दूसरे के कपड़े धोते और 9 कमरों में झाड़ू लगाते थे मोदी

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Modi 1नई दिल्ली: नरेंद्र दामोदर दास मोदी। बीजेपी की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री। बीजेपी के सबसे कद्दावर और लोकप्रिय नेता के तौर पर तेजी से स्थापित होते जा रहे मोदी ने कभी वे दिन भी देखें हैं जब उन्हें किसी और के कपड़े धोने पड़ते थे और कई कमरों में झाड़ू लगाना पड़ता था। मोदी के आधिकारिक जीवनीकार एमवी कामत ने अपनी किताब ‘नरेंद्र मोदी द आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न स्टेट’ में मोदी के हवाले से लिखा है, ‘1974 में नवनिर्माण आंदोलन के दौरान आरएसएस के अहमदाबाद कार्यालय हेडगेवार भवन में वकील साहब ने मुझे रहने के लिए आमंत्रित किया। वहां वकील साहब करीब 12 से 15 लोगों के साथ रहते थे। मेरा रोजमर्रा का काम प्रचारकों के लिए चाय और नाश्ता बनाने के साथ शुरू होता था। उसके बाद पूरी बिल्डिंग के करीब 8-9 कमरों में झाड़ू लगाता था। मैं अपने और वकील साहब के कपड़े भी धोता था। यह सिलसिला करीब एक साल तक चला। इस दौरान मेरी मुलाकात संघ के कई नेताओं और पदाधिकारियों से हुई।’

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वकील साहब ने दिलाई थी शपथ

लक्ष्मणराव ईनामदार को गुजरात में आरएसएस कार्यकर्ता ‘वकील साहब’ कहकर पुकारते थे। गुजरात में आरएसएस की जड़ें मजबूत करने का सबसे ज्यादा श्रेय ईनामदार को जाता है। 1958 में दिवाली के दिन गुजरात राज्य का काम देख रहे लक्ष्मणराव ईनामदार ने वडनगर में कुछ बच्चों को ‘बाल’ स्वयंसेवक के रूप में शपथ दिलाई थी। इनमें से एक बच्चा 8 साल का नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी था। नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े भाई सोमभाई मोदी के मुताबिक, ‘नरेंद्र हमेशा ही कुछ अलग करना चाहता था। हम लोग स्कूल या घर पर जो कुछ भी करते थे। इसके अतिरिक्त वह कुछ करना चाहता था और संघ की शाखाओं ने नरेंद्र को वह मौका दिया।’
तालाब पार कर बदला था भगवा झंडा

नरेंद्र मोदी के जीवन से जुड़ी एक कहानी पर अक्सर उनके जानने वाले चर्चा करते हैं। हालांकि, यह कितनी सही या गलत है, इसके बारे में कोई पुष्टि नहीं हुई है। कहानी के मुताबिक 12 साल की उम्र में नरेंद्र मोदी ने वडनगर कस्बे में मौजूद तालाब के बीच में स्थित एक मंदिर पर लगे भगवा झंडे को साहसिक तरीके से बदला था। बताया जाता है कि उस तालाब में कई मगरमच्छ थे। मगरमच्छ के डर से जल्दी कोई भी उस तालाब में जाने से कतराता था। इसलिए लंबे समय तक मंदिर पर लगा भगवा झंडा बदला नहीं जा सका और वह पुराना पड़ गया। जब बालक नरेंद्र मोदी को इसकी खबर लगी तो वह बिना मगरमच्छ की परवाह किए तालाब में कूद गया और भगवा झंडा बदलकर ही वापस लौटा।
औसत छात्र थे मोदी

मोदी ने वडनगर के भगवताचार्य नारायणाचार्य हाई स्कूल में पढ़ाई की। इस स्कूल में मोदी के संस्कृत अध्यापक रहे प्रह्लाद पटेल मोदी को याद करते हुए कहते हैं, ‘वह औसत छात्र था। लेकिन बहस और थिएटर में उसकी गहरी दिलचस्पी थी। मैंने स्कूल में डिबेट क्लब बनाया था। मुझे याद आता है कि नरेंद्र उन छात्रों में था जो रोज बहस में हिस्सा लेते था।’ वडनगर में मोदी के साथी रहे सुधीर जोशी ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, ‘स्कूल में पढ़ाई खत्म होने पर शाम को हम अपनी किताबें घर पर छोड़ सीधे शाखा में पहुंचते थे।’ मोदी के बड़े भाई सोमभाई ने बताया, ‘पिता, माता की मदद और स्कूल में पढ़ाई के बीच नरेंद्र शाखा को सबसे ज्यादा अहमियत देता था। जब नरेंद्र ने नमक और तेल खाना छोड़ने का फैसला किया था तो हमें लगा कि कहीं वह भिक्षा मांगकर गुजारा तो नहीं करेगा।’

दो साल तक रहे ‘अज्ञातवास’ में

नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई बताते हैं कि 18 साल की उम्र में मोदी घर छोड़कर चले गए थे। वे करीब दो साल तक ‘अज्ञातवास’ में रहे। बताया जाता है कि इन दो सालों में वे हिमालय की खाक छानते रहे। हालांकि, किसी को भी अच्छी तरह से यह नहीं मालूम कि इस दौरान मोदी कहां-कहां गए और क्या-क्या किया। नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई ने एक इंटरव्यू में बताया, ‘मोदी 18 साल की उम्र में दो सालों के लिए गायब हो गए थे। मां और हम सभी इस बात को लेकर परेशान थे कि नरेंद्र कहां चला गया। लेकिन दो साल बाद एक दिन वह घर लौट आया। उसने हमें बताया कि वह अहमदाबाद जाकर हमारे चाचा बाबूभाई की कैंटीन में काम करेगा।’

सिटी बस स्टैंड पर चलाते थे कैंटीन

वडनगर में मोदी के परिवार के पड़ोसी रहे एक शख्स के मुताबिक, ‘नरेंद्र के अज्ञातवास से लौट आने पर घर में उनके निजी जीवन को लेकर कलह होने लगी। इससे नाराज होकर नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर घर छोड़ दिया।’ इसके बाद मोदी अहमदाबाद पहुंचे जहां उनके चाचा बाबूभाई सिटी बस स्टैंड पर कैंटीन चलाते थे। मोदी ने कुछ दिन वहां काम किया। इसके बाद गीता मंदिर के नजदीक चाय का ठेला लगाने लगे। संघ के प्रचारक के मुताबिक, ‘कुछ प्रचारक सुबह की शाखा से लौटते समय मोदी के ठेले पर चाय पीने आते थे।’ धीरे-धीरे मोदी की बातों ने उन पर असर किया। चूंकि, मोदी वडनगर में आरएसएस से जुड़े रह चुके थे, इसलिए संघ के प्रचारकों ने उन्हें संघ के राज्य मुख्यालय में असिस्टेंट के तौर पर काम करने के लिए बुला लिया। यहीं पर मोदी की मुलाकात एक बार फिर से वकील साहब से हुई थी।