डेस्क:रात में पेड़-पौधों के आसपास चमकते हुए जुगनुओं के बारे में तो हम सभी ने देखा और सुना है परन्तु आज कल के बच्चे शायद ही कुदरत का इस छोटे से जुगनू को मिले अनमोल तौफे के बारे में जानते होगे|इनकी संख्या शहरों में तो पहले ही बहुत कम ही दिखाई देते हैं लेकिन अब ग्रामीण इलाकों में इनकी संख्या ना के बराबर हो गई है|
चमकने वाले जुगनुओ की खोज वर्ष 1667 में रॉबर्ट बायल नाम के एक वैज्ञानिक ने की थी। पहले यह माना जाता था कि जुगनुओं के शरीर में फास्फोरस होता है और इसी की वजह से ये चमकते रहते हैं लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने इस बात को नकार दिया और बताया कि जुगनू फास्फोरस की वजह से नहीं बल्कि ल्युसिफेरेस नामक प्रोटीनों के कारण चमकते हैं।जुगनुओं के चमकने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य अपने साथी यानी मादा जुगनुओं को आकर्षित करना और अपने लिए भोजन तलाशना होता है।जुगनूओं की चमक तीन तरह के रंग की होती है- हरा,पीला और लाल। मादा जुगनू जंगलों में पेड़ों की छाल में अपने अंडे देती है।आपको जानकर हैरानी होगी कि जुगनूओं के अंडे भी चमकते हैं।परन्तु आजकल रात में जुगनुओं का दिखना कम हो गया है। इसका मुख्य कारण पर्यावरण में बदलाव और उनके प्राकृतिक आवासों का नुकसान है।कीटनाशकों और रसायनों का उपयोग, प्रकाश प्रदूषण और आवासों का विनाश जुगनुओं की संख्या में कमी के मुख्य कारण हैं|जुगनू विशेष रूप से आर्द्रभूमि, घास के मैदानों और जंगलों में रहते हैं और इन आवासों का विनाश उनके लिए खतरा पैदा करता है|रात में कृत्रिम प्रकाश जुगनुओं के संभोग चक्र में बाधा डालता है जिससे उनके लिए साथी ढूंढना और प्रजनन करना मुश्किल हो जाता है|जलवायु परिवर्तन भी जुगनुओं के जीवन चक्र और आवासों को प्रभावित करता है,जिससे उनकी संख्या में गिरावट दिन प्रतिदिन आती चली जा रही है|
आखिर कहाँ गायब हुआ रात को चमकने वाला कीट,जो कुदरत से पाया नायाब तौफा

