स्ट्रांग रूम के निगरानी कैम्प में बसपाईयों के पास मिला ‘कटर’

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फर्रुखाबाद: लोकसभा चुनाव के मतगणना के लिए रखी ईबीएम की देख-रेख के लिए बने राजनैतिक पार्टियों के निगरानी कैम्प में बसपाईयों के पास एक कटर मिलने से बबाल हो गया| भाजपा प्रत्याशी के समर्थकों ने हंगामा कर दिया| जिसके बाद पुलिस ने कटर व उसको लाने वाले युवक को हिरासत में ले लिया|
सातनपुर गल्ला मंडी में ईवीएम स्ट्रांग रूम बना है| उसके कुछ दूरी पर ही राजनैतिक पार्टियों के लिए निगरानी कैम्प भी बनाया गया है|जिसमे भाजपा प्रत्याशी की तरफ से विनोद राजपूत की डियूटी निगरानी में लगी थी| भाजपा सांसद व प्रत्याशी मुकेश राजपूत के भतीजे व निर्दलीय प्रत्याशी राहुल राजपूत व सांसद प्रतिनिधि दिलीप भारद्वाज  ने बताया की उन्हें विनोद ने सूचना दी की निगरानी कैम्प में तकरीबन एक दर्जन बसपा नेता मौजूद है और उनके पास एक कटर भी रखा है| जानकारी मिलते ही वह लोग मौके पर पंहुचे| उन्होंने आरोप लगाया की जब अधिक लोगों के बैठने और कटर मौजूद होनें का विरोध किया तो बसपाई आक्रोशित हो गये| जिसके बाद बसपा व भाजपा नेताओं में जमकर बबाल हुआ| पुलिस ने भाजपा नेताओं को चलता किया|
वही बसपा जिलाध्यक्ष विजय भाष्कर ने बताया की कटर लाने वाला युवक रवि कुमार पुत्र रामप्रकाश निवासी हाथीपुर है| जो पत्थर काटने का कार्य करता है| उसे बसपा की तरफ से निगरानी में लगे विधान सभा अध्यक्ष विजय गौतम ने फोन करके बुलाया था| क्योंकि विजय की डियूटी खत्म हो गयी थी| वह रवि के साथ घर जाने वाले थे| उसी दौरान भाजपा प्रत्याशी के समर्थक आ गये और उन्होंने हंगामा कर दिया|
घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने कटर लेकर आने वाले युवक को हिरासत में ले लिया|अपर पुलिस अधीक्षक त्रिभुवन सिंह आदि मौके पर पंहुचे| पुलिस आरोपी युवक को कटर सहित कोतवाली ले गयी| जिलाधिकारी मोनिका रानी ने बताया कि जाँच करायी जा रही है| जाँच में जो सही होगा उसी आधार पर कार्यवाही होगी|

अंतिम चरण में मतगणना की तैयारी

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फर्रुखाबाद: जिला प्रशासन के द्वारा मतगणना के लिए की जा रही तैयारी लगभग अंतिम चरण में है| वही दूसरी तरफ प्रत्याशियों ने भी अपने विश्वास पात्र एजेंटों की सेना मतगणना के लिए तैयार कर ली है|
सातनपुर गल्ला मंडी में आगामी दो दिन बाद 23 मई को मतगणना होनी है| जिसके लिए मतगणना को कराने के लिए बेरिकेटिंग के साथ ही व्लाक बनाये जा रहे है| जिसके लिए दर्जनों मजदूर पसीना बहा रहे है| मतगणना स्थल को चारों तरफ से टिन लगाकर सुरक्षित किया गया है|
जिलाधिकारी मोनिका रानी ने बताया की सोमबार रात तक मतगणना प्रेक्षक भी जनपद में पंहुच रहे है| प्रशासनिक अधिकारीयों की डियूटी भी लगभग तैयार कर दी गयी है|

