कहां जा रही है आंगनबाड़ी केन्द्रों से हो रही 35 लाख रुपये मासिक की वसूली?

फर्रुखाबाद:भूख व कुपोषण से जूझ रहे गरीब बच्‍चों व गर्भवती महिलाओं के लिये आने वाले पुष्‍टाहार (पंजीरी) व बना बनाया गर्मागर्म खाना उपलब्‍ध कराने के लिये आंगनबाड़ी केंद्रों पर प्रदेश व केन्द्र सरकार करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं। वहीं जनपद के अधिकारी व कर्मचारी मिलकर योजना के नाम पर लाखों का गोलमाल कर रहे हैं। आंगनबाड़ी पर आने वाले पुष्‍टाहार को बेचने व भोजन उपलब्‍ध कराने के लिये आने वाली नगद धनराशि को डकार जाने की कार्यकत्रियों को खुली छू ट है। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों से इसके बदले दो से ढाई हजार रुपये प्रतिमाह की वसूली की जाती है। जनपद में कुल 1752 आंगनबाड़ी केन्द्र/कार्यकत्रियां हैं। इनमें से कुछ को यदि नेताओं, अधिकारियों या पत्रकारों के नजदीकी मानकर वसूली से छूट प्राप्‍त भी मान लिया जाये तो भी लगभग 35 लाख रुपये से अधिक की मासिक वसूली कार्यक्रम विभाग में एकत्र होती है। हद तो यह है कि ईमानदारी का डंका बजा रहे डीएम मुथुकुमार स्‍वामी के कार्यकाल में भी न तो यह वसूली बंद है और न ही पंजीरी की खुले आम बिक्री। सवाल यह है कि यह पैसा आखिर जाता कहां है?

विदित है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों पर आने वाली पंजीरी बच्चों के बजाय सीधे डेयरियों पर पशुओं के लिए पहुंच जाती है। केन्द्रों पर बच्‍चों की फर्जी उपस्थिति दर्शाकर हाटकुक व पंजीरी का फर्जी वितरण कागजों पर हो रहा है। जोकि किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की नजरों से छिपा नहीं है। जनपद में आंगनबाड़ी केन्द्रों की पंजीरी खुले बाजार में बेचा जाना आम बात है, परंतु इसके लिये  आज तक किसी भी आंगनबाड़ी कार्यकत्री या जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी है। पंजीरी प्रति माह ब्लेक में बिक जाती है व मिलीभगत के चलते जनपद में अधिकारी अनजान बने हुए हैं।

आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां खुलकर बताती हैं कि उनसे प्रति माह दो से ढाई हजार रुपये की वसूली कर ली जाती है। फिर उन्हें खुली छूट दे दी जाती है कि वह पंजीरी को बच्चों को खिलायें या बेच दें। स्‍थिति यह है कि कई कार्यकत्रियां तो टेंपो का भाड़ा देने से अच्छा केन्द्रों से निकलते ही पंजीरी को बेचने में ज्यादा मुनाफा समझती हैं। ऐसे में पशु पालक व उनके दलाल भी पंजीरी वितरण के दिन विकासखण्ड के गोदाम के इर्द गिर्द ही चक्कर काटते नजर आते हैं। उन्हें भी 400 रुपये का दाना मात्र 200 से 300 रुपये में मिल जाता है। पशु पालकों को दाना सस्‍ते में मिल जाता है, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की भी अपनी अच्छी खासी कमाई हो जाती है और अधिकारियों की जेबें गरम हो जातीं हैं। यही कारण है कि दिन पर दिन पंजीरी की कालाबाजारी बढ़ती ही जा रही है।

वसूली की सीधी गणित है। जनपद में 1752 आंगनबाड़ी केन्द्र संचालित हो रहे हैं। ढाई हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से लगभग 43 लाख रुपये की वसूली बनती है। इसमें यदि नेताओं, अफसरों व पत्रकारों की पहचान वाली कार्यकत्रियों को छोड़ भी दे तो भी 35 लाख रुपये मासिक से कम की वसूली का कोई आंकड़ा नहीं बनता है। सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रही वसूली रुपये आखिर कहां जा रहे हैं।

मजे की बात है कि कार्यक्रम अधिकारी राजेश वर्मा व्‍यवस्‍था में सुधार की बात करना तो दूर, सिरे से वसूली की बात ही नकार जाते हैं। अपनी बात के प्रमाण के तौर पर वह अपनी निरीक्षण आख्‍ यायें तक प्रस्‍तुत कर देते हैं, जिनमें आंगनबाड़ी केंद्रो पर शत प्रतिशत उपस्‍थिति व वितरण मिलने का स्‍पष्‍ट रूप से अंकन है। जाहिर है कि यही आख्‍यायें ऊपर तक जाती हैं। है न निर्बाध राम राज्‍य। निर्बाध इस लिये कि किसी भी पार्टी की सरकार आये, कोई भी मुख्‍यमंत्री बने, कोई डीएम हो, इन की सत्‍ता में कोई दखल नहीं पड़ता।