चुनाव के बाद अब मंथन की बारी- क्यूँ हारे और क्यूँ जीते?

अब जो कुछ होना था, हो चुका| पांच साल के लिए कुर्सी बुक हो गयी| अब जीतने वाले भले ही मंथन न करे हारने वालों का मंथन शुरू हो चुका है| सबसे पहले जे एन आई पर प्रकाशित बूथ वार मिले मतों की सूची के रविवार को देर रात प्रकाशन करने के बाद इस खबर को पढ़ने वालों की संख्या और जे एन आई के दफ्तर में आकर इस सूची प्राप्त करने की चाहत बढ़ गयी है| जीतने वाला बधाई और आगे की प्लानिंग में जुट गया है और हारने वाले मंथन कर रहे है| कहाँ किसने वोट दिया होगा और किसने नहीं| क्यूँ नहीं दिया होगा इस बात पर भी चिंतन शुरू हो चुका है| ये राजनैतिक जरुरत भी है और आवश्यकता भी भविष्य में राजनीति करने के लिए|

नोट- पाठको से अनुरोध है कि वे स्वस्थ मन से किसी भी लेख को पढ़े, विश्लेषण करे और प्रतिक्रिया दे| ये लेखक के पक्ष में भी हो सकती है और विपक्ष में भी| मगर प्रतिक्रिया देने वाले जब आलोचना करें तो अपनी पहचान खुल कर लिखे| यकीन करिए हम आपकी आलोचनाओ का स्वागत करेंगे और प्रकाशित भी करेंगे| मगर कुछ लोग हैं जो आलोचना तो करना चाहते है मगर अपनी पहचान बताने में डरते है| डरिये मत| जे एन आई जनता का पोर्टल है| हम आपका सम्मान करते है| आप पढ़ते हैं तभी हम लिखते है| वर्ना हमारी हैसियत ही क्या? चुनाव परिणाम वाले दिन फर्रुखाबाद नगर में पढ़े जाने किसी भी अखबार के मुकाबले कहीं अधिक 18563 लोगो ने अपनी उपस्थिति जेएनआई की वेबसाईट पर दर्ज कराई, यही तो हमारी पूँजी है| तीन साल पहले स्थापित वेब अखबार इतनी सफलता पायेगा ये हमें उम्मीद थी| ये पूरे भारत के लिए मीडिया की नयी मिशाल है| एक जिले की खबरों से लबरेज वेबसाईट पर इतने पाठक है, ये फर्रुखाबाद की जनता की बौद्धिकता की निशानी है| आपकी आलोचनाये हमें नयी दिशा देती है| सोचने पर मजबूर करती है| कुछ अच्छा करने का नया रास्ता खोलती है| इसलिए लिखे और खुलकर लिखे| लोकतंत्र में अपने अधिकार पहचाने, हमारी यही कोशिश है|- पंकज दीक्षित (संस्थापक- जोइंट न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (वेब मीडिया)|

तो अब चुनाव में वोट पड़ भी चुके और गिन भी चुके| अब काम की बारी है| जिन्हें नयी जिम्मेदारिया मिली उनकी परीक्षा और जो हार गए गए उनका मंथन| मतगणना के दूसरे दौर से ही मंथन शुरू हो चुका था| ये जनता का मंथन था| इसे पाठक भले ही वे किसी के समर्थक हो स्वस्थ मन से पढ़े| चिंतन करे और जहाँ जरुरत हो सुधार करें/कराये| वैसे इस पोर्टल के और इस जिले के वरिष्ठ एवं चिंतनशील पत्रकार/सम्पादक सतीश दीक्षित अपनी फर्रुखाबाद परिक्रमा में कुछ इशारे कर चुके है|

विजय सिंह ने अपनी पत्नी दयमन्ती सिंह को चुनाव मैदान में उतारा था| ये छोटा चुनाव था जनता से जुड़ने का चुनाव| बूथ पर मिले वोटो के हिसाब से विजय सिंह के साथ नए वोटर जुड़े मगर पुराने वोटर साथ छोड़ गए| अब नेता तो सिर्फ जात की राजनीति करते है और चाहते है लिहाजा उनके साथ जुड़ा पिछड़े वर्ग का वोटर छिटक गया| मुसलमान जमकर वोट डालने निकला और 25% वोट विजय सिंह को दे आया| बाकी वो एकजुट हुआ और थोडा सा हिस्सा छोड़ सब सलमा बेगम को चला गया| जात धर्म पर वोट मांगे गए और डाले गए| लिहाजा सलमा सिर्फ मुसलमानों में सिमट गयी| अगर ये जात धर्म छोड़ मुद्दों और योजनाओ को लेकर वोट मांगे जाते और डाले जाते तो ये तस्वीर बदली होती| खैर नेता को अपने काम पर भरोसा नहीं लिहाजा उसे जात के सहारे ही वोट माँगना है| नगरपालिका के कर्मचारी अफसर से लेकर सफाई कर्मी तक (कुछ अपवाद को छोड़) किसी भी कीमत पर दयमन्ती सिंह को नगरपालिका की कुर्सी पर बैठा नहीं देखना चाहते| ये नीम से भी ज्यादा कडुआ सच है| क्यूँ नहीं देखना चाहते ये खुद दयमन्ती सिंह बेहतर जानती होगी उन्हें चिंतन करना होगा| हालाँकि विजय सिंह के प्रति ऐसी भावना इन लोगो में नहीं दिखी, वे लोकप्रिय है| मुसलमानों का सलमा के लिए एकत्र होना और पिछड़े वर्गों के वोटो का खिसकना तथा दयमन्ती सिंह का कड़क स्वभाव विजय सिंह की हार का प्रमुख कारण रहा| यही चर्चा मतगणना केंद्र से लेकर नगर के चौराहे तिराहे तक मंथन चिंतन के दौरान है|