अखिलेश नें मायावती से मिल एक घंटे की चर्चा

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लखनऊ: लोकसभा चुनाव 2019 में कल सातवें चरण का मतदान सम्पन्न होने के बाद आए एक्जिट पोल ने भाजपा के खिलाफ अभियान चलाने वाली पार्टियों के सामने संकट ला दिया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ बड़ा गठबंधन बनाने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने उनके सहयोगी दल के मुखिया अखिलेश यादव ने भेंट की। मायावती को आज दिल्ली जाकर संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात करनी थी, लेकिन उन्होंने दिल्ली जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आज लखनऊ में मायावती से भेंट करने उनके आवास, माल एवेन्यू पहुंचे। एक्जिट पोल के बाद इन दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे की मुलाकात के तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। गठबंधन के नेताओं को भी 23 मई को नतीजे आने का इंतजार। इससे पहले ही आज अचानक मायावती से अखिलेश यादव की मुलाकात सुर्खियां बन रही है। माना जा रहा है कि आज बैठक में दोनों नेताओं ने सीटों की संख्या का आंकलन किया। दोनों के बीच करीब एक घंटे तक नई सरकार को लेकर बातचीत हुई। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि कल आए एग्जिट पोल्स के बाद दोनों नेताओं ने मुलाकात का फैसला लिया है। बैठक में दोनों नेताओं ने सीटों की संख्या का आंकलन किया। गठबंधन के नेताओं को उम्मीद है कि यूपी की 80 सीटों में से महागठबंधन को 56 सीटों पर जीत मिलेगी। इसके साथ ही दोनों नेताओं ने सरकार बनाने के लिए विपक्षी दलों के साथ जानें पर भी चर्चा की।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती का अनुमान है कि 23 मई को देश का नया पीएम मिलेगा। दोनों नेता 23 मई को ममता बनर्जी और शरद पवार से बातचीत करेंगे। कांग्रेस से मुलाकात 23 मई को नतीजे आने के बाद करेंगे। एग्जिट पोल के आंकड़ों के बाद तीसरे मोर्चे के लिए कवायद शुरू हो गई है। बसपा का साथ पाने को सभी आतुर होते दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि आज भी मायावती के साथ अखिलेश की मुलाकात में बेहद गंभीर चर्चा हुई। एग्जिट पोल के पूर्वानुमान में एक बार फिर मोदी सरकार के आने की बात कही जा रही है, लेकिन विपक्ष को अभी भी आस है कि एनडीए बहुमत से दूर रहेगा। इस स्थिति में गैर बीजेपी मोर्चे की सरकार बनाने के लिए विपक्ष की कवायद जारी रही। जहां एक तरफ टीडीपी अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू लगातार विपक्ष के नेताओं से मिल रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो कांग्रेस को समर्थन दे सकते हैं।
कई एग्जिट पोल्स में भाजपा को यूपी में बड़ी जीत दिखाई गई है। गठबंधन को बड़ी हार मिलती दिख रही है। एग्जिट पोल्स में गठबंधन में खास सफलता मिलते हुए नहीं दिखाई दे रही है। इसी कारण दोनों पार्टी के अध्यक्षों के लिए यह चिंता का विषय तो जरूर ही है।

