धनतेरस पर 43 साल बाद बन रहा है शुभ संयोग

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फर्रुखाबाद : धनवंतरी के पूजन के पर्व धनतेरस पर इस बार बाजार में धन बरसेगा। सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग के साथ इस दिन हस्त नक्षत्र भी होगा। पिता चंद्रमा अपने पुत्र बुध की उच्च राशि कन्या में होगा। इस दिन बन रहे सुखद संयोग में किए गए कार्य निर्विघ्न संपन्न होकर सिद्धि देंगे। खरीदी गई वस्तुएं सुखद फल देंगी। यह दुर्लभ संयोग 43 साल बाद आया है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी, रविवार 11 नवंबर को है। इस दिन तेरस दोपहर 1.28 बजे से लगेगी। इस दिन तेरस मानना शास्त्र सम्मत है। सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग सूर्योदय से रात 8.20 बजे तक रहेगा। हस्त नक्षत्र शनिवार रात 8.08 बजे से रविवार को सुबह 11.31 बजे तक रहेगा। इसके बाद प्रीति योग लगेगा।

ज्योतिषाचार्य पं. धर्मेंद्र शास्त्री के अनुसार उद्योग जगत के स्वामी शनि भी अपनी उच्च राशि में होंगे। उदय एवं व्यापार के स्वामी बुध की उच्च राशि कन्या में चंद्रमा होगा।

पं. ओम वशिष्ठ के अनुसार इस दिन भगवान धनवंतरी समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस कारण धनतेरस को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है। इस दिन जो भी शुभ कार्य या खरीदी की जाती है वह अमृत के समान अमर व स्थायी रहती है। यह दुर्लभ संयोग 7 नवंबर 1969 को 43 साल पहले बना था।

पं. जयदेव भट्ट के अनुसार रविवार के दिन हस्त नक्षत्र होने से अमृतसिद्धि योग बनता है क्योंकि हस्त नक्षत्र के स्वामी भी सूर्यदेव हैं। धनतेरस के दिन अमृत सिद्धि योग होने से सर्वार्थ सिद्धि योग स्वतः ही बन जाता है।

धनतेरस : जानिए पूजन के शुभ मुहूर्त

धनतेरस पर कुबेर एवं लक्ष्मी का पूजन होता है। इस दिन दुकान पर नई गादी लगाते हैं एवं अपने धन एवं दुकान का पूजन करते हैं। इसके अलावा मकान, दुकान, सोना, चांदी एवं नए वाहन भी खरीदते हैं
हर प्रकार की खरीदी का मुहूर्त-
दोपहर 11.48 से 12.15, 01.30 से 03.00,
शाम 06.00 से रात्रि 09.00 तक।

गादी बदलने का मुहूर्त-
सुबह 09.00 से दोपहर 12.00 तक।

पूजन का मुहूर्त-
सुबह 09.00 से दोपहर 12.00,
दोपहर 01.30 से 03.00,
शाम 06.00 से रात्रि 09.00 तक।

लग्न-अनुसार-
प्रात:- 06.52 से 09.09 (वृश्चिक लग्न)
प्रात:- 09.09 से 11.14 (धनु लग्न),
दोपहर:- 01.01 से 02.35 (कुंभ लग्न)
शाम :-05.45 से रात्रि 08.44 (मेष लग्न),
रात :-08.44 से 09.58 (वृषभ लग्न)

धनतेरस की पौराणिक कथा

एक बार यमराज ने अपने दूतों से प्रश्न किया- क्या प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें किसी पर दया भी आती है? यमदूत संकोच में पड़कर बोले- नहीं महाराज! हम तो आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। हमें दया-भाव से क्या प्रयोजन?

यमराज ने सोचा कि शायद ये संकोचवश ऐसा कह रहे हैं। अतः उन्हें निर्भय करते हुए वे बोले- संकोच मत करो। यदि कभी कहीं तुम्हारा मन पसीजा हो तो निडर होकर कहो। तब यमदूतों ने डरते-डरते बताया- सचमुच! एक ऐसी ही घटना घटी थी महाराज, जब हमारा हृदय काँप उठा था।

ऐसी क्या घटना घटी थी? -उत्सुकतावश यमराज ने पूछा। दूतों ने कहा- महाराज! हंस नाम का राजा एक दिन शिकार के लिए गया। वह जंगल में अपने साथियों से बिछड़कर भटक गया और दूसरे राज्य की सीमा में चला गया। फिर? वहाँ के राजा हेमा ने राजा हंस का बड़ा सत्कार किया।

उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया था। ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक विवाह के चार दिन बाद मर जाएगा। राजा के आदेश से उस बालक को यमुना के तट पर एक गुहा में ब्रह्मचारी के रूप में रखा गया। उस तक स्त्रियों की छाया भी न पहुँचने दी गई।

किन्तु विधि का विधान तो अडिग होता है। समय बीतता रहा। संयोग से एक दिन राजा हंस की युवा बेटी यमुना के तट पर निकल गई और उसने उस ब्रह्मचारी बालक से गंधर्व विवाह कर लिया। चौथा दिन आया और राजकुँवर मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस नवपरिणीता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय काँप गया। ऐसी सुंदर जोड़ी हमने कभी नहीं देखी थी। वे कामदेव तथा रति से भी कम नहीं थे। उस युवक को कालग्रस्त करते समय हमारे भी अश्रु नहीं थम पाए थे।

यमराज ने द्रवित होकर कहा- क्या किया जाए? विधि के विधान की मर्यादा हेतु हमें ऐसा अप्रिय कार्य करना पड़ा। महाराज! -एकाएक एक दूत ने पूछा- क्या अकालमृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है? यमराज नेअकाल मृत्यु से बचने का उपाय बताते हुए कहा- धनतेरस के पूजन एवं दीपदान को विधिपूर्वक करने से अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलता है। जिस घर में यह पूजन होता है, वहाँ अकाल मृत्यु का भय पास भी नहीं फटकता।

इसी घटना से धनतेरस के दिन धन्वंतरि पूजन सहित दीपदान की प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ।