही कहीं शहनाई की धुन सुनने को मिल जाती है। वर्तमान समय में शहनाई महज रसूख वालों के समारोहों की शोभा बढ़ाने के लिए रह गई है।
शान होती थी शहनाई
पहले राजा-महाराजाओं के दरबार में शहनाई शान समझी जाती थी। प्राय: लुप्त होती जा रही शहनाई की धुन के पीछे पश्चिमी संगीत के प्रति लोगों का बढ़ता रुझान और तेजी से होता इसका प्रचार-प्रसार है। शास्त्रीय संगीत से ताल्लुक रखने वाली शहनाई युवा पीढ़ी के लिए रास नहीं आ रही है। तेज स्वरों से बजता डीजे ही युवाओं को रास आ रहा है। आर्केस्ट्रा की धुन पर थिरकने वाले युवाओं के लिए शहनाई का कोई महत्व नहीं है।
बुजुर्ग भी नहीं समझाते महत्व
बुजुर्ग भी युवा पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जुड़ी शहनाई की किदवंतियां नहीं सुनाते और न ही उन्हें शहनाई के महत्व को समझाते हैं। आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संगीत का बढ़ता प्रचलन शहनाई के स्वरों का अस्तित्व खत्म करता रहा है। 82 वर्षीय बुजुर्ग धर्म सिंह का कहना है कि दरवाजों पर शादी-समारोह के दौरान शहनाई की धुन लोगों के हृदय को छूती थी। विदाई समारोह के दौरान शहनाई की धुन सुनते ही लड़की पक्ष के लोगों की आंखें स्वत:ही नम हो जाती थीं।
शहनाई बजाने वाले दो उस्ताद आज खस्ताहाल
मऊदरवाजा क्षेत्र के मोहल्ला भीकमपुरा निवासी पुत्तु मास्टर का शहनाई बजाने वालो में नाम था| जब जेएनआई टीम ने उनके घर पंहुचकर उनका दर्द सुना| वह घर पर नही मिले| उनकी पत्नी रुकसाना ने बताया कि विवाह से पूर्व ही उनके पति शहनाई बजाते थे लेकिन आज के दौर में उनका यह हुनर समाज के किसी काम का नही है| सरकार भी इसके लिये कोई लाभ नही दे रही| इस लिये बेटों को इससे दूर रखा| बेटे चाँद भांगड़ा बजाते है| वही 60 वर्षीय भोलू मास्टर वह भी इसी मोहल्ले में रहते है| लेकिन उम्र अधिक होने से अब आँखों से दिखाई नही देता| उन्होंने बताया कि उन्हें शहनाई के हुनर से कई पुरुस्कार भी मिले| लेकिन उनसे पेट नही भरता| पूर्व मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव की पुत्री मोना यादव के विवाह में शहनाई बजायी थी| तो नरेन्द्र सिंह ने सहयोग करके साँस्कृतिक विभाग लखनऊ से 2000 हजार रूपये पेंशन मंजूर करा दी थी| लेकिन आज तो वह पेंशन भी साल- भर से पहले नही मिलती| भोलू के चार बेटी है| उनका कहना है कि जिस शहनाई से ना जाने कितनो की बेटियों को चार चांद लगाया| आज जब खुद की चार बेटीयाँ विवाह योग्य हुई तो आर्थिक टंगी पीछे पड़ी है|
देखने वाली बात यह है कि आज जनपद में एक दो लोग ही शहनाई को बजाने वाले बचे है| युवा पीढ़ी उसे बजाना नही चाहती| यही चला तो जनपद में शाहनाई केबल किताबों में ही देखेंगे| (सहयोगी प्रमोद द्विवेदी)

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