गठबंधन और बीजेपी के बीच यूपी में कांटे की टक्कर

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नई दिल्ली/ लखनऊ:  आम चुनाव 2019 के आखिरी चरण की वोटिंग खत्म होने के बाद मीडिया में अलग-अलग सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल्स आ गए। इससे आधिकारिक नतीजों से पहले ही देश का मूड और हवा का रुख भांपने में मदद मिलती है।
चुनाव परिणाम आने तक एग्जिट पोल्स के नतीजे सियासी चर्चाओं के केंद्र में रहते हैं। जानिए- अलग-अलग एजेंसियों के सर्वे में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में किस दल को कितनी सीटें मिल रही है। टाइम्स नाउ-वीएमआर के मुताबिक, भाजपा को 80 में से 58 सीटें मिल सकती हैं। सपा-बसपा गठबंधन को 20 सीटें मिल सकती हैं। कांग्रेस को महज दो सीट मिलती दिख रही है। वहीं न्यूज 24X7 के अनुसार, भाजपा को 51 सीटें और सपा-बसपा को 26 सीटें मिल सकती हैं। यहां भी कांग्रेस को सिर्फ तीन सीट बताई गई है। एबीपी न्यूज-नील्सन के अनुसार भाजपा को भारी नुकसान हो रहा है। गठबंधन को 56 और कांग्रेस को दो सीट मिल सकती है। सुदर्शन न्यूज के एग्जिट पोल के मुताबिक, भाजपा को 52 सीट मिल सकती है। सपा-बसपा के खाते में 26 सीट जा सकती है।
एबीपी के सर्वे के अनुसार अवध क्षेत्र की 23 सीटों में भाजपा गठबंधन को 7 सीटें, सपा बसपा गठबंधन को 14 सीटें तथा कांग्रेस को 2 सीटें मिल रही है।  पश्चिम उत्तर प्रदेश के 27 सीटों में भाजपा गठबंधन को 6, सपा बसपा को 21 तथा कांग्रेस को 2 सीटें मिल रही है। बुंदेलखंड की 4 सीटों पर भाजपा गठबंधन को 1 तथा सपा बसपा गठबंधन को तीन सीटें मिल रही है।  वहीं पूर्वांचल में 26 सीटों पर भाजपा गठबंधन को 8 सीटें, सपा बसपा व लोकदल को 18 सीटें तथा कांग्रेस को 0 सीटें मिल रही है।
टाइम्स नाउ-वीएमआर के सर्वे में यूपी में भाजपा गठबंधन को 58 सीटें, कांग्रेस को 2 तथा सपा+बसपा+ रालोद गठबंधन को 20 सीटें मिलती दिख रही है। भले ही टाइम्स नाउ-वीएमआर सर्वे में महागठबंधन को महज 29 सीटें मिल रही हैं, लेकिन सी-वोटर सर्वे में उसे 40 सीटें मिलने की उम्मीद है। भाजपा को सी वोटर सर्वे में भी बहुत नुकसान होता नहीं दिख रहा है और उसे 38 सीटें मिलने का अनुमान है। हालांकि कांग्रेस को सी-वोटर के सर्वे में भी झटका लगता दिख रहा है। उसे महज 2 सीटें मिलने का ही अनुमान जताया गया है।

भाजपा + कांग्रेस+ सपा+ बसपा+रालोद अन्य
आज तक एक्सीस
एबीपी न्यूज नील्सन  22  2  5  0
सी वोटर  38  2  40  0
टाइम्स नाउ-वीएमआर  58  2  20  0
न्यूज 24X7  51  3  26  0

एग्जिट पोल में देश में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य यूपी (80 सीट) पर देश की नजर है। 2014 में भाजपा ने यहां बंपर सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार मुकाबला पूरी तरह अलग रहा। सपा और बसपा ने हाथ मिलाते हुए महागठबंधन बना लिया, वहीं कांग्रेस भी अपने दम पर चुनाव लड़ी। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को आधिकारिकतौर पर राजनीति में उतार दिया और पश्चिम यूपी की कमाई सौंप दी। चुनाव प्रचार के दौरान यूपी के नेताओं के नई विवादित बयान दिए, जिनके चलते योगी आदित्यनाथ के साथ ही मायावती और आजम खान के चुनाव प्रचार पाबंदी लगी।
यूपी की वीआईपी सीटों में लखनऊ सीट भी शामिल है, जहां से केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह मैदान में हैं। सपा ने उनके खिलाफ शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम को उतारा है। वहीं कांग्रेस ने प्रमोद कृष्णन को टिकट दिया है। इसी तरह वाराणसी (नरेंद्र मोदी), अमेठी (राहुल गांधी बनाम स्मृति ईरानी), रायबरेली (सोनिया गांधी), मैनपुरी (मुलायम सिंह), आजमगढ़ (अखिलेश यादव बनाम निरहुआ), रामपुर (आजम खान बनाम जया प्रदा), गोरखपुर (रवि किशन), कन्नौज (डिंपल यादव) यूपी की वीआईपी सीटों में शामिल हैं।
2014 का नतीजा: 2014 की मोदी लहर में भाजपा को 80 में से 73 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस को सिर्फ दो (अमेठी और रायबरेली) में जीत मिली थी। सपा को 5 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं मायावती की पार्टी का तो खाता भी नहीं खुला था।
आइए हम आपको बताते हैं कि आखिर एग्जिट पोल क्या होते हैं। लगभग सभी बड़े चैनल्स और एजेंसियां मिलकर आखिरी चरण के मतदान खत्म होने के बाद एग्जिट पोल दिखाती हैं। इसमें बताया जाता है कि नतीजे किसके पक्ष में होंगे और किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं। हालांकि जरूरी नहीं है कि परिणाम भी एग्जिट पोल के मुताबिक ही आएं क्योंकि यह सर्वे पर आधारित होता है और सर्वे शत प्रतिशत सही हों, इसकी गारंटी नहीं होती।
आइए हम आपको बताते हैं कि एग्जिट पोल कराने का तरीका क्या होता है। दरअसल एजेंसियां वोट डालने के तुरंत बाद वोटर्स की राय जानती हैं और उसी के आधार पर नतीजे तैयार किए जाते हैं। हालांकि यह सही रूप से पता कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। वहीं वोटिंग से पहले वोटर्स की राय जानकर जो अनुमान लगाए जातें हैं उन्हें ओपिनियन पोल कहते हैं।