सलमा बेगम यानि हाजी अहमद अंसारी क्यूँ हारे? इनके हारने के मंथन में कोई ख़ास थ्योरी नहीं है| खालिस जात धर्म पर वोट मांगे गए| न कोई अजेंडा न कोई योजना| सिफ विकास करेंगे| ये शब्द नाकाफी है| नगर के चारो सिरों तक सिर्फ मुसलमनो एकजुट हो जाओ के सिवा कोई आवाज नहीं| अरे चुनाव नगरपालिका का है| कोई मजहबी कमिटी का नहीं| विकास कैसा करेंगे, क्या क्या करेंगे, कैसे कैसे करेंगे| कोई खाका तो खीचा होता| कुछ नहीं बस जात धर्म की सूची बनाओ और लड़ो चुनाव| खूब एकजुट हुए मगर फिर भी हार गए| सलमान खुर्शीद द्वारा दिए गए भाषण से भी नहीं सीखा| लुईस मैडम का चुनाव पूरा बर्फ में लगा गए, मजहबी बात करके| ये फर्रुखाबाद की जनता है जागरूक और बहुत बौद्धिक है| खैर हाजी अहमद अब पांच नहीं तो अलगे लोकसभा तक तो साइकिल पर चलेंगे ही| करोड़ खाड़ फूक नेता बन गए| आगे कैसे बढ़ोगे चिंतन करो|

माला पारिया यानि संजीव पारिया| पारिया साहब ये जनता का चुनाव है वकीलों का नहीं| कचहरी के कैम्पस के बाहर की दुनिया ही अलग है| वहां कचहरी में मुवक्किल की मजबूरी है बाहर खुला खेल फर्रुखाबादी है| तुम्हारा तो घर ही घरवालो ने फूक दिया| जिनकी दम पर चुनाव लड़े थे वे तो अपने वैरी से बदला लेने के लिए तुम्हारे साथ थे| हर पार्टी/प्रत्याशी के लोग खुद को जिताने के लिए लड़ रहे थे| माला पारिया के चुनाव लड़ाने वाले विजय सिंह को हारने के लिए चुनाव लड़ रहे थे| जो जीतने के लिए लड़ रहे थे मन ही मन कुंठित और दुखी है| अरे शमसाबाद में कमल वाला साइकिल को पटखनी दे गया और फर्रुखाबाद में जहाँ तीन महीने पहले भाजपा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे जमानत जब्त हो गयी| अब भाजपा के सहारे चुनाव लड़ने और लड़ाने का दौर फर्रुखाबाद में नहीं होगा| आपके पास न तो कोई जात का अजेंडा था और न ही कोई विकास के सिस्टम की बात जनता तक पहुच| लेट हो गए तो अलग से| तुम्हे तो चिंतन ही यही करना है किसके साथ रहना है|

दो प्रत्याशी और चर्चा में आये| शशि प्रभा और सोनाली गुप्ता| कोई बेस नहीं कोई अजेंडा नहीं| एक बस ब्रह्मण प्रत्याशी नहीं इसलिए वोट मिलेंगे तो दूसरा मनोज को लोग पसंद नहीं कर रहे है इसलिए वोट देंगे| इसके सिवा कोई फंदा नहीं| बेमतलब में पैसे फूक डाले| पांच साल तो जनता के लिए संघर्ष करोगे नहीं और चुनाव में आ जाओगे खड़े होने| अरे पूरे नगर में जलभराव है निकलो सड़क पर तब देखे नेता बनने के गुण| सब जात धर्म के लिए संघर्ष करेंगे जैसे कोई मजहबी कमिटी का गठन होना है| इन दोनों सहित सभी हारे हुए प्रत्याशी पांच साल जनता को उनके हक़ और हकूक दिलाने के लिए संघर्ष करे| जे एन आई की भी यानि सलाह है| फिर देखें खुद को मैदाने जंग में| अलगे पांच साल में ये तस्वीर बदल जायेगी| ये खबर भी जिन्दा रहेगी और पोर्टल भी| जे एन आई की कोशिश रहेगी कि लोग अब जात धर्म नहीं उनके अधिकारों को दिलाने वालो के लिए वोट करें|
जय हिंद