नई दिल्ली. भारतीय रेल रोजाना करीब 2 करोड़ यात्रियों को मंजिल तक पहुंचाती है। देश भर में फैले 64 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे रूट पर करीब17 हजार ट्रेनों के जरिए भारतीय रेल देश की ‘लाइफ लाइन’ बनी हुई है। पर दुनिया के तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क वाली भारतीय रेल दीवालियेपन की कगार पर है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में रेल मंत्रालय का हाल यह है कि उसने सरकार से 39,600 करोड़ रुपये की बजटीय मदद मांगी है। लेकिन वित्त मंत्रालय ने टका सा जवाब देते हुए कहा है, ‘रेल को अनुशासित होने की जरूरत है।’ अब 25 फरवरी को ममता तीसरी बार रेल बजट पेश करने जा रही हैं। इसमें उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि वह रेलवे में अनुशासन (वित्तीय, प्रशासनिक) कैसे लाएंगी।
ममता के नेतृत्व में भारतीय रेल की कमाई में तेज गिरावट और खर्च में बढ़ोतरी हुई है। इस वित्त वर्ष में ही खर्च 1,330 करोड़ रुपये बढ़ गया है, जबकि कमाई 1,142 करोड़ रुपये के करीब घट गई है। आज रेलवे को सौ रुपये कमाने के लिए 95 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जबकि वित्त वर्ष 2007-08 के दौरान यह अनुपात (ऑपरेटिंग रेशियो) इससे काफी कम (75.9/100) था। जाहिर है, ऐसे में रेलवे से बेहतर सुविधा की अपेक्षा रखना बेमानी है। रेल के खजाने में अब सिर्फ 5,000 करोड़ रुपये बतौर रिजर्व राशि जमा हैं, जो हाल के दौर में सबसे कम राशि है। रेलवे के पास इतना पैसा नहीं है कि वह इसे कैपिटल फंड और विकास फंड में जमा कर सके ताकि नई चीजें खरीदी जा सकें और यात्री सुविधाओं में बढ़ोतरी की जा सके।
पिछले साल रेलवे कैपिटल फंड में एक रुपये भी नहीं जमा कर पाई, जो किसी भी संगठन की खस्ताहाली का पहला सबूत है। हालांकि पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहीं ममता बनर्जी ने कोलकाता मेट्रो ट्रेन को सुधारने के लिए 11,000 करोड़ रुपये का ऐलान जरूर कर दिया। रेल के इतिहास में पहली बार सप्लायरों का पैसा रोका गया है। खबर है कि सिग्नल के लिए इस्तेमाल होने वाले केबल और ट्रैक के फिशप्लेट सप्लाई करने वाली एजेंसियों के भुगतान को रोक लिया गया है।