भारत का लोकसभा चुनाव विश्‍व का सबसे महंगा

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नई दिल्‍ली: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का 17वां लोकसभा चुनाव दुनिया का सबसे खर्चीला चुनाव है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) के अनुसार सात चरणों में कराए जा रहे इस चुनाव का कुल खर्च 50 हजार करोड़ रुपये (सात अरब डॉलर) है। ओपेन सीक्रेट. ओआरजी के अनुसार 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का खर्च इससे कम करीब 6.5 अरब डॉलर था।
40 फीसद इजाफा
सीएमएस के अनुमान के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव का खर्च करीब 5 अरब डॉलर था। पांच साल बाद 2019 में हो रहे 17वें लोकसभा चुनाव में इस खर्च में 40 फीसद इजाफा हो चुका है।ति प्रति वोटर आठ डॉलर खर्च
जिस देश की साठ फीसद आबादी तीन डॉलर प्रतिदिन पर गुजारा करती है, उसमें प्रति मतदाता औसतन आठ डॉलर का खर्च लोकतंत्र को मुंह चिढ़ाता है। सर्वाधिक खर्च सोशल मीडिया, यात्राएं और विज्ञापन के मद में किया जाता है। 2014 में सोशल मीडिया पर महज 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, इस बार यह खर्च बढ़कर पांच हजार करोड़ रुपये जा पहुंचा है।
विज्ञापन पर खर्च
जेनिथ इंडिया के अनुसार 17वें लोकसभा चुनाव में 26 अरब रुपये सिर्फ विज्ञापन के मद में खर्चे जा सकते हैं। चुनाव आयोग के अनुमान के मुताबिक 2014 में दोनों मुख्य पार्टियों ने विज्ञापन पर करीब 12 अरब रुपये खर्च किए थे।
खर्च सीमा
राज्यों के हिसाब से लोकसभा चुनाव में कोई प्रत्याशी 50 लाख से 70 लाख के बीच खर्च कर सकता है। अरुणाचल प्रदेश, गोवा और सिक्किम को छोड़कर कोई भी उम्मीदवार किसी भी प्रदेश में अपने चुनाव प्रचार में अधिकतम 70 लाख खर्च कर सकता है। ऊपर के तीनों राज्यों में खर्च सीमा 54 लाख है। दिल्ली के लिए यह सीमा 70 लाख जबकि अन्य संघ शासित प्रदेशों के लिए 54 लाख है। विधानसभा चुनावों के लिए यह सीमा 20 लाख से 28 लाख के बीच है। इनमें किसी भी उम्मीदवार के चुनाव प्रचार में शामिल कुल खर्च होता है चाहे वह उसका कोई समर्थक खर्च करे या फिर राजनीतिक दल। चुनाव के पूरा होने के बाद सभी उम्मीदवारों को अपने खर्च का विवरण 30 दिनों के भीतर चुनाव आयोग को देना होता है।
बढ़ता चुनाव खर्च 
चुनाव आयोग के अनुसार पहले तीन लोकसभा चुनावों का खर्च 10 करोड़ रुपये से कम या उसके बराबर था। इसके बाद 1984-85 में हुए आठवें लोकसभा चुनाव तक कुल खर्च सौ करोड़ रुपये से कम था। 1996 में 11वें लोकसभा चुनाव में पहली बार खर्च में पांच सौ करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया। 2004 में 15वें लोकसभा चुनाव तक यह खर्च एक हजार करोड़ रुपये को पार कर गया। 2014 में खर्च 3870 करोड़ रुपये 2009 के खर्च से करीब तीन गुना अधिक था।