राशनकार्ड न बनाने के लिए डीएसओ ने जिंदा महिला को मुर्दा बता दिया

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फर्रुखाबाद: प्रदेश सरकार द्वारा आन लाइन राशनकार्ड बनवाने की प्रक्रिया ने जहां एक ओर आम जनता को राहत दी है वहीं जिला पूर्ति अधिकारी मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की इस ई-गवर्नेंस की नीति को विफल करने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाये हैं।  लालफीता शाही और बाबू तंत्र में जकड़े पूर्ति विभाग की अपनी समस्‍यायें हैं। एक ऊपरी आमदनी का जरिया कम हो गया है तो दूसरी तरफ काम का बोझ अधिक। क्योंकि निर्धारित समय पर राशनकार्ड बनाकर उपभोक्ता देना होता है।परंतु मनमानी की जिद की हद तो यह है कि अब पूर्ति विभाग लोकवाणी केंद्रों से अपलोड किये गये राशन कार्डों के आवेदनों को निरस्‍त करने के लिये जिंदा लोगों को मृत दिखाने और शासनादेशों के विषय में भ्रामक या झूठी जानकारियां तक फैलाने से नहीं चूक रहा है। ऐसे ही एक आवेदक को जब पूर्ति अधिकारी के आवेदन निरस्‍तीकरण आदेश के विषय में आवेदक को बताया तो अनायास ही उसके मुहं से निकल गया कि ‘अरे मेरी मां को तो जीते जी डीएसओ ने मार डाला।’

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शहर क्षेत्र के मोहल्ला मनिहारी निवासी जितेन्द्र पुत्र विशम्भरनाथ ने अपनी माता जी के राशन कार्ड से अलग अपना राशन कार्ड बनवाने के लिये पहले अपना नाम अपनी मां के राशन कर्ड से कटवाने का आवेदन किया व बाद में उन्‍होंने लोकवाणी केंद्र के माध्‍यम से आन लाइन राशनकार्ड का आवेदन दिनांक 7 अक्टूबर 2012 को आवेदन पत्र संख्या 29022120000438 से किया था। बेचारा जितेन्द्र निश्चिंत था कि प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जा रही आन लाइन सेवा का लाभ उसे घर बैठे ही मिल जायेगा। लेकिन उसे क्या मालूम था कि जिला पूर्ति विभाग एक अदद राशनकार्ड जारी करने की जगह उसकी ही मां को स्वर्गवासी बना देगा। शासन की ओर से राशन कार्ड जारी करने की निर्धारित अवधि दस दिन है। बेचारा जितेंद्र हर दस बारह दिन बाद आकर अपने राशन कार्ड के विषय में लोकवाणी केंद्र पर जानकारी करता और अभी नहीं बना का जवाब सुन कर वापस लौट जाता। आवेदन के ढाई माह ( 81 दिन ) जिला पूर्ति अधिकारी गुलाब चंद्र ने जितेंद्र का आवेदन यह लिख कर निरस्‍त कर दिया कि ‘माता के नाम राशन कार्ड जारी था, जिनकी मृत्‍यु हो चुकी है।’ जब यह बात जितेन्द्र को बतायी गयी तो उसके मुहं से अनायास ही निकला राशनकार्ड न बनाते लेकिन मेरी मां को जीते जी क्यों मार दिया। जितेन्द्र की मां मिथलेश कुमारी कमालगंज में स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारी हैं। उन्हें जब इस बात का पता चला कि जिला पूर्ति अधिकारी ने महज यह कहकर राशनकार्ड निरस्त कर दिया कि आवेदक की मां के नाम राशनकार्ड है और उनकी मृत्यु हो चुकी है। इस बात की जानकारी होते ही मिथलेश कुमारी के पैरों तले जमीन खिसक गयी और वह जिला पूर्ति अधिकारी व उनके पदेन कर्मचारियों को मन ही मन कोस बैठी।

यह कोई नई बात नहीं, जिला पूर्ति विभाग राशनकार्ड न बनाने के लिये आये दिन इसी प्रकार के नये नये आश्चर्यजनक प्रयोग करता चला आ रहा है। लगभग सात हजार आन लाइन राशनकार्डों के आवेदन जिला पूर्ति कार्यालय में लंबित हैं। जिन्हें कर्मचारी बनाने की बजाय उनमें कमियां निकालकर निरस्त कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। मजे की बात  है जिला पूर्ति कार्यालय द्वारा आन लाइन आवेदनों की जांच किसी पूर्ति निरीक्षक से कराने के बजाये जांच के लिये आवेदन कोटेदारों को दे दिये जाते हैं जोकि मनमाने तरीके से जांच रिपोर्ट लगा रहे हैं। कोटेदारों की लापरवाही का खमियाजा जिला प्रशासन की साख और मुख्‍यमंत्री की मंशा पर कितना विपरीत प्रभाव डालता है, इसका अंदाजा शायद जिला पूर्ति अधिकारी को नहीं है।

इस संबंध में जिलापूर्ति अधिकारी से पूछने पर उन्‍होंने काई कमेंट करने से इनकार कर दिया। फिर भी जेएनआई का उनसे अनुरोध है कि यदि वह उचित समझे तो समाचार के नीचे दिये कमेंट बाक्‍स में संसदीय भाषा में अपना पक्ष अंकित कर सकते हैं। जेएनआई उसको यथावत प्रकाशित कर देगा।

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